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This section includes InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

21401.

पर्यावरण प्रदूषित होने के कोई दो कारण लिखिए।

Answer»

औद्योगीकरण तथा वृक्षों की अत्यधिक कटाई पर्यावरण-प्रदूषण के दो मुख्य कारण हैं।

21402.

जल में कितने प्रकार की अशुद्धियाँ पाई जाती हैं?

Answer»

जल में दो प्रकार की अशुद्धियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें क्रमश: जल की घुलित अशुद्धियाँ तथा जल की अघुलित अथवा तैरने वाली अशुद्धियाँ कहा जाता है।

21403.

कठोर जल किसे कहते हैं? कठोरता कितने प्रकार की होती है?याकठोर जल की क्या पहचान है?याजल में कितने प्रकार की कठोरता पाई जाती है? जल की कठोरता कैसे दूर की जा सकती है?याजल की कठोरता को दूर करने के उपाय लिखिए।

Answer»

कठोर जल: साबुन के साथ सरलता से झाग उत्पन्न न करने वाला जल कठोर कहलाता है। जल में कठोरता इसमें उपस्थित लवणों के कारण होती है। जल की कठोरता दो प्रकार की होती है

(क) अस्थायी कठोरता:

यह वह कठोरता है जिसे आसानी से उबालकर जल से दूर किया जा सकता है।

(ख) स्थायी कठोरता:

यह वह कठोरता है जिसे उबालकर दूर नहीं किया जा सकता हैं। यह जल कपड़े धोने एवं दैनिक कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं होता है।

जल की अस्थायी कठोरता कैल्सियम व मैग्नीशियम के बाइकार्बोनेटों के कारण होती है तथा स्थायी कठोरता कैल्सियम व मैग्नीशियम के क्लोराइड अथवा सल्फेट के कारण। अस्थायी कठोरता को सरलता से दूर किया जा सकता है, किन्तु स्थायी कठोरता का निवारण कठिन है। जल की अस्थायी कठोरता को जल उबालकर समाप्त किया जा सकता है; किन्तु स्थायी कठोरता का निवारण कठिन है। स्थायी कठोरता के निवारण के लिए कठोर जल में कपड़े धोने का सोडा अल्प मात्रा में मिलाया जाता है। अथवा सोडे एवं चूने का मिश्रण मिलाया जाता है। इसके अतिरिक्त परम्यूटिट विधि द्वारा भी स्थायी करता को संमाप्त किया जा सकता है।

21404.

शुद्ध तथा अशुद्ध जल के लक्षणों या गुणों को स्पष्ट कीजिए। जल किस प्रकार से दूषित हो जाता है?याजल किस प्रकार दूषित होता है ? आप अशुद्ध जल को कैसे शुद्ध करेंगी?याजल में पाई जाने वाली मुख्य अशुद्धियों का वर्णन कीजिए।याजल अशुद्ध होने के क्या कारण हैं?

Answer»

शुद्ध जल के गुण या लक्षण

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हमारी पृथ्वी पर थल की तुलना में जल का भाग बहुत अधिक है। जल के मुख्य स्रोत समुद्र, नदियाँ, झीलें, तालाब, झरने तथा भूमिगत जल हैं। जल की अत्यधिक मात्रा उपलब्ध होने पर भी विश्व को पेयजल की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इस समस्या का मूल कारण यह है कि हमारे लिए केवल शुद्ध जल ही उपयोगी होता है। अशुद्ध जल या दूषित जल न तो पिया जा सकता है और न ही भोजन पकाने तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों में ही इस्तेमाल किया जा सकता है। इस स्थिति में शुद्ध जल के आवश्यक गुणों एवं लक्षणों की पहचान की समुचित जानकारी होना आवश्यक है।

शुद्ध जल वह सरल यौगिक है जो हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन से बनता है। शुद्ध जल स्वादरहित, रंगरहित, गन्धरहित द्रव्य होता है। शुद्ध अवस्था में जल साफ, स्वच्छ एवं पूर्ण रूप से पारदर्शी होता है। शुद्ध जल में एक प्रकार की प्राकृतिक चमक भी होती है।

अशुद्ध जल के गुण या लक्षण

जल एक अत्यधिक उत्तम विलायक है। अनेक वस्तुएँ एवं लवण जल में शीघ्र ही घुल जाते हैं। इसीलिए पूर्ण शुद्ध अवस्था में जल मुश्किल से ही प्राप्त होता है। कोई-न-कोई लवण जल में घुल जाता है अथवा कुछ अशुद्धियों या गन्दगी का जल-स्रोतों में समावेश हो जाता है जिसके . परिणामस्वरूप जल अशुद्ध हो जाता है। अशुद्ध जल के गुणों या लक्षणों का उल्लेख करने से पूर्व कहा जा सकता है कि वह जल अशुद्ध है जिसमें शुद्ध जल के आवश्यक किसी एक गुण या सभी गुणों को अभाव होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि अशुद्ध जल में किसी-न-किसी प्रकार का स्वाद पाया जाता है। यह खारा भी हो सकता है तथा मीठा भी। अशुद्ध जल में गन्ध या दुर्गन्ध का पाया जाना भी एक लक्षण है। प्रायः अशुद्ध जल मटमैला भी हो सकती है। अशुद्ध जल में कुछ अशुद्धियाँ तैरती हुई भी दिखाई दे सकती हैं। अशुद्ध जल अर्द्ध-पारदर्शी होता है तथा उसमें शुद्ध जल की प्राकृतिक चमक का भी प्रायः अभाव ही होता है।

जल का दूषित होना
प्रकृति ने हमें शुद्ध जल ही प्रदान किया था, परन्तु विभिन्न कारणों से जल क्रमश: दूषित होता जा रहा है। जल को अधिक दूषित करने में सर्वाधिक योगदान सभ्य व औद्योगिक एवं नगरीय मानव समाज का ही है। विभिन्न अति विकसित एवं आधुनिक मानवीय गतिविधियों के कारण ही जल क्रमशः दूषित होता जा रहा है। जल को दूषित करने वाले कुछ मुख्य कारकों का संक्षिप्त विवरण अग्रवर्णित है

(1) घरेलू वाहित मल (सीवेज):
इसमें मल-मूत्र, घरेलू गन्दगी तथा कपड़ों को धोने के बाद का जल आदि सम्मिलित होते हैं। सामान्य रूप से इस प्रकार का दूषित जल, घर की नालियों तथा बड़े नालों के माध्यम से बहता हुआ मुख्य जल-स्रोतों में मिल जाता है तथा इन स्रोतों के जल को भी प्रदूषित कर देता है। इसके परिणामस्वरूप नदियों के किनारे, झील आदि के जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। वाहित मल से अनेक प्रकार के कीटाणु जल में आ जाते हैं, जिसके कारण जल का अत्यधिक क्लोरीनीकरण करना आवश्यक हो जाता है।

(2) वर्षा का जल:
वर्षा का जल खेतों की मिट्टी की ऊपरी परत को बहाकर नदियों, झीलों तथा समुद्र तक पहुँचा देता है। इसके साथ अनेक प्रकार के खाद (नाइट्रोजन एवं फॉस्फेट के यौगिक) एवं कीटनाशक पदार्थ भी जल में पहुँच जाते हैं तथा जल क्रमशः दूषित हो जाता है।

