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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

जहांगीर गुरु अर्जन देव जी को क्यों शहीद करना चाहता था?

Answer»

जहांगीर को गुरु अर्जन देव जी की बढ़ती हुई ख्याति से ईर्ष्या थी।

अथवा

जहांगीर को इस बात का दुःख था कि हिन्दुओं के साथ-साथ कई मुसलमान भी गुरु साहिब से प्रभावित हो रहे हैं।

2.

‘बाबा बकाला’ वास्तव में कौन थे?

Answer»

गुरु तेग़ बहादुर जी।

3.

हरमंदर साहब का निर्माण कार्य कब पूरा हुआ?

Answer»

हरमंदर साहिब का निर्माण कार्य 1601 ई० में पूरा हुआ।

4.

गुरु अमरदास जी द्वारा सिक्ख मत के प्रसार के लिए किया गया कोई एक कार्य लिखो।

Answer»

गुरु अमरदास जी ने गोइन्दवाल में बावली का निर्माण किया।

अथवा

उन्होंने मंजी प्रथा की स्थापना की तथा लंगर प्रथा का विस्तार किया।

5.

अकाल तख़्त का निर्माण, लोहगढ़ का निर्माण तथा सिक्ख सेना का संगठन सिक्खों के किस गुरु ने किया?

Answer»

गुरु हरगोबिन्द जी ने।

6.

गुरु रामदास जी द्वारा सिक्ख धर्म के विस्तार के लिए किया गया कोई एक कार्य बताओ।

Answer»

गुरु रामदास जी ने अमृतसर नगर बसाया। इस नगर के निर्माण से सिक्खों को एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान मिल गया।

7.

गुरु तेग बहादुर जी की मालवा-यात्रा का वर्णन करो।

Answer»

1673 ई० के मध्य में गुरु तेग़ बहादुर साहिब मालवा प्रदेश की यात्रा पर गए। इस यात्रा में उनकी पत्नी गुजरी जी तथा पुत्र गोबिन्द दास भी उनके साथ थे।

  1. गुरु साहिब सर्वप्रथम सैफ़ाबाद पहुंचे। सैफ़ाबाद में गुरु साहिब की यह दूसरी यात्रा थी। यहां के मनसबदार – नवाब सैफूद्दीन ने उनका पुनः हार्दिक स्वागत किया। उसने गुरु साहिब तथा उनके परिवार को दुर्ग में ठहराया। गुरु साहिब यहां तीन मास तक रहे। यहां रहकर उन्होंने सिख धर्म का प्रचार किया।
  2. सैफ़ाबाद के पश्चात् गुरु साहिब ने मालवा तथा बांगर प्रदेश के अनेक गांवों तथा नगरों की यात्रा की। डॉ० त्रिलोचन सिंह के अनुसार, इस प्रदेश में गुरु साहिब ने लगभग 10 स्थानों का भ्रमण किया। इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण स्थान ये थे : मूलोवाल, सेखों, ढिल्लवां, जोगा, भीखी, खीवा, समऊं, खियाला, मौंड, तलवंडी साबो, भठिंडा, बराह, धमधान आदि। इन सभी स्थानों पर आज भी गुरुद्वारे बने हुए हैं जो गुरु साहिब की यात्रा की याद दिलाते हैं। मूलोवाल में गुरु साहिब में पानी की कमी को दूर करने के लिए एक कुआं खुदवाया। अन्य गांव भी काफ़ी पिछड़े हुए थे। गुरु साहिब ने इन सभी गांवों में लोगों के कष्टों को दूर करने का प्रयास किया। गुरु साहिब 1673 से 1675 ई० के बीच इस प्रदेश के गांवों का भ्रमण करते रहे और यहां के लोगों में धर्म का प्रचार करते रहे।

प्रभाव-मालवा में गुरु साहिब की यात्राओं का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा-

  1. गुरु साहिब के प्रेमपूर्वक व्यवहार से प्रभावित होकर वहां के ज़मींदारों ने किसानों के साथ अच्छा व्यवहार करना आरम्भ कर दिया।
  2. गुरु साहिब ने स्थान-स्थान पर धर्म-प्रचार केन्द्र स्थापित किए। उनके आकर्षक व्यक्तित्व तथा मधुर वाणी से प्रभावित होकर हज़ारों लोग उनके शिष्य बन गए।
  3. उनके उपदेशों के फलस्वरूप लोगों में नई चेतना का संचार हुआ। उनमें नया धार्मिक उत्साह उत्पन्न हुआ और वे साहसी एवं निडर बने। सिक्खों में ऐसे उत्साह एवं एकता को देखकर मुग़ल सरकार भी चिन्ता में पड़ गई।
8.

हरमंदर साहिब की योजना को कार्य रूप देने में किन दो व्यक्तियों ने गुरु अर्जन साहिब की सहायता की?

Answer»

हरमंदर साहिब की योजना को कार्य रूप देने में भाई बुड्डा जी तथा भाई गुरदास जी ने गुरु अर्जन साहिब की सहायता की।

9.

आदि ग्रन्थ साहिब के ऐतिहासिक महत्त्व पर प्रकाश डालिए।

Answer»

आदि ग्रन्थ साहिब सिक्खों का पवित्र धार्मिक ग्रन्थ है। यद्यपि इसे ऐतिहासिक दृष्टिकोण से नहीं लिखा गया, तो भी इसका अत्यन्त ऐतिहासिक महत्त्व है। इसके अध्ययन से हमें 16वीं तथा 17वीं शताब्दी के पंजाब के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन की अनेक बातों का पता चलता है। गुरु नानक देव जी ने अपनी वाणी में लोधी शासन तथा पंजाब के लोगों पर बाबर द्वारा किये गये अत्याचारों की घोर निन्दा की। उस समय की सामाजिक अवस्था के विषय में पता चलता है कि देश में जाति-प्रथा जोरों पर थी, नारी का कोई आदर नहीं था तथा समाज में अनेक व्यर्थ के रीति-रिवाज प्रचलित थे। इसके अतिरिक्त धर्म माम की कोई चीज नहीं रही थी। गुरु नानक देव जी ने स्वयं लिखा है “न कोई हिन्दू है, न कोई मुसलमान” अर्थात् दोनों ही धर्मों के लोग पथ भ्रष्ट हो चुके थे।

10.

गुरु अर्जन देव जी को आदि ग्रन्थ साहिब की स्थापना की आवश्यकता क्यों पड़ी?

Answer»

गुरु अर्जन देव जी सिक्खों को एक पवित्र धार्मिक ग्रन्थ देना चाहते थे, ताकि वे गुरु साहिबान की शुद्ध वाणी को पढ़ तथा सुन सकें।

11.

