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Answer» जब पर्यावरण के प्रभावों का अध्ययन किया जाता है, तब सर्वप्रथम प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण के प्रभावों को ही अध्ययन किया जाता है। वास्तव में पर्यावरण का यही रूप प्रकृति प्रदत्त है तथा मनुष्य के नियन्त्रण से बाहर है। भौगोलिक पर्यावरण के अर्थ को डॉ० डेविस ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “मनुष्य के सन्दर्भ में भौगोलिक पर्यावरण से अभिप्राय भूमि या मानव के चारों ओर फैले उन सभी भौतिक स्वरूपों से है जिनमें वह रहता है, जिनका उसकी आदतों एवं क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है। इस कथन से स्पष्ट है कि प्राकृतिक पर्यावरण के समस्त कारक मनुष्य के नियन्त्रण से मुक्त हैं। पर्यावरण के जनजीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पर्यावरण जनजीवन के सभी पक्षों को गम्भीर रूप से प्रभावित करता है। पर्यावरण के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को सामान्य रूप से दो वर्गों में बाँटा जाता है। प्रथम वर्ग में जनजीवन पर पर्यावरण के प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है तथा द्वितीय वर्ग में जनजीवन पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है। पर्यावरण के जनजीवन पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है| (1) पर्यावरण का जनसंख्या पर प्रभाव: किसी भी क्षेत्र की जनसंख्या के स्वरूप के निर्धारण में वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण की सर्वाधिक भूमिका होती है। अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण होने पर सम्बन्धित क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है तथा प्रतिकूल प्राकृतिक पर्यावरण होने की स्थिति में सम्बन्धित क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व कम होता है। यही कारण है कि उपजाऊ भूमि वाले मैदानी क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है, जबकि रेगिस्तानी क्षेत्रों, बंजर भूमि वाले क्षेत्रों तथा दुर्गम पहाड़ी-क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व कम होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करता है। (2) पर्यावरण का खान-पान पर प्रभाव: मनुष्य को अपनी खाद्य-सामग्री अपने पर्यावरण से ही प्राप्त होती है। इस स्थिति में जिस क्षेत्र में जो खाद्य-सामग्री बहुतायत में उपलब्ध होती है, वही उस क्षेत्र के निवासियों का मुख्य आहार होती है। उदाहरण के लिए–उपजाऊ मैदानी क्षेत्रों में लोगों का , मुख्य आहार वहाँ उगने वाले अनाज तथा सब्जियाँ एवं दालें आदि ही होते हैं। इससे भिन्न समुद्रतटीय क्षेत्रों में लोग अपने आहार में मछली एवं जलीय जीवों के मांस को अधिक स्थान देते हैं। इसी प्रकार ठण्डे एवं अति ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश व्यक्ति मांसाहारी होते हैं, जबकि गर्म क्षेत्रों के अधिकांश निवासी शाकाहारी होते हैं। (3) पर्यावरण का वेशभूषा पर प्रभाव: प्राकृतिक पर्यावरण को वहाँ के निवासियों की वेशभूषा पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति बारीक, ढीले तथा सूती वस्त्र धारण करते हैं। इससे भिन्न ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति गर्म एवं चुस्त वस्त्र धारण किया करते हैं। अनेक ठण्डे प्रदेशों में जानवरों की खाले से भी कोट इत्यादि बनाकर पहने जाते हैं। (4) पर्यावरण का आवासीय स्वरूप पर प्रभाव: प्राकृतिक पर्यावरण मनुष्य के निवास हेतु प्रयुक्त मकानों तथा इनकी सामग्री को भी प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए—पर्वतीय पर्यावरण में पत्थर तथा लकड़ी सरलता से उपलब्ध होती है। अत: इन क्षेत्रों में मकान बनाने के लिए पत्थर तथा लकड़ी को ही अधिक इस्तेमाल किया जाता है। जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वहाँ मकानों की छतें ढलावदार बनाई जाती हैं। मैदानी क्षेत्रों में प्रायः ईंट, सीमेण्ट, लोहे आदि से मकान बनाए जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में, प्रायः भूकम्प आते रहते हैं। इन क्षेत्रों को अधिक क्षति से बचाने के दृष्टिकोण से लकड़ी के मकान ही बनाए जाते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण जन-सामान्य के आवासीय स्वरूप को भी प्रभावित करता है। (5) पर्यावरण का आवागमन के साधनों पर प्रभाव: प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का आवागमन के साधनों के विकास पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। समुद्र तथा नदियों के निकटवर्ती क्षेत्रों में स्टीमर एवं नौकाएँ आवागमन का साधन होती हैं। मैदानी क्षेत्रों में सड़कें बनाना तथा रेल की पटरियाँ बिछाना सरल होता है। अतः इन क्षेत्रों में रेलगाड़ियाँ, मोटर कारें, बसें आदि वाहन अधिक होते हैं। ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में खच्चर ही आवागमन एवं माल ढोने के साधन माने जाते हैं। (6) पर्यावरण का शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव: जन-सामान्य के शारीरिक लक्षणों पर भौगोलिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति की त्वचा के रंग पर जलवायु एवं स्थानीय तापमान का अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है। गर्म क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का रंग बहुधा काला तथा ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का रंग गोरा होता है। भूमध्यरेखीय जलवायु में रहने वाले व्यक्ति वहाँ की अतिरिक्त उष्णता के कारण नाटे कद के और काले रंग के होते हैं, जबकि भूमध्यसागरीय जलवायु के निवासी प्रायः गोरे तथा लम्बे कद के होते हैं। (7) पर्यावरण का व्यावसायिक जीवन पर प्रभाव: प्राकृतिक पर्यावरण सम्बन्धित क्षेत्र के निवासियों के मूल व्यवसायों को भी प्रभावित करता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि समुद्र एवं जुल-स्रोतों के निकट रहने वाले लोगों का मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना होता है। नदियों से सिंचित मैदानी क्षेत्रों में कृषि-कार्य ही मुख्य व्यवसाय होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में भेड़-बकरियाँ पालना एक मूले व्यवसाय माना जाता है, जब कि अधिक वन वाले क्षेत्रों में लकड़ी काटना मूल व्यवसाय माना जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण अनिवार्य रूप से व्यावसायिक जीवन को भी प्रभावित करता है।
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