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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

आयकर सम्मिलित किया गया है(क) संघ सूची में(ख) राज्य सूची में(ग) समवर्ती सूची में(घ) इनमें से किसी में भी नहीं

Answer»

सही विकल्प है (क) संघ सूची में

2.

उत्पादन का क्या अर्थ है ? इसके प्रमुख तत्त्व तथा उपादानों (साधनों) का वर्णन कीजिए।

Answer»

उत्पादन

साधारण बोलचाल की भाषा में उत्पादन का अर्थ किसी वस्तु या पदार्थ के निर्माण से होता है, किन्तु वैज्ञानिकों का मत है कि मनुष्य न तो किसी वस्तु या पदार्थ को उत्पन्न कर सकता है और न ही नष्ट कर सकता है। वह केवल पदार्थ या वस्तुओं के स्वरूप को बदलकर उन्हें अधिक उपयोगी बना सकता है। दूसरे शब्दों में, वह वस्तु में उपयोगिता का सृजन कर सकता है। अत: थॉमस के अनुसार, “वस्तु की उपयोगिता में वृद्धि करना ही उत्पादन है।”

उत्पादन की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

प्रो० पेन्सन के अनुसार, “उत्पादन का तात्पर्य मानवीय आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने की योग्यता या शक्ति में वृद्धि करने से है, न कि किसी वस्तु के निर्माण करने से।”
प्रो० ऐली के अनुसार, “आर्थिक उपयोगिता का सृजन करना ही उत्पादन है।”
ए०एच० स्मिथ के अनुसार, “उत्पादन वह प्रक्रिया है, जिससे वस्तुओं में उपयोगिता का सृजन होता है।’
एजे० ब्राउन के अनुसार, “उत्पादन उन सभी क्रियाओं तथा सेवाओं का द्योतक है, जो कि किसी आवश्यकता को सन्तुष्ट करती हैं या सन्तुष्ट करने की आशा से की जाती हैं।”

उत्पादन के प्रमुख तत्त्व – उत्पादन के चार प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं –

  1. उत्पादन एक मानवीय प्रयत्न है।
  2. उत्पादन एक आर्थिक क्रिया है।
  3. उत्पादन द्वारा तुष्टिगुण का सृजन किया जाता है।
  4. सृजित तुष्टिगुण का मूल्य से विनिमय किया जाता है।

उत्पादन के साधन (उपादान) – उत्पादन के पाँच उपादान (साधन) निम्नलिखित हैं –

1. भूमि – साधारण बोलचाल की भाषा में भूमि का अर्थ जमीन की ऊपरी सतह से लिया जाता है, परन्तु अर्थशास्त्र में भूमि का अर्थ पर्याप्त व्यापक है। अर्थशास्त्र में भूमि के अन्तर्गत न केवल जमीन की ऊपरी सतह, वरन् वे समस्त वस्तुएँ एवं शक्तियाँ सम्मिलित की जाती हैं जिन्हें प्रकृति ने नि:शुल्क उपहार के रूप में मनुष्य को प्रदान किया है। इसके अन्तर्गत पर्वत, मैदान, नदी, झील, समुद्र, खनिज पदार्थ, वर्षा, प्रकाश, जलवायु आदि आते हैं। इन सभी प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता उत्पादन में होती है, बिना इनके उत्पादन नहीं हो सकता है। भूमि के स्वामी को भूमिपति कहते हैं।

2. श्रम – साधारण बोलचाल की भाषा में श्रम का अर्थ परिश्रम करने से होता है, परन्तु अर्थशास्त्र में सभी प्रकार के परिश्रम को श्रम नहीं माना जाता। अर्थशास्त्र में श्रम का अर्थ, मनुष्य के उस शारीरिक तथा मानसिक प्रयत्न (कार्य) से लिया जाता है, जो आर्थिक उद्देश्य से किया जाता है या मनुष्य का वह शारीरिक तथा मानसिक कार्य जिसका उद्देश्य धनोत्पादन करना होता है, श्रम कहलाता है। अध्यापक, डॉक्टर, मजदूर आदि का कार्य श्रम की श्रेणी में आता है। यदि इनमें से कोई भी व्यक्ति परोपकार के उद्देश्य से कार्य करता है तब वह श्रम नहीं कहलाएगा।

3. पूँजी – साधारण बोलचाल की भाषा में पूँजी का अर्थ रुपया, पैसा, धन, सम्पत्ति आदि से लगाया जाता है। अर्थशास्त्र में पूँजी धन की केवल वह भाग है, जिसे और अधिक धन पैदा करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। पूँजी उत्पादन का एक मनुष्यकृत साधन है।

4. प्रबन्ध या संगठन – उत्पादन के विभिन्न उपादानों को एकत्रित करके उन्हें उचित व आदर्श अनुपात | में लगाकर अधिकतम उत्पादन करने के कार्य को संगठन कहा जाता है। जो व्यक्ति इस कार्य को सम्पादित करता है उसे संगठनकर्ता, प्रबन्धक या व्यवस्थापक कहते हैं।

5. साहस या उद्यम – प्रत्येक व्यवसाय या उत्पादन कार्य में कुछ जोखिम या अनिश्चितता अवश्य होती है, क्योंकि उत्पादन की मात्रा भविष्य की माँग एवं प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर होती है; अतः उत्पादने कार्य में लाभ व हानि दोनों की सम्भावना होती है। इस प्रकार अर्थशास्त्र में किसी उत्पादन या व्यवसाय की अनिश्चितता या जोखिम को साहस या उद्यम कहते हैं। इस अनिश्चितता को सहन करने वाले व्यक्ति को साहसी या उद्यमी कहते हैं।

आधुनिक युग में उत्पादन के सभी साधनों के सहयोग से उत्पादन कार्य सम्पादित किया जाता है। सभी साधन एक-दूसरे पर निर्भर तथा महत्त्वपूर्ण हैं। उत्पादन एक सामूहिक प्रक्रिया है जो सभी साधनों के सहयोग से चलती है।

3.