‘बाबा बकाला’ वास्तव में थे(A) गुरु तेग़ बहादुर जी(B) गुरु हरकृष्ण जी(C) गुरु गोबिन्द सिंह जी(D) गुरु अमरदास जी

Answer»

सही विकल्प है (A) गुरु तेग़ बहादुर जी

12.

गुरु अर्जन देव जी की शहादत पर एक नोट लिखिए।

Answer»

मुग़ल सम्राट अकबर के पंचम पातशाह (सिक्ख गुरु) गुरु अर्जन देव जी के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे, परन्तु अकबर की मृत्यु के पश्चात् जहांगीर ने सहनशीलता की नीति छोड़ दी। वह उस अवसर की खोज में रहने लगा जब वह सिक्ख धर्म पर करारी चोट कर सके। इसी बीच जहांगीर के पुत्र खुसरो ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। खुसरो पराजित होकर गुरु अर्जन देव जी के पास आया। गुरु जी ने उसे आशीर्वाद दिया। इस आरोप में जहांगीर ने गुरु अर्जन देव जी पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया। परन्तु गुरु अर्जन देव जी ने जुर्माना देने से इन्कार कर दिया। इसलिए उन्हें बन्दी बना लिया गया और अनेक यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया। गुरु अर्जन देव जी की शहीदी से सिक्ख भड़क उठे। वे समझ गए कि उन्हें अब अपने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र धारण करने पड़ेंगे।

13.

शहीदी देने वाले प्रथम सिक्ख गुरु का नाम बताओ।

Answer»

शहीदी देने वाले प्रथम गुरु का नाम गुरु अर्जन साहिब था।

14.

आदि ग्रन्थ साहिब का सिक्ख इतिहास में क्या महत्त्व है?

Answer»

आदि ग्रन्थ साहिब के संकलन से सिक्ख इतिहास को एक ठोस आधारशिला मिली। यह सिक्खों के लिए पवित्र और प्रमाणिक बन गया। उनके जन्म, नामकरण, विवाह, मृत्यु आदि सभी संस्कार इसी ग्रन्थ को साक्षी मान कर सम्पन्न होने लगे। इसके अतिरिक्त आदि ग्रन्थ साहिब के प्रति श्रद्धा रखने वाले सभी सिक्खों में जातीय प्रेम की भावना जागृत हुई और वे एक अलग पंथ के रूप में उभरने लगे। आगे चल कर इसी ग्रन्थ साहिब को ‘गुरु पद’ प्रदान किया गया और सभी सिक्ख इसे गुरु मान कर पूजने लगे। आज सभी सिक्ख गुरु ग्रन्थ साहिब में संग्रहित वाणी को आलौकिक ज्ञान का भण्डार मानते हैं। उनका विश्वास है कि इसका श्रद्धापूर्वक अध्ययन करने से सच्चा आनन्द प्राप्त होता है।

15.

अमृतसर की किलाबन्दी किसने करवाई?

Answer»

गुरु हरगोबिन्द जी ने।

16.

पंथ के विकास में गुरु अर्जन देव जी के योगदान की चर्चा कीजिए।

Answer»

गुरु अर्जन देव जी सिक्खों के पांचवें गुरु थे। उन्होंने सिक्ख धर्म के विकास के लिए अनेक कार्य किये-

  1. उन्होंने अमृतसर में हरमंदर साहिब का निर्माण कार्य पूरा करवाया।
  2. उन्होंने तरनतारन और करतारपुर नगरों की नींव रखी।
  3. उन्होंने श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की बीड़ तैयार की और उसे हरमंदर साहिब में स्थापित किया। उन्होंने बाबा बुड्डा जी को वहां का प्रथम ग्रन्थी नियुक्त किया।
  4. सिक्ख पहले अपनी इच्छा से गुरु जी को भेंट देते थे, परन्तु अब गुरु जी ने सिक्खों से आय का दसवां भाग एकत्रित करने के लिए स्थान-स्थान पर सेवक रखे। इन सेवकों को मसन्द कहते थे।
17.

गुरु अर्जन देव जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या योगदान दिया?

Answer»

गुरु अर्जन देव जी के गुरुगद्दी सम्भालते ही सिक्ख धर्म के इतिहास ने नवीन दौर में प्रवेश किया। उनके प्रयास से हरमंदर साहिब बना और सिक्खों को अनेक तीर्थ स्थान मिले। यही नहीं उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब का संकलन किया जिसे आज सिक्ख धर्म में वही स्थान प्राप्त है जो हिन्दुओं में रामायण, मुसलमानों में कुरान शरीफ तथा इसाइयों में बाइबिल को प्राप्त है। संक्षेप में, गुरु अर्जन देव जी के कार्यों तथा सफलताओं का वर्णन इस प्रकार है —

1. हरमंदर साहिब का निर्माण- गुरु रामदास जी के ज्योति जोत समाने के पश्चात् गुरु अर्जन देव जी ने अमृतसर तथा सन्तोखसर नामक तालाबों का निर्माण कार्य पूरा किया। उन्होंने ‘अमृतसर’ तालाब के बीच हरमंदर साहिब का निर्माण करवाया। गुरु जी ने इसके चारों ओर एक-एक द्वार रखवाया। ये द्वार इस बात का प्रतीक हैं कि यह मंदर सभी जातियों तथा धर्मों के लोगों के लिए खुला है।

2. तरनतारन की स्थापना- गुरु अर्जन देव जी ने अमृतसर के अतिरिक्त अन्य अनेक नगरों, सरोवरों तथा स्मारकों का निर्माण करवाया। तरनतारन भी इनमें से एक था। उन्होंने इसका निर्माण प्रदेश के ठीक मध्य में करवाया। अमृतसर की भान्ति तरनतारन भी सिक्खों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गया।

3. लाहौर में बाऊली का निर्माण- गुरु अर्जन देव जी ने अपनी लाहौर यात्रा के दौरान डब्बी बाज़ार में एक बाऊली का निर्माण करवाया। इस बाऊली के निर्माण से निकटवर्ती प्रदेशों के सिक्खों को एक तीर्थ स्थान की प्राप्ति हुई।

4. हरगोबिन्दपुर तथा छरहटा की स्थापना- गुरु जी ने अपने पुत्र हरगोबिन्द के जन्म की खुशी में ब्यास नदी के तट पर हरगोबिन्दपुर नामक नगर की स्थापना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने अमृतसर के निकट पानी की कमी को दूर करने के लिए एक कुएं का निर्माण करवाया। इस कुएं पर छः रहट चलते थे। इसलिए इसको छहरटा के नाम से पुकारा जाने लगा।

