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भूमि किसे कहते हैं ? इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं ? उत्पादन के साधन के रूप में भूमि का क्या महत्त्व है ?याउत्पादन के साधन के रूप में भूमि की किन्हीं तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।याभूमि को परिभाषित कीजिए एवं उसकी किन्हीं दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

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भूमि

साधारण बोलचाल की भाषा में भूमि का अर्थ पृथ्वी (जमीन) की ऊपरी सतह से लिया जाता है, जिस पर हम चलते-फिरते और रहते हैं, परन्तु अर्थशास्त्र में भूमि का अर्थ इससे भिन्न एवं बहुत व्यापक है। अर्थशास्त्र में भूमि के अन्तर्गत न केवल जमीन की ऊपरी सतह, वरन् वे समस्त वस्तुएँ एवं शक्तियाँ सम्मिलित की जाती हैं, जिन्हें प्रकृति ने नि:शुल्क उपहार के रूप में मनुष्य को प्रदान किया है।

भूमि के प्रमुख लक्षण (विशेषताएँ) निम्नलिखित हैं –

1. भूमि प्रकृति का निःशुल्क उपहार है – भूमि मनुष्य के उपयोग के लिए प्रकृति का नि:शुल्क उपहार है। मनुष्य को इसके लिए कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। कुछ अर्थशास्त्रियों का विचार है कि आधुनिक युग में मनुष्य जिस भूमि को उपयोग में ला रहा है, वह उसे निर्मूल्य नहीं मिलती, वरन् अन्य साधनों की भाँति मूल्य देने से ही प्राप्त होती है।

2. भूमि की मात्रा सीमित है – भूमि प्रकृति की देन है। भूमि के क्षेत्र को घटाया-बढ़ाया नहीं जा सकता। भूमि का क्षेत्रफल उतना ही रहता है, जितना प्रकृति ने हमें प्रदान किया है। भूमि मानव-निर्मित नहीं है। और न ही मानव द्वारा इसे निर्मित किया जा सकता है। भूमि का स्वरूप प्राकृतिक कारणों से बदल सकता है, परन्तु भूमि के क्षेत्र या मात्रा में वृद्धि नहीं हो सकती।

3. भूमि स्थायी है – भूमि में स्थायित्व का गुण पाया जाता है। सृष्टि के आदि काल से आज तक भूमि किसी-न-किसी रूप में विद्यमान रही है। भूकम्प,या प्राकृतिक प्रकोपों से जल के स्थान पर स्थल तथा पहाड़ के स्थान पर समुद्र बन सकते हैं। भूमि के स्वाभाविक गुण होते हैं, जिन्हें रिकाडों ने ‘मौलिक तथा अविनाशी’ कहा है। भूमि अक्षय है तथा कभी नष्ट नहीं होती।

4. भूमि उत्पादन को निष्क्रिय साधन है – भूमि स्वयं उत्पादन कार्य करने में असमर्थ है। जब तक अन्य साधनों का इसे सहयोग प्राप्त नहीं होता, यह उत्पादन कार्य नहीं कर सकती। मनुष्य द्वारा श्रम और पूँजी लगाने से उत्पादन किया जाता है। इस दृष्टि से भूमि उत्पादन का निष्क्रिय उपादान है।

5. भूमि विविध प्रकार की होती है – उत्पादकता, स्थिति तथा प्रयोग की दृष्टि से भूमि में विविधता पायी, जाती है। भूमि अधिक उपजाऊ या कम उपजाऊ हो सकती है। शहर के अन्दर या समीप की भूमि मकान बनाने के लिए अधिक उपयुक्त होती है, जब कि गाँव की भूमि कृषि कार्य के लिए। इस प्रकार किसी स्थान पर भूमि में खनिज पदार्थ अधिक मात्रा में उपलब्ध होते हैं।

6. भूमि में गतिशीलता का अभाव है – भूमि में गतिशीलता का गुण नहीं पाया जाता। भूमि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं ले जाया जा सकता। कोलार की सोने की खान उत्तर प्रदेश में नहीं लायी जा सकती है।

