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1.

नगर महापालिकाओं की आय के चार स्रोत लिखिए।

Answer»

नगर महापालिकाओं की आय के चार स्रोत हैं-गृह कर, सम्पत्ति कर, भूमि कर तथा जल कर।

2.

उत्तर प्रदेश के नगर निगम या नगरपालिका की आय के स्रोतों तथा व्यय की प्रमुख मदों का वर्णन कीजिए।यानगरपालिका की आय के स्रोत लिखिए।यानगरपालिकाओं के व्यय की तीन मुख्य मदें लिखिए।यानगरनिगमों की आय के स्रोत लिखिए।

Answer»

नगर निगम उत्तर प्रदेश के महानगरों (जैसे-लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, आगरा, इलाहाबाद, गोरखपुर, मुरादाबाद, बरेली व मेरठ) की व्यवस्था करते हैं। ये प्राय: वही कार्य करते हैं, जो पूर्व में नगर महापालिकाएँ किया करती थीं; अन्तर केवल इतना ही है कि ये अधिक शक्तिशाली होते हैं, इनका कार्य-क्षेत्र अधिकं विस्तृत होता है, इन्हें कर लगाने तथा वसूल करने के अधिक अधिकार प्राप्त होते हैं तथा इन पर राज्य सरकार का उतना नियन्त्रण नहीं होता जितना नगर महापालिकाओं पर होता है।

नगर निगम या नगरपालिका की आय के स्रोत

नगर निगम या नगरपालिका की आय के दो प्रमुख साधन हैं –

  • (अ) कर आगम एवं
  • (ब) गैर-कर आगम।

(अ) कर आगम – नगर निगम को निम्नलिखित करों से आय प्राप्त होती है

1. सम्पत्ति कर – यह नगर निगम की आय का प्रमुख स्रोत है। यह कर उसकी सीमा में स्थित भूमि, मकान तथा सम्पत्तियों के स्वामियों पर लगाया जाता है। ये निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

  1. गृह व भूमि-कर – यह कर मकान व भूमि की वार्षिक आय पर लगाया जाता है और उसके स्वामी से वसूल किया जाता है।
  2. सुधार कर – यह कर नगर सुधार योजनाओं के कारण शहरी भूमि के मूल्य में होने वाली वृद्धि पर लगाया जाता है।
  3. सेवा कर – नगर निगम सेवाओं पर भी कर लगाते हैं; जैसे-जल-कर, माल-वाहन कर, विद्युत व अग्नि कर आदि।

2. चुंगी – नगर निगमों की सीमा में प्रवेश करने वाले माल पर जो कर लगाया जाता है, उसे चुंगी कहते हैं। नगर निगम की आय का यह सबसे बड़ा स्रोत है। चुंगी वस्तुओं की तोल पर या मूल्यानुसार लगायी जाती है। उत्तर प्रदेश में चुंगी समाप्त कर दी गयी है।

3. सीमा कर – यह कर रेल द्वारा किसी स्थानीय क्षेत्र में आने वाले पदार्थों पर लगाया जाता है।

4. मार्ग-कर – यह कर किसी स्थान, पुल या सड़क पर से गुजरने वाले प्रत्येक व्यक्ति, पशु, घोड़ागाड़ी आदि वाहनों से निश्चित दर (भार अथवा संख्या) पर वसूल किया जाता है।

5. तहबाजारी – यह कर अस्थायी अर्थात् ऐसे दुकानदारों से वसूल किया जाता है, जो सड़क की पटरियों पर रखकर अपना सामान बेचते हैं; जैसे-खोमचेवाले, फेरीवाले, हॉकर्स आदि।

6. शुल्क या अनुज्ञा-पत्र – इसके अन्तर्गत निम्नलिखित प्रकार के शुल्क सम्मिलित हैं

  1. नगर निगमों द्वारा प्रदान की गयी विशेष सेवाओं का शुल्क; जैसे-नोटिस शुल्क, नकल लेने का शुल्क आदि।
  2. विलासिता की सामग्री पर लगाये गये शुल्क; जैसे—मोटरगाड़ियों तथा कुत्ते रखने पर अनुज्ञा-पत्र शुल्क, ताँगा, इक्का, बैलगाड़ी, ठेली-रिक्शा आदि पर अनुज्ञा-पत्र शुल्क।
  3. अन्य मदों पर अनुज्ञा-पत्र।

(ब) गैर-कर आगम – नगर निगम की गैर-कर आगम से प्राप्त आय के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं

  1. भूमि का लगान तथा मकानों, विश्रामगृहों एवं डाक बँगलों का किराया।
  2. भूमि-कंर तथा भूमि की उपज से प्राप्त आय।
  3. बाजारों तथा बूचड़खानों से प्राप्त आय।
  4. विनियोगों पर प्राप्त आय।
  5. वाणिज्य व्यवसायों (जैसे—ट्राम सेवाओं, मोटरगाड़ियों, बिजली व गैस पदार्थों, जल-आपूर्ति सेवाओं आदि) से प्राप्त आय।
  6. राज्य सरकारों से प्राप्त अनुदान। ये दो प्रकार के होते हैं-

(i) आवर्ती अनुदान, जो प्रति वर्ष दिये जाते हैं तथा

(ii) अनावर्ती अनुदान, जो किसी विशेष कार्य को सम्पन्न करने के लिए दिये जाते हैं।

नगर निगम या नगरपालिका की व्यय की प्रमुख मदें

नगर निगम या नगरपालिका की व्यय की प्रमुख मदों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

1. शिक्षा – नगर निगम प्राथमिक शिक्षा, जूनियर शिक्षा व कभी-कभी माध्यमिक शिक्षा का भी प्रबन्ध करती है। स्कूलों का निर्माण करना, उनके संचालन के लिए आवश्यक सामग्री जुटाना, अध्यापकों को वेतन देना आदि व्यय इस मद में सम्मिलित होते हैं।

2. जन-स्वास्थ्य सेवाएँ – इस मद में ये व्यय सम्मिलित होते हैं-शुद्ध जल की व्यवस्था करना, गन्दे पानी की निकासी की व्यवस्था करना, सफाई का प्रबन्ध करना, महामारियों की रोकथाम करना, टीका लगवाना, खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकना, चिकित्सालयों की व्यवस्था करना आदि। नगर निगमों का पर्याप्त धन इन मदों पर व्यय होता है।

3. सार्वजनिक सुरक्षा – इस मद में ये व्यय आते हैं—आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड का प्रबन्ध करना, गलियों में प्रकाश की व्यवस्था करना, हानिकारक पशुओं से रक्षा करना, सड़कों के चौराहों पर पुलिस के खड़े होने के लिए चबूतरे बनवाना, सार्वजनिक स्थानों पर बिजली व प्रकाश का प्रबन्ध करना आदि।

4. जनसाधारण की सुविधा – इस मद में ये व्यय सम्मिलित किये जाते हैं-सड़क, पुल व नाली बनवाना; पुस्तकालय या वाचनालय का प्रबन्ध करना; सड़कों पर पानी छिड़कवाना; सड़कों के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाना; बाजार, मेले व प्रदर्शनियों आदि का आयोजन करना।

5. प्रशासन और कर-संग्रह पर व्यय – इन्हें अपने प्रशासन हेतु कार्यालयों की व्यवस्था करनी होती है। अत: कार्यालयों के कर्मचारियों के वेतन तथा सामग्री पर व्यय करना पड़ता है। करों को वसूल करने में भी आय का पर्याप्त भाग व्यय हो जाता है।

6. सार्वजनिक निर्माण-कार्य – नगरपालिकाओं को उद्यानों व पार्को की व्यवस्था करनी पड़ती है, खेल के मैदान एवं व्यायामशालाओं आदि का निर्माण भी करना पड़ता है तथा अपने क्षेत्र की टूटी-फूटी सड़कों का निर्माण एवं मरम्मत भी करानी पड़ती है। इन सभी कार्यों को सम्पादित करने में उसे प्रति वर्ष पर्याप्त धन व्यय करना पड़ता है।

7. पेयजल की व्यवस्था पर व्यय – नागरिकों के पीने के लिए शुद्ध जल की व्यवस्था करने के लिए नगरपालिकाएँ नलकूपों का निर्माण कराकर टंकियों के माध्यम से पेयजल की व्यवस्था करती हैं तथा सार्वजनिक स्थानों पर नल भी लगवाती हैं। इस मद पर भी इन्हें धन व्यय करना पड़ता है।

3.