(3) औद्योगिक संस्थानों द्वारा विसर्जित पदार्थ:
इनमें अनेक विषैले पदार्थ (अम्ल, क्षार, सायनाइड आदि), रंग-रोगन व कागज उद्योग द्वारा विसर्जित पारे (मरकरी) के यौगिक, रसायन एवं पेस्टीसाइड उद्योग द्वारा विसर्जित सीसे (लैड) के यौगिक तथा कॉपर वे जिंक के यौगिक प्रमुख हैं। इन सभी पदार्थों के जल में मिल जाने से जल दूषित एवं हानिकारक हो जाता है

(4) तैलीय (ऑयल) प्रदुषण:
इस प्रकार का प्रदूषण समुद्र के जल में होता है। समुद्र में यह प्रदूषण या तो जहाजों द्वारा तेल विसर्जित करने से होता है अथवा समुद्र के किनारे स्थित तेल-शोधक संस्थानों के कारण होता है।

(5) रेडियोधर्मी पदार्थ:
नाभिकीय विखण्डन के फलस्वरूप अनेक रेडियोधर्मी पदार्थ जल को दूषित कर देते हैं। इस प्रकार का प्रदूषण प्रायः समुद्र के जल में होता है।

जल में पाई जाने वाली मुख्य अशुद्धियाँ
दूषित जल में मुख्य रूप से दो प्रकार की अशुद्धियाँ पायी जाती हैं जिन्हें क्रमशः घुलित अशुद्धियाँ तथा अघुलित अथवा तैरने वाली अशुद्धियाँ कहा जाता है। इन दोनों प्रकार की अशुद्धियों को। संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

(1) घुलित अशुद्धियाँ:
जल एक उत्तम विलायक है; अत: इसके सम्पर्क में आने वाले विभिन्न पदार्थ शीघ्र घुलकर इसमें समा जाते हैं। इस प्रकार जल में समा जाने वाले विजातीय तत्त्वों को जल की घुलित अशुद्धियाँ कहा जाता है। इस प्रकार की अशुद्धियाँ प्रायः दो प्रकार की होती हैं। प्रथम वर्ग की घुलित अशुद्धियाँ कुछ लवण होते हैं। मुख्य रूप से जल के कुछ सल्फेट, कार्बोनेट तथा बाइकार्बोनेट घुल जाया करते हैं। ये लवण घुलकर पानी को कठोर बना देते हैं। कठोर जल हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। लवणों के अतिरिक्त कुछ गैसें भी जल में घुल जाती हैं। ये गैसें मुख्य रूप से सल्फ्यूरेटेड हाइड्रोजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड होती हैं। इन गैसों से युक्त जल भी हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ही होता है।

(2) अघुलित अथवा तैरने वाली अशुद्धियाँ:
अशुद्ध जल में कुछ ऐसी अशुद्धियाँ भी पाई जाती हैं जो जल में नहीं घुलतीं, परन्तु इनका जल में अस्तित्व ही जल को दूषित एवं हानिकारक बना देता है। इस प्रकार की अशुद्धियों को तैरने वाली अशुद्धियाँ भी कहा जाता है। जल में पाई जाने वाली इस प्रकार की मुख्य अशुद्धियाँ निम्नलिखित हो सकती हैं| ”

⦁    धूल-मिट्टी के कण एवं विभिन्न प्रकार का कूड़ा-करकट। पत्ते, घास, तिनके तथा बाल आदि इसी प्रकार की अशुद्धियाँ मानी जाती हैं।
⦁     विभिन्न रोगों के रोगाणु भी जल को अशुद्ध बनाते हैं। अशुद्ध जल में हैजा, पेचिश, मोतीझरा आदि रोगों के कीटाणु पाए जाते हैं।
⦁    अशुद्ध जल में अनेक प्रकार के कीड़े, कीड़ों के बच्चे तथा अण्डे भी पाए जाते हैं।
⦁    जल को अशुद्ध बनाने वाली कुछ अशुद्धियाँ पशुजनित भी होती हैं। पशुओं द्वारा जल में मल-मूत्र विसर्जित कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त उनके शरीर के बाल एवं अन्य अशुद्धियाँ भी जल को अशुद्ध बना देती हैं।

21405.

जल को उबालने से किस प्रकार की कठोरता दूर होती है?

Answer»

जल को उबालने से केवल उसकी अस्थायी कठोरता ही दूर हो सकती है।

21406.

जल को छानकर किस प्रकार की अशुद्धियों से मुक्त किया जा सकता है?

Answer»

जल को छानकर अघुलित अथवा तैरने वाली अशुद्धियों से मुक्त किया जा सकता है।

21407.

जल की घुलित अशुद्धियों को अलग करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है(क) क्लोरीन का(ख) तूतिया का(ग) फिटकरी का(घ) लाल दवा का

Answer»

सही विकल्प है (ग) फिटकरी का

21408.

जल की अघुलित अशुद्धियों को जल से अलग किया जा सकता है(क) अवक्षेपण क्रिया द्वारा(ख) आसवन क्रिया द्वारा(ग) उबालने की क्रिया द्वारा(घ) छानने की क्रिया द्वारा

Answer»

सही विकल्प है (घ) छानने की क्रिया द्वारा

21409.

जल के शुद्धिकरण के लिए प्रयोग किये जाने वाले जीवाणुनाशक पदार्थों के नाम लिखिए।

Answer»

जल के शुद्धिकरण के लिए सामान्य रूप से अपनाये जाने वाले मुख्य जीवाणुनाशक पदार्थ हैं ब्लीचिंग पाउडर, नीला थोथा, पोटैशियम परमैंगनेट तथा क्लोरीन।

21410.

जल शुद्धिकरण के लिए किसका प्रयोग किया जाता है?(क) सोडियम परमैंगनेट(ख) ब्लीचिंग पाउडर(ग) पोटैशियम परमैंगनेट(घ) जिंक ऑक्साइड

Answer»

सही विकल्प है (ख) ब्लीचिंग पाउडर

21411.

आसुत जल का प्रयोग होता है(क) दवाओं में(ख) खाना बनाने में(ग) पीने में(घ) सफाई करने में

Answer»

सही विकल्प है (क) दवाओं में

21412.

पर्यावरण का जन-सामान्य के धार्मिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

Answer»

प्राकृतिक पर्यावरण अनिवार्य रूप से जन-सामान्य के धार्मिक जीवन को प्रभावित करता है। पर्यावरण के प्रभाव को अधिक महत्त्व देने वाले विद्वानों का मत है कि प्राकृतिक शक्तियाँ धर्म के विकास को प्रभावित करती हैं। मैक्समूलर ने धर्म की उत्पत्ति का सिद्धान्त ही प्राकृतिक शक्तियों के भय से इनकी पूजा करने के रूप में प्रतिपादित किया है। विश्व के जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक प्रकोप अधिक है, वहाँ पर धर्म का विकास तथा धर्म के प्रति आस्था रखने वाले व्यक्तियों की संख्या अधिक होती है। एशिया की मानसूनी जलवायु के कारण ही यहाँ के लोग भाग्यवादी बने हैं। कृषिप्रधान देशों में इन्द्र की पूजा होना सामान्य बात है। स्पष्ट है कि धर्म विकास तथा धर्म के स्वरूप के निर्धारण में भी पर्यावरण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

21413.

‘पर्यावरण की एक परिभाषा लिखिए।यापर्यावरण से आप क्या समझती हैं?

Answer»

“पर्यावरण वह है जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है।” -जिस्बर्ट

21414.