व्यवस्था की जोखिम वहन करता है(क) साहसी(ख) भूमिपति(ग) श्रमिक(घ) सरकार

Answer»

सही विकल्प है (क) साहसी

4.

साहसी का प्रतिफल कहलाता है?(क) लगान(ख) वेतन(ग) ब्याज(घ) लाभ

Answer»

सही विकल्प है (घ) लाभ

5.

भूमि के उपयोग के लिए भूस्वामी को दिया जाने वाला भुगतान क्या कहलाता है?(क) ब्याज(ख) मजदूरी(ग) वेतन(घ) लगान

Answer»

सही विकल्प है (घ) लगान

6.

श्रम का प्रतिफल है(क) लाभ(ख) मजदूरी(ग) लगान(घ) ब्याज

Answer»

सही विकल्प है (ख) मजदूरी

7.

क्या व्यय आवश्यकता की सन्तुष्टि प्रत्यक्ष रूप से करता है।

Answer»

हाँ व्यय आवश्यकता की सन्तुष्टि प्रत्यक्ष रूप से करता है।

8.

राजस्व से क्या तात्पर्य है ?

Answer»

“राजस्व अर्थशास्त्र का वह अंग है, जिसमें सरकार की आय तथा व्यय और आय-व्यय सम्बन्धी प्रशासन का अध्ययन किया जाता है।

9.

कर किसे कहते हैं ? एक अच्छी कर-प्रणाली के लक्षण लिखिए।

Answer»

कर

कर एक अनिवार्य अंशदान है, जो करदाता को देना होता है। करदाता को इसके बदले में प्रत्यक्ष लाभ का कोई आश्वासन नहीं दिया जाता, करों का उपयोग सार्वजनिक हित में किया जाता है। डाल्टन के अनुसार, “कर किसी सार्वजनिक सत्ता द्वारा प्राप्त किया हुआ एक अनिवार्य अंशदान है, चाहे करदाता को बदले में उतनी राशि की सेवा प्राप्त हो या न हो और न यह किसी कानूनी अपराध के लिए दण्डस्वरूप लगाया जाता है।”

अच्छी कर-प्रणाली के लक्षण (विशेषताएँ)

एक अच्छी कर-प्रणाली में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए –

  1. कर-प्रणाली सरल एवं सुविधाजनक होनी चाहिए जिससे करदाता को कर का भुगतान करने में मानसिक कष्ट न हो।
  2. एक अच्छी कर-प्रणाली अधिकतम सामाजिक लाभ के सिद्धान्त पर आधारित होती है।
  3. कर-प्रणाली प्रगतिशील होनी चाहिए अर्थात् कर-प्रणाली ऐसी हो जिससे कर या भार धनी वर्ग पर अधिक व निर्धन वर्ग पर कम पड़े।
  4. एक अच्छी कर-प्रणाली में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों करों का समावेश होता है।
  5. एक अच्छी कर-प्रणाली में लोच का गुण पाया जाता है, जिससे आवश्यकतानुसार करों की मात्रा में वृद्धि व कमी की जा सके।
  6. कर-प्रणाली मितव्ययी होनी चाहिए।
  7. एक अच्छी कर-प्रणाली विलासिता एवं मादक वस्तुओं के उपभोग को हतोत्साहित करती है।
  8. बचत एवं पूँजी निर्माण को प्रोत्साहित करना अच्छी कर-प्रणाली का गुण है।
  9. अच्छी कर-प्रणाली आर्थिक विकास को गति प्रदान करती है।
  10. अच्छी कर-प्रणाली में उत्पादकता का गुण होता है।
  11. अच्छी कर-प्रणाली में करों का भार समाज पर कम पड़ता है।
  12. कर-प्रणाली में निश्चितता का गुण होना चाहिए।
10.

राजस्व की एक उचित परिभाषा दीजिए।

Answer»

राजस्व राज्य के वित्तीय पक्ष का विधिवत् अध्ययन करता है। आज राजस्व के विस्तृत एवं गहन दोनों ही प्रकार के कार्यों में तेजी से वृद्धि हो रही है। इन कार्यों के संचालन के लिए धन की आवश्यकता होती है। अत: धन कैसे जुटाया जाए और इसका व्यय कैसे किया जाए-इन सभी आय और व्यय से सम्बन्धित प्रक्रियाओं एवं व्यवस्थाओं का अध्ययन राजस्व के अन्तर्गत किया जाता है। संक्षेप में, ‘‘राजस्व अर्थ-विज्ञान का वह अंग है, जिसमें सरकार की आय और व्यय तथा आय-व्यय सम्बन्धी प्रशासन का अध्ययन किया जाता है। इसके अन्तर्गत मात्र विधियों का अध्ययन’ ही काफी नहीं है, वरन् उन सिद्धान्तों का पर्यवेक्षण भी आवश्यक है, जिनके अनुसार ये विधियाँ अपनाई जाती हैं।”

11.