5. करतारपुर की नींव रखना- गुरु जी ने 1593 ई० में जालन्धर दोआब में एक नगर की स्थापना की जिसका नाम करतारपुर रखा गया। यहां उन्होंने एक तालाब का निर्माण करवाया जो गंगसर के नाम से प्रसिद्ध है।

6. मसन्द प्रथा का विकास- गुरु अर्जन देव जी ने सिक्खों को आदेश दिया कि वे अपनी आय का 1/10 भाग (दशांश अथवा दसवंद) आवश्यक रूप से मसन्दों को जमा कराएं। मसन्द वैसाखी के दिन इस राशि को अमृतसर के केन्द्रीय कोष में जमा करवा देते थे। राशि को एकत्रित करने के लिए वे अपने प्रतिनिधि नियुक्त करने लगे। इन्हें ‘संगती’ . कहते थे।

7. आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन- गुरु अर्जन देव जी ने आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन करके सिक्खों को एक धार्मिक ग्रन्थ प्रदान किया। गुरु जी ने रामसर में आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन कार्य आरम्भ कर दिया। इस कार्य में भाई गुरदास जी ने गुरु जी को सहयोग दिया। अन्त में आदि ग्रन्थ साहिब की रचना का कार्य 1604 ई० में सम्पन्न हुआ। इस पवित्र ग्रन्थ में उन्होंने अपने से पहले चार गुरु साहिबान की वाणी, फिर अपने भक्तों की वाणी तथा उसके पश्चात् भट्टों की वाणी का संग्रह किया।

8. घोड़ों का व्यापार- गुरु जी ने सिक्खों को घोड़ों का व्यापार करने के लिए प्रेरित किया। इससे सिक्खों को निम्नलिखित लाभ हुए

(i) उस समय घोड़ों के व्यापार से बहुत लाभ होता था। परिणामस्वरूप सिक्ख लोग भी धनी हो गए। अब उनके लिए दसवंद (1/10) देना कठिन न रहा।

(ii) इस व्यापार से सिक्खों को घोड़ों की अच्छी परख हो गई। यह बात उनके लिए सेना संगठन के कार्य में बड़ी काम आई।

9. धर्म प्रचार कार्य- गुरु अर्जन देव जी ने धर्म-प्रचार द्वारा भी अनेक लोगों को अपना शिष्य बना लिया। उन्होंने अपनी आदर्श शिक्षाओं, सद्व्यवहार, नम्र स्वभाव तथा सहनशीलता से अनेक लोगों को प्रभावित किया।

संक्षेप में, इतना कहना ही काफ़ी है कि गुरु अर्जन देव जी के काल में सिक्ख धर्म ने बहुत प्रगति की। आदि ग्रन्थ साहिब की रचना हुई, तरनतारन, करतारपुर तथा छहरटा अस्तित्व में आए तथा हरमंदर साहिब सिक्ख धर्म की शोभा बन गया।

18.

गुरु हरकृष्ण जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या योगदान दिया?

Answer»

गुरु हरकृष्ण जी का जन्म 7 जुलाई, 1656 ई० को कीरतपुर में हुआ। उनकी माता का नाम सुलखणी तथा पिता का नाम गुरु हरराय जी था। वह 1661 ई० में सिक्खों के आठवें गुरु बने। इस समय उनकी आयु केवल पांच वर्ष की थी। एक बालक होने के कारण गुरु हरकृष्ण जी को ‘बाल गुरुं’ के नाम से भी याद किया जाता है। उनके गुरुकाल की प्रमुख घटनाओं का वर्णन इस प्रकार है

  1. रामराय का विरोध- गुरु हरकृष्ण जी को अपने स्वार्थी भाई रामराय के विरोध का सामना भी करना पड़ा। रामराय सातवें गुरु हरराय जी का बड़ा पुत्र होने के नाते गुरुगद्दी पर अपना अधिकार समझता था। वह किसी भी मूल्य पर गुरुगद्दी के अधिकार को खोना नहीं चाहता था। अत: उसने औरंगजेब के दरबार में न्याय की मांग की। औरंगजेब उस समय विद्रोहों को दबाने में लगा हुआ था। इसलिए वह इस ओर कोई विशेष ध्यान न दे सका, परन्तु कुछ समय पश्चात् उसने दोनों भाइयों का झगड़ा निपटाने का फैसला कर लिया। उसने गुरु हरकृष्ण जी को दिल्ली आने के लिये आमन्त्रित किया।
  2. गुरु जी दिल्ली में- गुरु हरकृष्ण जी मार्ग में सिक्ख धर्म का प्रचार करते हुए दिल्ली पहुंचे। वहां वह मिर्जा राजा जय सिंह के घर ठहरे। राजा जय सिंह ने गुरु साहिब की सूझ-बूझ देखने के लिए अपनी महारानी को एक दासी के वस्त्र पहना कर अन्य दासियों के बीच बिठा दिया। तब गुरु जी को महारानी की गोद में बैठने के लिये कहा गया। गुरु जी ने सभी स्त्रियों के चेहरों को ध्यानपूर्वक देखा और महारानी को पहचान गए। वह झट से उसकी गोद में जा बैठे। राजा जय सिंह गुरु साहिब की सूझबूझ से बहुत प्रभावित हुआ। इस स्थान पर आजकल गुरुद्वारा बंगला साहिब बना हुआ है।
  3. ज्योति-जोत समाना- उन दिनों दिल्ली में चेचक तथा हैजे की बीमारियां फैली हुई थीं। गुरु जी ने बीमारों और ज़रूरतमन्दों की अथक सेवा की परन्तु गुरु जी को चेचक के भयंकर रोग ने जकड़ लिया । उन्होंने अपना अन्त समय निकट जान अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का प्रयास किया। वह केवल ‘बाबा बकाला’ के ही शब्द बोल सके तथा उस परम ज्योति में समा गए। बाबा बकाला से अभिप्राय यह था कि उनका उत्तराधिकारी बकाला गांव (अमृतसर) में है। यह घटना 30 मार्च, 1664 ई० की थी। गुरु जी की याद में यमुना के किनारे गुरुद्वारा बाला साहिब का निर्माण करवाया गया।
19.

गुरु रामदास जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या यल किए?