पर्यावरण-प्रदूषण से आप क्या समझती हैं? पर्यावरण-प्रदूषण के सामान्य कारणों काभी वर्णन कीजिए।यापर्यावरण प्रदूषण की परिभाषा लिखिए। प्रदूषण के कारण बताइए। पर्यावरण-प्रदुषण नियन्त्रण के लिए सरकार द्वारा क्या उपाय किए गए हैं?यापर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य कारण क्या हैं?याजनजीवन पर पर्यावरण के हानिकारक प्रभाव को रोकने के बारे में लिखिए।

Answer»

पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ

पर्यावरण-प्रदूषण का सामान्य अर्थ है-हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना। पर्यावरण को निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्ही तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने जगती है जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है, तब कहा जाता है कि यावरण प्रदूषित हो रहा है। उदाहरण के लिए-यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर अन्य विषैली गैसों का अनुपात बढ़ जाये तो कहा जाएगा कि वायु-प्रदूषण हो गया है। ण के किसी भी भाग के दूषित हो जाने को पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाएगा। यह प्रदूषण जल-प्रदूषण, मृदा-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण तथा ध्वनि-प्रदूषण के रूप में हो सकता है।
 
पर्यावरण-प्रदूषण के सामान्य कारण

पर्यावरण प्रदूषण अपने आप में एक गम्भीर तथा व्यापक समस्या है। इस समस्या को उत्पन्न करने तथा बढ़ावा देने वाले वैसे तो असंख्य कारण हैं, परन्तु कुछ सामान्य कारण ऐसे हैं जो अधिक प्रबल तथा
अति स्पष्ट हैं। इस वर्ग के कारणों को ही पर्यावरण-प्रदूषण के सामान्य लक्षण कहा जाता है। इस वर्ग के मुख्य कारणों का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

(1) जल-मल का अनियमित निष्कासन:
आवासीय क्षेत्रों से जल-मल का अनियमित निष्कासन पर्यावरण-प्रदूषण का एक मुख्य कारण है। खुले शौचालयों से उत्पन्न होने वाली दुर्गन्ध वायु प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान देती है। इसके अतिरिक्त वाहित मल जल के स्रोतों को प्रदूषित करता है। घरों में इस्तेमाल होने वाला जल भी विभिन्न कारणों से अत्यधिक प्रदूषित हो जाता है तथा नाले-नालियों के माध्यम से यह दूषित जल नदियों के जल को भी प्रदूषित कर देता है।

(2) घरेलू अवशिष्ट पदार्थ:
घरों में इस्तेमाल होने वाले असंख्य पदार्थों के अवशिष्ट भाग भी पर्यावरण-प्रदूषण में उल्लेखनीय योगदान प्रदान करते हैं। फिनाइल, मच्छर मारने वाले घोल, डिब्बाबन्दी में इस्तेमाल डिब्बे, डिटर्जेण्ट, शैम्पू, साबुन आदि सभी के अवशेष जल, वायु तथा मिट्टी को गम्भीर रूप से प्रदूषित करते हैं।
 
(3) औद्योगिकीकरण:
तीव्र गति से होने वाला औद्योगिकीकरण भी पर्यावरण-प्रदूषण के लिए जिम्मेदार एक मुख्य कारण है। औद्योगिक संस्थानों में जहाँ ईंधन जलने से वायु-प्रदूषण होता है। वहीं उनमें इस्तेमाल होने वाली रासायनिक सामग्री के अवशेष आदि वायु, जल तथा मिट्टी को निरन्तर प्रदूषित करते हैं। औद्योगिक संस्थानों में चलने वाली मशीनों, सायरनों तथा अन्य कारणों से ध्वनि-प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

(4) दहन तथा धुआँ:
आधुनिक-उन्नत समाज में मानव ने दहन का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत कर लिया है। घरेलू रसोईघर से लेकर असंख्य वाहनों तथा औद्योगिक संस्थानों में सर्वत्र दहन का ही बोलबाला है, लकड़ी, कोयला, गैस, पेट्रोल तथा डीजल आदि के दहन से जहाँ अनेक विषैली गैसें तथा धुआँ उत्पन्न होता है, वहीं अप्राकृतिक स्रोतों से भी हानिकारक गैसें उत्पन्न होती हैं। ये सब सामूहिक रूप से वायु के प्राकृतिक स्वरूप को परिवर्तित करते हैं। परिणामस्वरूप वायु प्रदूषण में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

(5) कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग:
जैसे-जैसे कृषि एवं उद्यान-क्षेत्र में विस्तार हुआ है, वैसे-वैसे कीटनाशकों को प्रयोग भी निरन्तर बढ़ा है। विभिन्न कीटनाशक अत्यधिक विषैले हैं तथा इनका प्रभाव दूरगामी है। फसलों पर तथा घरों में होने वाले कीटनाशकों के छिड़काव से वायु, जल तथा मिट्टी का अत्यधिक प्रदूषण हो रहा है। इस प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव मनुष्यों तथा पशु-पक्षियों पर निरन्तर पड़ रहा है।

(6) नदियों में कूड़ा-करकट तथा मृत शरीर बहाना:
जैसे-जैसे जनसंख्या तथा नगरीकरण में वृद्धि हो रही है; वैसे-वैसे कूड़े-करकट की समस्या भी बढ़ रही है। अज्ञानता तथा प्रचलन के अनुसार कूड़े-करकट तथा मनुष्यों एवं पशुओं के मृत-शरीरों को नदियों में बहा दिया जाता है। इस प्रकार का विसर्जन सुविधाजनक तो प्रतीत होता है, परन्तु इस प्रचलन के परिणामस्वरूप जल-प्रदूषण में अत्यधिक वृद्धि होती है। इस जल-प्रदूषण से कुछ अंशों में वायु तथा मिट्टी के प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।
 
(7) वृक्षों की अत्यधिक कटाई:
पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि करने वाला एक मुख्य उल्लेखनीय कारण वृक्षों की अत्यधिक कटाई भी है। वृक्ष वे प्रकृति-प्रदत्त कारक हैं जो वायु के प्राकृतिक स्वरूप को सन्तुलित बनाये रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वृक्ष सूर्य के प्रकाश से कार्बन डाइ-ऑक्साइड ग्रहण करके ऑक्सीजन छोड़ते हैं। वृक्षों के अत्यधिक संख्या में कट जाने के परिणामस्वरूप वायु का प्राकृतिक स्वरूप विकृत होने लगती है और वायु-प्रदूषण की स्थिति को बढ़ावा मिलता है।

(8) रेडियोधर्मी पदार्थ:
पर्यावरण प्रदूषण के लिए उत्तरदायी कारकों में रेडियोधर्मी पदार्थों का भी उल्लेखनीय योगदान है। विभिन्न आणविक परीक्षणों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले रेडियोधर्मी पदार्थों ने भी पर्यावरण को गम्भीर रूप से प्रदूषित किया है। प्रदूषण के इस कारक के गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव सभी प्राणियों तथा पेड़-पौधों पर भी पड़ रहे हैं। विभिन्न प्रकार के कैन्सर तथा आनुवंशिक रोग इसी प्रकार के प्रदूषण के परिणाम हैं।

पर्यावरण-प्रदूषण पर नियन्त्रण
पर्यावरण-प्रदूषण अपने आप में एक गम्भीर समस्या है तथा सम्पूर्ण मानव-जगत के लिए एक चुनौती है। इस समस्या के समाधान के लिए मानव-मात्रं चिन्तित है। विश्व के प्रायः सभी देशों में पर्यावरण-प्रदूषण पर प्रभावी नियन्त्रण के लिए अनेक उपाय किए जा रहे हैं। हमारे देश में भी इस समस्या से मुकाबला करने के लिए अनेक उपाय किए जा रहे हैं। कुछ उपायों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