7. भूमि की स्थिति सापेक्ष होती है – भूमि की कीमत स्थिति के अनुसार होती है। शहरी भूमि की कीमत अधिक होती है, जब कि गाँव की भूमि की कीमत शहर की अपेक्षा कम है। इसी प्रकार समतल तथा दोमट मिट्टी वाली भूमि की कीमत ऊसर तथा बंजर भूमि की अपेक्षा अधिक होती है। भूमि की स्थिति की तुलना करके ही लगान व कीमत निर्धारित की जाती है।

8. भूमि उत्पादन का अनिवार्य उपादान है – भूमि उत्पादन का एक अनिवार्य एवं आधारभूत उपादान है। भूमि के अभाव में उत्पादन करना असम्भव है। आर्थिक दृष्टि से प्रत्येक प्रकार का उत्पादन अन्ततः भूमि की उपलब्धता पर ही निर्भर करता है।

उत्पादन के साधन के रूप में भूमि का महत्त्व

उत्पादन के साधन के रूप में भूमि का महत्त्व निम्नलिखित शीर्षकों में स्पष्ट किया जा सकता है –

1. आर्थिक विकास का आधार – किसी भी देश को सम्पन्न एवं समृद्धिशाली बनाने में भूमि अथवा प्राकृतिक साधनों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है, क्योंकि भूमि, धनोत्पादन का एक प्रमुख साधन है। किसी देश की उत्पादन क्षमता भूमि और प्राकृतिक साधनों की मात्रा तथा प्रकार पर निर्भर करती है।

2. लघु एवं कुटीर उद्योगों का आधार – प्राथमिक उद्योगों के विकास के लिए भूमि का अत्यधिक महत्त्व है। मत्स्यपालन, वनों पर आधारित व्यवसाय, खनन आदि का कार्य प्रत्यक्ष रूप से भूमि-संसाधनों पर ही निर्भर होता है।

3. यातायात के साधनों के विकास का आधार – यातायात तथा सन्देशवाहन के साधनों के विकास में भी भूमि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। यदि भूमि समतल है तो रेल, सड़क, तार, टेलीफोन आदि का सरलता से विकास किया जा सकता है।

4. औद्योगिक विकास का आधार – देश को औद्योगिक उत्पादन और विकास भी भूमि अथवा प्राकृतिक साधनों की मात्रा पर ही निर्भर करता है। औद्योगिक उत्पादन के लिए विभिन्न प्रकार के कच्चे माल, भूमि तथा खानों से प्राप्त होते हैं। औद्योगिक विकास में शक्ति के साधनों का भी विशेष महत्त्व है। कोयला तथा लोहा खानों से प्राप्त होता है और विद्युत जलस्रोतों से उत्पादित की जाती है।

5. मकान, कारखाने आदि के निर्माण के लिए – भूमि की ऊपरी सतह पर ही हम रहने के लिए भवनों का, रोजी-रोटी कमाने के लिए कारखानों का, शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालयों का तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए अस्पतालों का निर्माण करते हैं। ये सब भूमि के अभाव में असम्भव हैं।

6. जीवित रहने का आधार – मनुष्य को रहने के लिए जल, वायु, भोजन, वस्त्रों आदि की आवश्यकता होती है। उसकी ये सभी आवश्यकताएँ भूमि द्वारा पूरी की जाती हैं। यदि भूमि न हो तो मानव-जीवन दुर्लभ है।

7. लगान सिद्धान्त का आधार – लगान सिद्धान्त का आधार भूमि है। भूमि में सीमितता तथा विभिन्नता का लक्षण विद्यमान होता है। इसी को आधार मानकर लगान सिद्धान्त का निर्माण किया गया है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि मानव का सम्पूर्ण जीवन आर्थिक, सामाजिक, औद्योगिक वे राजनीतिक भूमि (प्राकृतिक संसाधनों) पर ही निर्भर है।



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