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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

सामाजिक परिवर्तन से आप क्या समझते हो?

Answer»

सामाजिक परिवर्तन का अर्थ सामाजिक संगठन, समाज की विभिन्न इकाइयों, सामाजिक संबंधों संस्थाओं इत्यादि में होने वाला परिवर्तन है। संगठन का निर्माण संरचना तथा कार्य दोनों से मिलकर होता है। सामाजिक प्रक्रियाओं तथा सामाजिक अंत:क्रियाओं में होने वाले परिवर्तनों को भी सामाजिक परिवर्तन ही कहा जाता है। गिलिन एवं गिलिन के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन जीवन के स्वीकृत प्रकारों में परिवर्तन है। भले ही ये परिवर्तन भौगोलिक दशाओं से हुए हों, या सांस्कृतिक साधनों पर जनसंख्या की रचना तथा सिद्धांतों के परिवर्तन से हुए हों, या प्रसार से अथवा समूह के अंदर ही आविष्कार से हुए हों।”

2.

In which stage of the conflict process does conflict become visible? (a) Illumination (b) Intentions (c) Behaviour (d) Cognition

Answer»

Correct option is (c) Behaviour

3.

One of the advantages of conflict is that it forces you to examine problems and work towards a potential __________.(a) Solution (b) Outcome (c) Experience (d) Relationship

Answer»

Correct option is (a) Solution

4.

Felt conflict is : (a) When people perceive that conflictful conditions exist (b) When conflict promoting conditions appear (c) When people feel there is conflict (d) None of the above

Answer»

Correct option is (c) When people feel there is conflict

5.

संरचनात्मक परिवर्तन से आप क्या समझते हैं? पुस्तक से अलग उदाहरणों द्वारा स्पष्ट कीजिए।

Answer»

संरचनात्मक परिवर्तन से अंभिप्राय सामाजिक संरचना में होने वाला परिवर्तन है। सामाजिक संरचना से अभिप्राय किसी इकाई के अंगों की क्रमबद्धता से है। समाज में व्यक्ति आपसी संबंधों में बँधकर उपसमूहों का निर्माण करते हैं तथा विभिन्न उपसमूह आपस में बँधकर समूहों का निर्माण करते। हैं। संरचनात्मक परिवर्तन समाज की संरचना, इसकी संस्थाओं अथवा नियमों, जिनसे संरचना अपना स्थायित्व बनाए रखती है, में होने वाले परिवर्तन को दर्शाता है। मूल्यों एवं मान्यताओं में परिवर्तन भी सामाजिक परिवर्तन ला सकते हैं। इनको हम संरचनातमक परिवर्तन नहीं कहते हैं। यदि मूल्यों एवं मान्यताओं में होने वाले परिवर्तन सामाजिक संरचना को परविर्तित कर दें तो इन्हें भी संरचनात्मक परिवर्तन कहा जा सकता है। भारत में जाति व्यवस्था, संयुक्त परिवार, हिंदू विवाह इत्यादि में होने वाले परिवर्तनों से संपूर्ण भारतीय सामाजिक संरचना परिवर्तित हुई है क्योंकि इनसे जुड़े मूल्यों एवं मान्यताओं के बदलते ही परंपरागत सामाजिक संरचना का स्वरूप भी परिवर्तित हो गया है।

इसी प्रकार, औद्योगीकरण, नगरीकरण, पश्चिमीकरण, आधुनिकीकरण, लौकिकीकरण जैसी प्रक्रियाओं की परंपरागत भारतीय सामाजिक संरचना के स्वरूप को बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इन प्रक्रियाओं ने भारतीय सामाजिक संरचना के लगभग सभी परंपरागत लक्षणों को परिवर्तित किया है। उदाहरणार्थ-जातीय श्रेणियों में पाए जाने वाले संस्तरण पर आधारित परंपरागत सामाजिक संरचना जातीय निषेधों में होने वाले परिवर्तनों के परिणामस्वरूप परिवर्तित हो गई हैं।

जिंसंबैर्ग (Ginsberg) के अनुसार, “सामाजिक संरचना सामाजिक संगठन के प्रमुख स्वरूपों, अर्थात् समितियों, समूह तथा संस्थाओं के प्रकार एवं इनकी संपूर्ण जटिलता जिनसे कि समाज का निर्माण होता है, से संबंधित है।”

6.

क्या आप इस बात से सहमत हैं कि तीव्र सामाजिक परिवर्तन मनुष्य के इतिहास में तुलनात्मक रूप से नवीन घटना है? 

Answer»

भारत जैसे परंपरागत समाज में भी सामाजिक परिवर्तन तुलनात्मक रूप से एक नवीन घटना है। अधिकांश सामाजिक परिवर्तनों का स्रोत अंग्रेजी शासनकाल को माना जाता है। इसी काल में परंपरागत भारतीय समाज के सभी प्रमुख पहलुओं, विशेष रूप से गाँव, जाति तथा संयुक्त परिवार, में दूरगामी एवं तीव्र परिवर्तन प्रारंभ हुए। नगरीकरण, औद्योगीकरण, पश्चिमीकरण, आधुनिकीकरण, लौकिकीकरण, जैसी प्रक्रियाएँ भारत में तीव्र सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी रही हैं। प्रजातंत्रीकरण एवं राजनीतिकरण ने भी समाज में हो रहे परिवर्तनों को तीव्र गति प्रदान करने में सहायता दी है।
सामाजिक परिवर्तन उन परिवर्तनों को इंगित करता है जो महत्त्वपूर्ण है अर्थात् जो किसी वस्तु अथवा परिस्थिति की मूलाधार संरचना को समयावधि में बदल दें। परिवर्तन का ‘बड़ा होना इस बात से नहीं मापा जाता है कि वह कितना परिवर्तन लाता है, अपितु यह परिवर्तन के पैमाने में मापा जाता है अर्थात् परिवर्तन समाज के कितने बड़े भाग को परिवर्तित करता है। यदि वह समाज के अधिकांश भाग को प्रभावित करता है तो उसे हम तीव्र सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

यह सही है कि तीव्र सामाजिक परिवर्तन मनुष्य के इतिहास में तुलनात्मक रूप से नवीन घटना भी है। समाजशास्त्र का उद्भव ही इस तीव्र सामाजिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप समाज में होने वाले बदलाव को समझने के प्रयास से हुआ है। तीन ऐसी प्रमुख घटनाएँ मानी जाती हैं जो तीव्र सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी हैं-“औद्योगिक क्रांति, फ्रांसीसी क्रांति तथा ज्ञानोदय। इन घटनाओं ने न केवल पूरे यूरोप के सामजों को हिलाकर रख दिया अपितु गैर-यूरोपीय समाजों पर भी इनका दूरगामी प्रभाव पंड़ा। चूंकि इन घटनाओं का संबंध पिछली दो-तीन शताब्दियों से ही है, इसलिए सामाजिक परिवर्तन को नवीन घटना माना जाता है। इससे पहले समाज में इतने व्यापक स्तपर पर कभी भी परिवर्तन नहीं हुए थे।

7.

Give an account of inter-state disparities of poverty in India.OrExplain briefly inter-state disparities of poverty in India.

Answer»

(i) Interstate disparities of poverty can be noticed in India. It means the proportion of poor people is not the same in every state. Recent estimates show that in 20 states and union territories, the poverty ratio is less than the national average.

(ii) On the other hand, poverty is still a serious problem in states like Orissa, Bihar, Assam, Tripura and Uttar Pradesh.

(iii) In comparison, there has been a significant decline in poverty in Kerala, Jammu and Kashmir, Andhra Pradesh, Tamil Nadu, Gujarat and West Bengal.

8.

सामाजिक परिवर्तन को अन्य परिवर्तनों से किस प्रकार अलग किया जा सकता है?

Answer»

‘सामाजिक परिवर्तन’ समाजशास्त्र की एक विशिष्ट संकल्पना है। इस नाते समाजशास्त्र में इसका उपयोग भी विशिष्ट अर्थों में किया जाता है। गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन जीवन के स्वीकृत प्रकारों में परिवर्तन है। भले ही ये परिवर्तन भौगोलिक दशाओं से हुए हों, या सांस्कृतिक साधनों पर जनसंख्या की रचना अथवा सिद्धांतों के परिवर्तन से हुए हों, या प्रसार से या समूह के अंदर ही आविष्कार से हुए हों।” वस्तुत: सामाजिक परिवर्तन समाज के विभिन्न पक्षों में होने वाला परिवर्तन है जिससे सामाजिक संबंध और सामाजिक संस्थाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

‘सामाजिक परिवर्तन’ एक सामान्य संकल्पना है जिसका प्रयोग किसी भी ऐसे परिवर्तन के लिए किया जा सकता है जो अन्य संकल्पना द्वारा परिभाषित नहीं किया जा सकता। इस दृष्टि से सामाजिक परिवर्तन अन्य परिवर्तनों से भिन्न है। उदाहरणार्थ-यह आर्थिक तथा राजनीतिक परिवर्तन से भिन्न है। इसी भाँति, यह भौगोलिक या संस्कृति में होने वाले परिवर्तन से भिन्न है। समाजशास्त्रियों को इसके व्यापक अर्थ को विशिष्ट बनाने के लिए काफी परिश्रम करना पड़ा है।

अन्य परिवर्तनों से भिन्न होने के बावजूद एक विस्तृत संकल्पना होने के नाते सामाजिक परिवर्तन को उनसे अलग कर पाना कठिन है। इतना ही नहीं, अनेक राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं भौगोलिक कारण सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी हैं। उदाहरणार्थ-श्रम-विभाजन का विकास एक आर्थिक परिवर्तन है परंतु इसका अध्ययन समाजशास्त्र में भी इसलिए किया जाता है क्योंकि इसके समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ते हैं। मतदान व्यवहार राजनीतिक व्यवहार है परंतु समाजशास्त्र में इसका अध्ययन इसलिए किया जाता है क्योंकि यह व्यवहार अनेक सामाजिक कारकों से प्रभावित होता है।

9.

Which of the following is conflict resolution skill? (a) Accomodating (b) Passive listening (c) Active listening (d) Avoiding

Answer»

Correct option is (c) Active listening

10.

The first stage of conflict resolution is to (a) Chose a solution (b) Define the problem (c) Think through possible solutions (d) Analyse the problem

Answer»

Correct option is (b) Define the problem

11.

Which of the following is not a leadership style as proposed by Iowa and Michigan studies? (a) Bureaucratic (b) Democratic (c) Autocratic (d) Laissez faire.

Answer»

Correct option is (a) Bureaucratic

12.

Why is autocratic leadership considered negetive? (a) people are uninformed,insecued and afraid of the leader (b) leader is extra friendly (c) too much confusion arises (d) very participative

Answer»

Correct option is (a) people are uninformed,insecued and afraid of the leader

13.