⦁    औद्योगिक संस्थानों के लिए कड़े निर्देश जारी किए गए हैं कि वे पर्यावरण-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के हर सम्भव उपाय करें। इसके लिए आवश्यक है कि पर्याप्त ऊँची चिमनियाँ लगाई. जाएँ तथा उनमें उच्च कोटि के छन्ने लगाए जाएँ। औद्योगिक संस्थानों से विसर्जित होने वाले जल को पूर्ण रूप से उपचारित करके ही पर्यावरण में छोड़ा जाना चाहिए। यही नहीं, ध्वनि-प्रदूषण को रोकने के लिए जहाँ तक सम्भव हो ध्वनि अवरोधक लगाये जाने चाहिए। औद्योगिक संस्थानों के आस-पास अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाए जाने चाहिए।
⦁    वाहन पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य कारण हैं; अत: वाहनों द्वारा होने वाले प्रदूषण को भी नियन्त्रित करना आवश्यक है। इसके लिए वाहनों के इंजन की समय-समय पर जाँच करवाई जानी
चाहिए। ईंधन में होने वाली मिलावट को भी रोका जाना चाहिए।
⦁    जन-सामान्य को पर्यावरण-प्रदूषण के प्रति सचेत होना चाहिए तथा जीवन के हर क्षेत्र में प्रदूषण पर प्रभावी रोक लगाने के हर सम्भव उपाय किए जाने चाहिए।
पर्यावरण-प्रदूषण वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति की समस्या है; अतः इसे नियन्त्रित करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक होना चाहिए। पर्यावरण प्रदूषण के प्रत्येक कारण को जानने का प्रयास किया जाना चाहिए तथा प्रत्येक कारण के निवारण का भी उपाय किया जाना चाहिए।

21415.

पर्यावरण के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रत्यक्ष प्रभावों का वर्णन कीजिए।याप्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण जनजीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।” इस कथन को स्पष्ट करते हुए पर्यावरण के प्रभावों का वर्णन कीजिए।यापर्यावरण मानव के लिए किस प्रकार उपयोगी है?

Answer»

जब पर्यावरण के प्रभावों का अध्ययन किया जाता है, तब सर्वप्रथम प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण के प्रभावों को ही अध्ययन किया जाता है। वास्तव में पर्यावरण का यही रूप प्रकृति प्रदत्त है तथा मनुष्य के नियन्त्रण से बाहर है। भौगोलिक पर्यावरण के अर्थ को डॉ० डेविस ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “मनुष्य के सन्दर्भ में भौगोलिक पर्यावरण से अभिप्राय भूमि या मानव के चारों ओर फैले उन सभी भौतिक स्वरूपों से है जिनमें वह रहता है, जिनका उसकी आदतों एवं क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है। इस कथन से स्पष्ट है कि प्राकृतिक पर्यावरण के समस्त कारक मनुष्य के नियन्त्रण से मुक्त हैं।

पर्यावरण के जनजीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव

पर्यावरण जनजीवन के सभी पक्षों को गम्भीर रूप से प्रभावित करता है। पर्यावरण के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को सामान्य रूप से दो वर्गों में बाँटा जाता है। प्रथम वर्ग में जनजीवन पर पर्यावरण के प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है तथा द्वितीय वर्ग में जनजीवन पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है। पर्यावरण के जनजीवन पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है|

(1) पर्यावरण का जनसंख्या पर प्रभाव:
किसी भी क्षेत्र की जनसंख्या के स्वरूप के निर्धारण में वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण की सर्वाधिक भूमिका होती है। अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण होने पर सम्बन्धित क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है तथा प्रतिकूल प्राकृतिक पर्यावरण होने की स्थिति में सम्बन्धित क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व कम होता है। यही कारण है कि उपजाऊ भूमि वाले मैदानी क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है, जबकि रेगिस्तानी क्षेत्रों, बंजर भूमि वाले क्षेत्रों तथा दुर्गम पहाड़ी-क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व कम होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करता है।
 
(2) पर्यावरण का खान-पान पर प्रभाव:
मनुष्य को अपनी खाद्य-सामग्री अपने पर्यावरण से ही प्राप्त होती है। इस स्थिति में जिस क्षेत्र में जो खाद्य-सामग्री बहुतायत में उपलब्ध होती है, वही उस क्षेत्र के निवासियों का मुख्य आहार होती है। उदाहरण के लिए–उपजाऊ मैदानी क्षेत्रों में लोगों का , मुख्य आहार वहाँ उगने वाले अनाज तथा सब्जियाँ एवं दालें आदि ही होते हैं। इससे भिन्न समुद्रतटीय क्षेत्रों में लोग अपने आहार में मछली एवं जलीय जीवों के मांस को अधिक स्थान देते हैं। इसी प्रकार ठण्डे एवं अति ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश व्यक्ति मांसाहारी होते हैं, जबकि गर्म क्षेत्रों के अधिकांश निवासी शाकाहारी होते हैं।

(3) पर्यावरण का वेशभूषा पर प्रभाव:
प्राकृतिक पर्यावरण को वहाँ के निवासियों की वेशभूषा पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति बारीक, ढीले तथा सूती वस्त्र धारण करते हैं। इससे भिन्न ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति गर्म एवं चुस्त वस्त्र धारण किया करते हैं। अनेक ठण्डे प्रदेशों में जानवरों की खाले से भी कोट इत्यादि बनाकर पहने जाते हैं।

(4) पर्यावरण का आवासीय स्वरूप पर प्रभाव:
प्राकृतिक पर्यावरण मनुष्य के निवास हेतु प्रयुक्त मकानों तथा इनकी सामग्री को भी प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए—पर्वतीय पर्यावरण में पत्थर तथा लकड़ी सरलता से उपलब्ध होती है। अत: इन क्षेत्रों में मकान बनाने के लिए पत्थर तथा लकड़ी को ही अधिक इस्तेमाल किया जाता है। जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वहाँ मकानों की छतें ढलावदार बनाई जाती हैं। मैदानी क्षेत्रों में प्रायः ईंट, सीमेण्ट, लोहे आदि से मकान बनाए जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में, प्रायः भूकम्प आते रहते हैं। इन क्षेत्रों को अधिक क्षति से बचाने के दृष्टिकोण से लकड़ी के मकान ही बनाए जाते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण जन-सामान्य के आवासीय स्वरूप को भी प्रभावित करता है।

(5) पर्यावरण का आवागमन के साधनों पर प्रभाव:
प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का आवागमन के साधनों के विकास पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। समुद्र तथा नदियों के निकटवर्ती क्षेत्रों में स्टीमर एवं नौकाएँ आवागमन का साधन होती हैं। मैदानी क्षेत्रों में सड़कें बनाना तथा रेल की पटरियाँ बिछाना सरल होता है। अतः इन क्षेत्रों में रेलगाड़ियाँ, मोटर कारें, बसें आदि वाहन अधिक होते हैं। ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में खच्चर ही आवागमन एवं माल ढोने के साधन माने जाते हैं।

(6) पर्यावरण का शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव:
जन-सामान्य के शारीरिक लक्षणों पर भौगोलिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति की त्वचा के रंग पर जलवायु एवं स्थानीय तापमान का अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है। गर्म क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का रंग बहुधा काला तथा ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का रंग गोरा होता है। भूमध्यरेखीय जलवायु में रहने वाले व्यक्ति वहाँ की अतिरिक्त उष्णता के कारण नाटे कद के और काले रंग के होते हैं, जबकि भूमध्यसागरीय जलवायु के निवासी प्रायः गोरे तथा लम्बे कद के होते हैं।

(7) पर्यावरण का व्यावसायिक जीवन पर प्रभाव:
प्राकृतिक पर्यावरण सम्बन्धित क्षेत्र के निवासियों के मूल व्यवसायों को भी प्रभावित करता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि समुद्र एवं जुल-स्रोतों के निकट रहने वाले लोगों का मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना होता है। नदियों से सिंचित मैदानी क्षेत्रों में कृषि-कार्य ही मुख्य व्यवसाय होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में भेड़-बकरियाँ पालना एक मूले व्यवसाय माना जाता है, जब कि अधिक वन वाले क्षेत्रों में लकड़ी काटना मूल व्यवसाय माना जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण अनिवार्य रूप से व्यावसायिक जीवन को भी प्रभावित करता है।

21416.