उत्तर प्रदेश में जिला परिषदों की आय के स्रोतों एवं व्यय की प्रमुख मदों का वर्णन कीजिए।याजिला परिषदों के व्यय की तीन मदें लिखिए।

Answer»

जिला परिषदों के कार्य-क्षेत्र के अन्तर्गत जिले का सम्पूर्ण ग्रामीण क्षेत्र आता है। इन परिषदों के मुख्य कार्य सड़कों का निर्माण व मरम्मत, शिक्षा की व्यवस्था, मानव, व पशु चिकित्सालयों की व्यवस्था, दुर्भिक्ष निवारण कार्य, विश्रामगृहों की स्थापना, प्रशिक्षण व्यवस्था, मेलों पर नियन्त्रण, बाजार आदि की व्यवस्था, सफाई आदि हैं।

जिला परिषद् की आय के स्रोत

जिला परिषद् की आय के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं –

1. भूमि उप-कर – जिला परिषदों की आय का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत भूमि उप-कर है। यह मालगुजारी पर अधिभार होता है, जिसको राज्य सरकारें स्थानीय संस्थाओं के लिए एकत्रित करती हैं। उत्तर प्रदेश में इस उप-कर को मालगुजारी में विलीन कर दिया गया है और इसके बदले में राज्य सरकार जिला परिषदों को क्षतिपूर्ति अनुदान देती है।

2. सम्पत्ति कर – यह मनुष्य की कुल सम्पत्ति अथवा आय के आधार पर लगाया जाता है। इस कर की प्रकृति प्रगतिशील होती है।

3. महसूल या मार्ग शुल्क – जिला परिषद् नदी के घाट, पुल, सड़क एवं तालाबों पर कर (महसूल) | लेती है। जो व्यक्ति अपने पशु अथवा वाहन से इन पुलों, सड़कों या घाटों से आते-जाते हैं, उन्हें यह मार्ग शुल्क देना पड़ता है।

4. काँजी हाउस – आवारा पशुओं को पकड़ने के लिए जिला परिषद् कॉजी हाउस की व्यवस्था करती | है। इसमें आवारा घूमने वाले पशुओं को बन्द कर दिया जाता है और पशु मालिकों से जुर्माना लेकर ही पशुओं को छोड़ा जाता है।

5. किराया व शुल्क – जिला परिषद् सराय, हाट, डाक बंगले, मकान, दुकान आदि से किराये के रूप में तथा संस्थाओं व चिकित्सालयों से फीस के रूप में आय प्राप्त करती है।

6. अनुज्ञा-पत्र शुल्क – जिला परिषद् कसाइयों से, गोश्त की दुकानों से, वनस्पति घी की दुकानों से, आटे की चक्की आदि से अनुज्ञा-पत्र जारी करके शुल्क प्राप्त करती है।

7. मेलों, प्रदर्शनियों व बाजारों से आय – जिला पंचायतों के क्षेत्र में जिन प्रमुख मेलों व प्रदर्शनियों का आयोजन किया जाता है, उसका प्रबन्धन जिला पंचायत को करना पड़ता है। इसके आयोजन से जो आय प्राप्त होती है, वह जिला परिषद् को मिल जाती है।

8. कृषि उपकरणों की बिक्री से आय – जिला परिषद् खाद, बीज, कृषि-यन्त्र आदि की बिक्री की भी व्यवस्था करती है। इनकी बिक्री से भी लाभ के रूप में उसे कुछ आय प्राप्त होती है।

9. सरकारी अनुदान – राज्य सरकार जिला परिषदों को पर्याप्त मात्रा में आर्थिक अनुदान (Grant) शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा आदि के विकास के लिए देती है। यह जिला परिषदों की कुल आय का40% तक होता है।

जिला परिषद की व्यय की मदें

जिला परिषदों के व्यय की प्रमुख मदें निम्नलिखित हैं –

1. शिक्षा – जिला परिष0द् ग्रामीण क्षेत्रों में प्राइमरी तथा जूनियर हाईस्कूल तथा वाचनालयों की व्यवस्था करती है। इस मद पर जिला परिषद् की आय का एक बड़ा भाग व्यय हो जाता है।

2. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य पर व्यय – जिला परिषद् ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सालयों एवं जच्चा- बच्चा गृहों की व्यवस्था करती है तथा संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए नि:शुल्क टीके लगवाती है।

3. पशु चिकित्सालय – जिला परिषद् पशुओं की चिकित्सा के लिए पशु चिकित्सालयों की स्थापना | करती है।

4. सार्वजनिक निर्माण कार्य – जिला परिषद् घाटे व गाँवों में सड़कें बनवाने, तालाब व कुएँ खुदवाने, वृक्ष लगवाने, पुलों का निर्माण करने तथा इन सबकी मरम्मत कराने में पर्याप्त व्यय करती है।

5. प्रशासन व कर वसूली – जिला परिषद् अपने कार्यालय की व्यवस्था करने, अपने कर्मचारियों को वेतन देने व कर वसूलने में पर्याप्त व्यय करती है।

6. पंचायतों को सहायता – जिला परिषद् अपने क्षेत्र की ग्राम पंचायतों तथा क्षेत्रीय समितियों के कार्यों का निरीक्षण करती है तथा उनके विकास के लिए आर्थिक अनुदान देती है।

7. मेले व प्रदर्शनियाँ – जिला परिषद् अपने क्षेत्र में मेले व प्रदर्शनियों की व्यवस्था पर पर्याप्त व्यय करती है।

8. अन्य मदें – जिला परिषद् दीन-दु:खियों तथा अपाहिजों की सहायता करती है, जन्म-मृत्यु का विवरण रखती है, कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करती है तथा पशुओं के रोगों की रोकथाम की व्यवस्था करती है। जिला परिषद् कभी-कभी जिले के आर्थिक विकास के लिए ऋण भी ले लेती है, जिस पर उसे ब्याज भी देना पड़ता है।

4.

राज्य सरकार की आय के दो साधनों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

1.भू-राजस्व की मालगुजारी

2.व्यापार कर।

5.

‘बिक्रीकर’ आय का साधन है(क) केन्द्र सरकार का(ख) राज्य सरकार का(ग) जिला पंचायत का(घ) ग्राम पंचायत का

Answer»

सही विकल्प है (ख) राज्य सरकार का

6.