Answer»

गुरु रामदास जी सिक्खों के चौथे. गुरु थे। उन्होंने सिक्ख पंथ के विकास में निम्नलिखित योगदान दिया —

  1. अमृतसर का शिलान्यास- गुरु रामदास जी ने रामदासपुर की नींव रखी। आजकल इस नगर को अमृतसर कहते हैं। 1577 ई० में गुरु जी ने यहां अमृतसर तथा सन्तोखसर नामक दो सरोवरों की खुदाई आरम्भ की। कुछ ही समय में सरोवर के चारों ओर एक छोटा-सा नगर बस गया। इसे रामदासपुर का नाम दिया गया। गुरु जी इस नगर को हर प्रकार से आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। अत: उन्होंने 52 अलग-अलम प्रकार के व्यापारियों को आमन्त्रित किया। उन्होंने एक बाजार की स्थापना की जिसे आजकल ‘गुरु का बाज़ार’ कहते हैं।
  2. मसन्द प्रथा का आरम्भ- गुरु रामदास जी को अमृतसर तथा सन्तोखसर नामक सरोवरों की खुदाई के लिए काफ़ी धन की आवश्यकता थी। अतः उन्होंने मसन्द प्रथा का आरम्भ किया। इन मसन्दों ने विभिन्न प्रदेशों में सिक्ख धर्म का खूब प्रचार किया तथा काफ़ी धन राशि एकत्रित की।
  3. उदासियों से मत- भेद की समाप्ति-गुरु अंगद देव जी तथा गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को उदासी.सम्प्रदाय से अलग कर दिया था। परन्तु गुरु रामदास जी ने उदासियों से बड़ा विनम्रतापूर्ण व्यवहार किया। उदासी सम्प्रदाय के संचालक बाबा श्री चन्द जी एक बार गुरु रामदास जी से मिलने आए। दोनों के बीच एक महत्त्वपूर्ण वार्तालाप हुआ। श्री चन्द जी गुरु साहिब की विनम्रता से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने गुरु जी की. श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया।
  4. सामाजिक सुधार- गुरु रामदास जी ने गुरु अमरदास जी द्वारा आरम्भ किए गए नए सामाजिक रीति-रिवाजों को जारी रखा। उन्होंने सती प्रथा की घोर निन्दा की, विधवा पुनर्विवाह की अनुमति दी तथा विवाह और मत्यु-सम्बन्धी कुछ नए नियम जारी किए।
  5. अकबर के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध - मुग़ल सम्राट अकबर सभी धर्मों के प्रति सहनशील था। वह गुरु रामदास जी का बड़ा सम्मान करता था। कहा जाता है कि गुरु रामदास जी के समय में एक बार पंजाब बुरी तरह अकाल की चपेट में आ गया जिससे किसानों की दशा बहुत खराब हो गई, परन्तु गुरु जी के कहने पर अकबर ने पंजाब के कृषकों. का पूरे वर्ष का लगान माफ कर दिया।’
  6. गुरुगद्दी का पैतृक सिद्धान्त- गुरु रामदास जी ने गुरुगद्दी को पैतृक रूप प्रदान किया। उन्होंने ज्योति जोत समाने से कुछ समय पूर्व गुरु-गद्दी अपने छोटे, परन्तु सबसे योग्य पुत्र अर्जन देव जी को सौंप दी।

गुरु रामदास जी ने गुरुगद्दी को पैतृक बनाकर सिक्ख इतिहास में एक नवीन अध्याय का श्रीगणेश किया। परन्तु एक बात ध्यान देने योग्य है कि गुरु पद का आधार गुण तथा योग्यता ही रहा।सच तो यह है कि गुरु रामदास जी ने बहुत ही कम समय तक सिक्ख मत का मार्ग-दर्शन किया। परन्तु इस थोड़े समय में ही उनके प्रयत्नों से सिक्ख धर्म के रूप में विशेष निखार आया।

20.

गुरु अमरदास जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या-क्या कार्य किए?

Answer»

गुरु अमरदास जी को सिक्ख धर्म में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। गुरु नानक देव जी ने धर्म का जो बीज बोया था वह गुरु अंगद देव जी के काल में अंकुरित हो गया। गुरु अमरदास जी ने अपने कार्यों से इस नये पौधे की रक्षा की। संक्षेप में, गुरु अमरदास जी के कार्यों का वर्णन इस प्रकार है —

  1. गोइन्दवाल की बावली का निर्माण- गुरु अमरदास जी ने सर्वप्रथम गोइन्दवाल के स्थान पर एक बावली (जल-स्रोत) का निर्माण कार्य पूरा किया जिसका शिलान्यास गुरु अंगद देव जी के समय रखा गया था। गुरु अमरदास जी ने इस बावली की तह तक पहुंचने के लिए 84 सीढ़ियां बनवाईं। गुरु जी के अनुसार प्रत्येक सीढ़ी पर जपुजी साहिब का पाठ करने से जन्म-मरण की चौरासी लाख योनियों के चक्कर से मुक्ति मिलेगी। गोइन्दवाल की बावली सिक्ख धर्म का एक प्रसिद्ध तीर्थ-स्थान बन गई।
  2. लंगर प्रथा- गुरु अमरदास जी ने लंगर प्रथा का विस्तार करके सिक्ख धर्म के विकास की ओर एक और महत्त्वपूर्ण कदम उठाया। उन्होंने लंगर के लिए कुछ विशेष नियम बनाए। अब कोई भी व्यक्ति लंगर में भोजन किए बिना गुरु जी से नहीं मिल सकता था। लंगर प्रथा से जाति-पाति तथा रंग-रूप के भेदभावों को बड़ा धक्का लगा और लोगों में समानता की भावना का विकास हुआ। परिणामस्वरूप सिक्ख एकता के सूत्र में बंधने लगे।
  3. सिक्ख गुरु साहिबान के शब्दों को एकत्रित करना- गुरु नानक देव जी के शब्दों तथा श्लोकों को गुरु अंगद देव जी ने एकत्रित करके उनके साथ अपने रचे हुए शब्द भी जोड़ दिए थे। यह सारी सामग्री गुरु अंगद देव जी ने गुरु अमरदास जी को सौंप दी थी। गुरु अमरदास जी ने कुछ-एक नए श्लोकों की रचना की और उन्हें पहले वाले संकलन (collection) के साथ मिला दिया। इस प्रकार विभिन्न गुरु साहिबान के शब्दों तथा उपदेशों के एकत्र हो जाने से ऐसी सामग्री तैयार हो गई जो आदि-ग्रन्थ साहिब के संकलन का आधार बनी।
  4. मंजी प्रथा- वृद्धावस्था के कारण गुरु साहिब जी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर अपनी शिक्षाओं का प्रचार करना कठिन हो गया था। अतः उन्होंने अपने पूरे आध्यात्मिक साम्राज्य को 22 प्रान्तों में बांट दिया। इनमें से प्रत्येक प्रान्त को मंजी’ कहा जाता था। प्रत्येक मंजी सिक्ख धर्म के प्रचार का एक केन्द्र थी। गुरु अमरदास जी द्वारा स्थापित मंजी प्रणाली का सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व है। डॉ० गोकुल चन्द नारंग के शब्दों में, “गुरु जी के इस कार्य ने सिक्ख धर्म की नींव सुदृढ़ करने तथा देश के सभी भागों में प्रचार कार्य बढ़ाने में विशेष योगदान दिया।”
  5. उदासियों से सिक्खों को पृथक करना- गुरु साहिब ने उदासी सम्प्रदाय के सिद्धान्तों का जोरदार शब्दों में खण्डन किया। उन्होंने अपने अनुयायियों को समझाया कि कोई भी व्यक्ति, जो उदासी नियमों का पालन करता है, सच्चा सिक्ख नहीं हो सकता। गुरु जी के इन प्रयत्नों से सिक्ख उदासियों से पृथक् हो गए और सिक्ख धर्म का अस्तित्व मिटने से बच गया।
  6. नई परम्पराएं- गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को व्यर्थ के रीति-रिवाजों का त्याग करने का उपदेश दिया। हिन्दुओं में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर खूब रोया-पीटा जाता था। परन्तु गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को रोने-पीटने के स्थान पर ईश्वर का नाम लेने का उपदेश दिया। उन्होंने विवाह की भी नई विधि आरम्भ की जिसे आनन्द कारज कहते हैं।
  7. आनन्द साहिब की रचना- गुरु अमरदास जी ने एक नई वाणी की रचना की जिसे आनन्द साहिब कहा जाता है। सच तो यह है कि गुरु अमरदास जी का गुरु काल सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। गुरु जी के द्वारा बाऊली का निर्माण, मंजी प्रथा के आरम्भ, लंगर प्रथा के विस्तार तथा नए रीति-रिवाजों ने सिक्ख धर्म के संगठन में बड़ी मज़बूती प्रदान की।
21.