उबालने से जल किस प्रकार रोगमुक्त हो जाता है?

Answer»

उबालने से जल के अन्दर उपस्थित सभी जीवाणु इत्यादि मर जाते हैं, क्योंकि जिस तापक्रम पर जल उबलता है अर्थात् 100° सेण्टीग्रेड पर जीवित रहना सामान्यतः सम्भव नहीं रहता।

21417.

पोटैशियम परमैंगनेट का प्रयोग जल के शुद्धिकरण के लिए कहाँ किया जाता है?(क) समुद्र में(ख) नदी में(ग) बरसात में(घ) कुएँ में

Answer»

सही विकल्प है (घ) कुएँ में

21418.

अतिसार प्रायः किस ऋतु में अधिक फैलता है?

Answer»

वर्षा-ऋतु में।

21419.

मक्खियों को नष्ट करने के लिए छिड़काव किया जाता है(क) डी० डी० टी० का(ख) ब्लीचिंग पाउडर का(ग) आयोडीन घोल का(घ) लाल दवा का

Answer»

सही विकल्प है (क) डी० डी० टी० का

21420.

पर्यावरण का अर्थ और परिभाषा निर्धारित कीजिए तथा पर्यावरण के विभिन्न वर्गों का सामान्य परिचय दीजिए।

Answer»

पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ
मनष्य ही क्या प्रत्येक प्राणी एवं वनस्पति जगत भी पर्यावरण से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है तथा ये सभी अपने पर्यावरण से प्रभावित भी होते हैं। पर्यावरण की अवधारणा को स्पष्ट करने से पूर्व ‘पर्यावरण के शाब्दिक अर्थ को स्पष्ट करना आवश्यक है।

पर्यावरण शब्द दो शब्दों अर्थात् ‘परि’ तथा ‘आवरण’ के संयोग या मेल से बना है। ‘परि’ का अर्थ है चारों ओर’ तथा आवरण का अर्थ है ‘घेरा। इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ हुआ चारों ओर का घेरा’। इस प्रकार व्यक्ति के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि व्यक्ति के चारों ओर जो प्राकृतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियाँ और परिस्थितियाँ विद्यमान हैं, इनके प्रभावी रूप को ही पर्यावरण कहा जाता है। पर्यावरण का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। पर्यावरण उन समस्त शक्तियों, वस्तुओं और दशाओं का योग है, जो मानव को चारों ओर से आवृत किए हुए हैं। मानवे से लेकर वनस्पति तथा सूक्ष्म जीव तक सभी पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं। पर्यावरण उन सभी बाह्य दशाओं एवं प्रभावों का योग है, जो जीव के कार्य-कलापों एवं जीवन को प्रभावित करता है। मानव जीवन पर्यावरण से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है।
 
पर्यावरण के शाब्दिक अर्थ एवं सामान्य परिचय को जान लेने के उपरान्त इस अवधारणा की व्यवस्थित परिभाषा प्रस्तुत करना भी आवश्यक है। कुछ मुख्य समाज वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

⦁     जिस्बर्ट के अनुसार पर्यावरण से आशय उन समस्त कारकों से है जो किसी व्यक्ति या जीव को चारों ओर से घेरे रहते हैं तथा उसे प्रभावित करते हैं एवं जीव अपने पर्यावरण के प्रभाव से बच नहीं सकता। उनके शब्दों में, “पर्यावरण वह है जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है।”
⦁     रॉस ने पर्यावरण के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए एक संक्षिप्त परिभाषा इन शब्दों में प्रस्तुत की है, “पर्यावरण हमें प्रभावित करने वाली कोई बाहरी शक्ति है।”
उपर्युक्त विवरण द्वारा पर्यावरण का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है। कि व्यक्ति के सन्दर्भ में स्वयं व्यक्ति को छोड़कर इस जगत् में जो कुछ भी है वह सब कुछ सम्मिलित रूप से व्यक्ति का पर्यावरण है।

पर्यावरण का वर्गीकरण
पर्यावरण के अर्थ एवं परिभाषा सम्बन्धी विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि पर्यावरण की धारणा अपने आप में एक विस्तृत अवधारणा है। इस स्थिति में पर्यावरण के व्यवस्थित अध्ययन के लिए पर्यावरण को समुचित वर्गीकरण प्रस्तुत करना आवश्यक है। सम्पूर्ण पर्यावरण को मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है

(1) प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण:
प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण के अन्तर्गत समस्त प्राकृतिक शक्तियों एवं कारकों को सम्मिलित किया जाता है। पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, पर्यावरण और जनजीवन पर उसका प्रभाव 113 वनस्पति जगत् तथा जीव-जन्तु तो प्राकृतिक पर्यावरण के घटक ही हैं। इनके अतिरिक्त प्राकृतिक शक्तियों एवं घटनाओं को भी प्राकृतिक पर्यावरण ही माना जाएगा। सामान्य रूप से कहा जा सकता है। कि प्राकृतिक पर्यावरण न तो मनुष्य द्वारा निर्मित है और न यह मनुष्य द्वारा नियन्त्रित ही है। प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव मनुष्य के जीवन के सभी पक्षों पर पड़ता है। जब हम पर्यावरण-प्रदूषण की बात करते हैं तब पर्यावरण से आशय सामान्य रूप से प्राकृतिक पर्यावरण से ही होता है।

(2) सामाजिक पर्यावरण:
सामाजिक पर्यावरण भी पर्यावरण का एक रूप या पक्ष है। सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचा ही सामाजिक पर्यावरण कहलाता है। इसे सामाजिक सम्बन्धों का पर्यावरण भी कहा जा सकता है। परिवार, पड़ोस, खेल के साथी, समाज, समुदाय, विद्यालय आदि सभी सामाजिक पर्यावरण के ही घटक हैं। सामाजिक पर्यावरण भी व्यक्ति को गम्भीर रूप से प्रभावित करता है, परन्तु यह सत्य है कि व्यक्ति सामाजिक पर्यावरण के निर्माण एवं विकास में अपना योगदान प्रदान करता है।
 
(3) सांस्कृतिक पर्यावरण:
पर्यावरण का एक रूप या पक्ष सांस्कृतिक पर्यावरण भी है। सांस्कृतिक पर्यावरण प्रकृति-प्रदत्त नहीं है, बल्कि इसका निर्माण स्वयं मनुष्य ने ही किया है। मनुष्य के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणियों के सन्दर्भ में सांस्कृतिक पर्यावरण का कोई महत्त्व नहीं है। वास्तव में मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओं का समग्र रूप तथा परिवेश सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है। सांस्कृतिक पर्यावरण भौतिक तथा अभौतिक दो प्रकार का होता है। सभी प्रकार के मानव-निर्मित उपकरण एवं साधन सांस्कृतिक पर्यावरण के भौतिक पक्ष में सम्मिलित हैं। इससे भिन्न मनुष्य द्वारा विकसित किए गए मूल्य, संस्कृति, धर्म, भाषा, रूढ़ियाँ, परम्पराएँ आदि सम्मिलित रूप से सांस्कृतिक पर्यावरण के अभौतिक पक्ष का निर्माण करते हैं।

21421.