ग्राम पंचायतों की आय के स्रोत एवं व्यय की प्रमुख मदों का वर्णन कीजिए।याग्राम पंचायत के किन्हीं दो आय के साधनों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

भारत की शासन-प्रणाली प्रजातान्त्रिक है। प्रजातन्त्र को गाँवों तक पहुँचाने के उद्देश्य से हमारे संविधान में पंचायती राज की व्यवस्था की गयी है। इस दृष्टि से उत्तर प्रदेश सरकार ने सन् 1947 ई० में पंचायती राज अधिनियम पारित करके ग्रामों में तीन प्रकार की संस्थाओं की स्थापना की-

  1. ग्राम सभा
  2. ग्राम पंचायत तथा
  3. न्याय पंचायत।

इस प्रकार ग्राम पंचायत ग्रामीण स्वशासन की दूसरी इकाई है। ग्राम पंचायत ग्राम सभा द्वारा निर्धारित नीतियों को लागू करती है।

ग्राम पंचायत की आय के स्रोत

ग्राम पंचायतों की आय के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं –

1. अनिवार्य कर –

  1. सम्पत्ति हस्तान्तरण पर चुंगी
  2. सवारी कर
  3. भूमि कर
  4. पेशा (उद्यम) कर।

2. महसूल –

  1. व्यापारिक फसलों के क्रय-विक्रय पर शुल्क
  2. भूमि उपकर एवं
  3. कृषि योग्य भूमि पर कर।

3. अन्य शुल्क –

  1. बाजारों पर शुल्क
  2. जमीन पर रोजगार शुल्क
  3. दलालों व एजेण्टों पर लाइसेन्स शुल्क
  4. अन्य कार्यों की स्वीकृति पर शुल्क
  5. बूचड़खानों पर शुल्क
  6. बैलगाड़ी ठहरने के स्थानों पर शुल्क
  7. सड़क व सार्वजनिक स्थानों पर शुल्क।

4. जिला बोर्ड से सहायता –

  1. प्राथमिक विद्यालय के व्यय के एक भाग की पूर्ति करना
  2. ग्रामीण बाजारों की व्यवस्था हेतु धनराशि प्राप्त करना
  3. घाटे की व्यवस्था करने पर आय-व्यय का अन्त।

ग्राम पंचायत की व्यय की मदें

ग्राम पंचायतों की व्यय की मुख्य मदें निम्नलिखित हैं –

  1. सफाई एवं प्रकाश की व्यवस्था पर व्यय।
  2. चिकित्सालय की व्यवस्था एवं संक्रामक रोगों की रोकथाम पर किये जाने वाले व्यय।
  3. शवों के दाह-संस्कार की व्यवस्था पर व्यय।
  4. शिक्षा व्यवस्था पर व्यय।
  5. सार्वजनिक सुविधाएँ; जैसे-तालाब, पोखर, कुओं आदि उपलब्ध करने पर व्यय।
  6. शुद्ध पेयजल की व्यवस्था पर व्यय।
  7. खेल-कूद व्यवस्था पर व्यय।
  8. बाजार, हाट व मेलों आदि के प्रबन्धं पर व्यय।
  9. पुस्तकालयों एवं वाचनालयों की व्यवस्था पर व्यय।
  10. बंजर एवं चरागाह भूमि के विकास पर व्यय।
7.

प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर के दो-दो उदाहरण दीजिए। या प्रत्यक्ष कर के दो उदाहरण लिखिए।

Answer»

प्रत्यक्ष कर के दो उदाहरण-आयकर और निगम कर। अप्रत्यक्ष कर के दो उदाहरण–बिक्री कर और उत्पादन कर।

8.

निम्नलिखित में से कौन-सा कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाया जाता है?(क) व्यापार कर(ख) मनोरंजन कर(ग) यात्री कर(घ) निगम कर

Answer»

सही विकल्प है (घ) निगम कर

9.

अप्रत्यक्ष कर का उदाहरण है(क) आयकर(ख) बिक्री कर(ग) सम्पत्ति कर(घ) उपहार कर

Answer»

सही विकल्प है (ख) बिक्री कर

10.

कर है –(क) अनिवार्य भुगतान(ख) ऐच्छिक भुगतान(ग) आर्थिक भुगतान(घ) गैर-आर्थिक भुगतान

Answer»

सही विकल्प है (क) अनिवार्य भुगतान

11.

जिला परिषद् के दो प्रमुख कार्यों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

जिला परिषद् के दो प्रमुख कार्य हैं –

1.शिक्षा तथा

2.सार्वजनिक स्वास्थ्य और चिकित्सी।

12.

ग्राम पंचायत के व्यय की दो मदें लिखिए।

Answer»

ग्राम पंचायत के व्यय की दो मुख्य मदें हैं—

1.सफाई एवं प्रकाश की व्यवस्था तथा

2.चिकित्सालय की व्यवस्था एवं संक्रामक रोगों की रोकथाम।

13.

नगर निगम की आय के दो साधन लिखिए।

Answer»

नगर निगम की आय के दो साधन हैं—

1.सम्पत्ति-कर या गृह-कर तथा

2.जल-कर।

14.

ग्राम पंचायत की आय के दो स्रोत लिखिए।

Answer»

ग्राम पंचायत की आय के दो स्रोत हैं—

1.अनिवार्य कर; जैसे—सवारी कर, भूमि कर, पेशा (उद्यम) कर।

2.जिला पंचायत तथा राज्य सरकार से अनुदान।

15.

पूँजी की परिभाषा दीजिए।यापूँजी का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

Answer»

पूँजी वह धन है जो आय प्रदान करती है या आय के उत्पादन में सहायक होती है।

16.

पूँजी के कोई दो प्रमुख लक्षण लिखिए।

Answer»

पूँजी के दो प्रमुख लक्षण हैं –

1.पूँजी उत्पादन का निष्क्रिय. साधन है तथा

2.पूँजी मनुष्यकृत साधन है।

17.

लाभ की परिभाषा दीजिए। लाभ किसे प्राप्त होता है ?यालाभ से आप क्या समझते हैं ?

Answer»

उत्पादन के पाँच उपादान हैं-भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन और उद्यम। इनमें उद्यम सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। उद्यमी (साहसी) ही उत्पादन के उपादानों को जुटाता है, उपादानों के स्वामियों को उनके प्रतिफल का भुगतान करता है और उत्पादन-सम्बन्धी सभी प्रकार की जोखिम उठाती है। उत्पादन के सभी उपादानों का भुगतान करने के बाद जो कुछ भी शेष बचता है, वही उसका प्रतिफल या लाभ होता है। अतः राष्ट्रीय आय का वह अंश, जो उद्यमी को प्राप्त होता है, लाभ कहलाता है।

लाभ की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –
थॉमस के अनुसार, “लाभ उद्यमी का पुरस्कार है।”
वाकर के अनुसार, “लाभ योग्यता का लगान है।”
मार्शल के अनुसार, “राष्ट्रीय लाभांश का वह भाग, जो उद्यमी को व्यवसाय की जोखिम उठाने के प्रतिफल रूप में प्राप्त होता है, लाभ कहलाता है।”

18.

राज्य सरकार कौन-कौन से कर लगाती है ?

Answer»

राज्य सरकार द्वारा लगाये जाने वाले करों के नाम हैं-

1.भू-राजस्व

2.व्यापार कर

3.राज्य उत्पादन कर तथा

4.मनोरंजन कर।

19.

पूँजी के दो भेद लिखिए।

Answer»

पूँजी के दो भेद हैं –

1.चल पूँजी या अचल पूँजी तथा

2.राष्ट्रीय पूँजी एवं अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी।

20.

पूँजी की परिभाषा दीजिए। देश के आर्थिक विकास में पूँजी के दो कार्य भी लिखिए।

Answer»

परिभाषा – “पूँजी वह धन है जो आय पैदा करता है अथवा आय के उत्पादन में सहायक होता है।” देश के आर्थिक विकास में पूँजी के दो प्रमुख कार्य हैं-

  1. पूँजी से राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है तथा
  2. पूँजी निर्धनता के दुश्चक्र को तोड़ती है।
21.