किन्हीं चार परिस्थितियों का वर्णन करो जो गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के लिए उत्तरदायी थीं।

Answer»

गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के मुख्य कारण निम्नलिखित थे —

  1. जहांगीर की धार्मिक कट्टरता- मुग़ल सम्राट जहांगीर गुरु जी से घृणा करता था। वह या तो उन्हें मारना चाहता था या फिर उन्हें मुसलमान बनने के लिए बाध्य करना चाहता था।
  2. पृथिया की शत्रुता- गुरु रामदास जी ने गुरु अर्जन देव जी की बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था, परन्तु यह बात गुरु अर्जन देव जी का बड़ा भाई पृथिया सहन न कर सका। इसलिए वह गुरु साहिब के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगा।
  3. गुरु जी का शाही ठाठ-बाठ- गुरु जी ने एक शानदार दरबार की स्थापना कर ली थी और वह शाही ठाठ-बाठ से रहने लगे थे। उन्होंने अब ‘सच्चा पातशाह’ की उपाधि धारण कर ली थी। मुग़ल सम्राट् जहांगीर इस बात को सहन न कर सका और उसने गुरु जी के विरुद्ध कार्यवाही करने का निश्चय कर लिया।
  4. गुरु अर्जन देव जी पर जुर्माना- धीरे-धीरे जहांगीर की धर्मान्धता चरम सीमा पर पहुंच गई। उसने विद्रोही राजकुमार खुसरो की सहायता करने के अपराध में गुरु जी पर दो लाख रुपये जुर्माना कर दिया। परंतु गुरु जी ने यह जुर्माना देने से इन्कार कर दिया। इस पर उसने गुरु जी को कठोर शारीरिक कष्ट देकर शहीद कर दिया।
22.

गुरु अर्जन देव जी के समाज सुधार के कोई दो काम लिखो।

Answer»

गुरु अर्जन देव जी ने विधवा विवाह के पक्ष में प्रचार किया और सिक्खों को शराब तथा अन्य नशीली वस्तुओं का सेवन करने से मना किया।

23.

गुरु रामदास जी ने पृथी चन्द को गुरु गद्दी के अयोग्य क्यों समझा?

Answer»

गुरु रामदास जी ने पृथी चंद को गुरुपद के अयोग्य इसलिए समझा क्योंकि वह धोखेबाज़ और षड्यन्त्रकारी था।

24.

गुरुगद्दी को पैतृक रूप दिया(A) गुरु अमरदास जी ने(B) गुरु रामदास जी ने(C) गुरु गोबिन्द सिंह जी ने(D) गुरु तेग़ बहादुर जी ने

Answer»

सही विकल्प है (A) गुरु अमरदास जी ने

25.

गुरु रामदास जी ने नगर बसाया-(A) अमृतसर(B) जालंधर(C) कीरतपर साहिब(D) गोइंदवाल साहिब

Answer»

सही विकल्प है (A) अमृतसर

26.

गुरु अर्जन देव जी की शहीदी पर एक संक्षिप्त नोट लिखो। सिक्ख इतिहास में इसका क्या महत्त्व है?

Answer»

मुग़ल सम्राट अकबर के गुरु अर्जन देव जी के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। परन्तु अकबर की मृत्यु के पश्चात् जहांगीर ने सहनशीलता की नीति को छोड़ दिया। वह उस अवसर की खोज में रहने लगा जब वह सिक्ख धर्म पर करारी चोट कर सके। इसी बीच जहांगीर के पुत्र खुसरो ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। खुसरो पराजित होकर गुरु अर्जन देव जी के पास आया। गुरु जी ने उसे आशीर्वाद दिया। इस आरोप में जहांगीर ने गुरु अर्जन देव जी पर दो लाख रुपये जुर्माना लगा दिया। परन्तु गुरु जी ने जुर्माना देने से इन्कार कर दिया। इसलिए उन्हें बन्दी बना लिया गया और अनेक यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया। गुरु अर्जन देव जी की शहीदी से सिक्ख भड़क उठे। वे समझ गए कि उन्हें अब अपने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र धारण करने पड़ेंगे।

27.

गुरु अर्जन देव जी की शहीदी का एक प्रभाव लिखो।

Answer»

गुरु अर्जन देव जी की शहीदी ने सिक्खों को शस्त्र उठाने के लिए प्रेरित किया। वे समझ गए कि धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना आवश्यक है।

28.

गुरु अर्जन देव जी द्वारा स्थापित किए गए चार शहरों के नाम लिखिए।

Answer»

तरनतारन, करतारपुर, हरगोबिन्दपुर तथा छहरटा।

29.

आदि ग्रंथ साहिब का संकलन किया-(A) गुरु अमरदास जी ने(B) गुरु अर्जन देव जी ने(C) गुरु रामदास जी ने(D) गुरु तेग़ बहादुर जी ने

Answer»

सही विकल्प है (B) गुरु अर्जन देव जी ने

30.

गुरु रामदास जी ने महादेव को गुरु गद्दी के अयोग्य क्यों समझा?

Answer»

महादेव फ़कीर स्वभाव का था तथा उसे सांसारिक विषयों से कोई लगाव नहीं था।

31.