किस रोग में रोगी अत्यधिक वमन करता है?

Answer»

हैजे का रोगी अत्यधिक वमन करता है।

21422.

टायफाइड फैलाने वाले रोगाणु का नाम लिखिए।

Answer»

साल्मोनेला टाइफ

21423.

टाइफाइड में कैसा आहार दिया जाना चाहिए?(क) पौष्टिक तथा गरिष्ठ(ख) हल्का तथा सुपाच्य(ग) मिर्च मसालेदार(घ) कुछ भी आहार नहीं देना चाहिए।

Answer»

सही विकल्प है (ख) हल्का तथा सुपाच्य

21424.

अतिसार के रोगी को किस प्रकार का आहार देना चाहिए ?(क) उच्च प्रोटीन युक्त(ख) उच्च रेशेयुक्त(ग) नरम व तरल आहार(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है (ग) नरम व तरल आहार

21425.

हैजा के जीवाणु का नाम है(क) टिटैनी(ख) टाइफी(ग) विब्रियो कोलेरी(घ) बैसिलरी

Answer»

सही विकल्प है (ग) विब्रियो कोलेरी

21426.

मक्खियों द्वारा कौन-सा रोग फैलता है?(क) मलेरिया(ख) अतिसार (डायरिया)(ग) हैजा(घ) तपेदिक

Answer»

सही विकल्प है (ग) हैजा

21427.

हैजा किसके द्वारा फैलता है ?(क) दूषित हवा(ख) विटामिन(ग) शुद्ध जल(घ) दूषित जल

Answer»

सही विकल्प है (घ) दूषित जल

21428.

अशुद्ध जल से रोग किस प्रकार फैलते हैं? इनके नियन्त्रण के उपाय बताइए।

Answer»

अशुद्ध जल से रोगों की उत्पत्ति एवं उनका संवाहन
अशुद्ध जल में अनेक प्रकार के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थ पाए जाते हैं। इनके अतिरिक्त अशुद्ध जल में अनेक प्रकार के जीवाणु, कृमि व उनके अण्डे तथा प्रोटोजोन्स आदि पाए जाते हैं। ये मनुष्यों में अनेक रोगों की उत्पत्ति का कारण होते हैं।

अशुद्ध अथवा दूषित जल प्रायः पेय जल के रूप में रोगों की उत्पत्ति एवं उनके संवाहन का कारण बनता है। अत: दूषित जल पीने से सामान्यत: आहारनाल सम्बन्धी रोग होते हैं, जिससे कि रोग की गम्भीर अवस्था में शरीर के कुछ अन्य अंग या पूर्ण शरीर रोग के अभाव में आ जाता है; जैसे-पेचिश, अतिसार व हैजा आदि में शरीर में पानी में आवश्यक लवणों की कमी हो जाने के कारण रोगी डी-हाइड्रेशन अथवा जल-अल्पता का शिकार होकर  मरने की स्थिति में पहुँच जाता है। जल द्वारा रोगों का संवाहन प्रायः निम्नलिखित अज्ञानताओं एवं असावधानियों के कारण होता है

⦁    पेय जल का उपयोग करते समय उसकी शुद्धता पर ध्यान न देकर हम स्वयं रोगों को आमन्त्रित करते हैं। इसके गम्भीर परिणाम प्रायः वर्षा ऋतु में अधिक होते हैं, क्योंकि वर्षा ऋतु में जल-प्रदूषण अधिक होता है।
⦁    रोगी द्वारा प्रयुक्त बर्तनों में बिना उनका उचित नि:संक्रमण किए जल पीने की लापरवाही स्वस्थ व्यक्तियों को भी रोग का शिकार बना देती है।
⦁    चिकित्सा के मध्य स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हुए रोगी को अज्ञानतावश दूषित जल पिला देना उसे दोबारा से रोगी बना देता है।
⦁    दूध में अशुद्ध जल की मिलावट होने पर भी यह जल संवाहित रोगों का माध्यम बन जाता है।
⦁    कभी-कभी दूषित जल द्वारा भोजन पकाने तथा उस भोजन को ग्रहण करने से भी रोग का संक्रमण हो जाता है।
 
जल संवाहित रोगों से बचने के उपाय

जल संवाहित रोगों का मूल कारण दूषित जल होता है। दूषित जल का सेवन करने पर इसमें उपस्थित जीवाणु तथा प्रोटोजोन्स इत्यादि हमारे शरीर में प्रवेश कर रोगों की उत्पत्ति करते हैं। अतः इन रोगों से बचने का एकमात्र उपाय शुद्ध जल का सेवन करना है, परन्तु यह इतना सरल नहीं है। इसके लिए पेय जल को रोगाणु मुक्त करना आवश्यक है। पेय जल को रोगाणुमुक्त करने की सामान्य विधियाँ निम्नलिखित हैं

(1) उबालना:
जल को उबालने से अधिकांश रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। अब इस जल को ठण्डा करके पीने से जल संवाहित रोगों के होने की सम्भावना नहीं रहती है।

(2) आसवन:
यह उबालने की विधि का वैज्ञानिक रूप है। इसमें एक बर्तन में जल को उबाला जाता है तथा परिणामस्वरूप बनी जल-वाष्प को एक दूसरे बर्तन में ठण्डा करके फिर से जल में परिवर्तित किया जाता है। इसे आसुत जल कहते हैं तथा यह पूर्ण रूप से रोगाणु मुक्त होता है।

(3) जीवाणु अभेद्य निस्यन्दक:
बाजार में विभिन्न क्षमता वाले ,जीवाणु अभेद्य निस्यन्दक लगे उपकरण मिलते हैं। इनमें पेय जल डालने पर जीवाणु व प्रोटोजोन्स निस्यन्दक द्वारा रुक जाते हैं। तथा शुद्ध जल छनकर बर्तन में एकत्रित हो जाता है।

(4) परा-बैंगनी किरणें:
विशिष्ट उपकरणों द्वारा पराबैंगनी अथवा अल्ट्रावॉयलेट किरणें डालने से जल में उपस्थित सभी रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। इस विधि का उपयोग प्राय: जल-संस्थान द्वारा किया जाता है।

(5) पोटैशियम परमैंगनेट:
कुएँ, तालाब, पोखर इत्यादि के जल में (पाँच ग्राम प्रति एक हजार लीटर जल में) पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) डालने से कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। हैजा जैसे संक्रामक रोग के प्रसार को रोकने का यह एक प्रभावशाली उपाय है।

(6) आयोडीन:
दो हजार लीटर जल में एक ग्राम पोटैशियम आयोडाइड मिलाने से जल के अधिकांश जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।

(7) ब्लीचिंग पाउडर:
एक लाख गैलन जल में 250 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर डालने से जल जीवाणुमुक्त हो जाता है। इसका उपयोग प्रायः जल संस्थानों द्वारा बड़े पैमाने पर जल को जीवाणु मुक्त करने के लिए किया जाता है।

(8) क्लोरीन:
क्लोरीन गैस को जल में प्रवाहित करने से जल जीवाणुरहित हो जाता है। जल संस्थानों द्वारा क्लोरीन गैस का उपयोग जीवाणुरहित पेय जल की आपूर्ति के लिए किया जाता है। दस लाख लीटर जल में प्रायः एक लीटर गैस प्रवाहित की जाती है।

21429.

