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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

निम्नलिखित में उत्तर प्रदेश सरकार की आय की मद कौन-सी है? (क) बिक्री कर(ख) उपहार कर(ग) आय कर(घ) मृत्यु कर

Answer»

सही विकल्प है (क) बिक्री कर।

2.

भारत में बिक्री कर किस सरकार की आय का प्रमुख स्रोत है?

Answer»

राज्य सरकार की।

3.

भारत में कृषि आय कर कौन लगाता है?

Answer»

राज्य सरकार।

4.

मनोरंजन कर किसे सरकार के राजस्व से सम्बन्धित है? यामनोरंजन कर कौन-सी सरकार लगाती है? 

Answer»

मनोरंजन कर राज्य सरकार लगाती है।

5.

बिक्री-कर किस सरकार के द्वारा लगाया जाता है ?

Answer»

बिक्री-कर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लगाया जाता है।

6.

व्यापार कर कौन-सी सरकार लगाती है?

Answer»

व्यापार कर राज्य सरकार लगाती है।

7.

उत्तर प्रदेश सरकार की आय कम होने के दो कारण लिखिए।

Answer»

आय कम होने के दो कारण हैं

⦁    राज्य सरकार की आय के स्रोत अपर्याप्त एवं बेलोच हैं तथा
⦁     जनसंख्या का तीव्र गति से बढ़ना।

8.

रजिस्ट्री शुल्क किस सरकार की आय का स्रोत है ?

Answer»

रजिस्ट्री शुल्क उत्तर प्रदेश सरकार की आय का स्रोत है।

9.

उत्तर प्रदेश सरकार की व्यय की दो प्रमुख मदों को लिखिए।

Answer»

(1) करों, शुल्कों को वसूल करने पर व्यय तथा
(2) सामान्य प्रशासन पर व्यय।

10.

भू-राजस्व के दो दोष बताइए।

Answer»

भू-राजस्व के दो दोष हैं

⦁    यह कर अन्यायपूर्ण है तथा
⦁     कर को वसूल करने में कठिनाइयाँ आती हैं।

11.

उत्तर प्रदेश सरकार की आय की दो प्रमुख मदों को लिखिए।

Answer»

(1) भू-राजस्व या मालगुजारी तथा
(2) बिक्री-कर।

12.

राज्य सरकार द्वारा लगाये जाने वाले किन्हीं दो प्रत्यक्ष और किन्हीं दो अप्रत्यक्ष करों के नाम लिखिए।

Answer»

राज्य सरकार द्वारा लगाये जाने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर निम्नवत् हैं

प्रत्यक्ष कर – (1) कृषि आयकर तथा (2) सम्पत्ति कर।
अप्रत्यक्ष कर – (1) मनोरंजन कर तथा (2) बिक्री-कर।

13.

राज्य सरकार की आय के मुख्य स्रोत क्या हैं ?

Answer»

राज्य सरकार को विभिन्न मदों से प्राप्त होने वाली आय को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  1. कर-राजस्व तथा
  2. गैर-कर राजस्व। प्रदेश की आय में गैर-करे राजस्व की अपेक्षा कर राजस्व का अधिक योगदान है।

राज्य सरकार की आय की मदों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

1. भू-राजस्व या मालगुजारी – यह एक अति प्राचीन कर है। सन् 1948 ई० तक कुल आय का लगभग आधा भाग भू-राजस्व या मालगुजारी से प्राप्त होता था। जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के बाद इस मद से प्राप्त होने वाली आय में धीरे-धीरे कमी होने लगी। इसका भुगतान फसल के समय किया जाता है। सूखा, बाढ़ या अन्य प्राकृतिक विपदा से फसल नष्ट होने पर भू-राजस्व में उदारतापूर्वक छूट भी दी जाती है। वर्तमान में 6.5 एकड़ से अधिक भूमि पर भू-राजस्व लिया जाता है।

2. व्यापारकर या बिक्री कर – ‘बिक्री कर’ या व्यापार कर राज्य सरकार की आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह एक अप्रत्यक्ष कर है, जिसे 1948 ई० में उत्तर प्रदेश में लागू किया गया था। यह विभिन्न वस्तुओं की बिक्री पर लगाया जाता है, किन्तु विक्रेता इसके भार को मूल्य में वृद्धि करके क्रेताओं पर टाल देते हैं।

3. राज्य उत्पादन शुल्क – ‘राज्य उत्पादन शुल्क राज्य की आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह एक परोक्ष कर है, जिसे सामान्यतः ऊँची दरों में मादक वस्तुओं; जैसे-शराब, गाँजा, अफीम, चरस, ताड़ी आदि पर लगाया जाता है। प्रदेश सरकार को इस मद से पर्याप्त आय प्राप्त होती है।

4. स्टाम्प व पंजीयन शुल्क – ‘स्टाम्प शुल्क’ प्राय: दो प्रकार का होता है –

  • न्यायिक स्टाम्प एवं
  • व्यापारिक स्टाम्प।

न्यायिक स्टाम्प न्यायालय में मुकदमा या अन्य कार्यवाही के लिए लगाया जाता है, जब कि व्यापारिक स्टाम्प सम्पत्ति के हस्तान्तरण, उपहार अथवा व्यापारिक सौदों पर लगाया जाता, है इसी प्रकार पंजीयन शुल्क (रजिस्ट्री शुल्क) भी राज्य सरकार की आय का एक महत्त्वपूर्ण साधन है।

5. कृषि आयकर – कृषि आयकर राज्य सरकार की आय का प्रमुख स्रोत है। भारत के अनेक राज्यों में कृषि को आयकर से मुक्त रखा गया है, किन्तु उत्तर प्रदेश सरकार कृषि क्षेत्र पर कर लगाती है। जमींदारी उन्मूलन के बाद से कृषि आयकर से प्राप्त आय में पर्याप्त कमी हुई है और अब यह नाममात्र का स्रोत रह गया है। जिन व्यक्तियों की आय आयकर अधिनियम के अन्तर्गत न्यूनतम सीमा से कम होती है, उन्हें कृषि-आय पर कर नहीं देना पड़ता, परन्तु जिनकी आय अधिक होती है उन्हें कृषि आयकर देना पड़ता है।

6. केन्द्र सरकार से अनुदान या सहायता – केन्द्र सरकार आयकर, केन्द्रीय उत्पाद कर, सम्पदा शुल्क आदि से प्राप्त आय का कुछ भाग वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्यों में वितरित करती है। केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों को आर्थिक विकास कार्यों के लिए भी सहायता दी जाती है। इसके अतिरिक्त राज्यों को कभी-कभी बाढ़, सूखा या अन्य प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी केन्द्र द्वारा विशेष सहायता प्रदान की जाती है। ये राज्य सरकार की आय के प्रमुख स्रोत होते हैं।

7. वाहन कर – मोटर, ट्रकों इत्यादि परिवहन वाहनों पर राज्य सरकार द्वारा कर लगाया जाता है। यह राज्य सरकारों विशेषकर उत्तर प्रदेश सरकार की आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

8. मनोरंजन कर – राज्य सरकार द्वारा मनोरंजन स्थलों, सिनेमाघर आदि पर मनोरंजन कर लगाया जाता | है। यह भी राज्य सरकारों विशेषकर उत्तर प्रदेश सरकार की आय का एक अच्छा स्रोत है। उपर्युक्त करों के अतिरिक्त राज्य सरकार को माल एवं यात्रियों पर कर, विद्युत कर और शुल्क आदि से भी पर्याप्त आय प्राप्त होती है। ये सभी राज्य सरकार की कर राजस्व की मदे हैं। निम्नलिखित मदें राज्य सरकार की गैर-कर राजस्व प्राप्ति की मदें हैं

9. सरकारी उपक्रमों से आय – राज्य सरकारों (उत्तर प्रदेश सरकार) को सरकारी उपक्रमों; जैसे—वन, सिंचाई, बिजली, सार्वजनिक निर्माण, सार्वजनिक उद्योगों से भी आय प्राप्त होती है। सड़क परिवहन व जल परिवहन भी राज्य की आय के मुख्य स्रोत हैं।

10. सामान्य प्रशासन – सामान्य प्रशासन के अन्तर्गत न्यायालय, जेल, पुलिस, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, सहकारिता इत्यादि क्षेत्र आते हैं। इनसे भी राज्य सरकार को आय प्राप्त होती है।

11. ब्याज प्राप्तियाँ, लाभांश और लाभ – प्रदेश सरकार को अपने द्वारा दिये गये ऋणों पर ब्याज तथा सरकारी क्षेत्र के उद्यमों से लाभांश व लाभ प्राप्त होता है। इस प्रकार ब्याज प्राप्तियाँ, लाभांश और लाभ द्वारा भी प्रदेश सरकार को आय होती है।

12. मूल्य संवद्धित कर – यह वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान के प्रत्येक बिन्दु पर प्राथमिक उत्पादन से लेकर अन्तिम उपभोग पर लगाया जाता है। यह उत्पाद की बिक्री और उनमें प्रयुक्त आदाओं की लागतों के अन्तर पर लगाया जाता है। इक्कीस राज्य एवं सभी केन्द्रशासित प्रदेश 1 अप्रैल, 2005 ई० से इसे लागू करने पर सहमत हुए। उत्तर प्रदेश में इसे कुछ समय पहले ही लागू किया गया है।

14.