नगर महापालिकाओं की आय के दो साधन लिखिए।

Answer»

(1) सम्पत्ति-कर या गृहकर तथा
(2) जल-कर।

22.

जिला परिषद् की आय के दो साधन बताइए।

Answer»

(1) हैसियत या सम्पत्ति कर तथा
(2) राज्य सरकार से अनुदान।

23.

जिला परिषदों (जिला पंचायतों) की आय के स्रोतों और व्यय की प्रधान मदों की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।याजिला परिषद् की आय के प्रमुख स्रोतों को समझाइए। 

Answer»

जिला परिषदों (जिला पंचायतों) की आय के प्रमुख स्रोत
1. हैसियत एवं सम्पत्ति – कर-जिला पंचायत अपने क्षेत्र में व्यक्तियों की हैसियत एवं सम्पत्ति पर अथवा उद्योगों व व्यापार पर कर लगाती है। इससे जिला परिषद् को आय प्राप्त होती है। इस कर की प्रकृति प्रगतिशील होती है, अर्थात् अमीर व्यक्तियों पर यह कर ऊँची दर से लगाया जाता है।
2. भूमि पर उपकर – यह जिला पंचायत की आय का प्रमुख स्रोत है। इस मद से सम्पूर्ण आय का लगभग 70% भाग प्राप्त होता है। इस कर को लगान के साथ राज्य सरकारें वसूल करती हैं और वह इसे जिला परिषद् में वितरित कर देती हैं। उत्तर प्रदेश में यह कर राज्य सरकार लगान के साथ ही वसूल करती है तथा जिला पंचायतों को प्रतिकारी अनुदान (Compensatory grant) प्रदान करती है।
3. मार्ग शुल्क – जिला पंचायत अपने क्षेत्र में नदियों के पुल, घाट, सड़क आदि पर कर लेती है। जो व्यक्ति अपने पशु अथवा वाहन इन पुलों, सड़कों या घाट से लाते व ले जाते हैं, उन्हें यह मार्ग शुल्क देना पड़ता है।
4. काँजी हाउस से आय – आवारा घूमने वाले पशुओं को कॉजी हाउस में बन्द कर दिया जाता है। जब उनके मालिक उन्हें छुड़ाने आते हैं तो उनसे जुर्माना प्राप्त किया जाता है। इस मद से भी जिला पंचायत को आय प्राप्त होती है।
5. मेलों, प्रदर्शनियों व बाजारों से आय – जिला पंचायतों के क्षेत्र में जिन प्रमुख मेलों व प्रदर्शनियों का आयोजन किया जाता है, उसका प्रबन्ध जिला पंचायत को करना पड़ता है। इनके आयोजन से जो आय प्राप्त होती है वह जिला पंचायत की आय है; उदाहरण के लिए-मुजफ्फरनगर में शुक्रताल, गढ़मुक्तेश्वर में गंगास्नान मेला आदि। इनसे प्राप्त होने वाली आय जिला पंचायतों को प्राप्त होती है।
6. किराया व शुल्क – जिला पंचायत के भूमि, मकानों, दुकानों, डाक-बंगलों आदि के किराये से आय प्राप्त होती है। स्कूलों में अस्पतालों से कुछ शुल्क भी आय के रूप में मिलता है।
7. राज्य सरकारों से प्राप्त अनुदान – राज्य सरकार जिला पंचायतों को अनुदान के रूप में आर्थिक सहायता प्रदान करती है। राज्य सरकारें यह अनुदान उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा आदि के विकास के लिए देती हैं। जिला पंचायतों की आय की यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मद है।
8. अनुज्ञा-पत्र शुल्क – जिला परिषद् कसाइयों से, गोश्त की दुकानों से, वनस्पति घी की दुकानों से, आटे की चक्की के रूप में आय प्राप्त करती है।
9. कृषि उपकरणों की बिक्री से आय – जिला पंचायत खाद, बीज, कृषि यन्त्र आदि की बिक्री की भी व्यवस्था करती है। इनकी बिक्री से भी लाभ के रूप में कुछ आय प्राप्त होती है।

जिला पंचायतों की व्यय की प्रमुख मदें
जिला पंचायत की व्यय की मदें निम्नलिखित हैं

1. शिक्षा पर व्यय – जिला पंचायत सबसे अधिक व्यय शिक्षा पर करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का प्रचार व प्रसार का उत्तरदायित्व जिला पंचायतों पर है। इसके लिए जिला पंचायत गाँवों में प्राइमरी स्कूल तथा जूनियर हाईस्कूल खोलती है। गाँवों में वाचनालय एवं पुस्तकालयों की भी व्यवस्था करती है।
2. सामान्य प्रशासन एवं करों की प्राप्ति पर व्यय – जिला पंचायत को अपने कार्यालय में कर्मचारियों के वेतन तथा करों की वसूली पर भी व्यय करना पड़ता है।
3. सार्वजनिक स्वास्थ्य – जिला पंचायतें ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल एवं जच्चा-बच्चा गृहों की व्यवस्था करती हैं। ये गाँवों में हैजा, चेचक, प्लेग आदि संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए टीके लगवाने की व्यवस्था करती हैं।
4. सार्वजनिक निर्माण कार्य – जिला पंचायत अपने क्षेत्र में सड़कें बनवाना, वृक्ष लगवाना, पुलों को निर्माण एवं मरम्मत की व्यवस्था करती है। इन कार्यों पर जिला पंचायत को पर्याप्त व्यय करना पड़ता है।
5. मेले तथा प्रदर्शनी पर व्यय – जिला पंचायत को जिले में लगने वाले मेलों तथा प्रदर्शनियों की व्यवस्था पर भी व्यय करना पड़ता है।
6. पंचायतों की आर्थिक सहायता – जिला पंचायत, ग्राम पंचायतों तथा क्षेत्रीय समितियों के कार्यों का निरीक्षण करती है तथा अनुदान के रूप में ग्राम पंचायतों को आर्थिक सहायता भी देती है।
7. ऋण पर ब्याज – जिला पंचायत कभी- कभी जिले के आर्थिक विकास के लिए ऋण भी ले लेती है। इन ऋणों पर उसे ब्याज देना पड़ता है।
8. अन्य मदें – जिला पंचायतें दीन-दु:खियों तथा अपाहिजों की सहायता करती हैं, जन्म-मृत्यु का विवरण रखती हैं, कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करती हैं तथा पशुओं आदि की बीमारी से रोकथाम की व्यवस्था करती हैं। इन सब कार्यों के लिए जिला पंचायते पर्याप्त धन व्यय करती हैं।

24.

स्थानीय निकाय की व्यय की दो मदों के नाम लिखिए।

Answer»

(1) शिक्षा,
(2) सार्वजनिक स्वास्थ्य व चिकित्सा।

25.

नगर महापालिकाओं की व्यय की दो प्रमुख मदों को लिखिए।

Answer»

(1) शिक्षा तथा
(2) सार्वजनिक स्वास्थ्य व चिकित्सा।

26.

