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Answer» गुरु हरगोबिन्द जी पांचवें गुरु अर्जन देव जी के इकलौते पुत्र थे। उनका जन्म जून,1595 ई० में अमृतसर जिले के एक गांव वडाली में हुआ था। अपने पिता जी की शहीदी पर 1606 ई० में वह गुरु गद्दी पर बैठे और 1645 ई० तक सिक्ख धर्म का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। गुरु साहिब द्वारा किए कार्यों का वर्णन इस प्रकार है — - कीरतपुर में निवास- कहलूर का राजा कल्याण चन्द गुरु हरगोबिन्द साहब का भक्त था। उसने गुरु साहिब को कुछ भूमि भेंट की। गुरु साहिब ने इस भूमि पर कीरतपुर नगर का निर्माण करवाया। 1635 ई० में गुरु जी ने इस नगर में निवास कर लिया। उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम दस वर्ष यहीं पर धर्म का प्रचार करते हुए व्यतीत किए।
- पहाड़ी राजाओं को सिक्ख बनाना- गुरु हरगोबिन्द साहब ने अनेक पहाड़ी लोगों को अपना सिक्ख बनाया। . यहां तक कि कई पहाड़ी राजा भी उनके सिक्ख बन गए। परन्तु यह प्रभाव अस्थायी सिद्ध हुआ। कुछ समय पश्चात् पहाड़ी राजाओं ने पुनः हिन्दू धर्म की मूर्ति-पूजा आदि प्रथाओं को अपनाना आरम्भ कर दिया। ये प्रथाएं गुरु साहिबान की शिक्षाओं के अनुकूल नहीं थीं।
- गुरु हरगोबिन्द जी की धार्मिक यात्राएं- ग्वालियर के किले से रिहा होने के पश्चात् गुरु हरगोबिन्द साहब के मुग़ल सम्राट् जहांगीर से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित हो गए। इस शान्तिकाल में गुरु जी ने धर्म प्रचार के लिए यात्राएं की। सबसे पहले वह अमृतसर से लाहौर गए। वहाँ पर आप ने गुरु अर्जन देव जी की स्मृति में गुरुद्वारा डेरा साहब बनवाया। लाहौर से गुरु जी गुजरांवाला तथा भिंभर (गुजरात) होते हुए कश्मीर पहुंचे। यहाँ पर आप ने ‘संगत’ की स्थापना की। भाई सेवा दास जी को इस संगत का मुखिया नियुक्त किया गया।गुरु हरगोबिन्द जी ननकाना साहब भी गए। वहाँ से लौट कर उन्होंने कुछ समय अमृतसर में बिताया। वह उत्तर प्रदेश में नानकमता (गोरखमता) भी गए। गुरु जी की राजसी शान देखकर वहां के योगी नानकमता छोड़ कर भाग गए। वहाँ से लौटते समय गुरु जी पंजाब के मालवा क्षेत्र में गए। तख्तूपुरा, डरौली भाई (फिरोजपुर) में कुछ समय ठहर कर गुरु जी पुनः अमृतसर लौट आए।
- धर्म-प्रचारक भेजना- गुरु हरगोबिन्द जी 1635 ई० तक युद्धों में व्यस्त रहे। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र बाबा गुरदित्ता जी को सिक्ख धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिए नियुक्त किया। बाबा गुरदित्ता जी ने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए चार मुख्य प्रचारकों-अलमस्त, फूल, गौंडा तथा बलु हसना को नियुक्त किया। इन प्रचारकों के अतिरिक्त गुरु हरगोबिन्द जी ने भाई विधिचन्द को बंगाल तथा भाई गुरदास को काबुल तथा बनारस में धर्म-प्रचार के लिए भेजा।
- हरराय जी को उत्तराधिकारी नियुक्त करना- अपना अन्तिम समय निकट आते देख गुरु हरगोबिन्द जी ने अपने पौत्र हरराय (बाबा गुरुदित्ता जी के छोटे पुत्र) को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
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