गुरु रामदास जी ने अमृतसर सरोवर के चारों ओर जो बाज़ार बसाया वह किस नाम से प्रसिद्ध हुआ?

Answer»

गुरु रामदास जी द्वारा बसाया गया यह बाज़ार ‘गुरु का बाज़ार’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

32.

नई नीति के अतिरिक्त गुरु हरगोबिन्द जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए अन्य क्या कार्य किए ?

Answer»

गुरु हरगोबिन्द जी पांचवें गुरु अर्जन देव जी के इकलौते पुत्र थे। उनका जन्म जून,1595 ई० में अमृतसर जिले के एक गांव वडाली में हुआ था। अपने पिता जी की शहीदी पर 1606 ई० में वह गुरु गद्दी पर बैठे और 1645 ई० तक सिक्ख धर्म का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। गुरु साहिब द्वारा किए कार्यों का वर्णन इस प्रकार है —

  1. कीरतपुर में निवास- कहलूर का राजा कल्याण चन्द गुरु हरगोबिन्द साहब का भक्त था। उसने गुरु साहिब को कुछ भूमि भेंट की। गुरु साहिब ने इस भूमि पर कीरतपुर नगर का निर्माण करवाया। 1635 ई० में गुरु जी ने इस नगर में निवास कर लिया। उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम दस वर्ष यहीं पर धर्म का प्रचार करते हुए व्यतीत किए।
  2. पहाड़ी राजाओं को सिक्ख बनाना- गुरु हरगोबिन्द साहब ने अनेक पहाड़ी लोगों को अपना सिक्ख बनाया। . यहां तक कि कई पहाड़ी राजा भी उनके सिक्ख बन गए। परन्तु यह प्रभाव अस्थायी सिद्ध हुआ। कुछ समय पश्चात् पहाड़ी राजाओं ने पुनः हिन्दू धर्म की मूर्ति-पूजा आदि प्रथाओं को अपनाना आरम्भ कर दिया। ये प्रथाएं गुरु साहिबान की शिक्षाओं के अनुकूल नहीं थीं।
  3. गुरु हरगोबिन्द जी की धार्मिक यात्राएं- ग्वालियर के किले से रिहा होने के पश्चात् गुरु हरगोबिन्द साहब के मुग़ल सम्राट् जहांगीर से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित हो गए। इस शान्तिकाल में गुरु जी ने धर्म प्रचार के लिए यात्राएं की। सबसे पहले वह अमृतसर से लाहौर गए। वहाँ पर आप ने गुरु अर्जन देव जी की स्मृति में गुरुद्वारा डेरा साहब बनवाया। लाहौर से गुरु जी गुजरांवाला तथा भिंभर (गुजरात) होते हुए कश्मीर पहुंचे। यहाँ पर आप ने ‘संगत’ की स्थापना की। भाई सेवा दास जी को इस संगत का मुखिया नियुक्त किया गया।गुरु हरगोबिन्द जी ननकाना साहब भी गए। वहाँ से लौट कर उन्होंने कुछ समय अमृतसर में बिताया। वह उत्तर प्रदेश में नानकमता (गोरखमता) भी गए। गुरु जी की राजसी शान देखकर वहां के योगी नानकमता छोड़ कर भाग गए। वहाँ से लौटते समय गुरु जी पंजाब के मालवा क्षेत्र में गए। तख्तूपुरा, डरौली भाई (फिरोजपुर) में कुछ समय ठहर कर गुरु जी पुनः अमृतसर लौट आए।
  4. धर्म-प्रचारक भेजना- गुरु हरगोबिन्द जी 1635 ई० तक युद्धों में व्यस्त रहे। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र बाबा गुरदित्ता जी को सिक्ख धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिए नियुक्त किया। बाबा गुरदित्ता जी ने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए चार मुख्य प्रचारकों-अलमस्त, फूल, गौंडा तथा बलु हसना को नियुक्त किया। इन प्रचारकों के अतिरिक्त गुरु हरगोबिन्द जी ने भाई विधिचन्द को बंगाल तथा भाई गुरदास को काबुल तथा बनारस में धर्म-प्रचार के लिए भेजा।
  5. हरराय जी को उत्तराधिकारी नियुक्त करना- अपना अन्तिम समय निकट आते देख गुरु हरगोबिन्द जी ने अपने पौत्र हरराय (बाबा गुरुदित्ता जी के छोटे पुत्र) को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
33.

अमृतसर की किलाबन्दी बारे गुरु हरगोबिन्द जी ने क्या किया?

Answer»

गुरु हरगोबिन्द साहिब ने अमृतसर की रक्षा के लिए इसके चारों ओर एक दीवार बनवाई और नगर में ‘लोहगढ़’ नामक एक किले का निर्माण करवाया।

34.

गुरु हरगोबिन्द साहिब के किन्हीं चार सेनानायकों के नाम बताओ।

Answer»

गुरु हरगोबिन्द साहिब के चार सेनानायकों के नाम विधिचन्द, पीराना, जेठा और पैंदे खां थे।

35.

सिक्ख धर्म के संगठन एवं विकास में किन चार संस्थाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई?

Answer»

सिक्ख धर्म के संगठन एवं विकास में ‘पंगत’, ‘संगत’, ‘मंजी’ तथा ‘मसन्द’ संस्थाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

36.

गुरु अर्जन देव जी की शहीदी की क्या प्रतिक्रिया हुई?

Answer»

गुरु अर्जन देव जी की शहीदी की महत्त्वपूर्ण प्रतिक्रिया हुई —

  1. गुरु अर्जन देव जी ने ज्योति-जोत समाने से पहले अपने पुत्र हरगोबिन्द के नाम यह सन्देश छोड़ा, “वह समय बड़ी तेजी से आ रहा है जब भलाई और बुराई की शक्तियों की टक्कर होगी। अतः मेरे पुत्र तैयार हो जा, आप शस्त्र पहन और अपने अनुयायियों को शस्त्र पहना।” गुरु जी के इन अन्तिम शब्दों ने सिक्खों में सैनिक भावना को जागृत कर लिया। अब सिक्ख ‘सन्त सिपाही’ बन गए जिनके एक हाथ में माला थी और दूसरे हाथ में तलवार।।
  2. गुरु जी की शहीदी से पूर्व सिक्खों तथा मुग़लों के आपसी सम्बन्ध अच्छे थे। परन्तु इस शहीदी ने सिक्खों की धार्मिक भावनाओं को भड़का दिया जिससे उनके मन में मुगल राज्य के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई।
  3. इस शहीदी से सिक्ख धर्म को लोकप्रियता मिली। सिक्ख अब अपने धर्म के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने को तैयार हो गए। निःसन्देह गुरु अर्जन देव जी की शहीदी सिक्ख इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई।
37.