सामाजिक व्यवस्था का क्या अर्थ है तथा इसे कैसे बनाए रखा जा सकता है?

Answer»

सामाजिक व्यवस्था को परस्पर अंत:क्रियारत व्यक्तियों अथवा समूहों का कुलक (Set) कहा जा सकता है। यह एक ऐसा कुलक है जिसे सामाजिक इकाई के रूप में देखा जाता है एवं जिसका व्यक्तियों (जो इस कुलक का निर्माण करते हैं) से भिन्न अपना पृथक् अस्तित्व है। स्मेलसर (Smelser) के अनुसार, “सामाजिक व्यवस्था से अभिप्राय संरचनात्मक तत्त्वों से प्रतिमानित संबंधों का एक ऐसा कुलक है जिनमें एक तत्त्व में परिवर्तन इन्य इकाइयों पर अनुकूलन के लिए दबाव डालने अथवा इन्हें भी परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। सामाजिक व्यवस्था समाज में स्थायित्व बनाए। रखने का कार्य करती है। स्थायित्व के लिए यह आवश्यक है कि समाज के विभिन्न अंग कमोबेश वैसे ही बने रहें जैसे वे हैं अर्थात् व्यक्ति लगातार समान नियमों का पालन करता रहे, समान क्रियाएँ एक ही प्रकार के परिणाम दें तथा साधारणतः व्यक्ति तथा संस्थाएँ पूर्वानुमानित’ रूप में आचरण करें। सामाजिक व्यवस्था के सहज संकेंद्रण का स्रोत मूल्यों एवं मानदंडों की साझेदारी से निर्धारित होता है। इन मूल्यों एवं मानदंडों को समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा आने वाली पीढ़ी को हस्तांरित किया जाता है। इसी प्रक्रिया द्वारा सामाजिक व्यवस्था अपनी निरंतरता सुनिश्चित करती है।

सामाजिक व्यवस्था द्वारा सामाजिक परिवर्तन का भी विरोध इसलिए किया जाता है ताकि व्यवस्था में विघटन की परिस्थिति विकसित न हो पाए। इसलिए व्यवस्था की सुस्थापित सामाजिक प्रणालियाँ परिवर्तन का प्रतिरोध कती हैं तथा उसे विनियमित करने का प्रयास करती हैं। सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में सामाजिक संरचना एवं स्तरीकरण की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। समाज के शासक प्रभावशाली वर्ग अधिकतर उन सभी सामाजिक परिवर्तनों का प्रतिरोध करते हैं जो उनकी स्थिति को बदल सकते हैं। वे स्थायित्व में अपना हित समझते हैं। दूसरी ओर, अधीनस्थ अथवा शोषित वर्गों को हित परिवर्तन में होता है। सामान्य स्थितियाँ अधिकांशत: अमीर तथा शक्तिशाली वर्गों की तरफदारी करती है तथा वे परिवर्तन के प्रतिरोध में सफल होती हैं। इससे भी समाज में स्थिरता बनी रहती है।

सामाजिक व्यवस्था की सुस्थापित सामाजिक प्रणालियों का स्थायित्व बनाए रखने की दृष्टि से सदैव यह प्रयास रहता है कि व्यक्ति समाज के नियमों तथा मानदंडों का स्वतः पालन करें। यदि ऐसा संभव न हो तो सामाजिक व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि व्यक्तियों को इन्हें मानने के लिए बाध्य भी किया जा सके। इस प्रकार, सामाजिक व्यवस्था अपना अस्तित्व बनाए रखने हेतु अनेक प्रकार के साधनों का प्रयोग करती है।

14.

Which style of leadership focuses on team building, conflict resolution, and morale? (a) surrogate leadership (b) social leadership (c) transparent leadership (d) task leadership

Answer»

Correct option is (b) social leadership

15.

सत्ता क्या है तथा यह प्रभुता एवं कानून से कैसे संबंधित है?

Answer»

सत्ता का अर्थ वैध शक्ति से है। इसलिए वैधता को समाजशास्त्र की प्रमुख संकल्पना मानी जाता है। वैधता ही शक्ति संतुलन में अंतर्निहित होती है। समाज में ऐसी चीजें जो वैध हैं, वे उचित, सही तथा ठीक मानी जाती हैं। ‘वैधता’ अधिकार, संपत्ति तथा न्याय के प्रचलित मानदंडों की अनुरूपता में निहित है। यदि व्यक्ति के शक्ति प्रयोग करने के अधिकार के पीछे वैधता है तो इसे शक्ति न कहकर ‘सत्ता’ कहते हैं। मैक्स वेबर ने सत्ता को कानूनी शक्ति के रूप में परिभाषित किया है। उदाहरणार्थ-एक पुलिस अधिकारी, एक जज अथवा एक स्कूल शिक्षक आदि सभी व्यक्ति अपने कार्य में निहित सत्ता का प्रयोग करते हैं। कचहरी में जज की आज्ञा का पालन उनके पद में निहित सत्ता के कारण करना पड़ता है। कचहरी से बाहर जज किसी भी अन्य नागरिक की भाँति है। वेबर ने काननी सत्ता के अतिरिक्त परंपरागत एवं चमत्कारिक सत्ता का भी उल्लेख किया है। इसका अर्थ यह है कि शक्ति को वैधता प्रदान करने में कानून के साथ-साथ परंपराओं एवं चमत्कारों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

सत्ता एवं कानून में गहरा संबंध पाया जाता है। सत्ता को स्थायित्व बनाने में कानून की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कानून से डर से ही व्यक्ति सत्ता का अनुपालन करते हैं। यदि सत्ता से कानूनी वैधता वापस ले ली जाए तो वह सत्ता नहीं रहती तथा हो सकता है प्रभुत्व का रूप ग्रहण कर ले। प्रभुत्व में कानून की भूमिका नहीं होती अपितु इसमें ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का नियम लागू होता है। प्रभुता या प्रभुत्व के साथ कानूनी शक्ति अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई नहीं होती है। प्रभुत्व अवैध शक्ति के रूप में भी हो सकता है। उदाहरणार्थ-कालोनी में किसी गुंडे का प्रभुत्व कालोनी वालों को बहुत-सी ऐसी बातें मानने के लिए विवश कर देता है जिसे वे अन्यथा स्वीकार न करें। उस गुंडे के प्रभुत्व का कारण कानूनी सत्ता न होकर उसकी अपनी गुंडागुर्दी (मसस्ल पॉवर) है। कालोनी वाले जानते हैं कि यदि उसकी बात न मानी जाए तो वह लड़ाई-झगड़ा कर सकता है अथवा तोड़-फोड़ पर उतारू हो सकता है।

16.

ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक व्यवस्था की कुछ विशेषताएँ क्या हैं?

Answer»

ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक व्यवस्था की अपनी कुछ विशेषताएँ होती हैं। इन विशेषताओं को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-

1. प्राथमिक समूहों को महत्त्व – ग्रामीण क्षेत्र में परिवार का महत्त्व अधिक होता है। पारिवारिकता ग्रामीण क्षेत्र की एक प्रमुख विशेषता है। सामाजिक नियंत्रण का एकमात्र साधन परिवार ही है। परिवार के मुखिया का नियंत्रण सभी पर होता है। परिवार की परंपराओं का ध्यान रखकर प्रत्येक कार्य किया जाता है। व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़कर पारिवारिक हितों का ध्यान रखा जाता है।
2. कम जनसंख्या – ग्रामीण क्षेत्र में केवल कुछ सीमित परिवारों के ही सदस्य निवास करते हैं। और कृषि ही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है। अन्य कोई उद्योग-धंधे न होने के कारण बाहर का कोई व्यक्ति वहाँ जाकर कम ही निवास करता है। अतएव ग्रामीण क्षेत्र में जनसंख्या कम होती है।
3. कृषि व्यवसाय – ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती करनी है अतः गाँव के लोग प्रकृति के पुजारी हैं और अपना गाँव छोड़कर दूसरे स्थानों पर जाना पसंद नहीं करते हैं अतएव
ग्रामीण क्षेत्र में प्रकृति पूजा पाई जाती है और गतिशीलता का प्रायः अभाव पाया जाता है।
4. प्रकृति से निकटता – ग्रामीण क्षेत्र के व्यक्ति प्रात:काल से संध्या तक अपने खेतों में काम करते हैं। इसलिए उनकी प्रकृति से निकटता बनी रहती है। प्रकृति से प्रत्यक्ष संबंध ग्रामीण क्षेत्र की एक प्रमुख विशेषता है। ग्रामवासी कृषि के लिए भी प्रकृति पर ही आश्रित होते हैं।
5. समान संस्कृति – ग्रामीण क्षेत्र के व्यक्ति एक-दूसरे को जानते हैं। उन सबका रहन-सहन, खान-पान, उठने-बैठने आदि का तरीका लगभग एक-सा ही होता है। वहाँ सभी रीति-रिवाजों, प्रथाओं आदि को एक ही तरीके से मनाया जाता है। इसलिए कहा जाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में समान संस्कृति के लोग रहते हैं।
6. जाति व्यवस्था की प्रधानता – ग्रामीण क्षेत्र पर बाह्य संस्कृति का प्रभाव नहीं पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्र में गतिशीलता भी कम पायी जाती है, अतएव जाति की सभी विशेषताएँ ग्रामीण क्षेत्रों में पायी जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों को संगठन जाति पर निर्भर है। जाति पंचायतों का ही वहाँ पर महत्त्व है।
7. प्राचीन विश्वासों की मान्यता – ग्रामीण क्षेत्र में भारत की प्राचीनतम संस्कृति के दर्शन हाते हैं। जाँद-टोना, जंतर-मंतर, भूत-प्रेत, पूजा आदि को प्रचलने आज भी ग्रामीण क्षेत्र में देखने को मिलता है। ग्रामीण क्षेत्र में शारीरिक रोगों को भी भगवा की इच्छा समझा जाता है और इसलिए बहुत काल तक उनका इलाज नहीं किया जाता है। यह विश्वास किया जाता है कि रोग हमारे पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का प्रतिफल है।
8. संयुक्त परिवार की व्यवस्था – ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि का भी महत्त्व है। कृषि एक ऐसा कार्य है। जिसमें अधिक-से-अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती है, अतएव ग्रामीण क्षेत्र में संयुक्त परिवार व्यवस्था पाई जाती है। ग्रामीण क्षेत्र में आत्मीयता पायी जाती है। इसलिए भी ग्रामीण क्षेत्रों में संयुक्त परिवार व्यवस्था पायी जाती है। संयुक्त परिवारों में हो रहे विघटन का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्र में कृषि व्यवसाय के कारण ही बहुत कम है।
9. विवाह की पवित्रता – ग्रामीण क्षेत्र में विवाह को एक धार्मिक संस्कार माना जाता है और पति-पत्नी के संबंधों को पूर्वजन्म का संस्कार माना जाता है। इसलिए एकविवाही परिवारों को महत्त्व दिया जाता है। और स्त्री अपने पति को देवता मानती है। ग्रामीण क्षेत्रों में विवाह-विच्छेद नहीं होते अथवा बहुत ही कम होते हैं।
10. कर्मवाद तथा भाग्यवाद में विश्वास – ग्रामीण क्षेत्रों के व्यक्तियों का दृढ़ विश्वास रहता है कि | जैसे कर्म हम करेंगे वैसे ही हमको फल मिलेंगे और हमारे भाग्य में विद्याता ने जो लिख दिया है वह अवश्य ही होगा। इसलिए वे बहुत-सी बातों को भाग्य पर छोड़ देते हैं। कर्मवाद एवं भौग्यवाद में विश्वास के कारण ग्रामवासी अधिक रूढ़िवादी होते हैं।
11. सरल जीवन – ग्रामीण क्षेत्र के व्यक्तियों के जीवन में बनावट नहीं होती, उनका अंदर व बाहर से व्यवहार समान ही होता है। साधारणतया सरल एवं निष्कपट जीवन उनकी मुख्य विशेषता है।
गाँवों में नगरों की अपेक्षा परस्पर प्रेम और सहयोग की भावना अधिक देखने को मिलती है।
12. जजमानी प्रथा – ग्रामीण क्षेत्र में भूमिपति कृषक या जमींदार खेती करते हैं और भूमिहीन लोग उन जमींदारों की कृषि कार्य में सहायता करते हैं जिसके बदले भूमिपति उनको समय-समय पर अनाज तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करता है। उनके बच्चों के विवाह आदि के उत्सवों पर भी जजमान अपने परिजनों की सहायता करता है। वह कृषक ‘जजमान’ कहलाता है और अन्य उसके सहायक लौहार, बढ़ई, दर्जी, धोबी, नाई आदि ‘परिजन’ कहलाते हैं। इस व्यवस्था को जजमानी प्रथा कहते हैं।
13. अनौपचारिक संबंध – ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक समूहों का विशेष महत्व है। परिवार प्राथमिक समूह का रूप है। परिवार के सदस्यों में रक्त के संबंध पाए जाते हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति | को प्रत्यक्ष रूप से जानता है अतएव उनके संबंधों में अनौपचारिकता पायी जाती है।