संगठन से क्या समझते हो? संगठनकर्ता के दो कार्य लिखिए।

Answer»

उत्पादन के विभिन्न उपादानों (भूमि, श्रम व पूँजी) को एकत्रित करके उन्हें उचित व आदर्श अनुपात में उत्पादन कार्य में लगाना संगठन कहलाता है और जो व्यक्ति इस कार्य को सम्पादित करता है उसे संगठनकर्ता, प्रबन्धक, प्रबन्ध संचालक, संचालक या व्यवस्थापक कहते हैं। इस प्रकार संगठनकर्ता प्रबन्ध का कार्य करता है।

संगठनकर्ता के कार्य

संगठनकर्ता के अग्रलिखित प्रमुख कार्य होते हैं –

  1. उत्पादन की योजना का निर्माण करना – उद्यमी के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए संगठनकर्ता . उत्पादन की विस्तृत योजना का निर्माण करता है। उत्पादन कब, कहाँ और कितनी मात्रा में किया जाए, इन सब बातों का निर्धारण संगठनकर्ता को स्वयं करना होता है।
  2. उत्पादन के विभिन्न साधनों का प्रबन्ध – संगठनकर्ता उत्पादने की प्रकृति के अनुरूप उत्पत्ति के साधनों ‘भूमि, श्रम, पूँजी’ को एकत्रित करता है।
15.

इनमें से कौन-सा कर नगर निगम लगाती है?(क) निगम कर(ख) उत्पाद कर(ग) बिजली व पानी कर(घ) सम्पत्ति कर

Answer»

सही विकल्प है (घ) सम्पत्ति कर

16.

निम्नलिखित में से कौन-सा अप्रत्यक्ष कर है?(क) आयकर(ख) कॉपोरेशन कर(ग) सीमा शुल्क(घ) उपहार कर

Answer»

सही विकल्प है (ग) सीमा शुल्क

17.

प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों को परिभाषित कीजिए एवं उनके गुण-दोष लिखिए।याअप्रत्यक्ष करों के चार गुणों का वर्णन कीजिए।यापरोक्ष कर क्या है ? इनके तीन दोष लिखिए।याप्रत्यक्ष कर को परिभाषित कीजिए तथा उसके गुण एवं दोषों की समीक्षा कीजिए।

Answer»

‘कर’ सरकारी अधिकारियों द्वारा वसूल किये जाने वाले वे अनिवार्य अंशदान हैं, जो सार्वजनिक व्यय को पूरा करने के लिए किये जाते हैं। ये (कर) दो प्रकार के होते हैं—

  1. प्रत्यक्ष कर तथा
  2. अप्रत्यक्ष कर।

प्रत्यक्ष कर

प्रत्यक्ष कर जिस व्यक्ति पर लगाये जाते हैं, उसका भुगतान उसी व्यक्ति द्वारा किया जाता है; अर्थात् जो कर व्यक्तियों पर सीधे लगाये जाते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष कर कहते हैं। करदाता इसका भार दूसरों पर नहीं टाल सकता। ये परोक्ष कर भी कहलाते हैं।

गुण – प्रत्यक्ष करों के गुण निम्नलिखित हैं

1. न्यायपूर्ण – प्रत्यक्ष कर न्यायपूर्ण होते हैं, क्योंकि ये व्यक्तियों की करदान क्षमता के आधार पर लगाये जाते हैं। इन करों का भार धनी वर्ग पर अधिक तथा निर्धन पर कम पड़ता है।

2. मितव्ययता – प्रत्यक्ष करों में मितव्ययता पायी जाती है, क्योंकि इन करों को वसूल करने में राज्य को अधिक व्यय नहीं करना पड़ता है। करदाता इन्हें सीधे राजकोष में जमा करता है।

3. निश्चितता – प्रत्यक्ष करों में निश्चितता का गुण भी पाया जाता है, क्योंकि इन करों के सम्बन्ध में करदाता को पूर्ण जानकारी रहती है कि उसे कितनी मात्रा में कर देना है।

4. लोचता – प्रत्यक्ष कर लोचदार होते हैं। सरकार इन करों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर सकती है।

5. नागरिक चेतना – प्रत्यक्ष कर नागरिक स्वयं जमा करता है। अतः वह यह जानने का प्रयास करता है कि दिये गये कर का उपयोग सार्वजनिक हित के कार्यों में हो रहा है अथवा नहीं। इस प्रकार कर का भुगतान करने से व्यक्ति में आदर्श नागरिकता एवं कर्तव्यपरायणता की भावना जाग्रत होती है।

6. उत्पादकता – प्रत्यक्ष कर उत्पादक होते हैं। करों की मात्रा में थोड़ी-सी वृद्धि से ही अधिक आय प्राप्त हो जाती है, जिसका उपयोग देश के आर्थिक विकास में किया जा सकता है।

7. समानता – प्रत्यक्ष कर आर्थिक असमानता को दूर करने का प्रयास करते हैं।

दोष – प्रत्यक्ष करों के दोष निम्नलिखित हैं –

1. करों की चोरी – प्रत्यक्ष करों का भुगतान व्यक्ति ईमानदारी के साथ नहीं करते। समाज में अधिक आय प्राप्त करने वाले वर्ग झूठे हिसाब-किताब बनाकर व अपनी आय कम प्रदर्शित करके करों से बचने का प्रयास करते हैं।

2. असुविधाजनक – प्रत्यक्ष कर असुविधाजनक व कष्टप्रद होते हैं। करदाता को आय-व्यय का विवरण तैयार कर अधिकारी के सम्मुख प्रस्तुत करना पड़ता है तथा उसे पूर्णरूप से सन्तुष्ट करना पड़ता है।

3. बेईमानी को प्रोत्साहन – प्रत्यक्ष कर का भार सच्चे व ईमानदार व्यक्तियों पर अधिक पड़ता है, क्योंकि बेईमान व्यक्ति झूठे हिसाब-किताब व रिश्वत द्वारा इन करों से बच जाते हैं इस प्रकार इन करों से बेईमानी व भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलता है।

4. करों की मनमानी दरें – प्रत्यक्ष करों की दरें सरकार स्वेच्छापूर्वक निर्धारित करती है। इन करों के निर्धारण में किसी प्रकार का वैधानिक आधार नहीं होता है। राज्य या सरकार द्वारा करारोपण की उच्च दरों से प्रभावित होकर लोग अपने उत्पादन-कार्य को सीमित कर देते हैं।

5. प्रत्यक्ष कर निर्धन वर्ग पर नहीं लगाये जा सकते – प्रत्यक्ष कर सभी नागरिकों के ऊपर नहीं लगाये जाते। एक निश्चित सीमा से कम आय वाले लोग इन करों से मुक्त रहते हैं  नैतिक दृष्टि से यह उचित नहीं है, क्योंकि इससे समाज धनी एवं निर्धन वर्ग में विभक्त हो जाता है।

6. सीमित क्षेत्र – प्रत्यक्ष कर कुछ व्यक्तियों से लिया जाता है। इस प्रकार आय के लिए समाज के कुछ थोड़े-से व्यक्तियों (धनी वर्ग) पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

7. अफसरशाही – प्रत्यक्ष करों के सम्बन्ध में अधिकांश निर्णय अधिकारियों द्वारा लिये जाते हैं। निर्णय करने में अधिकारीगण भ्रष्ट तरीके अपनाते हैं, जिससे समाज में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाता है।

अप्रत्यक्ष कर

अप्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं, जिनका कराधान एक व्यक्ति पर तथा कर भार दूसरे व्यक्ति पर पड़ता है; अर्थात् सरकार द्वारा जिस व्यक्ति पर कर लगाया जाता है, वह केर के भार को दूसरे व्यक्ति के ऊपर टाल देता है। ये अपरोक्ष कर भी कहलाते हैं।

गुण – अप्रत्यक्ष करों के गुण निम्नलिखित हैं –

1. सुविधाजनक – अप्रत्यक्ष कर सुविधाजनक होते हैं, क्योंकि करदाता को भुगतान करते समय इस बात का आभास नहीं होता कि वह कर का भुगतान कर रहा है। ये वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य में ही सम्मिलित रहते हैं। सरकार के लिए भी ये सुविधाजनक रहते हैं, क्योंकि वह इन करों को उत्पादकों या व्यापारियों से एकमुश्त सरलतापूर्वक प्राप्त कर लेती है।

2. करवंचन कठिन होता है – करदाता अप्रत्यक्ष करों की चोरी नहीं कर पाता, क्योंकि ये वस्तुओं के मूल्य में सम्मिलित होते हैं। जब कोई उपभोक्ता वस्तुएँ खरीदता है, तो उसे ये आवश्यक रूप से देने पड़ते हैं।

3. न्यायपूर्ण – ये कर न्यायपूर्ण होते हैं, क्योंकि समाज का प्रत्येक व्यक्ति इन करों का भुगतान करता है। जो व्यक्ति अधिक वस्तुओं एवं सेवाओं का उपयोग करता है, उसे अधिक तथा जो वस्तुओं एवं सेवाओं का कम प्रयोग करता है, उसे कम भुगतान करना पड़ता है।

4. सामाजिक हित की दृष्टि से उत्तम – अप्रत्यक्ष कर सामाजिक लाभ की दृष्टि से उत्तम होते हैं, क्योंकि सरकार करों की मात्रा में वृद्धि करके उस प्रकार की उपभोग वस्तुओं के प्रयोग को हतोत्साहित करे सकती है, जिनका समाज पर कुप्रभाव पड़ता है।