नगर महापालिकाओं की व्यय की मदों को लिखिए।

Answer»

नगर महापालिकाओं के व्यय की मदें।
1. प्रशासन और कर-संग्रह पर व्यय – नगर महापालिकाओं को अपने प्रशासन हेतु कार्यालय व्यवस्था करनी होती है। अत: कार्यालयों के कर्मचारियों के वेतन तथा सामग्री पर व्यय करना पड़ता है। करों को वसूल करने में भी आय का पर्याप्त भाग व्यय होता है।
2. सार्वजनिक सुरक्षा पर व्यय – नगर महापालिकाएँ सार्वजनिक सुरक्षा की दृष्टि से आग बुझाने के लिए दमकलें रखती हैं, सड़कों के चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस के उड़े होने के लिए चबूतरे बनवाती हैं तथा सार्वजनिक स्थानों पर बिजली व रोशनी का प्रबन्ध करती हैं। इन मदों पर भी प्रतिवर्ष काफी व्यय होता है।
3. सार्वजनिक स्वास्थ्य व चिकित्सा – नगर महापालिकाएँ नि:शुल्क चिकित्सा व्यवस्था प्रदान करती हैं। चेचक, हैजा, प्लेग आदि रोगों की रोकथाम के लिए टीके लगवाती हैं, नगर की सफाई की व्यवस्था करती हैं तथा बाजार में बिकने वाली अशुद्ध वस्तुओं पर रोक लगाती हैं। इन सब कार्यों को पूरा करने के लिए नगर महापालिकाओं का पर्याप्त धन व्यय होता है।
4. शिक्षा पर व्यय – नगर महापालिकाएँ अपने क्षेत्र में प्राइमरी शिक्षा की व्यवस्था करती हैं। कुछ नगर महापालिकाएँ जू० हा० स्कूल, हाईस्कूल व इण्टरमीडिएट कॉलेज भी चलाती हैं। इस मद पर भी नगर महापालिकाएँ धन व्यय करती हैं।
5. सार्वजनिक निर्माण कार्य – नगर महापालिकाओं को उद्योगों व पार्को की व्यवस्था करनी पड़ती है। खेल के मैदान एवं व्यायामशालाओं आदि का निर्माण भी करना पड़ता है तथा अपने क्षेत्र में टूटी-फूटी सड़कों का निर्माण एवं मरम्मत भी करानी पड़ती है। इन सभी कार्यों को सम्पादित करने में प्रतिवर्ष पर्याप्त धन व्यय करना पड़ता है।
6. पेयजल की व्यवस्था पर व्यय – नगर महापालिकाओं का एक प्रमुख कर्तव्य अपने क्षेत्र के नागरिकों को पीने के लिए शुद्ध जल की व्यवस्था करना है। इस कार्य के लिए नगर महापालिकाएँ नलकूपों का निर्माण कराकर टंकियों के माध्यम से पेयजल की व्यवस्था करती हैं। सार्वजनिक स्थानों पर नल भी लगवाती हैं। इस मद पर भी धन व्यय करना पड़ता है।

27.

राज्य सरकार द्वारा लगाये जाने वाले दो करों के नाम लिखिए।

Answer»

राज्य सरकार द्वारा लगाये जाने वाले दो कर निम्नलिखित हैं

⦁    कृषि आयकर – भारत के संविधान के अनुसार राज्य सरकारों को अपने-अपने राज्य में कृषि आयकर लगाने का अधिकार दिया गया है। यह कर कृषकों पर प्रगतिशील दरों पर लगाया जाता है तथा उन व्यक्तियों पर ही लगाया जाता है जिनके पास सीमा से अधिक भूमि होती है।
⦁    बिक्री-कर – बिक्री-कर राज्य की आय का एक प्रमुख स्रोत है। समाचार-पत्रों को छोड़कर अन्य वस्तुओं की बिक्री पर कर लगाने का अधिकार संविधान के अनुसार राज्य सरकारों को दिया गया है। यह कर एक अवरोही कर होता है। इसका भार निर्धन व्यक्तियों पर अधिक पड़ता है, क्योंकि निर्धन व्यक्ति अपनी आय का लगभग शत-प्रतिशत अपनी आवश्यकता की वस्तुओं को खरीदने पर व्यय करते हैं।

28.

भू-राजस्व के दो गुण बताइए।

Answer»

भू-राजस्व के दो गुण हैं

⦁     भू-राजस्व से निश्चित आय प्राप्त होती है तथा
⦁    यह कर पर्याप्त सुविधाजनक है।

29.

निम्नलिखित में से कौन राज्य सरकारों की आय का सीधा स्रोत नहीं है? (क) व्यापार कर(ख) आय कर(ग) मनोरंजन कर(घ) रजिस्ट्री शुल्क

Answer»

सही विकल्प है  (ग) मनोरंजन कर।

30.

राज्य सरकार द्वारा लगाये जाने वाले किन्हीं चार करों के नाम लिखिए।

Answer»

(1) कृषि आयकर
(2) बिक्री-कर
(3) राज्य उत्पादन कर
(4) मनोरंजन कर।

31.

सिनेमा पर मनोरंजन कर का भुगतान किसके द्वारा किया जाता है?(क) निर्माता द्वारा(ख) वित्त प्रबन्धक द्वारा(ग) निर्देशक द्वारा(घ) दर्शक द्वारा

Answer»

सही विकल्प है  (घ) दर्शक द्वारा।

32.

कौन-सा कर राज्य सरकार की आय का स्रोत नहीं है?(क) निगम कर(ख) व्यापार कर(ग) मूल्य-संवर्धित कर(घ) मनोरंजन कर

Answer»

सही विकल्प है  (क) निगम कर।

33.

उत्तर प्रदेश सरकार की आय में प्रत्यक्ष करों का अंश अप्रत्यक्ष करों की अपेक्षा कैसा है?

Answer»

उत्तर प्रदेश सरकार की आय में प्रत्यक्ष करों का अंश अप्रत्यक्ष करों की अपेक्षा कम है।

34.

राज्य उत्पादन शुल्क लगाया जाता है(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा(ख) राज्य सरकार द्वारा(ग) स्थानीय सरकार द्वारा।(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है  (ख) राज्य सरकार द्वारा।

35.

उत्तर प्रदेश सरकार की आय, व्यय की अपेक्षा कम है, क्यों? कारण बताइए।

Answer»

उत्तर प्रदेश सरकार की आय, व्यय की अपेक्षा कम होने के कारण – स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् राज्य सरकार की आय व व्यय दोनों में वृद्धि हुई है, परन्तु व्यय में वृद्धि आय की अपेक्षा अधिक हुई है। इसका कारण निम्नलिखित है

⦁    विकास व्यय में वृद्धि।
⦁    ऋण सेवाओं के व्यय में वृद्धि।
⦁     प्रशासनिक व्यय में वृद्धि।
⦁     जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होना।
उपर्युक्त कारणों से राज्य सरकार का व्यय निरन्तर बढ़ता जा रहा है।

राज्य सरकार की आय कम होने के कारण
⦁    राज्य सरकार की आय के स्रोत अपर्याप्त एवं बेलोच हैं।
⦁    राज्य सरकार का पर्याप्त ऋण प्राप्त करने में असफल रहना है।
⦁    आय का एक बड़ा भाग प्रशासनिक व्यवस्था एवं जनतन्त्रीय संस्थाओं पर व्यय किया जाता है।
⦁     करों का भार निर्धनों पर अधिक तथा धनिकों पर कम होना है।
⦁     उपर्युक्त कारणों से उत्तर प्रदेश सरकार की आय, व्यय की अपेक्षा कम है।

36.