17.

गाँव, कस्बा तथा नगर एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं?

Answer»

गाँव का अर्थ परिवारों का वह समूह कहा जा सकता है जो एक निश्चित क्षेत्र में स्थापित होता है तथा जिसका एक विशिष्ट नाम होता है। गाँव की एक निश्चित सीमा होती है तथा गाँववासी इस सीमा के प्रति सचेत होते हैं। उन्हें यह पूरी तरह से पता होता है कि उनके गाँव की सीमा ही उसे दूसरे गाँवो से पृथक् करती है। इसी सीमा में उस गाँव के व्यक्ति निवास करते हैं, कृषि तथा इससे संबंधित व्यवसाय करते हैं तथा अन्य कार्यों का संपादन करते हैं। सिम्स (Sims) के अनुसार, “गाँव वह नाम है, जो कि प्राचीन कृषकों की स्थापना को साधारणतः दर्शाता है।”

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से गाँवों का उद्भव सामाज़िक संरचना में आए उन महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों से हुआ जहाँ खानाबदोशी जीवन की पद्धति, जो शिकार, भोजन संकलन तथा अस्थायी कृषि पर आधारित थी, का संक्रमण स्थायी जीवन में हुआ। आर्थिक तथा प्रशासनिक शब्दों में गाँव तथा नगर बसावट के दो प्रमुख आधार जनसंख्या का घनत्व तथा कृषि-आधारित आर्थिक क्रियाओं का अनुपात हैं। गाँव में जनसंख्या का घनत्व कम होता है तथा अधिकांश जनसंख्या कृषि एवं इससे संबंधित व्यवसायों पर आधारित होती है।

नगर से अभिप्राय एक ऐसी केंद्रीयकृत बस्तियों के समूह से है जिसमें सुव्यवस्थित केंद्रीय व्यापार क्षेत्र, प्रशासनिक इकाई, आवागमन के विकसित साधन तथा अन्य नगरीय सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं। नगर की परिभाषा देना भी एक कठिन कार्य है। अनेक विद्वानों ने नगर की परिभाषा जनसंख्या के आकार तथा घनत्व को सामने रखकर देने का प्रयास किया है। सोमबर्ट (Sombart) ने घनी जनसंख्या पर बल देते हुए कहा हुए इस संदर्भ में कहा है-“नगर वह स्थान है जो इतना बड़ा है कि उसके निवासी परस्पर एक-दूसरे को नहीं पहचानते हैं। निश्चित रूप से नगर का विस्तार गाँव की तुलना में अधिक बड़े क्षेत्र पर होता है।

किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) का कहना है कि सामाजिक दृष्टि से नगर परिस्थितियों की उपज होती है। उनके अनुसार नगर ऐसा समुदाय है जिसमें सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विषमता पायी जाती है। यह कृत्रिमता, व्यक्तिवादिता, प्रतियोगिता एवं घनी जनसंख्या के कारण नियंत्रण के औपचारिक साधनों द्वारा संगठित होता है।

कस्बे तथा नगर में अंतर प्रशासनिक परिभाषा का विषय है। एक कस्बा और नगर मुख्यत: एक ही प्रकार के व्यवस्थापन होते हैं जहाँ अंतर उनके आकार के आधार पर होता है। कस्बों का आकार नगरों की तुलना में अपेक्षाकृत कम होता है। जनसंख्या के आकार की दृष्टि से जब बड़े गाँवों के लोगों की प्रवृत्तियाँ नगरीकृत हो जाती हैं तो उन्हें गाँव न कहकर ‘कस्बा’ कहा जाता है। इस प्रकार, कस्बा मानवीय स्थापना का वह स्वरूप है जो अपने जीवनक्रम एवं क्रियाओं में ग्रामीणता और नगरीयता दोनों प्रकार के तत्त्वों को अंतर्निहित करता है। बर्गल (Bergal) के शब्दों में, “कस्बा एक ऐसी नगरीय बस्ती के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो पर्याप्त आयामों के ग्रामीण क्षेत्र पर आधपित्य रखता है।

18.

निम्नलिखित में से कौन-सा समुदाय है?(क) विश्व समुदाय(ख) क्लब(ग) गाँव(घ) कर्मचारी संघ

Answer»

सही विकल्प है (ग) गाँव

19.

कल्याणकारी राज्य के दो दोष लिखिए।

Answer»

⦁    यह सामाजिक सुरक्षा देकर कार्य कर सकने योग्य वृद्धों को निष्क्रिय बना देती है। तथा
⦁    इससे सरकार की शक्ति में अधिक वृद्धि हो जाती है।

20.

कल्याणकारी राज्य के दो उद्देश्य लिखिए।

Answer»

⦁    आर्थिक सुरक्षा तथा
⦁    न्याय की व्यवस्था।

21.

लोक-कल्याणकारी राज्य के दो लक्षण (विशेषताएँ) बताइए।

Answer»

⦁    यह व्यक्ति की आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था करता है तथा
⦁    यह समाज की सर्वव्यापी उन्नति का प्रयास करता है।

22.

क्या राजा राममोहन राय ने स्त्रियों की दशा में सुधार के लिए प्रयास किये ? 

Answer»

हाँ राजा राममोहन राय ने स्त्रियों की दशा में सुधार के लिए प्रयास किये ।

23.

संयुक्त परिवार में स्त्रियों की क्या दशा थी ?

Answer»

संयुक्त परिवार व्यवस्था स्त्रियों को सम्मान देने के पक्ष में नहीं थी।

24.

पाश्चात्य प्रभाव से स्त्रियों की स्थिति में क्या अन्तर आया ?

Answer»

पाश्चात्य प्रभाव से स्त्रियों की स्थिति में सुधार आया।

25.

ग्रामीण समाज में हो रहे परिवर्तनों की विवेचना कीजिए।याग्रामीण समाज के परिवर्तित प्रतिमानों की व्याख्या कीजिए।

Answer»

आज ग्रामीण समाज में अनेक प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों से ग्रामीण जीवन काफी परिवर्तित होता जा रहा है। यह परिवर्तन इतना अधिक हुआ है कि ग्रामीण समाज को नगरीय समुदाय से भिन्न करना कठिन हो गया है।

ग्रामीण समाज के परिवर्तित प्रतिमान
भारतीय ग्रामीण सम्गज में होने वाले परिवर्तनों को निम्नलिखित क्षेत्रों में स्पष्ट देखा जा सकता है –