5. लोचदार – अप्रत्यक्ष करों की प्रकृति लोचदार होती है। आवश्यक वस्तुओं पर कर में थोड़ी-सी वृद्धि करके सरकार अपनी आय में वृद्धि कर सकती है।

6. विस्तृत आधार – अप्रत्यक्ष करों का आधार विस्तृत होता है, क्योंकि सरकार अनेक मदों पर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कर लगाकर अधिक आय प्राप्त करने में सफल होती है।

दोष – अप्रत्यक्ष करों के दोष निम्नलिखित हैं

1. कर-भार परिवर्तन से हानि – अप्रत्यक्ष करों में कर का भार एक-दूसरे पर टालने का प्रयास किया जाता है, जिसके कारण अन्तिम व्यक्ति पर इन करों का भार अधिक पड़ता है उदाहरण के लिएबिक्री-कर फर्म देती है। फर्म इसका भार थोक व्यापारियों पर, थोक व्यापारी फुटकर व्यापारी पर तथा फुटकर व्यापारी मूल्य-वृद्धि करके उपभोक्ताओं पर टाल देता है।

2. मितव्ययिता का अभाव – इन करों को वसूल करने में सरकार को अधिक व्यय करना पड़ता है। इस कारण ये मितव्ययी नहीं होते।

3. न्यायसंगत नहीं – अप्रत्यक्ष कर प्रायः वस्तुओं एवं सेवाओं के उपभोग पर लगाये जाते हैं। इसलिए इनको भार निर्धन वर्ग पर अधिक पड़ता है।

4. ये कर अनिश्चित होते हैं – परोक्ष करों से होने वाली आय अनिश्चित होती है, क्योंकि अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं की बिक्री की मात्रा पर निर्भर होते हैं। उपभोक्ताओं की माँग का पूर्वानुमान प्राय: लगाना कठिन होता है; अतः यह कहा जा सकता है कि अप्रत्यक्ष कर अनिश्चित होते हैं।

5. करों की चोरी का प्रयास – अप्रत्यक्ष करों की चोरी का प्रयास भी किया जाता है। उदाहरण के लिए–सरकार बिक्री-कर लगाती है। विक्रेता वस्तुओं की बिक्री का झूठा लेखा-जोखा रखता है तथा बिक्री-कर को राजकोष में जमा नहीं करता है, जब कि उपभोक्ताओं से यह वसूल कर लिया जाता है।

6. नागरिकता की भावना का अभाव – करदाताओं को अप्रत्यक्ष करों का भुगतान करते समय कर-भार अनुभव नहीं होता है। इसलिए उन्हें इस विषय में किसी प्रकार की रुचि नहीं होती है कि कर का उपभोग जनहित की दृष्टि से हो रहा है या नहीं।

7. प्रभावपूर्ण माँग में कमी – अप्रत्यक्ष करों की दरों में वृद्धि करने से वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिनके कारण वस्तुओं की माँग में कमी आती है। माँग में कमी का प्रभाव उत्पादन एवं राष्ट्रीय आय दोनों पर पड़ता है, जिससे राष्ट्र के विकास में बाधा पड़ती है।

18.

उत्तर प्रदेश सरकार की व्यय की मदों का उल्लेख कीजिए।याराज्य सरकार की व्यय की किन्हीं तीन मदों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व व्यय को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है

(अ) आयोजनागत व्यय – इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से करों की वसूली का व्यय, प्रशासनिक सेवाओं पर व्यय एवं सामाजिक, सामुदायिक तथा आर्थिक सेवाओं पर हुए व्यय सम्मिलित किये जाते हैं।
(ब) आयोजनेतर व्यय – इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से करों की वसूली, ब्याज को भुगतान, ऋण सेवा, सामान्य प्रशासनिक सेवाएँ एवं सामाजिक, सामुदायिक तथा आर्थिक सेवाओं पर किये जाने वाले व्यय सम्मिलित किये जाते हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की व्यय की मुख्य मदें निम्नलिखित हैं –

1. कर-शुल्क व अन्य राजस्वों की वसूली – इस मद के अन्तर्गत कृषि आयकर, भू-राजस्व, राज्य उत्पादन कर, वाहन कर, बिक्री कर, स्टाम्प, रजिस्ट्री शुल्क, मनोरंजन कर इत्यादि की वसूली में होने वाले व्ययं सम्मिलित किये जाते हैं। सरकार को इन्हें वसूल करने में पर्याप्त व्यय.करना पड़ता है।

2. सार्वजनिक या सामान्य प्रशासन पर व्यय – सार्वजनिक प्रशासन के अन्तर्गत न्याय, जेल, पुलिस, चिकित्सा इत्यादि विभागों के प्रशासनिक व्यय सम्मिलित होते हैं। सामान्य प्रशासन में विधानमण्डल, राज्यपाल, मन्त्रिपरिषद् के निर्वाचन एवं वेतन-भत्ते के व्यय, सचिवालय, लोक सेवा आयोग, जिला प्रशासन, कोषागार, सार्वजनिक निर्माण कार्य पर होने वाले मदों को सम्मिलित किया जाता है। पेंशन तथा प्रकीर्ण सेवाओं पर होने वाले व्ययों को भी इसी मद में रखा जाता है।

3. ब्याज भुगतान व ऋण सेवा – सरकार समय-समय पर अपने अतिरिक्त व्ययों की पूर्ति के लिए ऋण लेती है। इन ऋणों के भुगतान एवं ब्याज के भुगतान पर भी सरकार को प्रति वर्ष व्यय करना पड़ता है। उपर्युक्त व्यय प्रदेश सरकार द्वारा गैर-योजनागत मद के अन्तर्गत किये जाते हैं। प्रदेश सरकार द्वारा किये गये अग्रलिखित व्यय योजनागत मदों के अन्तर्गत किये जाते हैं –

4. सामाजिक, सामुदायिक एवं आर्थिक सेवाएँ तथा सहायक अनुदान – इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से शिक्षा, कला, संस्कृति, चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य व परिवार कल्याण, श्रम और सेवायोजन, सहकारिता, कृषि, सिंचाई, भू-संरक्षण, क्षेत्र विकास, पशुपालन, वन, सामुदायिक विकास, उद्योग व खनिज, जलविद्युत, परिवहन एवं संचार, विशेष व पिछड़े हुए क्षेत्र आदि मदें सम्मिलित की जाती हैं। इन मदों पर सरकार द्वारा पर्याप्त व्यय किया जाता है।

5. शिक्षा, कला एवं संस्कृति – शिक्षा के अन्तर्गत प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा, तकनीकी, प्रावैगिक व चिकित्सा शिक्षा आते हैं। इसके अतिरिक्त सांस्कृतिक विकास पर भी सरकार पर्याप्त व्यय करती है।

6. कृषि-सम्बन्धी विकास – कृषि विकास कार्यक्रमों के अन्तर्गत मुख्य रूप से कृषि, पशुपालन, सहकारिता, लघु सिंचाई, भू-संरक्षण, मत्स्यपालन, डेयरी उद्योग इत्यादि मदों को सम्मिलित करते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार इन मदों पर प्रति वर्ष अरबों रुपये व्यय करती है।

7. चिकित्सा, सार्वजनिक स्वच्छता, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण – उत्तर प्रदेश सरकार चिकित्सा, परिवार नियोजन व सार्वजनिक स्वच्छता एवं स्वास्थ्य व परिवार कल्याण पर प्रति वर्ष पर्याप्त धनराशि व्यय करती है।

8. सामुदायिक विकास सेवाएँ – राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर सामाजिक व आर्थिक असमानताओं को कम करने के लिए अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम संचालित किये जाते हैं, जिन पर उसे अत्यधिक धनराशि का व्यय करना पड़ता है।

9. उद्योग व खनिज – उद्योग व खनिज विकास पर उत्तर प्रदेश सरकार प्रति वर्ष करोड़ों रुपये व्यय करती है।

10. जल-विद्युत एवं विकास – राज्य द्वारा ग्रामीण विद्युतीकरण की नीति को लागू करने हेतु तथा पेयजल समस्या को दूर करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाये गये हैं। नदी-घाटी योजनाएँ, नलकूप निर्माण, ताप बिजलीघरों की स्थापना आदि विकास-कार्यक्रमों पर सरकार द्वारा अत्यधिक व्यय किया जाता है।

11. परिवहन व संचार – तार, वायरलेस, राजकीय परिवहन व संचार की मदों पर भी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पर्याप्त व्यय किया जाता है।

12. विशेष एवं पिछड़े हुए क्षेत्र – प्रदेश के विशेष रूप से पिछड़े या विशेष क्षेत्रों पर भी सरकार अत्यधिक व्यय करती है। इन क्षेत्रों के विभिन्न विकास-कार्यक्रमों पर राज्य सरकार द्वारा अतिरिक्त धनराशि का व्यय किया जाता है।

19.

नगरपालिकाओं की व्यय की दो प्रमुख मदों को लिखिए।

Answer»

नगरपालिकाओं की व्यय की दो प्रमुख मदें हैं-

1.शिक्षा तथा

2.सार्वजनिक स्वास्थ्य व चिकित्सा।

20.

