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उत्पादन का क्या अर्थ है ? इसके प्रमुख तत्त्व तथा उपादानों (साधनों) का वर्णन कीजिए।

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उत्पादन

साधारण बोलचाल की भाषा में उत्पादन का अर्थ किसी वस्तु या पदार्थ के निर्माण से होता है, किन्तु वैज्ञानिकों का मत है कि मनुष्य न तो किसी वस्तु या पदार्थ को उत्पन्न कर सकता है और न ही नष्ट कर सकता है। वह केवल पदार्थ या वस्तुओं के स्वरूप को बदलकर उन्हें अधिक उपयोगी बना सकता है। दूसरे शब्दों में, वह वस्तु में उपयोगिता का सृजन कर सकता है। अत: थॉमस के अनुसार, “वस्तु की उपयोगिता में वृद्धि करना ही उत्पादन है।”

उत्पादन की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

प्रो० पेन्सन के अनुसार, “उत्पादन का तात्पर्य मानवीय आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने की योग्यता या शक्ति में वृद्धि करने से है, न कि किसी वस्तु के निर्माण करने से।”
प्रो० ऐली के अनुसार, “आर्थिक उपयोगिता का सृजन करना ही उत्पादन है।”
ए०एच० स्मिथ के अनुसार, “उत्पादन वह प्रक्रिया है, जिससे वस्तुओं में उपयोगिता का सृजन होता है।’
एजे० ब्राउन के अनुसार, “उत्पादन उन सभी क्रियाओं तथा सेवाओं का द्योतक है, जो कि किसी आवश्यकता को सन्तुष्ट करती हैं या सन्तुष्ट करने की आशा से की जाती हैं।”

उत्पादन के प्रमुख तत्त्व – उत्पादन के चार प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं –

  1. उत्पादन एक मानवीय प्रयत्न है।
  2. उत्पादन एक आर्थिक क्रिया है।
  3. उत्पादन द्वारा तुष्टिगुण का सृजन किया जाता है।
  4. सृजित तुष्टिगुण का मूल्य से विनिमय किया जाता है।

उत्पादन के साधन (उपादान) – उत्पादन के पाँच उपादान (साधन) निम्नलिखित हैं –

1. भूमि – साधारण बोलचाल की भाषा में भूमि का अर्थ जमीन की ऊपरी सतह से लिया जाता है, परन्तु अर्थशास्त्र में भूमि का अर्थ पर्याप्त व्यापक है। अर्थशास्त्र में भूमि के अन्तर्गत न केवल जमीन की ऊपरी सतह, वरन् वे समस्त वस्तुएँ एवं शक्तियाँ सम्मिलित की जाती हैं जिन्हें प्रकृति ने नि:शुल्क उपहार के रूप में मनुष्य को प्रदान किया है। इसके अन्तर्गत पर्वत, मैदान, नदी, झील, समुद्र, खनिज पदार्थ, वर्षा, प्रकाश, जलवायु आदि आते हैं। इन सभी प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता उत्पादन में होती है, बिना इनके उत्पादन नहीं हो सकता है। भूमि के स्वामी को भूमिपति कहते हैं।

2. श्रम – साधारण बोलचाल की भाषा में श्रम का अर्थ परिश्रम करने से होता है, परन्तु अर्थशास्त्र में सभी प्रकार के परिश्रम को श्रम नहीं माना जाता। अर्थशास्त्र में श्रम का अर्थ, मनुष्य के उस शारीरिक तथा मानसिक प्रयत्न (कार्य) से लिया जाता है, जो आर्थिक उद्देश्य से किया जाता है या मनुष्य का वह शारीरिक तथा मानसिक कार्य जिसका उद्देश्य धनोत्पादन करना होता है, श्रम कहलाता है। अध्यापक, डॉक्टर, मजदूर आदि का कार्य श्रम की श्रेणी में आता है। यदि इनमें से कोई भी व्यक्ति परोपकार के उद्देश्य से कार्य करता है तब वह श्रम नहीं कहलाएगा।

3. पूँजी – साधारण बोलचाल की भाषा में पूँजी का अर्थ रुपया, पैसा, धन, सम्पत्ति आदि से लगाया जाता है। अर्थशास्त्र में पूँजी धन की केवल वह भाग है, जिसे और अधिक धन पैदा करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। पूँजी उत्पादन का एक मनुष्यकृत साधन है।

4. प्रबन्ध या संगठन – उत्पादन के विभिन्न उपादानों को एकत्रित करके उन्हें उचित व आदर्श अनुपात | में लगाकर अधिकतम उत्पादन करने के कार्य को संगठन कहा जाता है। जो व्यक्ति इस कार्य को सम्पादित करता है उसे संगठनकर्ता, प्रबन्धक या व्यवस्थापक कहते हैं।

5. साहस या उद्यम – प्रत्येक व्यवसाय या उत्पादन कार्य में कुछ जोखिम या अनिश्चितता अवश्य होती है, क्योंकि उत्पादन की मात्रा भविष्य की माँग एवं प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर होती है; अतः उत्पादने कार्य में लाभ व हानि दोनों की सम्भावना होती है। इस प्रकार अर्थशास्त्र में किसी उत्पादन या व्यवसाय की अनिश्चितता या जोखिम को साहस या उद्यम कहते हैं। इस अनिश्चितता को सहन करने वाले व्यक्ति को साहसी या उद्यमी कहते हैं।

आधुनिक युग में उत्पादन के सभी साधनों के सहयोग से उत्पादन कार्य सम्पादित किया जाता है। सभी साधन एक-दूसरे पर निर्भर तथा महत्त्वपूर्ण हैं। उत्पादन एक सामूहिक प्रक्रिया है जो सभी साधनों के सहयोग से चलती है।



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