1. धार्मिक जीवन में परिवर्तन – बाह्य जगत का धार्मिक जीवन पर सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह पड़ा है कि विस्तृत जगत के संपर्क में आकर गाँवों से धर्म और प्राचीन संस्कृति की रक्षा करने की भावनाओं का ह्रास होना प्रारंभ हो गया है। ग्रामीण लोग आज बच्चों के जन्म के अवसर, कर्मकांडों, मृत्यु-भोज आदि पर पहले की अपेक्षा कम व्यय करने लगे हैं। धीरे-धीरे धार्मिक कृत्यों पर उनका विश्वास उठता चला जा रहा है। परिणामस्वरूप ग्रामीण नैतिक मूल्यों को ह्रास होना प्रारंभ हो गया है। धर्म को ग्रामीण समाज में आजकल कम महत्त्व प्रदान किया जा रहा है। अधिकांश ग्रामीण लोग लौकिकीकरण (Secularization) से प्रभावित हो रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके दृष्टिकोण में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हो रहा है।
2. राजनीतिक संरचना में परिवर्तन – स्वतंत्रता के पश्चात् ग्रामीण लोगों ने इस क्षेत्र में विशेष रूप से प्रगति दिखाई है। ग्रामीण जनता ने राष्ट्र की राजनीति में सक्रिय भाग लेना प्रारंभ कर दिया है। अब ग्रामीण समुदाय केवल स्थानीय चुनावों तक ही सीमित नहीं रहता है, वरन् राज्य स्तर पर अपने प्रतिनिधि चुनने में रुचि लेता है। अब वह विचारों की स्वतंत्रता के दृष्टिकोण को समझ गया है। संचार के साधनों; जैसे—रेडियो, समाचार-पत्र इत्यादि ने ग्रामीण जगत के अंतर्गत राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने में कोई कमी नहीं रखी है। कुछ ग्रामीण लोग तो अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक गतिविधियों के संबंध में ज्ञान भी रखते हैं। राजनीतिक जागरूकता के साथ-साथ ग्रामीण समाज में राजनीतिक सहभागिता में भी वृद्धि हुई है, परंतु इतना सब-कुछ होते भी दुर्भाग्य की बात यह है कि गाँव आज दलबंदी के अखाड़े बन गए हैं, दलबंदी और दलबदलुओं को महत्त्व देने लगे हैं। फलस्वरूप कुछ ग्रामीण व्यवसायी राजनीतिज्ञ स्वयं तो राजनीति के शिकार होते ही हैं, साथ-ही-साथ अपने प्राचीन संगठन को भी खंडों में विभाजित कर बैठते हैं। वयस्क मताधिकार के कारण अब प्रभु-जातियों के परंपरागत प्रभुत्व को चुनौती दी जाने लगी है।
3. ग्रामीण आर्थिक संरचना में परिवर्तन – आज प्रत्येक किसान अपने परंपरागत कृषि-साधनों में परिवर्तन ले आया है। परंपरागत हल के स्थान पर ट्रैक्टर आ गए हैं। फलस्वरूप गाँवों में अन्न का उत्पादन बढ़ा है और अधिक आत्मनिर्भरता आ गई है। ग्रामीण समाज में अब वस्तुओं के विनिमय की प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। इसके साथ-ही-साथ जजमानी व्यवस्था भी समाप्त होती जा रही है। उसके स्थान पर पैसे से लेन-देन (Monetization) की भावनाएँ बढ़ रही हैं। छोटे-छोटे कुटीर उद्योग-धंधे अब फैक्ट्रियों की ओर बढ़ रहे हैं। भूमि संबंधी अधिनियमों ने कुछ परिवर्तन तो किया है, परंतु साथ-ही-साथ अधिकांश जनता में मुकदमों की प्रवृत्ति को बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप, ग्रामीण समुदाय अब अधिक मुकदमेबाज हो गया है, अतः निर्धनता की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।
4. संस्थागत सामाजिक संरचना में परिवर्तन – इसके अंतर्गत हम शिक्षा, पारस्परिक संबंध, जाति, परिवार, जजमानी व्यवस्था, ग्रामीण गतिशीलता, आवास इत्यादि को सम्मिलित करते हैं। पहले ग्रामीण लोग कम शिक्षित थे, परंतु अब शिक्षा की ओर उनकी रुचि बढ़ गई है और सब जाति और वर्ग के लोग कम-से-कम आगे आने वाली पीढ़ी को तो शिक्षा दिलाने के विचार से परिपूर्ण हैं। पारस्परिक संबंथों के क्षेत्र में ग्रामीण लोगों में स्वार्थ की भावनाएँ बढ़ रही हैं तथा व्यक्तिवादी भावना का विकास तीव्र गति से हो रहा है। जातिवाद की भावनाओं में भी लचीलापन आ गया है। स्वयं ग्रामीण लोगों की इस संबंध में यह धारणा बन गई है कि आजकल न तो कोई जाति है और न ही कोई धर्म। जजमानी व्यवस्था प्रायः अब टूट-सी गई है। परिजन लोग अब पैसा लेकर कार्य करते हैं। संयुक्त परिवार प्रणाली की प्रथा आंशिक रूप में ही रह गई है। एकाकी परिवार बन रहे हैं। आवागमन के साधनों में प्रगति हो जाने से ग्रामीण गतिशीलता के स्तर में वृद्धि हुई है। विशेष रूप से शिक्षित ग्रामीण तो अब नगर में ही अपनी जीविका कमाने में प्रतिष्ठा की बात समझता है और व्यवसाय के चल जाने पर या नौकरी मिल . जाने पर वहीं रहना पसंद करता है। ग्रामीण मकानों (आवास) के ढाँचों और बनावट में भी परिवर्तन हुआ है।
5. ग्रामीण पुनर्निर्माण पर प्रभाव – नल, सड़क, कुएँ, पंचायतघर, बीज-गोदाम और पशुओं के प्राकृतिक या कृत्रिम गर्भाधान केंद्र तो हमें आजकल लगभग प्रत्येक गाँव में देखने को मिल जाते हैं। गलियों की सफाई, श्रमदान तथा सड़के बनाना और परिवार नियोजन केंद्र की स्थापना भी होना प्रारंभ हो गया गया है। किसी-किसी स्थान पर तो समाज कल्याण केंद्र (Social Welfare Centres) की भी स्थापना हो चुकी है, यद्यपि उसका कार्य सीमित है; जैसे–बच्चों के खेल-कूद का प्रबंध आदि। श्रमदान, सर्वोदय और भूदान यज्ञ जैसे आंदोलनों ने ग्रामीण जनता में पुनर्निर्माण की भावनाओं को कुछ आंशिक रूप में परिवर्तित अवश्य किया है।
6. सौंदर्यात्मक और आदर्शात्मक संरचना में परिवर्तन – ग्रामीण समाज में सौंदर्यात्मक और आदर्शात्मक अनुभूतियों में भी परिवर्तन आया है। आज का ग्रामीण व्यक्ति फालतू समय में रामायण, महाभारत, गीता इत्यादि धार्मिक पुस्तकों को नहीं पढ़ता है। उपन्यास, मनोरंजक कहानियाँ तथा फिल्मी गानों की पुस्तक पढ़ता है और साथ-ही-साथ सिलाई व कढ़ाई-बुनाई की पुस्तकों को पढ़ने में भी अपना समय व्यतीत करता है। ग्रामीण पुरुष और स्त्रियाँ नगरीय पुरुषों और स्त्रियों की वेशभूषा और गहनों की नकल करने लगे हैं इतना ही नहीं, शिक्षित लोगों की ग्रामीण लड़कियाँ और नववधू सौंदर्य के लिए आधुनिक सौंदर्य साधनों का प्रयोग कस्ती हैं। गाँवों में भी लोग आधुनिक प्रकार का फर्नीचर खरीदते हैं। मेहमान के आदर-सत्कार के लिए चाय और कॉफी का प्रयोग करते हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि परंपरागत आभूषणों का मोह त्यागकर साइकिल, मोटर साइकिल, स्कूटर, टेलीविजन, टेपरिकॉर्डर, कैमरा, घड़ी, टार्च, फाउंटेन पैन इत्यादि को रखने में प्रतिष्ठा समझते हैं। घड़ी, फाउंटेन पैन और टेलीविजन तो ग्रामीण अशिक्षित मध्य वर्ग के परिवार में भी आज सामान्य वस्तुएँ समझी जाती है।

उपर्युक्त विवरण से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारतीय ग्रामीण जगत अब प्राचीन ग्रामीण जगत की भाँति नहीं रह गया है। आज का ग्रामीण कूपमंडूक नहीं रहा है तथा वह नगरीय लोगों से किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है।

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निम्नलिखित में उस व्यक्ति का नाम बताइए जिसने स्त्रियों की स्थिति सुधारने में सक्रिय भाग नहीं लिया(क) राजा राममोहन राय(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर(ग) स्वामी दयानन्द(घ) गोपालकृष्ण गोखले

Answer»

(घ) गोपालकृष्ण गोखले

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गाँव किस प्रकार से नगरों से भिन्न हैं? विस्तार से समझाइए।याग्रामीण एवं नगरीय समुदाय में अंतर स्पष्ट कीजिए।

Answer»

चूंकि गाँव ऐक समुदाय है इसलिए इसे अधिकांशत: ग्रामीण सुमदाय ही कहा जाता है। इसी भाँति नगर भी एक समुदाय है तथा इसके लिए नगरीय समुदाय’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। दोनों में अंतर करना एक कठिन कार्य है क्योंकि गाँव की अनेक विशेषताएँ नगरों में पायी जाती हैं, जबकि नगरों की अनेक विशेषताएँ आज गाँव में पायी जाती हैं। फिर भी, दोनों एक नहीं हैं तथा अनेक आधारों पर इनमें अंतर किया जा सकता है।

ग्रामीण एवं नगरीय समुदाय में अंतर
ग्रामीण तथा नगरीय समुदाय में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाये जाते हैं –