आयकर किसे कहते हैं ?

Answer»

व्यक्तियों की आय (Income) पर जो कर लगाया जाता है, उसे आयकर कहते हैं। यह एक प्रत्यक्ष कर है।

12.

केन्द्रीय सरकार की आय के स्रोतों का वर्णन कीजिए।याकेन्द्र सरकार द्वारा लगाये जाने वाले किन्हीं तीन करों का वर्णन कीजिए।

Answer»

केन्द्रीय सरकार की आय के स्रोत

केन्द्रीय सरकार की आय के स्रोतों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जा सकता है – (i) कर राजस्व अर्थात् कर क्षेत्र से प्राप्त आय तथा (ii) कर भिन्न राजस्व अर्थात् गैर-कर क्षेत्र से प्राप्त आय। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार की आय के स्रोतों में पूँजी प्राप्तियाँ भी हैं। पूँजी प्राप्तियों के अन्तर्गत ऋणों की वसूलियाँ, अन्य प्राप्तियाँ (विदेशी सहायता), उधार व अन्य देयताएँ, हुण्डियाँ आदि सम्मिलित रहती हैं। प्रस्तुत प्रश्न के अन्तर्गत कर व गैर-कर से प्राप्त आय का ही वर्णन किया जाएगा –

कर राजस्व से प्राप्त आय कर राजस्व के अन्तर्गत आने वाले प्रमुख करों का विवरण निम्नलिखित है –

1. आयकर – आयकर केन्द्र सरकार की आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत है, परन्तु वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार इसका एक निश्चित भाग राज्य सरकारों में वितरित किया जाता है। भारत में सर्वप्रथम 1950 ई० में आयकर लगाया गया था। कर की छूट सीमा उस समय र 2,000 वार्षिक थी। वर्ष 2012-13 के बजट में है 2,00,000.00 तक की वार्षिक आय को कर-मुक्त रखा गया है।

2. निगम कर – कम्पनियों पर लगे आयकर को ‘निगम कर’ कहते हैं। निगम कर में आय की भाँति छूट की कोई सीमा नहीं होती। इसके अतिरिक्त इसकी दरें प्रायः समानुपातिक होती हैं। वर्ष 2012-13 के लिए यह दर 30% है तथा इस पर 10 प्रतिशत अधिभार भी देय होगा।

3. केन्द्रीय उत्पादन कर – ये कर केन्द्र सरकार द्वारा देश में उत्पादित वस्तुओं पर लगाये जाते हैं। यह सीमेण्ट, कपड़ा, बिजली का सामान, मिट्टी का तेल, पेट्रोल, डीजल, रेफ्रीजरेटर, टेलीविजन, तम्बाकू, चाय, कॉफी, जूट व रेशम के सामान आदि के उत्पादन पर लगाया जाता है। वर्तमान समय में यह केन्द्रीय सरकार की आय का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है। इस कर-प्रणाली के अन्तर्गत पहले केवल 15 वस्तुओं पर कर लगाया जाता था, परन्तु वर्तमान समय में 1,300 से अधिक वस्तुओं को इस करे-व्यवस्था के अन्तर्गत लाया गया है।

4. सीमा-शुल्क – सीमा शुल्क में आयात-कर व निर्यात-कर आते हैं। आयात-कर विदेशों से मँगाये गये माल पर तथा निर्यात-कर अपने देश से बाहर वस्तु को भेजने पर लगाया जाता है। सीमा-शुल्क केन्द्र सरकार की आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत होता है।

5. सम्पत्ति कर – भारत में यह कर प्रो० कॉल्डर की सिफारिश पर 1 अप्रैल, 1957 ई० में लगाया गया था। सम्पत्ति कर का प्रशासन आयकर विभाग द्वारा ही चलाया जाता है। यह कर व्यक्तियों की है 10 लाख से अधिक की सम्पत्ति पर लगाया जाता है। इस कर से कृषि भूमि, धार्मिक स्थानों की सम्पत्ति, बीमा व विकास बॉण्ड, प्रॉविडेण्ट फण्ड आदि को मुक्त रखा गया है।

6. सेवा कर – यह कर विभिन्न प्रकार की प्रत्त सेवाओं पर लगाया जाता है। इसकी दर 12% है। वर्ष 2006-07 के बजट में चार लाख रुपये तक के वार्षिक टर्न ओवर को इससे मुक्त रखा गया है। उपर्युक्त मुख्य करों के अतिरिक्त केन्द्रीय सरकार को –

  1. ब्याज कर
  2. व्यय कर
  3. आस्ति कर या मृत्यु कर (सन् 1953 में आरोपित और 1985-86 ई० में समाप्त)
  4. उपहार कर (सन् 1958 में आरोपित और 1999-2000 ई० में समाप्त, वर्तमान में प्राप्तकर्ता की आय में सम्मिलित)
  5. अन्य कर और शुल्क
  6. संघ-राज्य क्षेत्रों के कर से भी आय प्राप्त होती है।

गैर – कर राजस्व से प्राप्त आय – इनके अन्तर्गत आने वाले प्रमुख करों का विवरण निम्नलिखित है –

1. ब्याज प्राप्तियाँ – केन्द्र सरकार राज्यों, केन्द्रशासित प्रदेशों एवं केन्द्रीय प्रतिष्ठानों को ऋण देती है। इन ऋणों पर ब्याज की प्राप्ति होती है, जो उसकी आय का एक स्रोत है।