अपने राज्य की सरकार की आय के प्रमुख स्रोतों और व्यय की प्रमुख मदों का विवरण दीजिए। याप्रदेश सरकार की आय के किन्हीं तीन स्रोतों तथा व्यय की किन्हीं तीन मदों का वर्णन कीजिए। याराज्य सरकार की कर आय के प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।

Answer»

प्रदेश सरकार की आय के प्रमुख स्रोत
1. मालगुजारी – यह राज्य सरकार की आय का एक प्रमुख स्रोत है। यह बहुत प्राचीन समय से चला आ रहा है तथा उन व्यक्तियों को देना होता है जिनके पास कृषि भूमि होती है। मालगुजारी निर्धारित करते समय देश के विभिन्न राज्यों में पृथक्-पृथक् नीतियाँ अपनायी गयी हैं। यह भूमि पर लगाया गया एक अवरोही कर है, क्योंकि यह निर्धन तथा धनवान लोगों को समान रूप से देना होता है। मालगुजारी या तो स्थायी होती है अथवा समय-समय पर राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाती है। मालगुजारी या भू-राजस्व का एक प्रमुख गुण यह है कि इनसे राज्य सरकारों को एक निश्चित धनराशि प्राप्त होती है तथा दूसरा प्रमुख गुण यह है कि यह कर सुविधाजनक है, क्योंकि यह कृषकों से उनके निवास स्थान से फसल आने के पश्चात् अमीनों द्वारा वसूल किया जाता है तथा यदि फसल खराब हो जाती है तो सरकार लगान माफ भी कर देती है अथवा कुछ छूट देती है।
2. राज्य उत्पादन कर – भारत के नवीन संविधान के अनुसार केन्द्रीय उत्पादन कर का एक भाग तो राज्य सरकारों को प्राप्त होता ही है, साथ ही उन्हें कुछ नशीली वस्तुओं; जैसे-शराब, अफीम तथा औषधियों पर उत्पादन करे लगाने का अधिकार दिया गया है। ऐसी वस्तुओं के उत्पादन पर राज्य सरकार द्वारा लगाये गये कर ही राज्य उत्पादन कर’ के नाम से जाने जाते हैं। इस कर से उन राज्यों को पर्याप्त आय होती है जिनमें मद्य निषेध लागू नहीं हैं। इस कर को दो उद्देश्यों से लगाया जाता है-प्रथम, आय प्राप्त करने के लिए और द्वितीय, मादक पदार्थों के उपभोग को कम करने के लिए। अब भारत में कुछ राज्यों ने अपने यहाँ मद्य-निषेध लागू कर दिया है।
3. कृषि आयकर – भारत के संविधान के अनुसार राज्य सरकारों को अपने-अपने राज्य में कृषि आयकर लगाने का अधिकार दिया गया है। यह कर कृषकों पर प्रगतिशील दरों पर लगाया जाता है तथा उन व्यक्तियों पर ही लगाया जाता है जिनके पास सीमा से अधिक भूमि होती है।
4. बिक्री-कर – बिक्री-कर राज्य की आय का एक प्रमुख स्रोत है। समाचार-पत्रों को छोड़कर अन्य वस्तुओं की बिक्री पर कर लगाने का अधिकार संविधान के अनुसार राज्य सरकारों को दिया गया है। यह कर एक अवरोही कर होता है। इसका भार निर्धन व्यक्तियों पर अधिक पड़ता है, क्योंकि निर्धन व्यक्ति अपनी आय का लगभग शत-प्रतिशत अपनी आवश्यकता की वस्तुओं को खरीदने पर व्यय करते हैं।
5. प्रशासनिक प्राप्तियाँ – राज्य को अपने प्रशासनिक विभागो, जैसे न्यायालय, जेल, पुलिस, शिक्षा चिकित्सा आदि से फीस और शुल्क के रूप में भी कुछ आय प्राप्त होती है।
6. राजकीय व्यवसाय से प्राप्त आय – राज्य सरकार को सार्वजनिक व्यवसायों से भी आय प्राप्त होती है, उनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं
⦁     सार्वजनिक उद्योग – राज्य सरकार कुछ व्यावसायिक कार्यों का संचालन करती है जिनसे उन्हें प्रतिवर्ष कुछ आय प्राप्त होती हैं; जैसे – चुर्क सीमेण्ट का कारखाना आदि से आय।
⦁     सिंचाई कार्य – सरकार ने सिंचाई व्यवस्था के लिए नहरें एवं नलकूपों की व्यवस्था की हुई है। सरकारी नहरों व नलकूपों से सिंचाई शुल्क के रूप में उत्तर प्रदेश सरकार को आय प्राप्त होती है।
⦁    सार्वजनिक निर्माण कार्य – उत्तर प्रदेश सरकार को सरकारी सम्पत्तियों, जैसे – सरकारी मकान, सड़कें, पुल आदि से भी आय प्राप्त होती है।
⦁     वनों से आय – राज्य सरकारों को वनों से भी आय प्राप्त होती है। वनों को ठेकों पर देकर तथा उनकी लकड़ी, छाल, कत्था आदि की बिक्री से भी आय प्राप्त होती है।
⦁     सड़क तथा जल परिवहन – उत्तर प्रदेश सरकार को सड़क परिवहन तथा जल परिवहन सेवाओं से भी आय प्राप्त होती है।
7. आय-प्राप्ति के अन्य साधन – उत्तर प्रदेश सरकार को अन्य साधनों से भी आय प्राप्त होती है, जिनमें कुछ निम्नलिखित हैं
⦁    विद्युत शुल्क – राज्य सरकार को विद्युत शुल्क से आय प्राप्त होती है।
⦁     यात्री कर – जो व्यक्ति राज्य सड़क परिवहन की बसों में यात्रा करते हैं, उन्हें किराये के अतिरिक्त यात्रा कर भी देना होता है, जिससे राज्य सरकार को आय प्राप्त होती है।
⦁    स्टाम्प शुल्क – सरकार को स्टाम्प की बिक्री से भी आय प्राप्त होती है।
⦁     रजिस्ट्रेशन शुल्क – अचल सम्पत्तियों की बिक्री के लिए सम्पत्ति की रजिस्ट्री कराना अनिवार्य है इसके लिए रजिस्ट्रेशन शुल्क लिये जाते हैं इसी प्रकार संस्था समितियों आदि का रजिस्ट्रेशन कराने पर भी रजिस्ट्रेशन शुल्क देना होता है जिससे सरकार को पर्याप्त आय प्राप्त होती है।
⦁    मनोरंजन कर – उत्तर प्रदेश सरकार चल-चित्रों, थियेटरो नाटक व अन्य मनोरंजन के साधनों पर कर लगाती है। इससे भी उत्तर प्रदेश सरकार को पर्याप्त आय प्राप्त होती है।
8. आयकर में राज्यों का भाग – आय कर लगाने और वसूल करने का अधिकार केन्द्रीय सरकार का है, परन्तु इस आय में से एक निश्चित भाग राज्यों में बाँटा जाता है। केन्द्रीय उत्पादन करों में राज्यों का हिस्सा – वित्त आयोग की सिफारिश पर केन्द्रीय उत्पादन करों से प्राप्त आय में से एक निश्चित धनराशि प्राप्त होती है।
9. सहायता एवं अनुदान – केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों को अनुदान देती है जिससे वे अपनी पंचवर्षीय योजनाओं एवं विकास कार्यों को क्रियान्वित कर सकें। उत्तर प्रदेश सरकार को भी केन्द्रीय सरकार से अनुदान प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त राज्यों को बाढ़, सूखा, भूकम्प आदि प्राकृतिक विपदाओं से निपटाने के लिए भी केन्द्रीय सरकार विशेष सहायता प्रदान करती है।

उत्तर प्रदेश सरकार की व्यय की प्रमुख मदें
राज्य सरकार के होने वाले समस्त व्ययों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित कर सकते हैं
(अ) विकास व्यय तथा
(ब) गैर-विकास व्यय।