1. सांस्कृतिक आधार पर अंतर – ग्रामीण समुदाय में कृषि एवं समान उद्योग-धंधों के कारण सभी सदस्यों की संस्कृति समान होती है। नगरीय समुदायों में विभिन्न स्थलों से आकर व्यक्ति बसते हैं अतएव वहाँ सांस्कृतिक असमानता पायी जाती है। इसीलिए यह कहा जाता है कि ग्रामीण समुदायों में सजातीयता की भावना पायी जाती है, जबकि नगरीय समुदाय में विजातीयता की भावना।
2. सामुदायिक भावना में अंतर – ग्रामीण समुदाय में सामुदायिक भावना या मिलकर काम करने की भावना पायी जाती है। किंतु नगरीय समुदाय में द्वितीयक संबंधों की प्रधानता के कारण इसका अभाव है।
3. परिवार के आकार में अंतर – ग्रामीण समुदाय में कृषि व्यवस्था के कारण परिवार के आकार बड़े होते हैं और इसमें सामान्यतया संयुक्त परिवार ही पाए जाते हैं, किंतु नगरीय परिवार का आकार छोटा होता है और इसमें एकाकी परिवार पाए जाते हैं।
4. विस्तार में अंतर – ग्रामीण समुदाय की जनसंख्या कम होती है और नगरीय समुदाय बहुधंधीय होने के कारण जनसंख्या में विस्तृत हो जाता है। अधिक जनसंख्या के कारण नगरीय समुदाय का विस्तार क्षेत्र अधिक होता है।
5. प्रथाओं मे अंतर – बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, विधवा-पुनर्विवाह निषेध तथा अन्य अनेक प्रकार के विवाह संबंधी निषेध ग्रामीण परिवारों की प्रमुख विशेषताएँ हैं जिनका नगरीय समुदायों में सामान्यतः अभाव होता है।
6. स्त्रियों की स्थिति में अंतर – ग्रामीण समुदाय में स्त्रियों का सामाजिक स्तर नीचा होता है। उन लिए शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं होती। घर की चहारदीवारी में रहकर उन्हें जीवन-यापन करना होता है। नगरीय समुदायों में स्त्रियों का सामाजिक स्तर पुरुषों के समान होता है। उन्हें शिक्षा के अनेक अवसर प्राप्त रहते हैं। पुरुषों के समान वे अनेक क्षेत्रों में भाग लेती हैं।
7. विवाह के आधार में अंतर – ग्रामीण समुदाय में विवाह एक धार्मिक संस्कार है, किंतु नगरीय समुदायों में आजकल प्रेम पर आधारित विवाह संबंध पाए जाते हैं जो अस्थायी होते हैं। नगरीय
समुदायों में विवाह-विच्छेद भी ग्रामीण समुदायों की अपेक्षा अधिक होता है।
8. संबंधों की प्रकृति में अंतर – ग्रामीण समुदाय के सदस्य एक-दूसरे से परिचित रहते हैं और उनमें अनौपचारिक संबंध पाए जाते हैं, किंतु नगरीय समुदाय में संबंधों की औपचारिकता पाई जाती है। नगरीय समुदायों में परिवार के सदस्यों में भी औपचारिक संबंध पाए जाते हैं। इन्हीं औपचारिक संबंधों के कारण नगरीय जीवन अलगावकृत होता जा रहा है।
9. पड़ोसीपन की भावना में अंतर – ग्रामीण समुदाय में पड़ोस व जाति का विशेष महत्त्व है। नगरों में प्रायः दोनों ही प्रभावहीन हैं। अवैयक्तिक तथा अनौपचारिक संबंधों के कारण नगरों में आज पड़ोसियों में भी अनजानापन देखा जा सकता है। महानगरों में तो कई बार पड़ोसी एक-दूसरे से पूरी तरह परिचित तक नहीं होते।
10. मनोरंजन के साधन में अंतर – ग्रामीण समुदायों में परिवार ही मनोरंजन के साधन हैं, किंतु नगरीय समुदाय में सिनेमाघर, क्लब आदि व्यावसायिक मनोरंजन के केंद्र हैं। नगरों में मनोरंजन
भी एक व्यवसायी बन गया है।
11. व्यक्तियों की सुविधाओं में अंतर – ग्रामीण समुदायों में व्यक्ति का विकास संभव नहीं है; किंतु नगरीय समुदायों में अनेक समितियों, सभाओं तथा संगठनों द्वारा मानव अपने व्यक्तित्व का विकास करने में सफल होता है। ग्रामीण समुदायों में सुविधाओं का अभाव पाया जाता है जिसके कारण ग्रामवासियों में संकीर्णता की भावना बनी रहती है। नगरीय समुदायों में अत्यधिक सुविधाओं के कारण जीवन का स्तर उच्च होता है तथा समाजिक गतिशीलता भी अधिक पायी जाती है।
12. विचारों में अंतर – ग्रामीण समुदाय के व्यक्तियों में विचारों में संकीर्णता पायी जाती हैं, किंतु नगरीय समुदाय में रेडियो, समाचार-पत्रों एवं विविध प्रकार की उपसंस्कृतियों के कारण विचारों में व्यापकता अधिक होती है। वस्तुत: नगरीय जीवन में इतनी अधिक विविधता पायी जाती है कि विचारों में मतभेद होना स्वाभाविक ही है।
13. सामाजिक नियंत्रण में अंतर – ग्रामीण समुदाय में परिवार, पड़ोस, प्रथाएँ, रीति-रिवाज, धर्म तथा जाति पंचायत सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख अनौपचारिक साधन हैं, जबकि नगरों में पुलिस तथा कानून ही सामाजिक व्यवहार के नियंत्रण के औपचारिक साधन है। नगरों में अनौपचारिक साधन इतने अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं होते जितने कि वे ग्रामीण समुदाय में होते हैं।
14. सामाजिक जीवन में अंतर – ग्रामीण समुदाय में व्यक्ति का जीवन सरल, पवित्र तथा परंपरावादी होता है। अतएव व्यक्ति बुराइयों से बचा रहता है। किंतु नगरीय समाज का व्यक्ति जुआ, शराब आदि का शिकार हो जाता है अतएव नगरीय समुदायों में अपराधों की संख्या बढ़ती है और वैयक्तिक तथा पारिवारिक अथवा सामाजिक विघटन अधिक होते हैं।

निष्कर्ष – उपर्युक्त विवचेन से यह स्पष्ट हो जाता है कि ग्रामीण एवं नगरीय समुदाय दो भिन्न अवधारणाएँ हैं। इनमें विविध आधारों पर अंतर किया जा सकता है। आज दोनों प्रकार के समुदायों में इतनी अधिक अंत:क्रिया हो गई है कि दोनों में अंतर करना कठिन होता जा रहा है।

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गाँव किसे कहते हैं? भारतीय गाँव की ऐतिहासिक रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।यागाँव को परिभाषित कीजिए तथा गाँवों के प्रमुख प्रकार बताइए।याभारत के संदर्भ में गाँवों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है? समझाइए।

Answer»

गाँव, ग्रामीण समाजशास्त्र की प्रयोगशाला है, जो कि समाजशास्त्र की प्रमुख शाखा है। ग्रामीण समाजशास्त्र की विषय-वस्तु और क्षेत्र; ग्रामीण जीवन और समुदाय से संबंधित हैं। इस दृष्टि से भारतीय गाँव का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है। प्रायः सभी भारतीय गाँवों में किसी-न-किसी मात्रा में समानता पायी जाती है। भारत में आदिकाल से गाँव पाए जाते रहे हैं और इन गाँवों में अपने युग की छाप को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भारत में अनेक विदेशी शासक आए और उन्होंने भारत पर शासन किया। इन विदेशी शासकों का भारतीय ग्रामीण समुदाय पर प्रभाव अवश्य पड़ा, किंतु उनमें कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ। भारत में गाँव विविधता में एकता के द्योतक माने जाते हैं। इस दृष्टि से गाँवों का अध्ययन आवश्यक है।

गाँव का अर्थ तथा परिभाषाएँ।
गाँव वैसे तो एक अत्यंत सरल शब्द लगता है परंतु इसकी कोई निश्चित परिभाषा देना कठिन है। इसे परिवारों का वह समूह कहा जा सकता है जो एक निश्चित क्षेत्र में स्थापित होता है तथा जिसका एक विशिष्ट नाम होता है। गाँव की एक निश्चिम सीमा होती है तथा गाँववासी इस सीमा के प्रति सचेत होते हैं। उन्हें यह पूरी तरह से पता होता है कि उनके गाँव की सीमा ही उसे दूसरे गाँवों से पृथक् करती है। इस सीमा में उस गाँव के व्यक्ति निवास करते हैं, कृषि तथा इससे संबंधित व्यवसाय करते हैं तथा अन्य कार्यों का संपादन करते हैं। भारतीय गाँवों के घरों की दीवारें अधिकांशतः मिट्टी की होती हैं। उनकी छत खपरैल की होती हैं। आवागमन के लिए कच्ची गलियाँ होती हैं। भारतीय गाँव अपेक्षाकृत एक परिपूर्ण इकाई होते थे, यद्यपि अब इनमें भी परिवर्तन की प्रक्रिया गतिशील है। इनमें जजमानी प्रथा का प्रचलन पाया जाता है। धर्म और परंपराओं का ग्रामीण जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है।
विभिन्न विद्वानों ने गाँव की जो परिभाषाएँ की हैं, उनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं –

1. आर० के० पाटिल (R.K. Patil) के अनुसार – “ग्रामीण क्षेत्र में सामान्य ग्राम स्थान पर समीपस्थ गृहों में निवास करने वाले परिवारों के समूह को सामान्यतः ग्राम की अभिव्यक्ति के • रूप में समझा जा सकता है।”
2. ए० आर० देसाई (A.R. Desai) के अनुसार – “गाँव ग्राम्य समाज की इकाई है। यह रंगशाला के समान है, जहाँ ग्राम जीवन को प्रकट करता है और कार्य करता है।”
3. सिम्स (Sims) के अनुसार – “गाँव वह नाम है, जो कि प्राचीन कृषकों की स्थापना को । साधारणतयाः दर्शाता है।”

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि गाँव मानव निवास का वह नाम है, जिसका एक विशिष्ट क्षेत्र होता है और जहाँ सामुदायिक जीवन के सभी तत्त्व पाए जाते हैं। यहाँ निवास करने वाले सदस्य पारस्परिक आत्म-निर्भरता के द्वारा सामाजिक संबंधों का विकास करते हैं।

गाँव की ऐतिहासिक रूपरेखा
गाँव की उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में मतैक्य का अभाव पाया जाता है। कुछ विचारकों का मत है कि गाँव की उत्पत्ति का प्रमुख आधार सभ्यता का विकास है। सभ्यता के विकास ने मनुष्य के ज्ञान को विकसित किया जिसके फलस्वरूप विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मनुष्य ने विभिन्न प्रयत्न प्रारंभ किए और विभिन्न अनुभवों एवं प्रयत्नों के उपरांत संतोष प्राप्त किया। यह प्रक्रिया कालांतर में निरंतर रही है और वर्तमान समय में गाँव संरचना से कस्बों, नगरों और शहरों की संरचना विकसित हुई है। अनेक उविकासवादियों का यह मत है कि कृषि के उदय के बाद गाँव का संगठन दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार गाँव के विकास के बारे में एक मत नहीं है। इसका कारण यह है कि गाँव के विकास के कारक इतने समीपवर्ती और अस्पष्ट हैं कि इनसे कोई स्थायी कल्पना निर्धारित नहीं की जा सकती। गाँव निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया में रहता हैं। ये परिवर्तन प्रौद्योगिक-आर्थिक, सामाजिक-आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक आदि शक्तियों के कारण प्रभावित होते रहे हैं।
इस समस्या के निवारण हेतु भी विभिन्न विचारकों ने अपने मत प्रकट किए हैं। ए० आर० देसाई (A.R. Desai) ने कहा है-“पर्यावरणीय एवं क्षेत्रीय प्रयत्न ग्राम्य प्रारूपों एवं ग्राम्य सामाजिक संरचना में विभेद करने में सहायता करेंगे। ये प्रयत्न प्रादेशीय, जिले संबंधी एवं क्षेत्रीय इकाइयों के वैज्ञानिक वर्गीकरण में भी सहायक होंगे। ये विशिष्ट सांस्कृतिक क्षेत्रों के निर्माण के आधारभूत तत्त्वों की स्थापना में भी सहायक होंगे और अंत में ये संपूर्ण रूप में भारतीय समाज के व्यवस्थित वर्णन को विकसित करने में सहायक होंगे। इस प्रकार विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न प्रयास गाँव के विकास को निर्धारित करने के लिए किए। और इसी कारण गाँव के विकास के संबंध में विभिन्न विचार पारित हुए। देसाई ने लिखा है-“गाँव का उदय इतिहास में कृषि अर्थव्यवस्था के उदय के साथ संबंद्ध है। गाँव का उदय यह निर्देशित करता है कि मानव सामूहिक घुमक्कड़ जीवन से गुजरकर स्थायी जीवन में आया है। यह मूलरूप से उत्पादन के यंत्रों के सुधार के परिणामस्वरूप हुआ, जिसने कृषि का विकास किया और इस भाँति एक निश्चित सीमित क्षेत्र में स्थायी जीवन को संभव और आवश्यक बनाया। जो व्यक्ति स्थायी कृषि को ही ग्रामोदय का आधार मानते हैं उनको विश्वास है कि गाँवों का उदय सभ्यता के उदय के साथ-साथ स्थायी कृषि के परिणामस्वरूप हुआ है।