रिकार्डो क्यों प्रसिद्ध हैं ?

Answer»

रिकार्डो अपने ‘लगान के सिद्धान्त’ के लिए प्रसिद्ध हैं।

21.

ब्याज का क्या अर्थ है? ब्याज क्यों लिया जाता है ?

Answer»

ब्याज का अर्थ-पूँजी उत्पादन का प्रमुख साधन है। व्यक्ति अपनी आय में से आवश्यकताओं में कटौती करके कुछ बचत अवश्य करता है। उस बचत का उपयोग वह दो प्रकार से करता है –

  1. स्वयं विनियोग कर मूल से अधिक धन का अर्जन करता है।
  2. बचत को विनियोग के इच्छित अन्य व्यक्ति को वह पूँजी के उपयोग के लिए देता है, जिसके बदले में विनियोगकर्ता उस व्यक्ति को कुछ अतिरिक्त धन प्रदान करता है।

इस प्रकार स्वयं विनियोग द्वारा मूलधन से अधिक धन का अर्जन करना अथवा विनियोगकर्ता द्वारा मूलधन से अतिरिक्त का अंश प्रदान करना ब्याज कहलाता है। मूलधन से अतिरिक्त धन कमाने की इच्छा से ब्याज लिया जाता है।

22.

उद्यमी (साहसी) किसे कहते हैं ?

Answer»

व्यवसाय में जोखिम को सहन करने वाले व्यक्ति को उद्यमी या साहसी कहते हैं।

23.

ग्राम पंचायत की स्थापना होती है(क) महानगरों में(ख) ग्रामीण क्षेत्रों में(ग) ब्लॉक में(घ) छोटे शहरों में

Answer»

सही विकल्प है (ख) ग्रामीण क्षेत्रों में

(ख) ग्रामीण क्षेत्रों में
24.

लगान का क्या अर्थ है ?

Answer»

लगान से सामान्य अभिप्राय भूमि, मकान, मशीन आदि के उपयोग के लिए उसके मालिक को दिये गये किराये से है।

25.

रिकार्डों के लगान सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए।यालगान से क्या आशय है ? लगान का आधुनिक सिद्धान्त लिखिए।

Answer»

भूमि के स्वामी को प्रतिफल के रूप में उत्पादन में से जो भाग मिलता है, उसे लगान कहते हैं। दूसरे शब्दों में, सामान्यतः लगान का अभिप्राय भूमि, मकान, मशीन आदि के उपयोग के लिए उसके मालिक को दिये गये किराये से होता है। लगान निर्धारण के सम्बन्ध में दो प्रकार के सिद्धान्त प्रचलित हैं-पहला रिकार्डों का लगान सिद्धान्त और दूसरा माँग-पूर्ति का आधुनिक लगान सिद्धान्त।

रिकार्डों का लगान सिद्धान्त-रिका के अनुसार केवल भूमि ही लगान प्राप्त कर सकती है, क्योंकि भूमि में कुछ ऐसी विशेषताएँ विद्यमान हैं जो अन्य साधनों में नहीं होतीं; जैसे-भूमि प्रकृति का नि:शुल्क उपहार है, भूमि सीमित होती है आदि। रिकार्डो ने इस सिद्धान्त की व्याख्या भूमि के आधार पर की है।

रिकार्डों के अनुसार, “लगान भूमि की उपज को वह भाग है जो भूमि के स्वामी को भूमि की मौलिक तथा अविनाशी शक्तियों के प्रयोग के लिए दिया जाता है।”

रिकाडों के अनुसार, सभी भूमियाँ एक समान नहीं होतीं उनमें उपजाऊ शक्ति तथा स्थिति में अन्तर पाया जाती है। कुछ भूमियाँ अधिक उपजाऊ तथा अच्छी स्थिति वाली होती हैं तथा कुछ अपेक्षाकृत घटिया होती हैं। जो भूमि स्थिति एवं उर्वरता दोनों ही दृष्टिकोण से सबसे घटिया भूमि हो तथा जिससे उत्पादन व्यय के बराबर ही उपज मिलती हो, अधिक नहीं, उस भूमि को रिकाडों ने सीमान्त भूमि कहा है। रिकाडों ने सीमान्त भूमि की अपेक्षा अधि-सीमान्त भूमि को बेहतर माना है। अतः रिकार्डों के अनुसार, “लगान अधि-सीमान्त और सीमान्त भूमि से उत्पन्न होने वाली उपज का अन्तर होता है।’ चूंकि सीमान्त भूमि से केवल उत्पादन व्यय के बराबर उपज मिलती है और कुछ अतिरिक्त नहीं मिलती, इसलिए रिकार्डों के अनुसार ऐसी भूमि पर कुछ अधिशेष (लगान) भी नहीं होता अर्थात् सीमान्त भूमि लगानरहित भूमि होती है।

उदाहरण – मान लिया कि ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ व ‘घ’ भूमि के चार टुकड़े हैं, जिन पर क्रमशः 10, 20, 30 व 40 क्विण्टल गेहूं उत्पन्न होता है। ‘क’ सीमान्त भूमि है तथा ‘ख’, ‘ग’ व ‘घ’ अधि-सीमान्त भूमि। अतः ‘ख’, ‘ग’ व ‘घ’ भूमि पर 10, 20 व 30 क्विण्टल गेहूँ के रूप में लगान प्राप्त होता है।

लगान का आधुनिक सिद्धान्त – आधुनिक अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि लगाने का निर्धारण माँग-पूर्ति के आधार पर होता है। इनका कहना है कि उत्पादन का प्रत्येक साधन अपनी विशिष्टता के आधार पर लगान प्राप्त कर सकता है, क्योंकि उत्पत्ति के सभी साधन परिमाण में सीमित होते हैं। उनके अनुसार लगान तो साधन की विशिष्टता के लिए पुरस्कार है।

वास्तव में, लगान उत्पन्न होने का मुख्य कारण उत्पादन के साधनों का माँग की तुलना में सीमित होना है। इस मत की मुख्य प्रतिपादक जॉन रॉबिन्सन हैं। इनके अनुसार, “लगान की धारणा का सार वह आधिक्य है, जो एक साधन की इकाई उसे न्यूनतम आय के ऊपर प्राप्त करती है, जो साधन को अपना कार्य करते रहने के लिए आवश्यक है।

इस प्रकार लगान एक आधिक्य (बचत) है, जो किसी साधन की एक इकाई को उसके कुल पूर्ति मूल्य के अतिरिक्त प्राप्त होता है। कुल पूर्ति मूल्य वह न्यूनतम राशि है, जो किसी साधन को वर्तमान व्यवसाय में बनाये रखने के लिए आवश्यक है। इसे ‘अवसर लागत’ अथवा हस्तान्तरण आय’ भी कहते हैं। सूत्रे रूप में, लगान को निम्नवत् व्यक्त किया जा सकता है

लगान = साधन की वास्तविक आय – अवसर लागत

इस अवधारणा के दो प्रमुख बिन्दु हैं—प्रथम, उत्पादन के सभी साधन लगान प्राप्त कर सकते हैं तथा द्वितीय, सेवाओं के हस्तान्तरण के द्वारा लगान की उपलब्धता सुनिश्चित होती है।

उदाहरण – मान लिया कि, एक प्रबन्धक अपने कार्य/सेवा के बदले ₹ 40,000 प्राप्त करता है। यदि वह दूसरे सर्वश्रेष्ठ उद्योग में ₹ 35,000 कमा सकता है, तो यह उसकी सेवाओं की न्यूनतम पूर्ति कीमत होगी। यहाँ वह ₹ 5,000 अतिरिक्त (40,000 – 35,000 = ₹ 5,000) कमाता है। यही लगान है।

इस प्रकार आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार –

  1. उत्पादन का प्रत्येक साधन लगान प्राप्त कर सकता है।
  2. लगान विशिष्टता का परिणाम है। जो साधन जिस अंश तक विशिष्ट होता है, उसे उस अंश तक ही लगान प्राप्त होता है।
  3. लगान = साधन की वास्तविक आय – अवसर लागत।
26.

निम्नलिखित में से कौन स्थानीय निकाय की आय का स्रोत है?(क) आयकर(ख) उत्पादन कर(ग) चुंगी कर(घ) व्यापार कर

Answer»

सही विकल्प है (ग) चुंगी कर

27.