2. मुद्रा, सिक्का ढलाई एवं टकसाल – केन्द्र सरकार को नोट छापने एवं सिक्का ढलाई का एकाधिकार प्राप्त है। इससे भी उसको आय प्राप्त होती है।

3. लाभांश व लाभ – इसके अन्तर्गत भारतीय रिजर्व बैंक, अन्य राष्ट्रीयकृत व्यापारिक बैंक व केन्द्र सरकार के व्यावसायिक उपक्रमों से प्राप्त लाभ को सम्मिलित किया जाता है।

4. सामान्य सेवाओं से आय – इस मद के अन्तर्गत लोक सेवा आयोग, पुलिस, रेल, रक्षा-सेवाएँ आदि | मदों से प्राप्त आय सम्मिलित की जाती है।

5. सार्वजनिक उपक्रमों से आय – इसमें सार्वजनिक प्रतिष्ठानों से प्राप्त आय सम्मिलित होती हैं; जैसे–इण्डियन ऑयल, प्राकृतिक तेल एवं गैस आयोग, राज्य व्यापार निगम, डाक तार, रेल आदि से प्राप्त आय।

6. सामाजिक एवं सामुदायिक सेवाएँ – सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं में मुख्य हैं – शिक्षा, चिकित्सा, परिवार नियोजन, सफाई व जल आपूर्ति, आवास, नगर विकास, सूचना एवं प्रसार, सामाजिक सुरक्षा व कल्याण आदि। इनसे भी केन्द्र सरकार को आय प्राप्त होती है।

7. आर्थिक सेवाएँ – इनमें मुख्य रूप से सहकारिता, कृषि, लघु सिंचाई, भू-संरक्षण, पशुपालन, डेयरी विकास, मत्स्य उद्योग, ग्रामोद्योग व लघु उद्योग, खनन व खनिज पदार्थ, बहुउद्देशीय नदी-घाटी योजनाएँ, विद्युत विकास सेवाएँ, सड़कें, पुल आदि आते हैं। इन सेवाओं से भी केन्द्र सरकार को आय प्राप्त होती है।

13.

भूमि किसे कहते हैं ? इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं ? उत्पादन के साधन के रूप में भूमि का क्या महत्त्व है ?याउत्पादन के साधन के रूप में भूमि की किन्हीं तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।याभूमि को परिभाषित कीजिए एवं उसकी किन्हीं दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Answer»

भूमि

साधारण बोलचाल की भाषा में भूमि का अर्थ पृथ्वी (जमीन) की ऊपरी सतह से लिया जाता है, जिस पर हम चलते-फिरते और रहते हैं, परन्तु अर्थशास्त्र में भूमि का अर्थ इससे भिन्न एवं बहुत व्यापक है। अर्थशास्त्र में भूमि के अन्तर्गत न केवल जमीन की ऊपरी सतह, वरन् वे समस्त वस्तुएँ एवं शक्तियाँ सम्मिलित की जाती हैं, जिन्हें प्रकृति ने नि:शुल्क उपहार के रूप में मनुष्य को प्रदान किया है।

भूमि के प्रमुख लक्षण (विशेषताएँ) निम्नलिखित हैं –

1. भूमि प्रकृति का निःशुल्क उपहार है – भूमि मनुष्य के उपयोग के लिए प्रकृति का नि:शुल्क उपहार है। मनुष्य को इसके लिए कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। कुछ अर्थशास्त्रियों का विचार है कि आधुनिक युग में मनुष्य जिस भूमि को उपयोग में ला रहा है, वह उसे निर्मूल्य नहीं मिलती, वरन् अन्य साधनों की भाँति मूल्य देने से ही प्राप्त होती है।

2. भूमि की मात्रा सीमित है – भूमि प्रकृति की देन है। भूमि के क्षेत्र को घटाया-बढ़ाया नहीं जा सकता। भूमि का क्षेत्रफल उतना ही रहता है, जितना प्रकृति ने हमें प्रदान किया है। भूमि मानव-निर्मित नहीं है। और न ही मानव द्वारा इसे निर्मित किया जा सकता है। भूमि का स्वरूप प्राकृतिक कारणों से बदल सकता है, परन्तु भूमि के क्षेत्र या मात्रा में वृद्धि नहीं हो सकती।

3. भूमि स्थायी है – भूमि में स्थायित्व का गुण पाया जाता है। सृष्टि के आदि काल से आज तक भूमि किसी-न-किसी रूप में विद्यमान रही है। भूकम्प,या प्राकृतिक प्रकोपों से जल के स्थान पर स्थल तथा पहाड़ के स्थान पर समुद्र बन सकते हैं। भूमि के स्वाभाविक गुण होते हैं, जिन्हें रिकाडों ने ‘मौलिक तथा अविनाशी’ कहा है। भूमि अक्षय है तथा कभी नष्ट नहीं होती।

4. भूमि उत्पादन को निष्क्रिय साधन है – भूमि स्वयं उत्पादन कार्य करने में असमर्थ है। जब तक अन्य साधनों का इसे सहयोग प्राप्त नहीं होता, यह उत्पादन कार्य नहीं कर सकती। मनुष्य द्वारा श्रम और पूँजी लगाने से उत्पादन किया जाता है। इस दृष्टि से भूमि उत्पादन का निष्क्रिय उपादान है।