स्थायी कृषि के कारण गाँव सामूहिक स्थापना का प्रथम रूप है। और ग्रामीण कृषि इस व्यवस्था की उत्पत्ति में प्रथम कारक है। कृषि में उत्पादन बढ़ने के अतिरिक्त खाद्य सामग्री के बच जाने से व्यक्ति अन्य उद्योगों की ओर बढ़े और कस्बों व नगरों की स्थापना हुई। कुछ विद्वान कृषि के अतिरिक्त गाँवों का उदय मानवीय जीवन के उदय के साथ भी निर्धारित करते हैं। पंरतु उविकासवादी कृषि के कारक पर ही अधिक बल देते हैं। वास्तव में जब मानव की सामूहिक व घुमक्कड़ प्रवृत्ति को यांत्रिक व स्थायी खेती का साधन प्राप्त हुआ तो उसी समय से निवास व्यवस्था ने भी स्थायी रूप धारण किया। इसी के फलस्वरूप गाँवों का निर्माण व विकास प्रारंभ हुआ। दूसरे शब्दों में हम इस प्रकार कह सकते हैं कि शिकारी व घुमक्कड़ अर्थात् खाद्य संकलन की अवस्था को हो (लकड़ी को नुकीला कर कृषि हेतु प्रयोग करना) के आविष्कार ने स्थायी रूप में परिवर्तित किया है। इस परिवर्तन के उपरांत पशुपालन का महत्त्व बढ़ गया तथा गाँव का संगठन विकसित हुआ। इसीलिए ग्रामीण समाजशास्त्री सिम्स (Sims) ने भी लिखा है-“गाँव प्राचीन कृषकों की स्थापना को प्रदर्शित करने के लिए सामान्यत: प्रयोग किया जाने वाला नाम है।” भूगोलशास्त्रियों का यह मत है कि कृषि ने मानवीय जीवन में सुरक्षा तथा स्थायित्व प्रदान किया है। कृषि के उपरांत ही सभ्यता का विकास एवं गाँव संरचना में वृद्धि हुई है।

गाँव के विकास के बारे में जे० बी० रोज (J.B. Rose) का कहना है–“प्रथम अवस्था अग्रगामी काल की अवस्था थी जो प्रारंभिक स्थापनाओं के काल से पूर्व लगभग 1800 ई० 1835 ई० तक तथा बाद में मध्य-पश्चिम के विभिन्न भागों में प्रसारित हुई। दूसरी अवस्था, जो भूमि जोतने का काल कहलाती है, ने अग्रगामी काल का उत्तराधिकार लिया और साधारणतः 1890 ई० तक रही। यह काल ग्रामीण समाज का विशिष्ट काल कहलाता है, क्योंकि इसी समय निवास स्थानों की सुव्यवस्था, स्कूल व धर्म-स्थानों का आयोजन हुआ था। तीसरी अवस्था विनाश अथवा विध्वंस काल कहलाती है जो 1890 ई० में मध्य-पश्चिम से प्रारंभ हुई और 1920 ई० तक समस्त देशों में फैल गई। यह काल भूमि वरदान और विशेषीकरण के काल के नाम से परिभाषित किया जाता है। इस प्रकार जे०बी० रोज के विचारानुसार कृषि के पूर्व ही समाज स्थापना की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी थी और कृषि का कार्य बाद में अर्थात् दूसरी अवस्था में प्रारंभ हुआ था। विल्सन (Wilson), जिन्होंने कृषि के उदय के साथ ही गाँवों का उदय निर्धारित किया, के मत का विरोध करते हुए सिम्स (Sims) ने लिखा है।”

“ग्रामीण समुदाय की उत्पत्ति हमें पीछे सभ्यता के प्रांरभ की ओर, स्वयं स्थायी स्थापनों की ओर ले जाती है।” सभ्यता के उदय व स्थायित्व ने सामूहिक जीवन को कृषि के लिए बाध्य किया और तदुपरांत ही उपज का संकलन प्रारंभ हुआ। मानव अपनी क्षुधा तृप्ति हेतु ही इधर-उधर घूमता था। क्षुधा तृप्ति ही उसका तथा उसके जीवन का सर्वप्रथम लक्ष्य था। स्थायी जीवन के साथ ही उसे इस दिशा की ओर प्रयास करना अनिवार्य था। कृषि एक गाँव का एक सम्मिलित रूप इसीलिए ही आज हमें दृष्टिगोचर होता है। इसी दृष्टि से प्राचीन गाँव कृषि व कृषक के नाम से ही संबंधित किए जाते हैं।

गाँवों के प्रमुख प्रकार
गाँवों के प्रमुख प्रकारों के बारें में भी विद्वानों में मतैक्य का अभाव पाया जाता है। भारत के संदर्भ में विद्वानों ने गाँवों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया है –

1. कोल्ब (Kolb) ने ग्रामीण जीवन में उपलब्ध सुविधाओं को ग्रामीण वर्गीकरण का आधार माना। है। इसी दृष्टि से उन्होंने गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है –
⦁    सहज सुविधा वाले गाँव
⦁     सीमित सुविधा वाले गाँव,
⦁    अपर्याप्त सुविधा वाले गाँव,
⦁    पूर्ण/आंशिक सुविधा वाले गाँव तथा
⦁    पूर्ण नगरीय सुविधायुक्त गाँव।

2. एस० सी० दुबे (S. C. Dube) के अनुसार भारतीय गाँवों या ग्रामीण समुदाय के वर्गीकरण के निम्नलिखित आधारों पर विभाजित किया है –
⦁    आकार, जनसंख्या और भू-भाग के आधार पर,
⦁    प्रजातीय संगठन और जाति संरचना,
⦁    भूस्वामित्व के प्रतिमान,
⦁    अधिकार संरचना और शक्ति का सोपान क्रम,
⦁    सामुदायिक अलगाव की मात्रा तथा
⦁    स्थानीय परंपराएँ।

3. सोरोकिन (Sorokin) के अनुसार जिमरमैन और गाल्पिन ने भू-स्वामित्व को ग्रामीण वर्गीकरण का आधार माना है, जो निम्नलिखित हैं –
⦁    संयुक्त भू-स्वामित्व वाले गाँव,
⦁    पट्टीदारी व्यवस्था वाले गाँव,
⦁    व्यक्तिगत भू-स्वामित्व वाले गाँव,
⦁    वह गाँव जहाँ पट्टीदार रहते हैं,
⦁    जहाँ जमींदारों के कारिंदे रहते हैं तथा
⦁    जहाँ नौकरीपेशा लोग तथा श्रमिक निवास करते हैं।

4. ऐतिहासिक विकास-क्रम की दृष्टि से – ऐतिहासिक विकास-क्रम की दृष्टि से गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    कृषकों का सामूहिक स्वामित्व ग्राम,
⦁    कृषकों के सामूहिक किराएदारी ग्राम,
⦁    कृषकों का व्यक्तिगत स्वामित्व ग्राम,
⦁    कृषकों के व्यक्तिगत किराएदारी ग्राम,
⦁    व्यक्तिगत कृषक मजदूरों के ग्राम तथा
⦁    राज्य व धर्म, कृषक मजदूरों के ग्राम।

5. संरचना के आधार पर – कर्वे (Karve) का विचार है कि संरचना ग्रामीण जीवन का मुख्य आधार है। अतः इन्होंने गाँव की संरचना को ध्यान में रखकर गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है
⦁    बिखरे हुए गाँव तथा
⦁    समूह गाँव।

6. भूमि-व्यवस्था के आधार पर – बेडन पावेल (Baden Powell) ने भूमि व्यवस्था के आधार पर गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है –
⦁    रैयतवारी गाँव तथा
⦁    सामूहिक गाँव।

7. भारतीय गाँवों का सामान्य वर्गीकरण – जनसंख्या और क्षेत्रफल दोनों ही दृष्टियों से भारत एक विशाल देश है। इस विशालता के कारण भारतीय गाँवों का वर्गीकरण एक समस्या है। भारतीय गाँवों का वर्गीकरण निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है –

(i) जनसंख्या के आधार पर – जनसंख्या की दृष्टि से भारतीय गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    बड़े गाँव,
⦁    मध्यम गाँव तथा
⦁    छोटे गाँव।
बड़े गाँवों की श्रेणी में 5,000 से अधिक जनसंख्या वाले गाँवों को सम्मिलित किया जा सकता है। छोटे गाँवों के अंतर्गत 500 से कम आबादी वाले गाँवों को सम्मिलित किया जाता है। जो गाँव 500 से अधिक तथा 5,000 से कम की आबादी के हैं, उनहें मध्यम श्रेणी के गाँवों में सम्मिलित किया जा सकता है।

(ii) क्षेत्रफल के आधार पर – क्षेत्रफल के आधार पर गाँवों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    सीमित गाँव तथा
⦁    विस्तृत गाँव।
विस्तृत गाँव वे हैं, जो विशाल क्षेत्रों में फैले होते हैं। इनका क्षेत्रफल काफी बड़ा होता है। इसके विपरीत सीमित क्षेत्रफल में फैले गाँव ‘सीमित गाँव’ के अंतर्गत रखे जा सकते हैं।

(iii) अर्थव्यवस्था के आधार पर – अर्थव्यवस्था के आधार पर गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    कृषिप्रधान गाँव,
⦁    उद्योगप्रधान गाँव तथा
⦁    मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले गाँव।
कृषिप्रधान गाँव वे हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था खेती पर आधारित है। इन गाँवों में निवास करने वाले व्यक्तियों का प्रमुख व्यवसाय खेती करना है। इसके विपरीत उद्योगप्रधान गाँव वे हैं, जिनमें ग्रामीण आवश्यकताओं की पूर्ति तथा जीवन-यापन के लिए कुटीर उद्योग का संपादन किया जाता है। इन उद्योगों में लकड़ी, लोहा, मिट्टी, चमड़े आदि के उद्योग सम्मिलित हैं। मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले गाँव वे हैं, जहाँ कृषि तथा उद्योग दोनों का ही मिला-जुला स्वरूप पाया जाता है।

(iv) सुविधाओं के आधार पर – ग्रामीण जीवन में उपलब्ध सुविधाओं के आधार पर गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    पूर्ण सुविधायुक्त गाँव,
⦁    आंशिक सुविधायुक्त गाँव तथा
⦁    सुविधाहीन गाँव।
पूर्ण सुविधायुक्त गाँवों की श्रेणी में उन गाँवों को रखा जाता है, जहाँ मानव जीवन की समस्त आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इन सुविधाओं में आवागमन तथा संचार, स्वास्थ्य तथा चिकित्सा, शिक्षा, सुरक्षा, व्यवसाय तथा व्यापार आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। सुविधाहीन गाँव वे हैं, जहाँ उपर्युक्त सुविधाएँ उपलब्ध नहीं है। आंशिक सुविधा युक्त गाँव इन दोनों के मध्य की स्थिति हैं, जहाँ कुछ सुविधाएँ भी हैं और कुछ असुविधाएँ भी।

