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अतिसार नामक रोग के कारणों, लक्षणों एवं बचने के उपायों का वर्णन कीजिए।याअतिसार रोग के लक्षण लिखिए। अतिसार के रोगी को किस प्रकार को आहार देना चाहिए?याअतिसार और पेचिश में क्या अन्तर है? अतिसार के कारण, लक्षण और उपचार लिखिए।यापेचिश एवं अतिसार में क्या अन्तर है?

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अतिसार (डायरिया)

कारण-अतिसार जल द्वारा फैलने वाला एक रोग है। इस रोग की उत्पत्ति प्राय: इश्चेरिचिया कोलाई नामक जीवाणु द्वारा होती है। यह रोग प्रायः बच्चों में अधिक पाया जाता है। इस रोग के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

⦁    वर्षा-ऋतु में इस रोग के जीवाणु जल में अधिक पाए जाते हैं।
⦁    मक्खियों द्वारा इसके जीवाणु दूध में आ जाते हैं जिनके द्वारा यह बच्चों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
⦁    बार-बार वे आवश्यकता से अधिक भोजन करने से, अपच हो जाने के कारण यह रोग हो सकता है।
⦁    समय-असमय भोजन करने से भी यह रोग हो सकता है।

लक्षण:

इस रोग के निम्नलिखित लक्षण हैं
⦁    पतले व हरे रंग के दस्त आते हैं।
⦁    दस्त अधिक आने पर कभी-कभी दस्त के साथ रक्त भी आता है।
⦁    रोगी को हल्का-सा ज्वर भी रहता है।
⦁    दस्तों की संख्या एक दिन में 25-30 तक हो सकती है, जिससे रोगी अत्यधिक दुर्बल हो जाता है।
 
बचाव के उपाय:
यह एक भयानक रोग है जिसमें उचित चिकित्सा न होने पर लगभग 1-6 वर्ष की आयु तक के बच्चों के मरने का भय बना रहता है; अत: निम्नलिखित उपायों का पालन किया जाना अति आवश्यक है
⦁    रोगी को पूर्ण विश्राम करने देना चाहिए।
⦁     योग्य चिकित्सक से तुरन्त परामर्श करना चाहिए।
⦁    रोगी को उबालकर ठण्डा किया जल पीने के लिए देना चाहिए।
⦁    बोतल से दूध पीने वाले बच्चों की बोतल को समय-समय पर अच्छी तरह से स्वच्छ करना चाहिए।
⦁    रोगी बच्चे को व अन्य स्वस्थ बच्चों को सदैव उबालकर ताज़ा दूध देना चाहिए।
⦁    भोज्य पदार्थों को मक्खियों से बचाने के लिए ढककर रखना चाहिए।
⦁    रोगी बच्चे को खाने में चूने का पानी, मट्ठा तथा अन्य सुपाच्य व हल्के भोज्य पदार्थ  देने चाहिए। फलों में केला खाने के लिए देना इस रोग में लाभप्रद रहता है।
⦁    अतिसार के रोगी को निर्जलीकरण से बचाने के समस्त उपाय करने चाहिए।

अतिसार और पेचिश में अन्तर
प्रायः अतिसार में पेट में पीड़ा होने के लक्षण नहीं पाए जाते। केवल दस्त ही होते हैं। अतिसार पर नियन्त्रण नहीं किया जाता है, तो इसके बाद पेचिश के लक्षण भी दो-एक दिनों में दिखाई देने लगते हैं, अर्थात् दस्तों के साथ पेट में तेज ऐंठन, दस्त के साथ श्लेष्मा (आँव) व रक्त, भी आने लगता है। रोगी को ज्वर भी हो सकता है।



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