हैजा नामक रोग किस जीवाणु द्वारा फैलता है?याहैजा रोग के कारण लिखिए।

Answer»

हैजा नामक रोग विब्रियो कोलेरी नामक जीवाणु द्वारा फैलता है। अशुद्ध जल के कारण वचारों ओर फैली गन्दगी, उन पर बैठने वाली मक्खियों के द्वारा भोजन पर आकर बैठने से।

21430.

अतिसार नामक रोग के कारणों, लक्षणों एवं बचने के उपायों का वर्णन कीजिए।याअतिसार रोग के लक्षण लिखिए। अतिसार के रोगी को किस प्रकार को आहार देना चाहिए?याअतिसार और पेचिश में क्या अन्तर है? अतिसार के कारण, लक्षण और उपचार लिखिए।यापेचिश एवं अतिसार में क्या अन्तर है?

Answer»

अतिसार (डायरिया)

कारण-अतिसार जल द्वारा फैलने वाला एक रोग है। इस रोग की उत्पत्ति प्राय: इश्चेरिचिया कोलाई नामक जीवाणु द्वारा होती है। यह रोग प्रायः बच्चों में अधिक पाया जाता है। इस रोग के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

⦁    वर्षा-ऋतु में इस रोग के जीवाणु जल में अधिक पाए जाते हैं।
⦁    मक्खियों द्वारा इसके जीवाणु दूध में आ जाते हैं जिनके द्वारा यह बच्चों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
⦁    बार-बार वे आवश्यकता से अधिक भोजन करने से, अपच हो जाने के कारण यह रोग हो सकता है।
⦁    समय-असमय भोजन करने से भी यह रोग हो सकता है।

लक्षण:

इस रोग के निम्नलिखित लक्षण हैं
⦁    पतले व हरे रंग के दस्त आते हैं।
⦁    दस्त अधिक आने पर कभी-कभी दस्त के साथ रक्त भी आता है।
⦁    रोगी को हल्का-सा ज्वर भी रहता है।
⦁    दस्तों की संख्या एक दिन में 25-30 तक हो सकती है, जिससे रोगी अत्यधिक दुर्बल हो जाता है।
 
बचाव के उपाय:
यह एक भयानक रोग है जिसमें उचित चिकित्सा न होने पर लगभग 1-6 वर्ष की आयु तक के बच्चों के मरने का भय बना रहता है; अत: निम्नलिखित उपायों का पालन किया जाना अति आवश्यक है
⦁    रोगी को पूर्ण विश्राम करने देना चाहिए।
⦁     योग्य चिकित्सक से तुरन्त परामर्श करना चाहिए।
⦁    रोगी को उबालकर ठण्डा किया जल पीने के लिए देना चाहिए।
⦁    बोतल से दूध पीने वाले बच्चों की बोतल को समय-समय पर अच्छी तरह से स्वच्छ करना चाहिए।
⦁    रोगी बच्चे को व अन्य स्वस्थ बच्चों को सदैव उबालकर ताज़ा दूध देना चाहिए।
⦁    भोज्य पदार्थों को मक्खियों से बचाने के लिए ढककर रखना चाहिए।
⦁    रोगी बच्चे को खाने में चूने का पानी, मट्ठा तथा अन्य सुपाच्य व हल्के भोज्य पदार्थ  देने चाहिए। फलों में केला खाने के लिए देना इस रोग में लाभप्रद रहता है।
⦁    अतिसार के रोगी को निर्जलीकरण से बचाने के समस्त उपाय करने चाहिए।

अतिसार और पेचिश में अन्तर
प्रायः अतिसार में पेट में पीड़ा होने के लक्षण नहीं पाए जाते। केवल दस्त ही होते हैं। अतिसार पर नियन्त्रण नहीं किया जाता है, तो इसके बाद पेचिश के लक्षण भी दो-एक दिनों में दिखाई देने लगते हैं, अर्थात् दस्तों के साथ पेट में तेज ऐंठन, दस्त के साथ श्लेष्मा (आँव) व रक्त, भी आने लगता है। रोगी को ज्वर भी हो सकता है।

21431.

पेचिश रोग के प्रकार लिखिए।

Answer»

यह रोग दो प्रकार से उत्पन्न होता है। यह रोग जीवाणुओं एवं प्रजीवाणुओं, दोनों ही प्रकार से होता है। जीवाणु बैसिलस द्वारा होने वाली पेचिश को बैसिलरी पेचिश तथा प्रजीवाणु एण्ट अमीबा हिस्टोलिका द्वारा होने वाली पेचिश को अमीबियोसिस कहते हैं।

21432.

अशुद्ध जल से रोग हो जाता है।याजल द्वारा कौन-सा रोग हो जाता है ?(क) क्षय रोग(ख) चेचक(ग) हैजा(घ) मलेरिया

Answer»

सही विकल्प है (घ) मलेरिया

21433.

निम्नलिखित में से कौन-सा रोग अशुद्ध जल से नहीं फैलता है?(क) हैजा(ख) अतिसार(ग) क्षय रोग (टी० बी०)(घ) मोतीझरा (टायफाइड)

Answer»

सही विकल्प है (ग) क्षय रोग (टी० बी०)

21434.

अशुद्ध जल से फैलने वाले रोगों के नाम लिखिए।

Answer»

अशुद्ध जल से अनेक प्रकार के सामान्य से लेकर भयंकर रोग तक फैलते हैं। इनमें आहारनाल सम्बन्धी, गुर्दे सम्बन्धी तथा ज्वर सम्बन्धी अनेक रोग सम्मिलित हैं। पीलिया, टायफाइड, हैजा, अतिसार, पेचिश, गोलकृमि, सूत्रकृमि आदि महामारियों के रूप में भी फैलते हैं। अनेक अति सामान्य रोग; जैसे—सिरदर्द, नजला, फ्लू, आँखों के रोग, मितली, उल्टी (वमन), दस्त आदि भी दूषित जल से हो सकते हैं।

21435.

जल द्वारा फैलने वाले रोग कौन-से हैं?

Answer»

जल द्वारा फैलने वाले मुख्य रोग हैं-हैजा, टायफाइड, पेचिश एवं अतिसार।

21436.

हैजा रोग से बचने के दो उपाय लिखिए।

Answer»

हैजा रोग से बचने के लिए खाने-पीने की वस्तुओं को मक्खियों से बचाना चाहिए तथा टीकाकरण भी करवाना चाहिए।

21437.

दूषित जल से फैलने वाली दो बीमारियों के नाम लिखिए। या, अशुद्ध जल से क्या हानियाँ होती हैं?

Answer»

अशुद्ध जल से अनेक प्रकार के साधारण तथा भयंकर रोग हो सकते हैं; जैसे-हैजा एवं टायफाइड।

21438.

Find the least number by which 1323 must be multiplied so that the product is a perfect cube.

Answer»

The prime factor of 1323 are =3 x 3 x 3 x 7 x 7

= (3 x 3 x 3) x 7 x 7

Clearly, 1323 must be multiplied by 7.

21439.

If the system of equations 4x – 5y = 6 and -12x + ay = b is inconsistent. Which of the following cannot be the value of b? A) -20 B) -9 C) -7 D) -18

Answer»

Correct option is (D) -18

Given that following system of equations is inconsistent.