(v) परिस्थितिशास्त्रीय आधार पर – नगरीय और ग्रामीण परिस्थितियों के आधार पर गाँवों को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    नगरीकृत गाँव,
⦁    अर्द्ध-नगरीकृत गाँव तथा
⦁    ग्रामीण गाँव।
नगरीकृत गाँवे वे हैं, जो विशाल नगरों के पास स्थित हैं। इन गाँवों की अर्थव्यवस्था तथा जीवन पूर्णतया नगरों पर आधारित होता है। इन गाँवों में कोलकाता, मुम्बई दिल्ली आदि के आस-पास स्थित गाँवों को सम्मिलित किया जा सकता है। ग्रामीण गाँव वे हैं, जो नगरीय सभ्यता से दूर स्थित हैं। वहाँ का वातावरण तथा जीवन ग्रामीण तत्त्वों पर आधारित है। अर्द्ध-नगरीय गाँव वे हैं, जो न तो पूर्णतया नगरीकृत हैं और न ही ग्रामीण।

(vi) अन्य वर्गीकरण – उपर्युक्त वर्गीकरण के अतिरिक्त गाँवों को अन्य अनेक भागों में विभाजित किया जा सकता है। ऐसे प्रमुख वर्गीकरण निम्नलिखित हैं
⦁    धार्मिक आधार पर गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    धर्मप्रधान गाँव तथा
⦁    मिश्रित धर्मप्रधान गाँव।
⦁    शैक्षणिक आधार पर गाँवों को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    शिक्षित गाँव
⦁    अर्द्ध-शिक्षित गाँव तथा
⦁    अशिक्षित गाँव
⦁    धार्मिक व राजनीतिक आधार पर गाँवों को सत्ता पक्ष और सत्ता विरोधी इन दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।

29.

नगरीय समाज के परिवर्तित प्रतिमानों की व्याख्या कीजिए।यानगरीय समाज में हो रहे परिवर्तनों की स्पष्ट रूप से विवेचना कीजिए।

Answer»

नगरीय समाज की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन हैं। नगरीय समाज की परिभाषा विद्वानों ने जनसंख्या के आकार तथा घनत्व को सामने रखकर देने का प्रयास किया है। हेलबर्ट (Helbert) के अनुसार, “स्वयं सभ्यता के जन्म के समान ही नगर का जन्म भी भूत के अँधेरे में सो गया है।” किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) का कहना है कि सामाजिक दृष्टि से नगर केवल जीवन की एक विधि है तथा यह एक अनुपम प्रकार के वातावरण अर्थात् नगरीय परिस्थितियों की उपज होती है। इनके अनुसार, “नगर एक ऐसा समुदाय है जिसमें सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विषमता पायी जाती है तथा जो कृत्रिमता, व्यक्तिवादिता, प्रतियोगिता एवं घनी जनसंख्या के कारण नियंत्रण के औपचारिक साधनों द्वारा संगठित होता है।”

नगरीय समाज में हो रहे प्रमुख परिवर्तन
नगरीय समाज में हो रहे प्रमुख परिवर्तन निम्नलिखित हैं –

1. सहिष्णुता – नगरीय समाज के लोगों में रीति-रिवाजों, रहन-सहन, खान-पान की विषमता पायी जाती है किंतु फिर भी लोग ऐसा जीवन बनाए रखते हैं कि वे एक-दूसरे की बातों को सहन
करते हैं। इससे सहिष्णुता को प्रोत्साहन मिलता है।
2. विषमता में वृद्धि – नगरीय समाज के लोगों के रहन-सहन और रीति-रिवाजों में समरूपता नहीं पायी जाती है। नगरों में विभिन्न रीति-रिवाज, विचारों, व्यवसायों तथा संस्कृतियों के लोग एकत्र होते हैं जिससे उनमें विषमता आती है। अत: नगरीय समाज अत्यधिक विजातीयता वाले समुदाय होते जा रहे हैं जिससे विभिन्न समूहों में संघर्ष की स्थिति भी विकसित हो रही है।
3. नियंत्रण में शिथिलता – नगरों में कानून जैसे औपचारिक साधनों व द्वितीयक समूहों द्वारा नियंत्रण स्थापित किया जाता है। इस प्रकार के नियंत्रण में सुव्यवस्था कम ही मात्रा में स्थापित हो सकती है। नगरों में नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों का महत्त्व समाप्त हो जाता है जिससे नियंत्रण में शिथिलता आ जाती है।
4. अप्रत्यक्ष संपर्क में वृद्धि – नगरीय समाज में लोगों के संबंधों में घनिष्ठता नहीं होती तथा उनमें प्रायः अप्रत्यक्ष संबंध पाये जाते हैं। इसका मुख्य कारण नगरों की जनसंख्या है। वास्तव में, जनसंख्या ही इतनी अधिक होती है कि सभी में प्रत्यक्ष संबंध हो ही नहीं सकते हैं। अप्रत्यक्ष संबंधों के कारण ही प्रत्यक्ष सामाजिक नियंत्रण संभव नहीं रह पाता।
5. सामाजिक गतिशीलता – यातायात के साधनों में विकास होने के कारण नगर के निवासी एक | स्थान से दूसरे स्थान को आते-जाते रहते हैं। वे आजीविका या व्यवसाय की खोज में भी इधर-उधर घूमते रहते हैं। समाज की प्रथाओं में परिवर्तन करने में भी उन्हें संकोच नहीं होता है। अतएव नगरों में सामाजिक गतिशीलता का गुण पाया जाता है।
6. व्यक्तित्व का विकास – नगरों में व्यक्ति अपनी योग्यतानुसार पद प्राप्त कर सकता है तथा अपना विकास कर सकता है। गतिशीलता के अधिक अवसर होने के कारण तथा अर्जित गुणों
की महत्ता के कारण व्यक्तित्व का विकास इच्छानुसार हो सकता है।
7. समस्याओं में वृद्धि – नगरों में विविध प्रकार की समस्याओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। इन समस्याओं में बाल अपराध, अपराध, श्वेतवसन, अपराध, भ्रष्टाचार, मद्यपान एवं मादक द्रव्य व्यसन, वेश्यावृत्ति, निर्धनता एवं बेरोजगारी इत्यादि प्रमुख हैं।
8. ऐच्छिक संपर्क – नगरों में व्यक्ति अपनी इच्छानुसार चाहे जिसके साथ संपर्क स्थापित करे या न करे। ऐच्छिक संपर्क के कारण ही नगरों में ऐच्छिक समितियों की संख्या बढ़ने लगी है।
9. व्यक्तिवादिता – नगरों में व्यक्ति स्वार्थ की ओर ही ध्यान देता है, अतएव नगरों में सामाजिकता के स्थान पर व्यक्तिवादिता पायी जाती है। नगरीय जीवन इतना व्यस्त है कि लोगों को दूसरों के सुख-दु:ख में हिस्सा लेने का समय ही नहीं मिलता। परिवार के सदस्यों तक में व्यक्तिवाद की भावना विकसित होने लगती है।

30.

निम्नलिखित दशाओं में से कौन-सी दशा स्त्रियों की शोचनीय स्थिति के लिए उत्तरदायी है?(क) पश्चिमी शिक्षा(ख) एक-विवाह का नियम(ग) औद्योगीकरण व नगरीकरण(घ) अशिक्षा

Answer»

सही विकल्प है (घ) अशिक्षा

31.

निम्नांकित में से कौन-सा कल्याणकारी राज्य है?(क) पाकिस्तान(ख) चीन(ग) ब्रिटेन(घ) मोरक्को

Answer»

सही विकल्प है (ग) ब्रिटेन

32.

निम्नलिखित में से किस सिद्धान्त के अनुसार राज्य शोषण का यन्त्र है? (क) व्यक्तिवाद(ख) आदर्शवाद(ग) साम्यवाद(घ) फासीवाद

Answer»

सही विकल्प है (घ) फासीवाद

33.

दि पोजिशन ऑफ वुमेन इन हिन्दू सिविलाइजेशन’ पुस्तक के लेखक कौन हैं ?(क) पी० एच० प्रभु(ख) डॉ० नगेन्द्र(ग) अल्तेकर(घ) राधाकमल मुखर्जी

Answer»

सही विकल्प है (ग) अल्तेकर

34.

‘ए ग्रामर ऑफ पॉलिटिक्स’ नामक पुस्तक के लेखक थे(क) प्लेटो(ख) हैरल्ड लॉस्की(ग) ऐंजिल्स(घ) कार्ल मार्क्स

Answer»

सही विकल्प है (ख) हैरल्ड लॉस्की

35.

‘दि प्रोटेस्टेंट इथिक एण्ड द स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज्म’ नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?

Answer»

‘दि प्रोटेस्टेंट इथिक एण्ड दि स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज्म’ नामक पुस्तक के लेखक मैक्स वेबर है।

36.

ब्रीज के अनुसार नगरीकरण को परिभाषित कीजिए।

Answer»

ब्रीज के अनुसार, “नगरीकरण एक प्रक्रिया है जिसके कारण लोग नगरीय कहलाने लगते हैं, कृषि के स्थान पर अन्य व्यवसायों को अपनाते हैं, जो नगर में उपलब्ध हैं और अपने व्यवहार प्रतिमान में अपेक्षाकृत परिवर्तन का समावेश करते हैं।”

37.

औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के परिणाम के रूप में सामाजिक विघटन तथा अपराधों की चर्चा कीजिए।

Answer»

औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण समाज-विरोधी कार्यों एवं अपराधों में वृद्धि हुई। नगरों में नियन्त्रण के अभाव में सामाजिक नियमों की अवहेलना की जाती है, जिससे समाज में विघटनकारी प्रवृत्तियाँ प्रबल होती हैं। औद्योगिक केन्द्रों एवं बड़े नगरों में वेश्यावृत्ति, शराबखेरी, जुआ, बाल-अपराध, हत्याएँ, आत्महत्याएँ, चोरी, डकैती, गबन एवं अन्य अपराधी व्यवहारों की बहुलता पायी जाती है। इन्हें हम अपराध के केन्द्र कह सकते हैं।

38.

औद्योगिक क्रान्ति सर्वप्रथम कहाँ हुई ?(क) अमेरिका में(ख) फ्रांस में(ग) इटली में(घ) इंग्लैण्ड में

Answer»

(घ) इंग्लैण्ड में  

39.

‘दि डिवीजन ऑफ लेबर’ नामक पुस्तक के लेखक कौन है ?(क) कार्ल मार्क्स(ख) इमाइल दुर्चीम(ग) मैक्स वेबर(घ) एच० एम० जॉनसन

Answer»

(क) कार्ल मार्क्स   

40.