5. भूमि विविध प्रकार की होती है – उत्पादकता, स्थिति तथा प्रयोग की दृष्टि से भूमि में विविधता पायी, जाती है। भूमि अधिक उपजाऊ या कम उपजाऊ हो सकती है। शहर के अन्दर या समीप की भूमि मकान बनाने के लिए अधिक उपयुक्त होती है, जब कि गाँव की भूमि कृषि कार्य के लिए। इस प्रकार किसी स्थान पर भूमि में खनिज पदार्थ अधिक मात्रा में उपलब्ध होते हैं।

6. भूमि में गतिशीलता का अभाव है – भूमि में गतिशीलता का गुण नहीं पाया जाता। भूमि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं ले जाया जा सकता। कोलार की सोने की खान उत्तर प्रदेश में नहीं लायी जा सकती है।

7. भूमि की स्थिति सापेक्ष होती है – भूमि की कीमत स्थिति के अनुसार होती है। शहरी भूमि की कीमत अधिक होती है, जब कि गाँव की भूमि की कीमत शहर की अपेक्षा कम है। इसी प्रकार समतल तथा दोमट मिट्टी वाली भूमि की कीमत ऊसर तथा बंजर भूमि की अपेक्षा अधिक होती है। भूमि की स्थिति की तुलना करके ही लगान व कीमत निर्धारित की जाती है।

8. भूमि उत्पादन का अनिवार्य उपादान है – भूमि उत्पादन का एक अनिवार्य एवं आधारभूत उपादान है। भूमि के अभाव में उत्पादन करना असम्भव है। आर्थिक दृष्टि से प्रत्येक प्रकार का उत्पादन अन्ततः भूमि की उपलब्धता पर ही निर्भर करता है।

उत्पादन के साधन के रूप में भूमि का महत्त्व

उत्पादन के साधन के रूप में भूमि का महत्त्व निम्नलिखित शीर्षकों में स्पष्ट किया जा सकता है –

1. आर्थिक विकास का आधार – किसी भी देश को सम्पन्न एवं समृद्धिशाली बनाने में भूमि अथवा प्राकृतिक साधनों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है, क्योंकि भूमि, धनोत्पादन का एक प्रमुख साधन है। किसी देश की उत्पादन क्षमता भूमि और प्राकृतिक साधनों की मात्रा तथा प्रकार पर निर्भर करती है।

2. लघु एवं कुटीर उद्योगों का आधार – प्राथमिक उद्योगों के विकास के लिए भूमि का अत्यधिक महत्त्व है। मत्स्यपालन, वनों पर आधारित व्यवसाय, खनन आदि का कार्य प्रत्यक्ष रूप से भूमि-संसाधनों पर ही निर्भर होता है।

3. यातायात के साधनों के विकास का आधार – यातायात तथा सन्देशवाहन के साधनों के विकास में भी भूमि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। यदि भूमि समतल है तो रेल, सड़क, तार, टेलीफोन आदि का सरलता से विकास किया जा सकता है।

4. औद्योगिक विकास का आधार – देश को औद्योगिक उत्पादन और विकास भी भूमि अथवा प्राकृतिक साधनों की मात्रा पर ही निर्भर करता है। औद्योगिक उत्पादन के लिए विभिन्न प्रकार के कच्चे माल, भूमि तथा खानों से प्राप्त होते हैं। औद्योगिक विकास में शक्ति के साधनों का भी विशेष महत्त्व है। कोयला तथा लोहा खानों से प्राप्त होता है और विद्युत जलस्रोतों से उत्पादित की जाती है।

5. मकान, कारखाने आदि के निर्माण के लिए – भूमि की ऊपरी सतह पर ही हम रहने के लिए भवनों का, रोजी-रोटी कमाने के लिए कारखानों का, शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालयों का तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए अस्पतालों का निर्माण करते हैं। ये सब भूमि के अभाव में असम्भव हैं।

6. जीवित रहने का आधार – मनुष्य को रहने के लिए जल, वायु, भोजन, वस्त्रों आदि की आवश्यकता होती है। उसकी ये सभी आवश्यकताएँ भूमि द्वारा पूरी की जाती हैं। यदि भूमि न हो तो मानव-जीवन दुर्लभ है।

7. लगान सिद्धान्त का आधार – लगान सिद्धान्त का आधार भूमि है। भूमि में सीमितता तथा विभिन्नता का लक्षण विद्यमान होता है। इसी को आधार मानकर लगान सिद्धान्त का निर्माण किया गया है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि मानव का सम्पूर्ण जीवन आर्थिक, सामाजिक, औद्योगिक वे राजनीतिक भूमि (प्राकृतिक संसाधनों) पर ही निर्भर है।

14.

बचत से होने वाली दो हानियाँ बताइए।

Answer»

बचत से होने वाली दो हानियाँ निम्नलिखित हैं

⦁    पैतृक रूप में मिली सम्पत्ति भावी पीढ़ी को निकम्मा बना देती है।

⦁    भविष्य के लिए अधिक धन बचाने के स्वार्थ में वर्तमान की आवश्यकता सन्तुष्ट नहीं हो पाती है, जिससे व्यक्ति के जीवन-स्तर में विकास नहीं हो पाता है।

15.