साहस अथवा उद्यम से आप क्या समझते हैं ? एक साहसी क्या कार्य करता है ?याउद्यम से आप क्या समझते हैं ? उत्पादन में उद्यमी का क्या महत्त्व है?या‘साहसी का अर्थ समझाइए। एक सफल साहसी के चार गुणों का वर्णन कीजिए।

Answer»

साहस अथवा उद्यम

प्रत्येक व्यवसाय या उत्पादन-कार्य में कुछ जोखिम (Risk) या अनिश्चितता अवश्य होती है, क्योंकि उत्पादन की मात्रा भविष्य की माँग पर आधारित होती है। यदि माँग का अनुपात ठीक रहता है तब उद्यमी को लाभ होता है, अन्यथा हानि ही होती है। उत्पादन-कार्य में लाभ व हानि दोनों की सम्भावना होती है। इस प्रकार अर्थशास्त्र में किसी उत्पादन या व्यवसाय की अनिश्चितता या जोखिम को साहस या उद्यम कहते हैं।” इसे अनिश्चितता को सहन करने वाले व्यक्ति को साहसी अथवा उद्यमी कहते हैं।

प्रो० जे०के० मेहता के अनुसार, “उत्पादन में सदैव कुछ-न-कुछ जोखिम रहता है। इस जं.खिम से उत्पन्न होने वाली हानियों को सहन करने के लिए किसी-न-किसी व्यक्ति की आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति इन हानियों को सहन करता है, उसे साहसी या उद्यमी कहते हैं।”

उद्यमी का महत्त्व

आधुनिक युग में साहसी या उद्यमी का स्थान महत्त्वपूर्ण है। वह सम्पूर्ण उत्पादन व्यवस्था का आधार, संचालक व निर्णायक है, क्योंकि प्रत्येक व्यवसाय में कुछ-न-कुछ जोखिम अवश्य होता है और जब तक इस जोखिम को उठाने के लिए कोई व्यक्ति तैयार नहीं होगा, तब तक व्यवसाय प्रारम्भ नहीं होगा। अतः उद्यमी का महत्त्व निम्नवत् व्यक्त किया जा सकता है –

  1. उद्यमी उत्पादन का आधार है।
  2. देश की आर्थिक उन्नति एवं विकास एक बड़ी सीमा तक कुशल और योग्य साहसियों पर निर्भर करता है।
  3. साहसी ही उत्पादन के अन्य उपादानों को पारिश्रमिकों का भुगतान करता है।
  4. साहसी वास्तव में एक सेनापति का कार्य करता है। अतः औद्योगिक संगठन में साहसी का महत्त्व अधिक है।

साहसी अथवा उद्यमी के कार्य

साहसी अथवा उद्यमी के कार्यों को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है –

(क) निर्णयात्मक कार्य – एक उद्यमी को निर्णय सम्बन्धी निम्नलिखित कार्य करने पड़ते हैं

  1. उद्योग या व्यवसाय का चुनाव
  2. वस्तु का चुनाव
  3. उत्पादन स्थल का चुनाव
  4. उत्पादन के आकार का निर्णय तथा
  5. उत्पादन के उपादानों का एकत्रीकरण।

(ख) वितरणात्मक कार्य – उद्यमी को उत्पादन-कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए विभिन्न उपादानों का सहयोग प्राप्त करना पड़ता है। उत्पादन के उपादानों के सहयोग, त्याग एवं परिश्रम के लिए उद्यमी को उन्हें उचित पारिश्रमिक देना पड़ता है। यह पारिश्रमिक उद्यमी को उत्पादन के साधनों की सीमान्त उत्पादकता को ध्यान में रखकर देना होता है।

(ग) जोखिम सहन करने का कार्य – उत्पादन कार्य में सदैव कुछ-न-कुछ जोखिम अवश्य रहता है। उत्पादन के अन्य उपादानों को प्रत्येक दशा में अपना पारिश्रमिक चाहिए। उनका किसी प्रकार की हानि से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। अत: व्यवसाय से सम्बन्धित सभी जोखिम उद्यमी को सहन करने पड़ते हैं।

उद्यमी (साहसी) के गुण

साहसी अथवा उद्यमी के प्रमुख गुण निम्नवत् हैं-

  1. उसे दूरदर्शी एवं उत्साही होना चाहिए।
  2. उसमें मनुष्य के स्वभाव, रुचि एवं योग्यता को परखने की क्षमता होनी चाहिए।
  3. उसमें तुरन्त एवं सही निर्णय लेने की योग्यता होनी चाहिए।
  4. उसमें आत्मविश्वास और साहस होना चाहिए।
  5. उसे पर्याप्त व्यावसायिक अनुभव एवं ज्ञान होना चाहिए।
  6. उसे अपने उद्योग से सम्बन्धित होने वाले नित नये आविष्कारों का ज्ञान होना चाहिए।
  7. उसे कुशल प्रशासक होना चाहिए अर्थात् व्यवसाय के प्रशासन में उसे उदार, निष्पक्ष एवं ईमानदार होना चाहिए।
28.

एक उद्यमी के दो गुण लिखिए।

Answer»

एक उद्यमी के दो गुण निम्नवत् हैं –

1.वह दूरदर्शी व बुद्धिमान होना चाहिए तथा

2.उसमें शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए।

29.

संगठन किसे कहते हैं ? आधुनिक युग में इसका क्या महत्त्व है ?याउत्पादन प्रक्रिया में संगठन की भूमिका बताइए।

Answer»

उत्पादन के विभिन्न उपादानों को उचित व आदर्श अनुपात में जुटाकर अधिक उत्पादन करने के कार्य को संगठन कहा जाता है और जो व्यक्ति इस कार्य को सम्पादित करता है, उसे संगठनकर्ता, प्रबन्धक़ या व्यवस्थापक कहते हैं। संक्षेप में, जो व्यक्ति संगठन का कार्य करता है, उसे संगठनकर्ता कहते हैं।

संगठन का महत्त्व –

  1. आधुनिक युग में बड़े पैमाने के उत्पादन, श्रम-विभाजन आदि के कारण उत्पादन प्रणाली अत्यन्त जटिल हो गयी है। इस कारण यह आवश्यक हो गया है कि उत्पत्ति के साधनों को उचित अनुपात में मिलाया जाए तथा उनमें प्रभावपूर्ण समायोजन स्थापित किया जाए जिससे कि न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन किया जा सके। इस कार्य को संगठनकर्ता ही सम्पादित कर सकता है।
  2. वर्तमान समय में उत्पादन की कुशलता प्रबन्धक की योग्यता तथा कुशलता पर भी निर्भर होती है। यदि प्रबन्धक योग्य, ईमानदार तथा व्यवहारकुशल है, तब उत्पादन अधिक तथा श्रेष्ठ होगा, जिससे व्यवसाय में अधिकतम लाभ प्राप्त होगा।
  3. संगठनकर्ता का महत्त्व पूँजीवादी, समाजवादी तथा मिश्रित अर्थव्यवस्था सभी में बढ़ता जा रहा है।
  4. बिना उचित प्रबन्ध के बड़े पैमाने का उत्पादन कठिन ही नहीं, वरन् असम्भव भी है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि प्रबन्धक ही वास्तव में उद्योगरूपी शरीर का मस्तिष्क अथवा उसकी जीवनदायिनी शक्ति है। बिना प्रबन्धक के उत्पादन-कार्य कठिन ही नहीं वरन् असम्भव भी है।

30.

निम्नलिखित में से कौन-सा कर राज्य सरकार लगाती है?(क) आयकर(ख) सेवा कर(ग) व्यापार कर(घ) निगम कर

Answer»

सही विकल्प है (ग) व्यापार कर

31.

कर के अर्थ एवं महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। या ‘कर’ क्या है ?

Answer»

अर्थ – कर एक अनिवार्य अंशदान है, जो करदाता को देना होता है। करदाता को कर के बदले में प्रत्यक्ष लाभ का कोई आश्वासन नहीं दिया जाता। करों का उपयोग सार्वजनिक हित में किया जाता है। महत्त्व-प्रत्येक देश की सरकार करों के माध्यम से देश की आर्थिक विषमता को कम करने का प्रयास करती है। सरकार धनी वर्ग पर अधिक कर लगाकर तथा करों से प्राप्त आय को निर्धनों के कल्याण-कार्यों पर व्यय करके राष्ट्रीय आय को समान वितरण करती है, जिससे समाज में धनी व निर्धन वर्ग में गहरी खाई न बन सके।

32.

निम्नलिखित में से कौन-सा प्रत्यक्ष कर है?(क) व्यापार कर(ख) उत्पादन कर(ग) आयकर(घ) मनोरंजन कर

Answer»

सही विकल्प है (ग) आयकर

33.

वितरण का अर्थ लिखिए।

Answer»

उत्पादन के विभिन्न उपादानों में संयुक्त उपज को बाँटने की क्रिया को वितरण कहते हैं। साधारण बोलचाल को भाषा में वितरण का अर्थवस्तुओं को ‘बाँटने से है।

34.

वितरण की समस्या क्या है ? वितरण की प्रक्रिया को लिखिए।यावितरण किसे कहते हैं ?