गुरु अर्जन देव जी के चरित्र तथा व्यक्तित्व के किन्हीं चार महत्त्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट कीजिए।

Answer»

पांचवें सिक्ख गुरु अर्जन देव जी उच्च कोटि के चरित्र तथा व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके चरित्र के चार विभिन्न पहलुओं का वर्णन इस प्रकार है —

  1. गुरु जी एक बहुत बड़े धार्मिक नेता और संगठनकर्ता थे। उन्होंने सिक्ख धर्म का उत्साहपूर्वक प्रचार किया और मसन्द प्रथा में आवश्यक सुधार करके सिक्ख समुदाय को एक संगठित रूप प्रदान किया।
  2. गुरु साहिब एक महान् निर्माता भी थे। उन्होंने अमृतसर नगर का निर्माण कार्य पूरा किया, वहां के सरोवर में हरमंदर साहिब का निर्माण करवाया और तरनतारन, हरगोबिन्दपुर आदि नगर बसाये। लाहौर में उन्होंने एक बावली बनवाई।
  3. उन्होंने ‘आदि ग्रन्थ साहिब’ का संकलन करके एक महान् सम्पादक होने का परिचय दिया।
  4. उनमें एक समाज सुधारक के भी सभी गुण विद्यमान थे। उन्होंने विधवा विवाह का प्रचार किया और नशीली वस्तुओं के सेवन को बुरा बताया। उन्होंने एक बस्ती की स्थापना करवाई जहां रोगियों को औषधियों के साथ-साथ मुफ्त भोजन तथा वस्त्र भी दिए जाते थे।
38.

गुरु हरगोबिन्द साहिब ने अपने दरबार में किन दो संगीतकारों को वीर रस के गीत गाने के लिए नियुक्त किया?

Answer»

उन्होंने अपने दरबार में अब्दुल तथा नत्थामल नामक दो संगीतकारों को वीर रस के गीत गाने के लिए नियुक्त किया।

39.

गुरु हरगोबिन्द साहिब की सेना के संगठन का वर्णन करो।

Answer»

गुरु हरगोबिन्द जी ने आत्मरक्षा के लिए सेना का संगठन किया। इस सेना में अनेक शस्त्रधारी सैनिक तथा स्वयं सेवक सम्मिलित थे। माझा के अनेक युद्ध प्रिय युवक गुरु जी की सेना में भर्ती हो गए। मोहसिन फानी के मतानुसार, गुरु जी की सेना में 800 घोड़े, 300 घुड़सवार तथा 60 बन्दूकची थे। उनके पास 500 ऐसे स्वयं सेवक भी थे जो वेतन नहीं लेते थे। यह सिक्ख सेना पांच जत्थों में बंटी हुई थी। इनके जत्थेदार थे-विधिचंद, पीराना, जेठा, पैरा तथा लंगाह । इसके अतिरिक्त पैंदा खां के नेतृत्व में एक पृथक् पठान सेना भी थी।

40.

गुरु अर्जन देव जी की शहीदी कब हुई?

Answer»

1606 ई० में।

41.

गुरु रामदास जी ने “गुरु का बाज़ार’ की स्थापना किस उद्देश्य से की?

Answer»

गुरु रामदास जी अमृतसर नगर को हर प्रकार से आत्म-निर्भर बनाना चाहते थे। इसी कारण उन्होंने 52 अलग-अलग प्रकार के व्यापारियों को आमन्त्रित किया और इस बाज़ार की स्थापना की।

42.

गुरु अर्जन देव जी के माता-पिता का नाम लिखो।

Answer»

गुरु अर्जन देव जी के पिता का नाम गुरु रामदास जी तथा उनकी माता जी का नाम बीबी भानी था।

43.

उन परिस्थितियों का वर्णन करो जो गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के लिए उत्तरदायी थीं। इस शहीदी का क्या महत्त्व है?अथवा“गुरु अर्जन देव जी के बलिदान ने सिक्ख इतिहास के पन्ने पलट दिए।” इस कथन की पुष्टि करो।

Answer»

गुरु अर्जन देव जी उन महापुरुषों में से एक थे जिन्होंने धर्म की खातिर अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनकी शहीदी के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-

1. सिक्ख धर्म का विस्तार- गुरु अर्जन देव जी के समय सिख धर्म का तेजी से विस्तार हो रहा था। कई नगरों की स्थापना, श्री हरमंदर साहिब के निर्माण तथा आदि ग्रंथ साहिब के संकलन के कारण लोगों की सिक्ख धर्म में आस्था बढ़ती जा रही थी। दसबंध प्रथा के कारण गुरु साहिब की आय में वृद्धि हो रही थी। अतः लोग गुरु अर्जन देव जी को ‘सच्चे पातशाह’ कह कर पुकारने लगे थे। मुग़ल सम्राट् जहांगीर इस स्थिति को राजनीतिक संकट के रूप में देख रहा था।

2. जहांगीर की धार्मिक कट्टरता- 1605 ई० में जहांगीर मुग़ल सम्राट् बना। यह सिक्खों के प्रति घृणा की भावना रखता था। इसलिए वह गुरु जी से घृणा करता था। वह या तो उनको मारना चाहता था और या फिर उन्हें मुसलमान बनने के लिए बाध्य करना चाहता था। अत: यह मानना ही पड़ेगा कि गुरु जी की शहीदी में जहांगीर का पूरा हाथ था।

3. पृथिया (पिरथी चन्द) की शत्रुता- गुरु रामदास जी ने गुरु अर्जन देव जी की बुद्धिमता से प्रभावित होकर उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। परन्तु यह बात गुरु अर्जन देव जी का बड़ा भाई पृथिया सहन न कर सका। उसने मुगल सम्राट अकबर से यह शिकायत की कि गुरु अर्जन देव जी एक ऐसे धार्मिक ग्रंथ (आदि ग्रंथ साहिब) की रचना कर रहे हैं, जो इस्लाम धर्म के सिद्धांतों के विरुद्ध है, परन्तु सहनशील अकबर ने गुरु जी के विरुद्ध कोई कार्यवाही न की। इसके बाद पृथिया लाहौर के गवर्नर सुलेही खां तथा वहां के वित्त मंत्री चंदुशाह से मिलकर गुरु अर्जन देव जी के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगा। मरने से पहले वह मुग़लों के मन में गुरु जी के विरुद्ध घृणा के बीज बो गया।