(अ) विकास व्यय
विकास व्यय को पुन: निम्नलिखित दो भागों में विभाजित कर सकते हैं
(क) प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक विकास करने वाली मदे – राज्य सरकारें अपने राज्यों में प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक विकास करने के लिए अग्रलिखित मदों पर व्यय करती हैं
1. कृषि – प्रदेश की सरकार कृषि विकास हेतु विभिन्न कार्यों पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये व्यय करती है; जैसे-कृषि प्रदर्शनियों का आयोजन, आदर्श कृषि फार्मों की स्थापना, पौधों के संरक्षण की व्यवस्था, कृषि शिक्षा, कृषि अनुसन्धान आदि।
2. सहकारिता – राज्य सरकार सहकारिता विभाग का संचालन करने के लिए तथा सहकारी समितियों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में धन खर्च करती है।
3. पशुपालन – पशुपालन सम्बन्धी कार्यों पर हमारे प्रदेश की सरकार को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये व्यय करने होते हैं; जैसे-पशुओं की चिकित्सा, पशु चिकित्सालयों की व्यवस्था करना, पशुओं की नस्ल में सुधार, कृत्रिम गर्भाधान की व्यवस्था आदि।
4. उद्योग – धन्धे प्रदेश की सरकार अपने प्रदेश में लघु उद्योगों तथा बड़े उद्योगों का विकास करने के लिए प्रतिवर्ष पर्याप्त मात्रा में धन व्यय करती है। औद्योगिक एवं तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था हेतु राज्य सरकार के व्यय में वृद्धि जा रही है।
5. सिंचाई – सिंचाई की प्रदेश में उचित व्यवस्था करने के लिए प्रदेश सरकार बड़ी मात्रा में धन व्यय करती है। यह राज्य सरकार के व्यय का एक प्रमुख साधन है। इसके अन्तर्गत नहरों व नलकूपों को खोदने व उसकी मरम्मत पर होने वाले व्यय, बाँध-निर्माण आदि व्यय होते हैं। सूखा एवं कम वर्षा की कठिनाइयों को दूर करने के लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार आवश्यक है।
6. सार्वजनिक कार्य – इस मद के अन्तर्गत सड़कों, सरकारी मकानों आदि के निर्माण एवं उनकी मरम्मत पर होने वाले व्यय सम्मिलित किये जाते हैं। सरकार की आय का यह बड़ा भाग इन निर्माण कार्यों पर व्यय होता है।
7. सामुदायिक विकास परियोजनाएँ – इन परियोजनाओं का प्रमुख उद्देश्य गाँवों का सर्वांगीण विकास करना तथा कृषि की उन्नति करना है। अतः अनेक परियोजनाओं को चालू करने में बहुत-सा धन व्यय करना पड़ता है।
8. यातायात – इसके अन्तर्गत सड़क एवं जल परिवहन पर होने वाले व्यय सम्मिलित किये जाते हैं। इस मद पर भी राज्य सरकार को बड़ी धनराशि व्यय करनी पड़ती है।
9. ऋण सेवाएँ – राज्य सरकार अपने राज्य में विभिन्न विकास योजनाओं को चालू करने के लिए जो ऋण लेती है, उसका ब्याज उसे प्रतिवर्ष चुकाना पड़ता है। अतः यह राज्य के व्यय का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। राज्य सरकार द्वारा निरन्तर आन्तरिक ऋण लिये जाने के परिणामस्वरूप ऋण सेवाओं पर ब्याज तथा अन्य भुगतानों की राशि बढ़ती ही जा रही है। राज्य सरकार द्वारा निरन्तर आन्तरिक ऋण लिये जाने के परिणास्वरूप ऋण सेवाओं पर ब्याज तथा अन्य भुगतानों की राशि बढ़ती ही जा रही है।

(ख) परोक्ष रूप से आर्थिक विकास करने वाली मदें – इस प्रकार के कार्यों की मदों का वर्णन हम संक्षेप में निम्नलिखित प्रकार से कर सकते हैं
1. शिक्षा – उत्तर प्रदेश की सरकार की व्यय की मदों में शिक्षा पर होने वाले व्यय का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके अन्तर्गत शिक्षा सम्बन्धी सुविधाओं के प्रसार पर होने वाले समस्त व्यय सम्मिलित हैं। अब इस मद पर होने वाले व्यय की राशि में भी निरन्तर वृद्धि होती जा रही है।
2. समाज कल्याण – समाज कल्याण से सम्बन्धित कार्यों को करने के लिए भी उत्तर प्रदेश सरकार को बहुत-सा धन व्यय करना पड़ता है; जैसे-वृद्ध व्यक्तियों तथा विधवाओं को पेंशन, अनाथ बच्चों की सहायता करना, पतितों का उद्धार करना आदि।
3. श्रम एवं रोजगार – उत्तर प्रदेश सरकार को श्रमिकों के कल्याण कार्यों तथा उन्हें रोजगार दिलाने की उचित व्यवस्था करने पर प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में धन व्यय करना पड़ता है।
4. चिकित्सा तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य – चिकित्सा तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के अन्तर्गत राज्य सरकार के द्वारा अस्पतालों तथा प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों को खोलने के व्यय तथा नि:शुल्क चिकित्सा की सुविधा प्रदान करने वाले व्यय सम्मिलित किये जाते हैं।
5. पिछड़े वर्ग के लोगों की सहायतार्थ कार्य – उत्तर प्रदेश सरकार अपने प्रदेश के उन लोगों के आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए कार्य कर रही है जो कि पिछड़े हुए हैं।

(ब) गैर-विकास व्यय
इसके अन्तर्गत निम्नलिखित कुछ प्रमुख व्यय की मदें आती हैं
⦁    पुलिस – प्रत्येक राज्य अपने क्षेत्र में शान्ति एवं सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस रखता है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् इस मद पर होने वाले व्यय में भी निरन्तर वृद्धि होती जा रही है।
⦁    सामान्य प्रशासन – सामान्य प्रशासन पर भी उत्तर प्रदेश सरकार को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये व्यय करने पड़ते हैं। इस मद के अन्तर्गत राज्यपाल, मुख्यमन्त्री, मन्त्रियों, सचिवालयों, आयुक्तों, जिलाधीशों एवं अन्य सरकारी कर्मचारियों के वेतन आदि से सम्बन्धित व्यय सम्मिलित किये जाते हैं।
⦁    जेल – उत्तर प्रदेश सरकार को जेलों पर भी व्यय करना पड़ता है।
⦁    न्याय – प्रदेश में न्यायालयों की उचित व्यवस्था करने के लिए भी प्रदेशीय सरकार को धन व्यय करना पड़ता है।
⦁    कर वसूली पर आय – राज्य सरकार अपने राज्य में अनेक प्रकार के कर लगाती है। करदाताओं से इन करों को वसूल करने में राज्य सरकार को कुछ धन व्यय करना होता है।

37.

उत्तर प्रदेश सरकार की आय के साधन कम होने के चार कारण लिखिए।

Answer»

उत्तर प्रदेश सरकार की आय के साधन अग्रलिखित कारणों से कम हैं
⦁    आय स्रोतों में लोच का अभाव है।
⦁    राज्य सरकार को केन्द्र पर निर्भर रहना पड़ता है।
⦁     उत्तर प्रदेश की जनसंख्या अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक है।
⦁    भू-राजस्व आदि से आय बहुत कम होती है।

38.

उत्तर प्रदेश सरकार अपने बढ़ते हुए व्यय को किस प्रकार कम कर सकती है?

