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वितरण की समस्या क्या है ? वितरण की प्रक्रिया को लिखिए।यावितरण किसे कहते हैं ?

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वितरण

साधारण बोलचाल की भाषा में ‘वितरण’ से आशय वस्तुओं को बाँटने से है। अर्थशास्त्र में, “उत्पादन जिन साधनों के सहयोग से प्राप्त होता है, उन्हीं साधनों में सम्पूर्ण उत्पादन को वितरित करने की प्रक्रिया वितरण कहलाती है। आर्थिक दृष्टि से वितरण राष्ट्रीय सम्पत्ति को विभिन्न वर्गों में बाँटने की क्रिया की ओर संकेत करता है।”

आधुनिक औद्योगिक युग में उत्पादन की प्रक्रिया जटिल होती जा रही है। आज प्रतिस्पर्धा के युग में उत्पादन बड़े पैमाने पर श्रम-विभाजन व मशीनीकरण द्वारा सम्पादित किया जा रहा है। उत्पादन-कार्य में उत्पादन के साधनों, भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन व साहस अपना सहयोग देते हैं। चूंकि उत्पादन समस्त उत्पत्ति के साधनों का प्रतिफल है, अत: यह प्रतिफल सभी उत्पत्ति के साधनों में उनके पुरस्कार के रूप में वितरित किया जाना चाहिए अर्थात् कुल उत्पादन में से श्रम को उसके पुरस्कार के रूप में दी जाने वाली मजदूरी, भूमि को लगान, पूँजी को ब्याज, संगठनकर्ता को वेतन तथा साहसी को लाभ मिलना चाहिए। उत्पत्ति के साधनों को उनका पुरस्कार कुल उत्पादन में से किस आधार पर दिया जाए, यह वितरण की केन्द्रीय समस्या है।

वितरण की समस्या को समझने के लिए निम्नलिखित चार बिन्दुओं का विवेचन आवश्यक है –

1. वितरण किसका होता है या किसका होना चाहिए – वितरण में सर्वप्रथम यह समस्या उत्पन्न होती है कि वितरण कुल उत्पादन का किया जाए या शुद्ध उत्पादन का। वितरण कुल उत्पादन का नहीं किया जाता, वरन् कुल उत्पादन में से अचल सम्पत्ति पर ह्रास व्यय, चल पूँजी का प्रतिस्थापन व्यय, करों के भुगतान का व्यय, बीमे की प्रीमियम आदि व्यय को घटाने के पश्चात् जो वास्तविक या शुद्ध उत्पादन बचता है उसका वितरण किया जाता है। फर्म की दृष्टि से भी वास्तविक या शुद्ध उत्पत्ति का ही वितरण हो सकता है, कुल उत्पत्ति का नहीं। यह वास्तविक उत्पत्ति ही उत्पत्ति के साधनों के बीच बाँटी जानी चाहिए। राष्ट्र की दृष्टि से राष्ट्रीय आय अथवा राष्ट्रीय लाभांश का वितरण उत्पत्ति के समस्त साधनों में होता है।

2. वितरण किनमें होता है या किनमें होना चाहिए – वितरण की दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या यह है कि वितरण किनमें होना चाहिए? उत्पादन में उत्पत्ति के जिन उपादानों (भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन और साहस) ने सहयोग किया है, शुद्ध उत्पादन का बँटवारा उन्हीं को किया जाना चाहिए। उत्पादन के उपादानों (भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन एवं साहस) के स्वामी क्रमशः भूमिपति, श्रमिक, पूँजीपति, प्रबन्धक एवं साहसी कहलाते हैं, इन्हीं को राष्ट्रीय लाभांश में से भाग मिलता है। राष्ट्रीय लाभांशों में से भूमिपति का दिया गया भांग लगान, श्रमिक को मजदूरी, पूँजीपति को ब्याज, प्रबन्धक को वेतन तथा साहसी को प्राप्त होने वाला प्रतिफल लाभ कहा जाता है।

3. उत्पादन का क्रम क्या रहता है या क्या होना चाहिए – प्रत्येक उद्यमी उत्पादन के पूर्व यह अनुमान लगाता है कि वह जिस वस्तु का उत्पादन करना चाहता है, उसे उस व्यवसाय में कितनी शुद्ध उत्पत्ति प्राप्त हो सकेगी। इस अनुमानित वास्तविक उत्पत्ति में से उत्पत्ति के अन्य चार उपादानों को अनुमानित पारिश्रमिक देना पड़ेगा। जब उद्यमी उत्पादन-कार्य आरम्भ करने का निश्चय कर लेता है तो वह उत्पत्ति के उपादानों के स्वामियों से उसके पुरस्कार के सम्बन्ध में सौदा तय कर लेता है और अनुबन्ध । के अनुसार समय-समय पर उन्हें पारिश्रमिक देता रहता है। समस्त उपादानों को उनका पारिश्रमिक देने के उपरान्त जो शेष बचता है, वह उसका लाभ होता है। ऐसी स्थिति में कभी-कभी उसे हानि भी सहन करनी पड़ती है। उद्यमी को यह प्रयास रहता है कि उसे अपने व्यवसाय में हानि न हो। इस कारण वह उत्पत्ति के अन्य साधनों को कम-से-कम पारिश्रमिक देने का प्रयास करता है। इस कारण वितरण की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

4. वितरण में प्रत्येक उपादान का भाग किस प्रकार निर्धारित किया जाता है या किया जाना चाहिए – संयुक्त उत्पादन में से प्रत्येक उपादान का भाग किस आधार पर निश्चित किया जाए, इस सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद हैं। प्रो० एडम स्मिथ तथा रिकार्डो ने वितरण का परम्परावादी सिद्धान्त दिया है, जिसके अनुसार राष्ट्रीय आय में से सर्वप्रथम भूमि का पुरस्कार अर्थात् लगान दिया जाए, उसके बाद श्रमिकों की मजदूरी, अन्त में जो शेष बचता है उसमें से पूँजीपति को ब्याज एवं साहसी को लाभ के रूप में मिलना चाहिए। रिकार्डों के अनुसार, लगान का निर्धारण सीमान्त व अधिसीमान्त भूमि के उत्पादन के द्वारा निर्धारित होना चाहिए तथा मजदूरों को ‘मजदूरी कोष’ से पुरस्कार प्राप्त होना चाहिए। जे०बी० क्लार्क, विक्स्टीड एवं वालरस ने वितरण के ‘सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त’ का प्रतिपादन किया है। इनके अनुसार, “किसी साधन का पुरस्कार अथवा उसकी कीमत उसकी सीमान्त, उत्पादकता द्वारा निर्धारित होती है; अर्थात् एक साधन का पुरस्कार उसकी सीमान्त उत्पादकता के बराबर होता है।” सीमान्त उत्पादकता ज्ञात करना एक दुष्कर कार्य है। वितरण का आधुनिक सिद्धान्त माँग व पूर्ति का सिद्धान्त है। इसके अनुसार संयुक्त उत्पत्ति में, उत्पत्ति के किसी उपादान का भाग उस उपादान की माँग और पूर्ति की शक्तियों के अनुसार उस स्थान पर निर्धारित होता है, जहाँ पर उपादान की माँग और पूर्ति दोनों ही बराबर होते हैं।



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