राजस्व किसे कहते हैं ? इसके महत्त्व को लिखिए।

Answer»

राजस्व

राजस्व सार्वजनिक वित्त अथवा लोक-सत्ताओं के आय-व्यय से सम्बन्धित बातों का अध्ययन है। डाल्टन के अनुसार, “राजस्व के अन्तर्गत लोक-सत्ताओं के आय-व्यय तथा उनके पारस्परिक समायोजन । और समन्वय का अध्ययन किया जाता है।”

राजस्व का महत्त्व

आज के युग में राज्यों एवं सरकारों के कार्यों में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है; अतः सार्वजनिक राजस्व का महत्त्व भी बढ़ रहा है। सार्वजनिक राजस्व के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है –

1. आर्थिक विषमता को दूर करना – प्रत्येक देश की सरकार करों के माध्यम से देश की आर्थिक विषमता को कम करने का प्रयास करती है। सरकार धनी वर्ग पर अधिक कर लगाकर तथा करों से प्राप्त आय को निर्धनों के कल्याण के कार्यों पर व्यय करके राष्ट्रीय आय का समान वितरण करती है, जिससे समाज में धनी व निर्धन वर्ग में गहरी खाई न बन सके।

2. देश की आर्थिक विकास – आर्थिक नियोजन के माध्यम से देश का आर्थिक विकास किया जाता है। आर्थिक नियोजन को सफल बनाने के लिए ही राजस्व की आवश्यकता होती है। यदि सरकार के आय के स्रोत अधिक हैं और सरकार को आय निश्चित समय पर उचित मात्रा में प्राप्त होती रहती है तब सरकार आर्थिक नियोजन के द्वारा देश का आर्थिक विकास तीव्र गति से कर सकती है; अत: देश के आर्थिक विकास में राजस्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

3. अधिकतम सामाजिक कल्याण – वह सरकार देश के नागरिकों का अधिक कल्याण कर सकती है, जिस देश की सरकार के आय के स्रोत अधिक होंगे तथा सरकार की आय अधिक होगी। सरकार सार्वजनिक राजस्व से प्राप्त आय को जनता के सामाजिक कल्याण पर व्यय करती है; अतः शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, मनोरंजन आदि की व्यवस्था के लिए सार्वजनिक आय का अधिक होना आवश्यक है।

4. उपभोग की हानिकारक वस्तुओं पर नियन्त्रण – सरकार करों की मात्रा में वृद्धि करके इस प्रकार की उपभोग की वस्तुओं के प्रयोग को हतोत्साहित कर सकती है, जिनका समाज पर कुप्रभाव पड़ता है; जैसे-शराब, गाँजा, अफीम आदि मादक पदार्थों पर अधिक कर लगाकर इनके उपभोग को कम किया जा सकता है।

5. आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहन – आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार उद्योगों को संरक्षण प्रदान करती है, उनके करों को समाप्त करती है। तथा उन्हें आर्थिक सहायता भी देती है। इससे उत्पादन तथा राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।

6. देश में आर्थिक स्थिरता – सरकार राजस्व के द्वारा मन्दी और तेजी की अवस्था में देश को आर्थिक स्थिरता प्रदान करती है। सरकार तेजी के समय अधिकं कर लगाकर या ऋण लेकर मूल्यों में स्थिरता लाने का प्रयास करती है तथा मन्दी के समय सार्वजनिक व्यय में वृद्धि करके क्रय-विक्रय को बढ़ाती है।

7. सामरिक क्षेत्र में महत्त्व – आज विश्व में अशान्ति के बादल मँडरा रहे हैं। प्रत्येक देश युद्ध के लिए नये-नये वैज्ञानिक अस्त्र-शस्त्र तैयार करने में लगा हुआ है। बाह्य आक्रमणों से देश की सुरक्षा के लिए सैन्य शक्ति व हथियारों पर व्यय करना आवश्यक है। आज वही सरकार सामरिक क्षेत्र में सबल है, जिसकी सार्वजनिक आय अधिक है; अतः राजस्व का महत्त्व आज और भी बढ़ गया है।

16.

निम्नलिखित में से किसे अर्थशास्त्र के उत्पादन के साधन के रूप में श्रम के अन्तर्गत नहीं माना जा सकता है?(क) खेत जोतने में मानव श्रम(ख) मरीज का परीक्षण करने में डॉक्टर का श्रम(ग) किराये की गाड़ी खींचने में घोड़े का श्रम(घ) बच्चों को ट्रेनिंग देने में ड्रिल मास्टर का श्रम

Answer»

सही विकल्प है (ग) किराये की गाड़ी खींचने में घोड़े का श्रम

17.

लगान किसे प्राप्त होता है?(क) भूमि-स्वामी को(ख) उद्यमी को(ग) श्रमिक को(घ) प्रबन्धक को

Answer»

सही विकल्प है (क) भूमि-स्वामी को

18.

उत्पादन में जोखिम सहन करने वाले व्यक्ति को कहते हैं(क) संगठनकर्ता(ख) श्रमिक(ग) साहसी(घ) भूमिपति

Answer»

सही विकल्प है (ग) साहसी

19.

व्यय किसे कहते हैं? व्यय कितने प्रकार के होते हैं?