Answer»

वितरण

साधारण बोलचाल की भाषा में ‘वितरण’ से आशय वस्तुओं को बाँटने से है। अर्थशास्त्र में, “उत्पादन जिन साधनों के सहयोग से प्राप्त होता है, उन्हीं साधनों में सम्पूर्ण उत्पादन को वितरित करने की प्रक्रिया वितरण कहलाती है। आर्थिक दृष्टि से वितरण राष्ट्रीय सम्पत्ति को विभिन्न वर्गों में बाँटने की क्रिया की ओर संकेत करता है।”

आधुनिक औद्योगिक युग में उत्पादन की प्रक्रिया जटिल होती जा रही है। आज प्रतिस्पर्धा के युग में उत्पादन बड़े पैमाने पर श्रम-विभाजन व मशीनीकरण द्वारा सम्पादित किया जा रहा है। उत्पादन-कार्य में उत्पादन के साधनों, भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन व साहस अपना सहयोग देते हैं। चूंकि उत्पादन समस्त उत्पत्ति के साधनों का प्रतिफल है, अत: यह प्रतिफल सभी उत्पत्ति के साधनों में उनके पुरस्कार के रूप में वितरित किया जाना चाहिए अर्थात् कुल उत्पादन में से श्रम को उसके पुरस्कार के रूप में दी जाने वाली मजदूरी, भूमि को लगान, पूँजी को ब्याज, संगठनकर्ता को वेतन तथा साहसी को लाभ मिलना चाहिए। उत्पत्ति के साधनों को उनका पुरस्कार कुल उत्पादन में से किस आधार पर दिया जाए, यह वितरण की केन्द्रीय समस्या है।

वितरण की समस्या को समझने के लिए निम्नलिखित चार बिन्दुओं का विवेचन आवश्यक है –

1. वितरण किसका होता है या किसका होना चाहिए – वितरण में सर्वप्रथम यह समस्या उत्पन्न होती है कि वितरण कुल उत्पादन का किया जाए या शुद्ध उत्पादन का। वितरण कुल उत्पादन का नहीं किया जाता, वरन् कुल उत्पादन में से अचल सम्पत्ति पर ह्रास व्यय, चल पूँजी का प्रतिस्थापन व्यय, करों के भुगतान का व्यय, बीमे की प्रीमियम आदि व्यय को घटाने के पश्चात् जो वास्तविक या शुद्ध उत्पादन बचता है उसका वितरण किया जाता है। फर्म की दृष्टि से भी वास्तविक या शुद्ध उत्पत्ति का ही वितरण हो सकता है, कुल उत्पत्ति का नहीं। यह वास्तविक उत्पत्ति ही उत्पत्ति के साधनों के बीच बाँटी जानी चाहिए। राष्ट्र की दृष्टि से राष्ट्रीय आय अथवा राष्ट्रीय लाभांश का वितरण उत्पत्ति के समस्त साधनों में होता है।

2. वितरण किनमें होता है या किनमें होना चाहिए – वितरण की दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या यह है कि वितरण किनमें होना चाहिए? उत्पादन में उत्पत्ति के जिन उपादानों (भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन और साहस) ने सहयोग किया है, शुद्ध उत्पादन का बँटवारा उन्हीं को किया जाना चाहिए। उत्पादन के उपादानों (भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन एवं साहस) के स्वामी क्रमशः भूमिपति, श्रमिक, पूँजीपति, प्रबन्धक एवं साहसी कहलाते हैं, इन्हीं को राष्ट्रीय लाभांश में से भाग मिलता है। राष्ट्रीय लाभांशों में से भूमिपति का दिया गया भांग लगान, श्रमिक को मजदूरी, पूँजीपति को ब्याज, प्रबन्धक को वेतन तथा साहसी को प्राप्त होने वाला प्रतिफल लाभ कहा जाता है।

3. उत्पादन का क्रम क्या रहता है या क्या होना चाहिए – प्रत्येक उद्यमी उत्पादन के पूर्व यह अनुमान लगाता है कि वह जिस वस्तु का उत्पादन करना चाहता है, उसे उस व्यवसाय में कितनी शुद्ध उत्पत्ति प्राप्त हो सकेगी। इस अनुमानित वास्तविक उत्पत्ति में से उत्पत्ति के अन्य चार उपादानों को अनुमानित पारिश्रमिक देना पड़ेगा। जब उद्यमी उत्पादन-कार्य आरम्भ करने का निश्चय कर लेता है तो वह उत्पत्ति के उपादानों के स्वामियों से उसके पुरस्कार के सम्बन्ध में सौदा तय कर लेता है और अनुबन्ध । के अनुसार समय-समय पर उन्हें पारिश्रमिक देता रहता है। समस्त उपादानों को उनका पारिश्रमिक देने के उपरान्त जो शेष बचता है, वह उसका लाभ होता है। ऐसी स्थिति में कभी-कभी उसे हानि भी सहन करनी पड़ती है। उद्यमी को यह प्रयास रहता है कि उसे अपने व्यवसाय में हानि न हो। इस कारण वह उत्पत्ति के अन्य साधनों को कम-से-कम पारिश्रमिक देने का प्रयास करता है। इस कारण वितरण की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

4. वितरण में प्रत्येक उपादान का भाग किस प्रकार निर्धारित किया जाता है या किया जाना चाहिए – संयुक्त उत्पादन में से प्रत्येक उपादान का भाग किस आधार पर निश्चित किया जाए, इस सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद हैं। प्रो० एडम स्मिथ तथा रिकार्डो ने वितरण का परम्परावादी सिद्धान्त दिया है, जिसके अनुसार राष्ट्रीय आय में से सर्वप्रथम भूमि का पुरस्कार अर्थात् लगान दिया जाए, उसके बाद श्रमिकों की मजदूरी, अन्त में जो शेष बचता है उसमें से पूँजीपति को ब्याज एवं साहसी को लाभ के रूप में मिलना चाहिए। रिकार्डों के अनुसार, लगान का निर्धारण सीमान्त व अधिसीमान्त भूमि के उत्पादन के द्वारा निर्धारित होना चाहिए तथा मजदूरों को ‘मजदूरी कोष’ से पुरस्कार प्राप्त होना चाहिए। जे०बी० क्लार्क, विक्स्टीड एवं वालरस ने वितरण के ‘सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त’ का प्रतिपादन किया है। इनके अनुसार, “किसी साधन का पुरस्कार अथवा उसकी कीमत उसकी सीमान्त, उत्पादकता द्वारा निर्धारित होती है; अर्थात् एक साधन का पुरस्कार उसकी सीमान्त उत्पादकता के बराबर होता है।” सीमान्त उत्पादकता ज्ञात करना एक दुष्कर कार्य है। वितरण का आधुनिक सिद्धान्त माँग व पूर्ति का सिद्धान्त है। इसके अनुसार संयुक्त उत्पत्ति में, उत्पत्ति के किसी उपादान का भाग उस उपादान की माँग और पूर्ति की शक्तियों के अनुसार उस स्थान पर निर्धारित होता है, जहाँ पर उपादान की माँग और पूर्ति दोनों ही बराबर होते हैं।

35.

श्रम की परिभाषा दीजिए। कुशल तथा अकुशल श्रम में क्या अन्तर है ?याकुशल एवं अकुशल श्रम में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

Answer»

परिभाषा –“श्रम मनुष्य को वह शारीरिक तथा मानसिक प्रयत्न है, जो किसी प्रतिफल की इच्छा से किया जाता है।”

कुशल तथा अकुशल श्रम में अन्तर – जिस श्रम के लिए किसी विशेष प्रकार की शिक्षा या प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, वह ‘कुशल श्रम’ कहलाता है; जैसे–अध्यापक, वकील, डॉक्टर आदि का श्रम। ‘ इसके विपरीत, जिस श्रम के लिए किसी प्रकार की शिक्षा या प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती, वह अकुशल श्रम कहलाता है; जैसे-चौकीदारी अथवा साधारण मजदूरी का कार्य।

36.

भूमि का अर्थ लिखिए।याभूमि का क्या तात्पर्य है ? स्पष्ट कीजिए।

Answer»

“अर्थशास्त्र में भूमि के अन्तर्गत न केवल जमीन की ऊपरी सतह वरन् वे समस्त वस्तुएँ एवं शक्तियाँ सम्मिलित की जाती हैं, जिन्हें प्रकृति ने नि:शुल्क उपहार के रूप में मनुष्य को प्रदान किया है।’

37.

श्रम कितने प्रकार का होता है ?

Answer»

श्रम मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है –

1.उत्पादक तथा अनुत्पादक श्रम

2.शारीरिक तथा मानसिक श्रम तथा

3.कुशल तथा अकुशल श्रम।

38.

उत्पादन के कोई दो प्रकार बताइए।

Answer»

उत्पादन के दो प्रकार हैं

1.रूप-परिवर्तन द्वारा उत्पादन तथा

2.स्थान परिवर्तन द्वारा उत्पादन।

39.

पूँजी की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।यापूँजी के किन्हीं तीन लक्षणों का वर्णन कीजिए।

Answer»

साधारण बोलचाल की भाषा में पूँजी का अर्थ रुपया, पैसा, धन, सम्पत्ति आदि से लगाया जाता है, परन्तु अर्थशास्त्र में, “मनुष्य द्वारा उत्पादित धन का वह भाग जो और अधिक धन उत्पन्न करने में सहायक होता है, पूँजी कहलाता है।”

विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने पूँजी को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है; जैसे –

प्रो० मार्शल के अनुसार, “प्रकृति के नि:शुल्क उपहारों को छोड़कर वह सब सम्पत्ति जिसके द्वारा और अधिक आये प्राप्त की जा सकती है, पूँजी कहलाती है।”

प्रो० चैपमैन के अनुसार, “पूँजी वह धन है, जो आय पैदा करता है अथवा आय के उत्पादन में सहायक होता है या जिसका इसे उपयोग करने का इरादा होता है।”

रिकार्डों के अनुसार, “पूँजी धन का वह भाग है, जिसका उत्पादन में प्रयोग किया जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से पूँजी के निम्नलिखित गुणों का पता चलता है –

  • पूँजी उत्पत्ति का मनुष्यकृत साधन है और इसलिए उसमें भूमि और प्राकृतिक साधनों को सम्मिलित नहीं किया जा सकता। इसके अन्तर्गत केवल वे वस्तुएँ आती हैं, जिनका निर्माण मनुष्य द्वारा किया गया है।
  • धन का केवल वह भाग ही पूँजी के अन्तर्गत आता है, जिसे और अधिक धन पैदा करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि उपभोग्य वस्तुओं को पूँजी के अन्तर्गत सम्मिलित नहीं किया जाता।
  • चैपमैन ‘आय प्रदान करने को पूँजी का एक गुण मानते हैं। उनके अनुसार, धन का केवल वह भाग पूँजी है, जो आय प्रदान करता है।