4x – 5y = 6                ____________(1)

and -12x + ay = b      ____________(2)

Condition for system of equations is inconsistent is

\(\frac{a_1}{a_2}=\frac{b_1}{b_2}\neq\frac{c_1}{c_2}\)

\(\Rightarrow\) \(\frac{4}{-12}=\frac{-5}{a}\neq\frac6b\)

\(\Rightarrow\) \(\frac6b\neq\frac{4}{-12}\)

\(\Rightarrow\) \(\frac6b\neq\frac{-1}3\)

\(\Rightarrow\) \(b\neq6\times-3\)

\(\Rightarrow\) \(b\neq-18\)

Hence, if \(b\neq-18\) then given system is inconsistent.

Hence, if given system is inconsistent then the value of b cannot be -18.

Correct option is D) -18

21440.

If (p, p) is the solution of system of equations ax + by + (t – s) = 0 and bx + ay + (s – r) = 0, (a ≠ b) then which of the following must be true ?A) 2s = r + t B) r + s + t = 0 C) 2r = s + t D) 2t = r + s

Answer»

Correct option is (A) 2s = r + t

Given that (p, p) is the solution of system of equations ax + by + (t – s) = 0

and bx + ay + (s – r) = 0

\(\therefore\) ap + bp + t - s = 0    ____________(1)

bp + ap + s - r = 0       ____________(2)

Subtract equation (1) from (2), we get

(ap + bp + s - r) - (ap + bp + t - s) = 0 - 0 = 0

\(\Rightarrow\) s - r - t + s = 0

\(\Rightarrow\) 2s - r - t = 0

\(\Rightarrow\) 2s = r + t

Correct option is A) 2s = r + t

21441.

A labourer was engaged for 30 days on the condition that he will be paid Rs. 35 for each day he works and will be fined Rs. 10 for each day he is absent. If he earned Rs. 735 in total, then the number of days he worked is …………………. A) 21 B) 22 C) 25 D) 23

Answer»

Correct option is (D) 23

Let labourer works x number of days and absent y days.

\(\because\) Total number of days he engaged = 30

\(\therefore\) x+y = 30             ___________(1)

Labourer earned Rs. 735 in total.

\(\therefore\) 35x - 10y = 735  ___________(2)

Put y = 30 - x from (1) into (2), we get

35x - 10 (30 - x) = 735

\(\Rightarrow\) 35x - 300 + 10x = 735

\(\Rightarrow\) 45x = 735+300 = 1035

\(\Rightarrow\) x = \(\frac{1035}{45}\) = 23

\(\therefore\) y = 30 - x = 30 - 23 = 7    (From (1))

Hence, number of days he worked is x = 23.

Correct option is D) 23

21442.

The ratio between a two-digit number and the sum of digits of that number is 4 : 1. If the digit in the unit place is 3 more than the digit in the tenth place. What is that number ? A) 36B) 49 C) 86 D) 92

Answer»

Correct option is (A) 36

Let the number be ab or (10a+b).

Given that ratio of two-digit number and the sum of digit of that number is 4 : 1.

\(\therefore\) \(\frac{10a+b}{a+b}=\frac41\)

\(\Rightarrow\) 10a+b = 4a+4b

\(\Rightarrow\) 6a = 3b

\(\Rightarrow\) b = 2a        _____________(1)

According to \(2^{nd}\) condition, we have

b = a+3          _____________(2)

\(\Rightarrow\) 2a = a+3          (From (1))

\(\Rightarrow\) a = 3

\(\therefore b=2\times3=6\)    (From (1))

Hence, the required number is ab = 36.

Correct option is A) 36

21443.

The middle digit of number between 100 and 1000 is zero and the sum of the other digits is 11. If the digits are reversed, the number so formed exceeds the original number by 495, then the number is ……………….. A) 405 B) 408 C) 308 D) 309

Answer»

Correct option is (C) 308

Let the required number be a0b where 100's digit is a & 10's digit is zero (0) and unit digit is b.

\(\therefore\) a0b = 100a + 10 \(\times\) 0 + b

\(\Rightarrow\) a0b = 100a + b       __________(1)

Sum of other digits is a+b.

a+b = 11    __________(2)  (Given)

If digits are reversed then formed number be b0a.

\(\therefore\) b0a = 100b + a     __________(3)

According to given condition, we have

100b+a = 100a + b + 495

\(\Rightarrow\) 99b - 99a = 495

\(\Rightarrow\) b - a = \(\frac{495}{99}\) = 5

\(\Rightarrow\) b - a = 5       __________(4)

Adding equation (2) & (4), we get

(a+b) + (b - a) = 11+5

\(\Rightarrow\) 2b = 16

\(\Rightarrow\) b = \(\frac{16}2\) = 8

\(\therefore\) a = 11 - b

= 11 - 8 = 3             (From (2))

Hence, the required number is 100a+b = 300+8 = 308.    (From (1))

Correct option is C) 308

21444.

A three digit number abc is 459 more than the sum of its digits. What is the sum of the 2 digit number ab and the 1 digit number a ? A) 51 B) 61 C) 71 D) 81

Answer»

Correct option is A) 51

21445.

A and B each has some money. If A gives Rs 30 to B, then B will have twice the money left with A . But, if B gives Rs 10 to A, then a will have thrice as much as is left with B. How much money does each have?

Answer»

Let the amount of money which A has be ’a’ and which B has be ‘b’.

Given,

If A gives Rs 30 to B, then B will have twice the money left with A.

⇒ b + 30 = 2(a – 30)

⇒ b + 30 = 2a – 60

⇒ b = 2a - 60 - 30

⇒ b = 2a – 90 --------- (1)

But, if B gives Rs 10 to A, then A will have thrice as much as is left with B

a + 10 = 3(b - 10)a+10 = 3b - 30a = 3b - 30 - 10

⇒ a = 3b - 40 --------- (2)

Substituting ‘a’ from eq2 in eq1b

= 2(3b - 40) – 90

⇒ b = 6b - 80 – 90

⇒ b - 6b = - 80 – 90

⇒ - 5b = -170

⇒ b = -170/- 5

⇒ b = Rs. 34

Substitute value of b in eq. 2,

a = 3(34) - 40

Thus,

a = 102 – 40 = Rs. 62

Hence, A has Rs 62 and B has Rs 34.

21446.

The woodcutter’s axe was made of —————goldiron (TM)silver

Answer»

Correct option is 2. iron (TM)

21447.

Why was the River Goddess pleased?

Answer»

The River Goddess was pleased to see the honesty of the woodcutter.

21448.

There are two examination rooms A and B. If 10 candidates are sent from A to B, the number of students in each room is same. If 20 candidates are sent from B to A, the number of students in A is double the number of students in B. Find the number of students in each room.

Answer»

Let the number of candidates in rooms A and B be ‘a’ and ‘b’ respectively.

Given,

If 10 candidates are sent from A to B, the number of students in each room is same.

⇒ a – 10 = b + 10

⇒ a – b = 20 ----- (1)

Also,

If 20 candidates are sent from B to A, the number of students in A is double the number of students in B.

⇒ a + 20 = 2(b – 20)

⇒ a – 2b = - 60 ------- (2)

Subtracting equation 2 from equation 1

⇒ a – b – a + 2b = 20 + 60

⇒ b = 80

Thus, a = 80 + 20 = 100

21449.

An examination consists of 100 questions. Two marks are awarded for every correct option. If one mark is deducted for every wrong option and half mark is deducted for every question left. Then a person scores 135. Instead, if half mark is deducted for every wrong option and one mark is deducted for every question left, then the person scores 133. Find the number of questions left unattempted by the person. A) 13 B) 14 C) 19 D) 15

Answer»

Correct option is B) 14

21450.

What does an engineer do?

Answer»

An engineer is trained to fix or repair anything.