Answer»

व्यय से आशय व्यय, आय का वह भाग होता है, जिसे मनुष्य अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उपयोग में लेता है। सरल शब्दों में, आय का वह भाग, जो तात्कालिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उपभोग में लिया जाता है, व्यय (Expenditure)  कहलाता है। प्रो. बसु के अनुसार, “आवश्यकताओं को प्रत्यक्ष रूप से सन्तुष्ट करने के लिए आय का उपभोग करना ही ‘व्यय’ कहलाता है।”

व्यय के प्रकार व्यय के निम्नलिखित प्रकार होते हैं

1. व्यक्तिगत या निजी व्यय आय का वह हिस्सा, जिसे मनुष्य द्वारा अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए प्रयोग में लिया जाता है, ‘व्यक्तिगत व्यय’ या ‘निजी व्यय’ (Personal Expenses) कहलाता है, जैसे-बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, मकान का किराया, आदि पर किया जाने वाला व्यय।

2. सामाजिक व्यय मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण समाज में रहकर कुछ सुविधाएँ व संम्मान प्राप्त करता है। मनुष्य की आय का वह भाग, जो सामाजिक आवश्यकताओं या समाज के ऊपर खर्च किया जाता है, ‘सामाजिक व्यय’ (Social Expenses) कहलाता है।
सामाजिक व्यय निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-

⦁    अनिवार्य सामाजिक व्यय मनुष्य की आय का वह भाग, जिसे समाज के लिए अनिवार्य रूप से खर्च करना पड़ता है, ‘अनिवार्य सामाजिक व्यंय’ कहलाते हैं। इन व्ययों से समाज का हित होता है; जैसे-केन्द्रीय या प्रादेशिक कर।

⦁    ऐच्छिक सामाजिक व्यय मनुष्य की आय का वह भाग, जिसे मनुष्य अपनी इच्छा से समाज के लिए खर्च करता है, ‘ऐच्छिक सामाजिक व्यय कहलाते हैं; जैसे–मन्दिर, अस्पताल या धार्मिक संस्थाओं को चन्दा देना।

20.

बचत का सामाजिक महत्त्व बताइए।अथवासमाज में बचत के महत्व का वर्णन कीजिए। 

Answer»

बचत (संचय) करने वाले व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठित  व्यक्ति माने जाते हैं। निरन्तर बचत (संचय) करने से व्यक्ति को संकट के समय समाज में किसी दूसरे व्यक्ति के सामने अपनी व्यथा रखने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे  उसको एक सकारात्मक परिणाम मिलता है तथा उसकी प्रतिष्ठा समाज में बनी रहती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समाज में बचत का अत्यधिक महत्त्व है।

21.

निम्नलिखित में कौन-सी क्रिया श्रम के अन्तर्गत आती है?(क) जुआ खेलना(ख) भीख माँगना(ग) श्रमिक द्वारा बोझा ढोना(घ) घोड़े द्वारा बोझा ढोनी

Answer»

सही विकल्प है (ग) श्रमिक द्वारा बोझा ढोना

22.

व्यय से वर्तमान/भावी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि होती है।

Answer»

व्यय से वर्तमान आवश्यकताओं की सन्तुष्टि होती है।

23.

निम्नलिखित में से कौन-सा उत्पादन का साधन प्रकृति का निःशुल्क उपहार कहा जाता(क) श्रम(ख) पूँजी(ग) भूमि(घ) संगठन

Answer»

सही विकल्प है (ग) भूमि

24.

ब्याज किस उत्पादन के साधन के प्रयोग के बदले में दिया जाता है?याउत्पादन के किस साधन के पुरस्कार को ब्याज कहते हैं?(क) श्रम(ख) पूँजी(ग) भूमि(घ) साहस

Answer»

सही विकल्प है (ख) पूँजी

25.

क्या बैंक में धन को जमा करना बचत कहलाता है।

Answer»

हाँ बैंक में धन को जमा करना बचत कहलाता है।

26.

पूँजीपति को मिलता है(क) लाभ(ख) लगान(ग) ब्याज(घ) मजदूरी

Answer»

सही विकल्प है (ग) ब्याज

27.

व्यय तथा बचत दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं,नहीं होते हैं।

Answer»

व्यय तथा बचत दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं।

28.

व्यय कितने प्रकार के होते हैं?

Answer»

व्यय निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-

⦁    व्यक्तिगत व्यय
⦁    सामाजिक व्यय

29.

क्या निःसंचय का पूँजी के निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

Answer»

हाँ निःसंचय का पूँजी के निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

30.

क्या व्यय तथा बचत दोनों आय के भाग होते हैं।

Answer»

हाँ व्यय तथा बचत दोनों आय के भाग होते हैं।

31.

“आवश्यकताओं को प्रत्यक्ष रूप से सन्तुष्ट करने के लिए आये का उपयोग करना ही व्यय कहलाता है।” यह कथन है।(a) प्रो. बसु का(b) प्रो. केन्ज का(c) प्रो. पेन्सन का(d) इनमें से कोई नहीं

Answer»

(d) प्रो. बसु का 

32.

Define or Explain the following concept:Aggregate Demand

Answer»

Aggregate demand: Aggregate demand implies the total demand of final goods and services by various individuals in all the sectors in an economy. It expresses the total demand in terms of money. In this manner, it can be defined as the actual aggregate expenditure incurred by all the people in an economy on different goods and services.

AD = C + I + G + (X – M)

Where,

Demand by households - Private consumption expenditure (C)

Demand by firms - Private investment expenditure (I)

Demand by government - Government expenditure (G)

Demand by foreign sector- Net exports (X – M)

Where, X is exports and M is imports

33.

उत्पादन के साधन हैं(क) दो(ख) तीन(ग) पाँच(घ) अनन्त

Answer»

सही विकल्प है (ग) पाँच

34.