पूँजी की विशेषताएँ (लक्षण)

उत्पत्ति के साधन के रूप में पूँजी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. पूँजी उत्पादन का निष्क्रिय साधन है – पूँजी स्वयं धन पैदा करने की क्षमता नहीं रखती। भूमि की तरह पूँजी भी उत्पादन का निष्क्रिय उपादान है और मानव-श्रम के बिना उससे कुछ भी उत्पन्न नहीं किया जा सकता।

2. पूँजी उत्पत्ति का मनुष्यकृत साधन है – समस्त पूँजी मानव-श्रम का परिणाम है। प्राकृतिक साधनों पर मानव-श्रम के काम करने से ही पूँजीगत वस्तुएँ पैदा होती हैं। मशीनें, औजार, बिल्डिग आदि सभी मानव-श्रम द्वारा उत्पादित वस्तुएँ हैं।

3. पूँजी बचत का परिणाम है – बचत के द्वारा ही पूँजी-निर्माण सम्भव है। यदि समस्त उत्पादन का उपभोग कर लिया जाए तो बचत कुछ भी नहीं होगी और पूँजी का निर्माण भी नहीं होगा। व्यक्तियों अथवा समाज द्वारा अपनी आय में से बचाये हुए धन की सहायता से ही पूँजीगत वस्तुएँ या पूँजी का निर्माण किया जाता है।

4. पूँजी स्थायी नहीं होती उसमें घिसावट होती है – पूँजी को उत्पादन में प्रयोग किये जाने पर पूँजी का बराबर क्षय होता रहता है, इसलिए पूँजी के पुनरुत्पादन की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए-मशीन, यन्त्र, ट्रैक्टर आदि वस्तुएँ स्थायी नहीं हैं, क्योंकि उपभोग में आने पर एक समय के बाद ये नष्ट हो जाती हैं।

5. पूँजी की पूर्ति में परिवर्तन सम्भव है – भूमि की भाँति पूँजी की पूर्ति निश्चित नहीं होती। पूँजी को आवश्यकतानुसार घटाया-बढ़ाया जा सकता है, क्योंकि पूँजी मानवकृतं साधन है।

6. पूँजी में उत्पादकता होती है – पूँजी में उत्पादकता का गुण पाया जाता है। पूँजी श्रम व भूमि के सहयोग से बड़ी मात्रा में वस्तुओं और सेवाओं को उत्पन्न कर सकती है। इसलिए पूँजी को उत्पादकता बढ़ाने का महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता है।

7. पूँजी आय प्रदान करती है – पूँजी का एक महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि उसके द्वारा आय प्राप्त की जा सकती है। लोग पूँजी का संचय इसी उद्देश्य से करते हैं, जिससे भविष्य में उससे आय प्राप्त कर सकें।

8. पूँजी अत्यधिक गतिशील होती है – उत्पत्ति के अन्य साधनों की अपेक्षा पूँजी में अधिक गतिशीलता पायी जाती है। पूँजी की गतिशीलता में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पूँजी में प्रयोग गतिशीलता तथा स्थान गतिशीलता दोनों पायी जाती हैं।

9. पूँजी उत्पादन का अनिवार्य साधन नहीं है – पूँजी उत्पादन का अनिवार्य साधन न होकर महत्त्वपूर्ण साधन है, क्योंकि बिना पूँजी के श्रम तथा भूमि के सहयोग से उत्पादन किया तो जा सकता है; परन्तु पूँजी के प्रयोग से उत्पादन की मात्रा में और अधिक वृद्धि सम्भव है। इस कारण पूँजी को उत्पाद का महत्त्वपूर्ण साधन कहा जा सकता है।

40.

इस प्रदेश की जिला परिषद् की व्यय की दो प्रमुख मदों को लिखिए।

Answer»

उत्तर प्रदेश की जिला परिषद् की व्यय की दो प्रमुख मदें हैं—

1.शिक्षा पर व्यय तथा

2.करों की प्राप्ति पर व्यय।

41.

प्रत्यक्ष कर वे अप्रत्यक्ष कर में अन्तर स्पष्ट कीजिए। या प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष करों का अन्तर बताइए। प्रत्यक्ष कर के तीन स्रोत बताइए।

Answer»

प्रत्यक्ष कर वह कर है, जिसका भुगतान करदाता प्रत्यक्ष रूप से नकद रूप में कर अधिकारी को करता है। ऐसे करों का भार उन व्यक्तियों द्वारा ही वहन किया जाता है, जिन पर ये लगाये जाते हैं; जैसे-आयकर, निगम कर, मृत्यु कर आदि। इसके विपरीत अप्रत्यक्ष कर वे कर हैं, जिनके भार को करदाता दुसरों पर टालने में सफल हो जाते हैं। इन करों का तात्कालिक एवं अन्तिम भार अलग-अलग व्यक्तियों पर पड़ता है; जैसे–बिक्री कर, उत्पादन कर, सीमा,कर आदि।

42.

निम्नलिखित में से कौन-सा कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाया जाता है?(क) आयात कर(ख) मनोरंजन कर(ग) यात्रा कर(घ) मार्ग कर

Answer»

सही विकल्प है (क) आयात कर

43.

श्रम से क्या तात्पर्य है ?

Answer»

प्रो० मार्शल के अनुसार, “श्रम का अर्थ मनुष्य के आर्थिक कार्य से है, चाहे वह हाथ से किया जाए यो मस्तिष्क से।”

44.

भूमि और श्रम में एक असमानता लिखिए।

Answer»

भूमि उत्पादन का निष्क्रिय साधन है, जबकि श्रम उत्पादन का सक्रिय साधन।

45.

उत्पादन और वितरण को परिभाषित कीजिए।

Answer»

साधारण बोलचाल की भाषा में उत्पादन का अर्थ किसी वस्तु या पदार्थ के निर्माण से होता है, किन्तु वैज्ञानिकों का मत है कि मनुष्य न तो किसी वस्तु या पदार्थ को उत्पन्न कर सकता है और न ही नष्ट कर सकता है। वह केवल पदार्थ या वस्तुओं के स्वरूप को बदलकर उन्हें अधिक उपयोगी बना सकता है। दूसरे शब्दों में, वह वस्तु में उपयोगिता का सृजन कर सकता है। अत: थॉमस के अनुसार, “वस्तु की उपयोगिता में वृद्धि करना ही उत्पादन है।”

साधारण बोलचाल की भाषा में ‘वितरण’ से आशय वस्तुओं को बाँटने से है। अर्थशास्त्र में, “उत्पादन जिन साधनों के सहयोग से प्राप्त होता है, उन्हीं साधनों में सम्पूर्ण उत्पादन को वितरित करने की प्रक्रिया वितरण कहलाती है। आर्थिक दृष्टि से वितरण राष्ट्रीय सम्पत्ति को विभिन्न वर्गों में बाँटने की क्रिया की ओर संकेत करता है।”

46.

‘पूँजी का क्या अर्थ है ? पूँजी के प्रकार तथा महत्त्व को लिखिए।याअर्थशास्त्र में पूँजी का क्या अर्थ है ? उत्पादन के उपादान के रूप में इसका महत्त्व बताइए।यापूँजी का अर्थ बताइए तथा पूँजी के लक्षण व महत्त्व पर प्रकाश डालिए।या“पूँजी उत्पादन का एक प्रमुख साधन है।” स्पष्ट कीजिए तथा पूँजी के प्रकार पर प्रकाश डालिए।

Answer»

पूँजी

साधारण भाषा में पूँजी का अर्थ रुपया, पैसा, धन, सम्पत्ति आदि से लगाया जाता है, परन्तु अर्थशास्त्र में पूँजी का अर्थ अत्यधिक व्यापक है। उसके अनुसार, “पूँजी धन का केवल वह भाग है, जिसे और अधिक धन पैदा करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।पूँजी उत्पत्ति का एक मनुष्यकृत साधन है और इसलिए वह प्रकृतिदत्त साधनों; जैसे—भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों से भिन्न है।

पूँजी का वर्गीकरण निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है –

(1) अचल पूँजी तथा चल पूँजी

अचल पूँजी – जे० एस० मिल के अनुसार, “अचल पूँजी स्वभाव से टिकाऊ होती है तथा अपने जीवन-पर्यन्त आय प्रदान करती है।” अचल पूँजी वह पूँजी होती है, जिसका प्रयोग धन के उत्पादन में बार – बार किया जा सकता है; जैसे—ट्टिकाऊ वस्तुएँ, औजार, मशीन, विभिन्न प्रकार के उपकरण, भवन इत्यादि। इस प्रकार की पूँजी को लगातार कई वर्षों तक उत्पादन-प्रक्रिया में प्रयोग किया जा सकता है।

चल पूँजी – चल पूँजी वह पूँजी होती है, जो एक ही बार के प्रयोग के बाद समाप्त हो जाती है, अर्थात् जिसका प्रयोग उत्पादन-प्रक्रिया में बार-बार नहीं किया जा सकता; जैसे-ईंधन, कच्चा माल आदि।