4. नक्शबंदियों का विरोध- नक्शबंदी लहर एक मुस्लिम लहर थी जो गैर मुसलमानों को कोई भी सुविधा दिए जाने के विरुद्ध थे। इस लहर के एक नेता शेख अहमद सरहिंदी के नेतृत्व में मुसलमानों ने गुरु अर्जन देव जी के विरुद्ध सम्राट अकबर से शिकायत की। परन्तु एक उदारवादी शासक होने के कारण अकबर ने नक्शबंदियों की शिकायतों की ओर कोई ध्यान न दिया। अत: अकबर की मृत्यु के बाद नक्शबंदियों ने जहांगीर को गुरु साहिब के विरुद्ध भड़कना शुरु कर दिया।

5. चन्दू शाह की शत्रुता- चन्दू शाह लाहौर का दीवान था। गुरु अर्जन देव जी ने उसकी पुत्री के साथ अपने पुत्र का विवाह करने से इन्कार कर दिया था। अतः उसने पहले सम्राट अकबर को तथा बाद में जहांगीर को गुरु जी के विरुद्ध यह कह कर भड़काया कि उन्होंने विद्रोही राजकुमार की सहायता की है। जहांगीर पहले ही गुरु जी के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना चाहता था। इसलिए वह गुरु जी के विरुद्ध कठोर पग उठाने के लिए तैयार हो गया।

6. आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन- गुरु जी ने आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन किया था। गुरु जी के शत्रुओं ने जहांगीर को बताया कि आदि ग्रन्थ साहिब में इस्लाम धर्म के विरुद्ध बहुत कुछ लिखा गया है। अत: जहांगीर ने गुरु जी को आदेश दिया कि आदि ग्रन्थ साहिब में से ऐसी सभी बातें निकाल दी जाएं जो इस्लाम धर्म के विरुद्ध हों। इस पर गुरु जी ने उत्तर दिया, “आदि ग्रन्थ साहिब से हम एक भी अक्षर निकालने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि इसमें हमने कोई भी ऐसी बात नहीं लिखी जो किसी धर्म के विरुद्ध हो।” कहते हैं कि यह उत्तर पाकर जहांगीर ने गुरु अर्जन देव जी से कहा कि वे इस ग्रन्थ में मुहम्मद साहिब के विषय में भी कुछ लिख दें। परन्तु गुरु जी ने जहांगीर की यह बात स्वीकार न की और कहा कि इस विषय में ईश्वर के आदेश के सिवा किसी अन्य के आदेश का पालन नहीं किया जा सकता।

7. राजकुमार खुसरो का मामला (तात्कालिक कारण)- खुसरो जहांगीर का सबसे बड़ा पुत्र था। उसने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। जहांगीर की सेनाओं ने उसका पीछा किया। वह भाग कर गुरु अर्जन देव जी की शरण में पहुंचा। कहते हैं कि गुरु जी ने उसे आशीर्वाद दिया और उसे लंगर भी छकाया। परन्तु गुरु साहिब के विरोधियों ने जहांगीर के कान भरे कि गुरु साहिब ने खुसरो की धन से सहायता की है। इसे गुरु जी का अपराध माना गया और उन्हें बंदी बनने का आदेश दिया गया।

शहीदी- गुरु साहिब को 24 मई, 1606 ई० को बंदी के रूप में लाहौर लाया गया। उपर्युक्त बातों के कारण जहांगीर की धर्मान्धता चरम सीमा पर थी। अतः उसने गुरु अर्जन देव जी को शहीद करने का आदेश जारी कर दिया। शहीदी से पहले गुरु साहिब को कठोर यातनाएं दी गईं। कहा जाता है कि उन्हें तपते लोहे पर बिठाया गया और उनके शरीर पर गर्म रेत डाली गई। 30 मई 1606 ई० को गुरु जी शहीदी को प्राप्त हुए। उन्हें शहीदों का ‘सरताज’ कहा जाता है।
शहीदी का महत्त्व-गुरु अर्जन देव जी की शहीदी को सिक्ख इतिहास में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

  1. गुरु जी की शहीदी ने सिक्खों में सैनिक भावना जागृत की। अतः शान्तिप्रिय सिक्ख जाति ने लड़ाकू जाति का रूप धारण कर लिया। वास्तव में वे ‘सन्त सिपाही’ बन गए।
  2. गुरु जी की शहीदी से पूर्व सिक्खों तथा मुगलों के आपसी सम्बन्ध अच्छे थे। परन्तु इस शहीदी ने सिक्खों की धार्मिक भावनाओं को भड़का दिया और उनके मन में मुग़ल राज्य के प्रति घृणा पैदा हो गई।
  3. इस शहीदी से सिक्ख धर्म को लोकप्रियता मिली। सिक्ख अब अपने धर्म के लिए अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तैयार हो गए।
  4. निःसन्देह गुरु अर्जन देव जी की शहीदी सिक्ख इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई। इसने शान्तिप्रिय सिक्खों को सन्त सिपाही बना दिया। उन्होंने समझ लिया कि यदि उन्हें अपने धर्म की रक्षा करनी है तो उन्हें शस्त्र धारण करने ही पड़ेंगे।
44.

गुरु हरगोबिन्द साहिब के समय तक कौन-कौन से चार स्थान सिक्खों के तीर्थ स्थान बन चुके थे?

Answer»

गुरु हरगोबिन्द साहिब के समय तक गोइन्दवाल, अमृतसर, तरनतारन तथा करतारपुर सिक्खों के तीर्थ स्थान बन चुके थे।

45.

गुरु हरगोबिन्द जी की गद्दी पर बैठते समय आयु कितनी थी?

Answer»

गुरु गद्दी पर बैठते समय उनकी आयु केवल ग्यारह वर्ष की थी।

46.

किस मुग़ल बादशाह ने गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में बन्दी बनाया?

Answer»

जहांगीर ने मुग़ल बादशाह ने गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में बन्दी बनाया ।

47.

गुरु हरगोबिन्द जी ने धार्मिक तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा किससे प्राप्त की?

Answer»

गुरु हरगोबिन्द जी ने धार्मिक तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा भाई बुड्डा जी से प्राप्त की।

48.

गुरु अर्जन देव जी का जन्म कब और कहां हुआ?

Answer»

गुरु अर्जन देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1563 ई० को गोइन्दवाल में हुआ।

49.

गुरु हरगोबिन्द साहिब के समय के चार प्रमुख प्रचारकों (उदासियों) के नाम लिखो।

Answer»

गुरु हरगोबिन्द साहिब के समय के चार प्रमुख प्रचारकों (उदासियों) के नाम अलमस्त, फूल, गौड़ा तथा बलु हसना थे।

50.

गुरु अमरदास जी का जन्म कब और कहां हुआ था?

Answer»

गुरु अमरदास जी का जन्म 1479 ई० में जिला अमृतसर में स्थित बासरके नामक गाँव में हुआ था।