एक संगठनकर्ता को मिलता है(क) वेतन(ख) ब्याज(ग) लाभ(घ) मजदूरी

Answer»

सही विकल्प है (क) वेतन

35.

Fill in the blank with appropriate alternatives given below__________ consumption cannot be zero.OptionsInducedAutonomousGovernmentPrivate

Answer»

Autonomous consumption cannot be zero.

Explanation:

Autonomous consumption is the minimum consumption expenditure that an individual incurs irrespective of his income. It is the consumption of basic goods and services i.e consumption of those goods and services that are essential for living. For example, food, medicines, clothes etc. Such a consumption cannot fall to zero as it is essential for survival.

36.

अधिक बचत से देश में पूँजी का निर्माण होता है/नहीं होता है।

Answer»

अधिक बचत से देश में पूँजी का निर्माण होता है।

37.

Write Short note on:Effective Demand

Answer»

Effective demand is defined as the total expenditure incurred by all people in an economy on the various goods and services produced in an economy over a given period of time. It is determined by the intersection of aggregate demand and aggregate supply.

38.

बचत करने से पूँजी में कमी/वृद्धि होती है।

Answer»

वृद्धि होती है

39.

पूँजी का निर्माण निर्भर करता है(a) व्यय पर(b) आय पर(c) बचत पर(d) ये सभी

Answer»

सही विकल्प है (c) बेचत पर

40.

निम्नलिखित में से व्यक्तिगत व्यय कौन-कौन से है?(a) भोजन पर व्यय(b) स्वास्थ्य पर व्यय(c) बच्चों की शिक्षा पर व्यय(d) ये सभी

Answer»

सही विकल्प है (d) ये सभी

41.

Define or Explain the following concept:Aggregate Supply

Answer»

Aggregate supply: Aggregate supply refers to the aggregate production planned by all the producers during an accounting year. In other words, aggregate supply indicates the total amount of goods and services produced within an economy at a given general (or overall) price level during an accounting period. The aggregate supply function is represented as follows.

\(AS=f(\bar{N},\bar{L},\bar{K},\bar{T}\))

where,

AS = Aggregate supply

N = Natural resources

L = Labour

K = Stock of capital

T = State of technology

42.

Distinguish between:Consumption Function and Saving Function

Answer»
Consumption FunctionSavings Function
It depicts the relationship between consumption expenditure and the level of disposable incomeIt depicts the relationship between savings and the level of disposable income.
C = f (Yd), where C represents consumption expenditure Yd represents disposable income.\(S=-\bar{S} + sY_d\)
\(\bar{S}\) represent marginal saving*
s represents marginal propensity to save (MPS) Yd represents disposable income.
It shows how a change in income influences the consumption pattern.It shows how a change in income influences savings.

43.

निम्नलिखित में से पूँजी नहीं है(क) रहने का मकान(ख) गत्ता बनाने का कारखाना(ग) डॉक्टर की योग्यता(घ) जमीन में गड़ा हुआ धन

Answer»

सही विकल्प है (क) रहने का मकान

44.

Fill in the blank with appropriate alternatives given belowInvestment made by the government is __________ investment.Optionsinducedautonomousgrossunplanned

Answer»

Investment made by the government is autonomous investment

Explanation:

Autonomous investment is that investment which is independent of the profit motive i.e. which is made without an aim of earning some profit on that investment. Government investment on public welfare is an example of an autonomous investment. Governments investment in railways, electricity, construction of dams, roads etc for the welfare of the public rather than profit.

45.

सम्पत्ति का जो भाग उत्पादन में लगाया जाता है, उसे कहते हैं (a) बचत(b) संचय(c) पूँजी(d) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है (d) बचत

46.

Distinguish between:Consumption and Saving

Answer»
ConsumptionSavings
Consumption is that part of the income that is spent on buying goods and services.This is the unspent part of the income.
It is the expenditure incurred by households on the gross domestic productThe savings are used for investment in business enterprises.
The savings are used for investment in business enterprises.of food, clothes etcExample: Amount deposited in fixed deposits.

47.

Give reason or explain.Saving may be used in future for unforeseen contingencies.

Answer»

Savings are that part of the income which are not consumed and are kept aside to be used in the future. For any financial contingencies, savings can act as a helpful source of finance. Savings also act as a vital source of funds at the time of future emergencies.

48.

Give reason or explain.Investment demand is not the sole determinant of aggregate demand.

Answer»

Investment demand is not the sole determinant of aggregate demand. Apart from investment demand, consumption demand, government demand, exports and imports are also the components of aggregate demand.

AD = C + I + G + (X – M)

Where,

Demand by households - Private consumption expenditure (C)

Demand by firms - Private investment expenditure (I)

Demand by government - Government expenditure (G)

Demand by foreign sector- Net exports (X – M)

Where, X is exports and M is imports.

49.

Write Short note on:Marginal Propensity to Consume

Answer»

Marginal propensity to consume expresses the propensity to consume in proportionate terms. It refers to the ratio of change in the consumption expenditure to the change in the disposable income. Algebraically, MPC = ΔC/ ΔY.

50.

Distinguish between:Exports and Imports

Answer»
ExportsImports
It is the selling of domestically produced goods and services to any foreign country.It is the buying of internationally produced goods and services by the domestic country.
In exports, goods flow out of the economyIn imports, goods flow into the economy.
Here, foreign exchange is earned by the economy.Here, foreign exchange flows out of the economy