Answer»

उत्तर प्रदेश की आय एवं व्यय दोनों में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है, परन्तु व्यय में वृद्धि आय की अपेक्षा अधिक हुई है। इसका प्रमुख कारण विकास व्यय, ऋण-सेवाएँ व्यय एवं प्रशासनिक व्यय में तीव्र गति से वृद्धि होना है।

उत्तर प्रदेश सरकार की आय बढ़ाने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए

⦁     प्रशासनिक एवं अनावश्यक व्यय कम किये जाने चाहिए।
⦁    सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से अधिक आय प्राप्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
⦁     करों की चोरी रोकने हेतु प्रभावशाली कदम उठाये जाने चाहिए।
⦁     नवीन करों की व्यवस्था की जानी चाहिए।
⦁     करों को प्राप्त करने के लिए करों पर होने वाला व्यय कम किया जाए।
⦁     प्रदेश में आवश्यक रूप से बना विशाल मन्त्रिमण्डल का आकार छोटा किया जाने की आवश्यकता है।
उपर्युक्त उपायों के द्वारा प्रदेश सरकार बढ़ते हुए व्यय के साथ समायोजन कर सकती है।

39.

केन्द्रीय सरकार की व्यय की सबसे बड़ी मद कौन-सी है?

Answer»

केन्द्रीय सरकार की व्यय की सबसे बड़ी मद प्रतिरक्षा सेवा है।

40.

प्रतिरक्षा व्यय को कौन-सी सरकार वहन करती है ?

Answer»

प्रतिरक्षा व्यय’ को केन्द्रीय सरकार वहन करती है।

41.

आयकर किसके द्वारा लगाया जाता है ?

Answer»

आयकर केन्द्रीय सरकार द्वारा लगाया जाता है।

42.

भारत में केन्द्र सरकार के व्यय के प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।

Answer»

केन्द्र सरकार के व्यय के स्रोत (मदे)
केन्द्र सरकार अपनी आय को निम्नलिखित मदों पर व्यय करती है

1. करों को एकत्रित करने पर व्यय – केन्द्रीय सरकार को प्रतिवर्ष करों की धनराशि को एकत्रित करने पर बहुत बड़ी धनराशि व्यय करनी पड़ती है।
2. ऋण सेवाओं पर व्यय – केन्द्रीय सरकार ने अपनी विभिन्न प्रकार की योजनाओं को पूरा करने के लिए अनेक प्रकार के ऋण लिये हैं। इन ऋणों पर दी जाने वाली ब्याज की धनराशि इस शीर्षक के अन्तर्गत आती है। इस मद पर भी केन्द्रीय सरकार का व्यय निरन्तर बढ़ता जा रहा है।
3. रक्षा व्यय – चीन व पाकिस्तान के आक्रमण के भय के कारण हमारी सरकार को अपने देश की रक्षा पर प्रतिवर्ष होने वाले व्यय पर वृद्धि करनी पड़ रही है। इसके अन्तर्गत जल, थल और नभ सेनाओं पर होने वाला व्यय सम्मिलित किया जाता है।
4. नागरिक प्रशासन पर व्यय – इस मद के अन्तर्गत संसद, मन्त्रिपरिषद्, राष्ट्रपति, सचिवालय, सामान्य प्रशासन, न्याय, पुलिस लेखा परीक्षण आदि पर होने वाले व्यय सम्मिलित हैं। इस मद पर होने वाले व्यय में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है।
5. मुद्रा एवं टकसाल पर व्यय –  केन्द्रीय सरकार, जो नोट छापने व सिक्कों को ढालने का कार्य करती है, इस पर होने वाले व्यय में प्रतिवर्ष वृद्धि कर रही है।
6. सामाजिक विकास पर व्यय – इस मद में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, चिकित्सा, पिछड़ी तथा परिगणित जातियों के कल्याण, सामाजिक कल्याण पर किया जाने वाला व्यय आदि सम्मिलित होते हैं। प्रत्येक सरकार को उद्देश्य कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है; अतः इस मद पर होने वाले व्यय में अत्यधिक वृद्धि हुई है।
7. पेन्शन व्यय – केन्द्रीय सरकार को प्रतिवर्ष अवकाश प्राप्त कर्मचारियों एवं अधिकारियों को पेन्शन देनी होती है। अवकाश प्राप्त कर्मचारियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होने के कारण इस मद पर व्यय होने वाली धनराशि में भी वृद्धि होती जा रही है।
8. राज्यों को अनुदान – केन्द्रीय सरकार राज्यों को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का अनुदान देती है। विकास कार्यों में वृद्धि होने के कारण इस मद में होने वाले व्यय में भी निरन्तर वृद्धि होती जा रही है।
9. अन्य व्यय – उपर्युक्त प्रमुख मदों के अतिरिक्त केन्द्रीय सरकार को अन्य कई मदों पर व्यय करने होते हैं; जैसे-अकाल, बाढ़, सूखा, भूकम्प, शिक्षा संस्थाओं को दिया गया अनुदान आदि।

43.

निगम कर किसके द्वारा लगाया जाता है?

Answer»

केन्द्र सरकार द्वारा।

44.

भारत में योजना आयोग का अध्यक्ष कौन होता है ?

Answer»

भारत में योजना आयोग का अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होता है।

45.

ऐसे कर जिनका प्रभाव सम्पूर्ण देश पर पड़ता है, लगाने का अधिकार किसे है ?

Answer»

ऐसे कर जिनका प्रभाव सम्पूर्ण देश पर पड़ता है, को लगाने का अधिकार केन्द्र सरकार को है।

46.

निगम कर कैसा कर है?

Answer»

प्रत्यक्ष कर।

47.

भारत में ‘आयकर’ किस प्रकार का कर है ?

Answer»

भारत में आयकर प्रगतिशील कर है, क्योंकि कर की दर, आय की वृद्धि के साथ बढ़ती जाती है।

48.

भारत की मुख्य आर्थिक आधारित संरचनाएं कौन सी हैं ? वर्णन करो।

Answer»

आर्थिक आधारित संरचना से अभिप्राय उस पूंजी स्टॉक से है जो उत्पादन प्रणाली को प्रत्यक्ष सेवाएं प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में, आर्थिक आधारित संरचनाएं वे सुविधाएं तथा सेवाएं हैं जो उत्पादन तथा वितरण प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।
भारत की मुख्य आर्थिक आधारित संरचनाएं —

  1. परिवहन तथा संचार
  2. शक्ति
  3. सिंचाई
  4. मुद्रा पूर्ति
  5. बैंकिंग तथा अन्य वित्तीय संस्थाएं
49.

आधारित संरचना से क्या अभिप्राय है ? इसकी क्या आवश्यकता है?

Answer»

आधारित संरचना- आधारित संरचना से आशय उन सुविधाओं, क्रियाओं तथा सेवाओं से है जो अन्य क्षेत्रों के संचालन तथा विकास में सहायक होती हैं।

आधारित संरचना की आवश्यकता वास्तव में, प्रत्येक देश के आर्थिक विकास के लिए आधारित संरचना एक पूर्व शर्त है। इसकी पर्याप्त उपलब्धता विकास का आधार है तथा इसकी अपर्याप्त उपलब्धता विकास में सबसे बड़ी बाधा है।

50.

आधारिक संरचना से क्या अभिप्राय है?

Answer»

अर्थ-व्यवस्था के पूंजी स्टॉक का वह भाग जो विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रदान करने की दृष्टि से आवश्यक होता है, अर्थ-व्यवस्था का सहायक ढांचा अथवा आर्थिक संरचना कहलाता है।