(2) उत्पादन पूँजी एवं उपभोग पूँजी

उत्पादन पूँजी – उत्पादन पूँजी वह पूँजी होती है, जो प्रत्यक्ष रूप से उत्पादन में सहायता देती है: जैसे-कच्चा माल, मशीनें, औजार इत्यादि। कुछ अर्थशास्त्री इन्हें पूँजीगत वस्तुएँ भी कहते हैं। उपभोग पूँजी-उपभोग पूँजी वह पूँजी है, जिसका उपयोग उत्पादन में न होकर उपभोग में किया जाता है।

उपभोग पूँजी – मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति प्रत्यक्ष रूप से करती है; जैसे—शिक्षा, स्वास्थ्य व आवास पर किया जाने वाला व्यय। इन्हें उपभोग वस्तुएँ भी कहते हैं।

(3) वेतन पूँजी और सहायक पूँजी

वेतन पूँजी – वेतन पूँजी वह पूँजी होती है, जो उत्पादन कार्य में लगे हुए श्रमिकों के भुगतान के लिए प्रयोग में लायी जाती है; जैसे-श्रमिकों को दी जाने वाली मजदूरी, वेतन पूँजी है।

सहायक पूँजी – सहायक पूँजी वह पूँजी है, जिसके सहयोग से श्रमिक अधिकउत्पादन करता है; जैसे–मशीन, विद्युत शक्ति आदि।

(4) भौतिक पूँजी तथा वैयक्तिक पूँजी

भौतिक पूँजी – वह पूँजी जो मूर्त तथा स्थूल रूप में पायी जाती है और जिसे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तान्तरित किया जा सकता है, भौतिक पूँजी कहलाती है; जैसे—कच्चा माल, मशीनें, बिल्डिग आदि।

वैयक्तिक पूँजी – वैयक्तिक पूँजी वह पूँजी होती है, जो व्यक्तिगत गुणों के रूप में पायी जाती है और जिसे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तान्तरित नहीं किया जा सकता; जैसे-इन्जीनियर, अध्यापक, डॉक्टर की योग्यता आदि।

(5) व्यक्तिगत पूँजी और सार्वजनिक पूँजी

व्यक्तिगत पूँजी – जिस पूँजी पर व्यक्ति-विशेष का स्वामित्व होता है, उसे व्यक्तिगत पूँजी कहते हैं; जैसे—निजी कारखाने, किसान की भूमि, ट्रैक्टर, हल, बैल आदि।

सार्वजनिक पूँजी – सार्वजनिक पूँजी वह पूँजी होती है, जो सम्पूर्ण समाज या सरकार के स्वामित्व में हो; जैसे–रेलें, सड़कें, पुल, सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने आदि।

(6) राष्ट्रीय पूँजी एवं अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी

राष्ट्रीय पूँजी – किसी राष्ट्र की सम्पूर्ण पूँजी के योग को राष्ट्रीय पूँजी कहते हैं; जैसे-राष्ट्रीय रेल, जहाज, कल-कारखाने आदि।

अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी – अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी वह पूँजी है, जिस पर किसी एक राष्ट्र का अधिकार न होकर अनेक राष्ट्रों का या विश्व के देशों का अधिकार होता है; जैसे–विश्व बैंक की पूँजी, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, संयुक्त राष्ट्र संघ आदि।

(7) देशी पूँजी और विदेशी पूँजी

देशी पूँजी – जिस पूँजी पर अपने ही देशवासियों का व्यक्तिगत या सामूहिक अधिकार होता है, उसे देशी पूँजी कहते हैं। इस प्रकार की पूँजी का निर्माण अपने ही देश में होता है; जैसे-देशवासियों द्वारा जमा किया गया धन।

विदेशी पूँजी – विदेशी पूँजी उस पूँजी को कहते हैं, जो विदेशों से प्राप्त होती है। इस पूँजी का निर्माण एक देश में तथा प्रयोग दूसरे देश में होता है। उदाहरण के लिए आज हमारे देश में अमेरिका, इंग्लैण्ड, जर्मनी आदि देशों की पर्याप्त पूँजी अनेक कारखानों में लगी हुई है। यह हमारे देश के लिए विदेशी पूँजी है।

उत्पादन के उपादान के रूप में पूँजी का महत्त्व

उत्पादन के उपादान के रूप में पूँजी के महत्त्व को निम्नलिखित रूप में वर्णित किया जा सकता है –

1. उत्पादन का महत्त्वपूर्ण साधन – पूँजी उत्पादन का एक महत्त्वपूर्ण उपादान है। किसी भी उत्पादन | कार्य में पूंजी की मात्रा, उत्पत्ति के पैमाने तथा उत्पादन की तकनीकी पर पर्याप्त प्रभाव डालती है। यदि पूँजी समुचित मात्रा में उपलब्ध है तब पूँजी की मात्रा में वृद्धि करके बड़े पैमाने के उत्पादन के लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।

2. आर्थिक विकास का आधार – किसी भी देश के आर्थिक विकास में पूँजी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। देश के प्राकृतिक संसाधनों का कुशलतम उपयोग पूँजी की सहायता से ही सम्भव है। पूँजी के द्वारा ही उत्पादन में वृद्धि करके बढ़ती हुई श्रम-शक्ति को रोजगार दिया जा सकता है। पूँजी के द्वारा राष्ट्रीय आय, प्रति व्यक्ति आय तथा जीवन-स्तर में वृद्धि होती है।

3. औद्योगीकरण या बड़े पैमाने पर उत्पादन-कार्य – देश के औद्योगीकरण के लिए पूँजी का पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना परम आवश्यक है। जिस देश के पास पर्याप्त पूँजी होगी वही देश पूँजी विनियोग के द्वारा विभिन्न प्रकार की मशीनों, यन्त्रों तथा नयी वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग करके उत्पादन की मात्रा बढ़ा सकता है। पूँजी के प्रयोग से ही उद्योग विकसित व शक्तिशाली बन सकते हैं।

4. कृषि उद्योग की उन्नति – भूमि उत्पादन का निष्क्रिय साधन है। भूमि में अधिक उत्पादन के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति भी कृषि कार्य करने से कम होती जाती है। इसलिए भूमि में पूँजी का विनियोग किया जाना आवश्यक है, जिससे उत्पादन में वृद्धि की जा सके तथा उर्वरा शक्ति को नष्ट होने से बचाया जा सके।

5. परिवहन के साधनों का विकास – किसी भी देश में जल, थल व वायु यातायात तभी विकसित अवस्था में हो सकते हैं, जब देश में पूँजी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो। इसलिए यातायात के साधनों के विकास के लिए पूँजी का होना नितान्त आवश्यक है।

6. राजनीतिक स्थिरता एवं सैनिक शक्ति का आधार – पूँजी, विकास-प्रक्रिया में केन्द्रीय स्थान रखने के साथ-साथ राजनीतिक स्थिरता तथा सामरिक शक्ति में भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। जिस देश में पूँजी पर्याप्त मात्रा में होती है, उस देश की सैनिक शक्ति विकसित तथा सुदृढ़ होती है तथा राजनीतिक स्थिरता भी रहती है। पूँजी के अभाव में राष्ट्र अस्थिर हो जाता है तथा उसकी सुरक्षा-व्यवस्था जर्जर हो जाती है।

7. आर्थिक नियोजन में महत्त्व – विकासशील देश नियोजन के द्वारा अपना विकास करने हेतु प्रयासरत हैं। कोई भी देश नियोजन के माध्यम से तभी अपने उद्देश्यों की पूर्ति करने में सफल हो सकता है जब उसके पास पर्याप्त मात्रा में पूँजी होगी। पूँजी के अभाव में सभी पूर्व-नियोजित कार्य अधूरे रह जाते हैं। इसलिए नियोजन व आर्थिक विकास के लिए पूँजी का होना नितान्त आवश्यक है।

47.

सार्वजनिक वित्त और निजी वित्त में अन्तर लिखिए।

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सार्वजनिक वित्त और निजी वित्त में निम्नलिखित तीन अन्तर हैं –

  1. व्यक्ति अपना व्यय अपनी आय के अनुसार निर्धारित करता है, जबकि सरकार अपने व्यय के अनुसार आय-प्राप्ति के साधन खोजती है।
  2. व्यक्ति की आय के साधन सीमित होते हैं, जब कि सरकार के पास आय के साधनों की प्रचुरता होती है।
  3. व्यक्ति अपनी आय-व्यय के हिसाब को प्राय: गुप्त रखता है, जबकि सार्वजनिक वित्त का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया जाता है।
48.

जिला परिषद् की आय के दो साधन लिखिए।

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जिला परिषद् की आय के दो साधन हैं—

  1. हैसियत या सम्पत्ति कर तथा
  2. राज्य सरकार से अनुदान।
49.

आयकर लगाने का अधिकार किसे है?(क) राज्य सरकार को(ख) केन्द्र सरकार को(ग) महापालिका को(घ) नगरपालिका को

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सही विकल्प है (ख) केन्द्र सरकार को

50.

‘आयकर’ एक(क) अप्रत्यक्ष कर है।(ख) प्रत्यक्ष कर है।(ग) प्रतिगामी कर है।(घ) इनमें से कोई नहीं

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सही विकल्प है (ख) प्रत्यक्ष कर है।