निम्नलिखित में से कौन-सा विराट नगर नहीं है ?(क) मुम्बई(ख) कोलकाता(ग) चेन्नई(घ) अहमदाबाद

Answer»

(घ) अहमदाबाद  

41.

बहुउद्देशीय योजनाओं का एक उद्देश्य बताएं।

Answer»

जल विद्युत् का उत्पादन।

42.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम किस वर्ष लागू किया गया ? (क) 1950 ई० में(ख) 1956 ई० में(ग) 1976 ई० में(घ) 1986 ई० में

Answer»

(घ) 1986 ई० में

43.

इम्पीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण कब किया गया?

Answer»

1 जुलाई, 1955 ई० को इम्पीरियल बैंक का आंशिक राष्ट्रीयकरण किया गया।

44.

बहु-उद्देशीय योजनाओं से क्या अभिप्राय है ? बहु-उद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के उद्देश्य बताइए।

Answer»

बहु-उद्देशीय योजना-बहु-उद्देशीय योजनाओं से तात्पर्य उन बहुमुखी परियोजनाओं से है जिनका निर्माण एक से अधिक समस्याओं का समाधान करने के लिए किया गया है।

बहु-उद्देशीय योजनाओं के उद्देश्य —

  1. जल-विद्युत् का उत्पादन।
  2. सिंचाई की सुविधाएं जुटाना।
  3. बाढ़ों की रोकथाम करना।
  4. दलदलों को सुखाना तथा कृषि योग्य भूमि बढ़ाना।
  5. जल-यातायात की सुविधाएं जुटाना।
  6. कृत्रिम जलाशयों में मछली पालन करना।
  7. वृक्षारोपण करना तथा वनों का उचित शोषण करना।
45.

उपभोक्ता संरक्षण कानून 1986 की एक विशेषता बताएं।

Answer»

उपभोक्ता की शिकायतों का सरल व सस्ता समाधान।

46.

भारतीय स्टेट बैंक की सफलताओं पर प्रकाश डालिए।

Answer»

स्थापना के समय भारतीय स्टेट बैंक को निम्नलिखित दायित्व सौंपे गये थे

⦁     बैंकिंग विकास,
⦁     ग्रामों में बैंकिंग सुविधाएँ तथा सस्ते ऋण की व्यवस्था, जिसमें कृषि के लिए ऋण-विशेष महत्त्वपूर्ण है,
⦁     लघु उद्योगों के विकास के लिए सहायता, एक शक्तिशाली एवं साधन-सम्पन्न बैंक संगठन जो देश के आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान कर सके।

स्टेट बैंक की सफलताओं को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत रखा जा सकता है
1. बैकिंग विकास – स्टेट बैंक परिवार द्वारा देश में बैंकिंग सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया गया है। 1969 ई० में स्टेट बैंक समूह की कुल शाखाएँ 2,462 थीं, जो 30 जून, 2013 ई० में बढ़कर 1,50,03 हो गयी हैं।

2. ग्रामीण बैकिंग – स्टेट बैंक शाखा विस्तार कार्यक्रम से ग्रामों में बैंकिंग सुविधाओं का विशेष विकास हुआ है। स्टेट बैंक समूह की 42% शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में ही कार्यरत हैं।

3. ग्रामीण साख – स्टेट बैंक द्वारा सहकारी बैंकों, लघु लद्योगों तथा कृषि योजनाओं के ऋण की अनेक सुविधाओं की व्यवस्था की गयी है। इनमें अल्पकालीन एवं मध्यकालीन आर्थिक सुविधाएँ प्रमुख हैं।

4. लघु उद्योग – भारतीय स्टेट बैंक ने लघु उद्योगों के वित्त पोषण के लिए ‘साहसी योजना’, ‘उदार साख योजना’ आदि आरम्भ की हैं।

5. विदेशी विनिमय तथा वित्त – स्टेट बैंक द्वारा विदेशों को माल निर्यात के लिए निर्यात सम्वर्द्धन योजना जारी की गयी है जिसके अन्तर्गत निर्यातकों को सुविधाजनक ऋण दिये जाते हैं।

6. मध्यकालीन ऋण – स्टेट बैंक द्वारा उद्योगों के लिए दस वर्ष तक की अवधि के ऋण दिए जा सकते हैं। इन ऋणों के लिए औद्योगिक विकास बैंक पुनर्वित्त व्यवस्था कर देता है।

47.

राष्ट्रीयकरण से पूर्व भारतीय स्टेट बैंक का नाम क्या था?(क) इम्पीरियल बैंक(ख) ग्रेट ब्रिटेन बैंक(ग) ईस्ट इण्डिया कम्पनी बैंक(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है  (क) इम्पीरियल बैंक।

48.

उपभोक्ता संरक्षण कानून 1986 की मुख्य विशेषताएं बताइए।

Answer»

उपभोक्ता संरक्षण कानून 1986 की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं —

  1. निजी, सार्वजनिक और सहकारी क्षेत्र के सभी विक्रेताओं पर यह कानून लागू होता है।
  2. यह कानून उपभोक्ताओं की शिकायतों का सरल और सस्ता समाधान करता है।
  3. उपभोक्ताओं की शिकायतों का समाधान करने के लिए त्रि-स्तरीय अदालतें स्थापित की गई हैं
    (i) जिला फोरम
    (ii) राज्य आयोग
    (iii) राष्ट्रीय आयोग।
  4. उपभोक्ता अपनी शिकायतें वस्तु के खरीदने के दो साल तक कर सकता है।
49.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम कब लागू हुआ?(A) 1980(B) 1982(C) 1986(D) 1988

Answer»

सही विकल्प है (C) 1986

50.

भारत में स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया की स्थापना के उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए। स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के वर्जित कार्यों का वर्णन कीजिए। याभारतीय स्टेट बैंक के कार्यों का वर्णन करें। 

Answer»

स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया
1 जुलाई, 1955 ई० को इम्पीरियल बैंक ऑफ इण्डिया का राष्ट्रीयकरण करके स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया की स्थापना की गयी।
सरकार के वित्तीय सहयोग से निजी अंशधारियों द्वारा 1806 ई० में बैंक ऑफ बंगाल, 1840 ई० में बैंक ऑफ बॉम्बे तथा 1843 ई० में बैंक ऑफ मद्रास की स्थापना की गयी। यह तीनों बैंक प्रेसिडेन्सी बैंक कहलाते थे। प्रेसिडेन्सी बैंकों को 1862 ई० तक कागजी नोट निर्गमन का अधिकार भी प्राप्त था। वर्ष 1921 में तीनों प्रेसिडेन्सी बैंकों को मिलाकर इम्पीरियल बैंक ऑफ इण्डिया की स्थापना की गयी।
1 जुलाई, 1955 ई० को इम्पीरियल बैंक का आंशिक राष्ट्रीयकरण करके उसका नाम स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया कर दिया गया, वर्तमान में स्टेट बैंक देश की सबसे बड़ा व्यापारिक बैंक है। भारतीय स्टेट बैंक का केन्द्रीय कार्यालय मुम्बई में है। इसके चोदई अन्य क्षेत्रीय कार्यालय भी हैं। जून, 2013 ई० के अन्त में भारतीय स्टेट बैंक समूह की कुल 15,003 शाखाएँ कार्य कर रही थीं। स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के कुल अंशों का 55% अंश रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के पास रहता है, शेष 45% अन्य व्यक्तियों के पास हो सकता है। इस समय 92 प्रतिशत अंश रिजर्व बैंक के पास हैं। स्टेट बैंक का प्रबन्ध एक केन्द्रीय संचालक बोर्ड करता है।

स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया की स्थापना के उद्देश्य
इसके उद्देश्य निम्नलिखित थे
⦁    स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया की स्थापना का आधारभूत उद्देश्य यह था कि यह देश में ग्रामीण साख का विकास और बैंकिंग का प्रचार व प्रसार करेगा।
⦁     स्टेट बैंक की स्थापना का उद्देश्य बचतों को प्रोत्साहित करना था, जिससे देश के आर्थिक विकास में सहयोग मिल सके।
⦁     स्टेट बैंक की स्थापना का उद्देश्य धन के स्थानान्तरण की सस्ती सेवा प्रदान करना था, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग का विकास हो सके।
⦁     स्टेट बैंक की स्थापना के समय ग्रामीण क्षेत्रों में लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करने का दायित्व भी स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया को ही सौंपा गया था। अत: लघु उद्योगों को आर्थिक सहायता एवं परामर्श देने का उत्तरदायित्व भी स्टेट बैंक का ही है।
⦁    स्टेट बैंक को एक महत्त्वपूर्ण कार्य यह भी सौंपा गया कि वह सारे देश में शाखाओं का एक जाल बिछाकर बैंकिंग के विकास में सहायक बने। विशेष रूप से देश के उन भागों में साख व बैंकिंग का विकास करे जहाँ ये सुविधाएँ पहले से उपलब्ध नहीं हैं।
⦁     इसकी स्थापना के अन्य उद्देश्य थे
⦁     धन के हस्तान्तरण की सुविधा प्रदान करना,
⦁    रिजर्व बैंक की साख-नियन्त्रण नीति में सहयोग करना,
⦁     आर्थिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्तियों की सहायता करना आदि।

स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के कार्य
भारतीय स्टेट बैंक के कार्यों को दो भागों में विभाजित किया गया है
(i) रिजर्व बैंक के प्रतिनिधि के रूप में तथा
(ii) व्यापारिक बैंक के रूप में।

(i) रिजर्व बैंक के प्रतिनिधि के रूप में
देश के केन्द्रीय बैंक का एजेण्ट होने के कारण जिन स्थानों पर भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यालये नहीं हैं वहाँ भारतीय स्टेट बैंक रिजर्व बैंक के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। ये कार्य निम्नलिखित हैं
⦁    सरकार के बैंकर के रूप में – सरकार के बैंकर के रूप में यह जनता से सरकार की ओर से धन वसूल करता है और सरकार के आदेशानुसार इसका भुगतान भी करती है। यह सार्वजनिक ऋणों की व्यवस्था भी करता है।
⦁    बैंकों के बैंक के रूप में – स्टेट बैंक अन्य बैंकों को ऋण देता है वे उनके बिलों को बट्टा करता है। रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया की ओर से समाशोधन-गृह का कार्य करता है। बैंकों के कोषों का स्थानान्तरण करता है तथा व्यापारिक बैंकों को सलाह भी देता है।

(ii) व्यापारिक बैंक के रूप में
व्यापारिक बैंक के रूप में स्टेट बैंक निम्नलिखित कार्य करता है
⦁     ग्राहकों के विभिन्न खातों में जमा स्वीकार करना।
⦁     अंशों, ऋण-पत्रों तथा विभिन्न प्रतिभूतियों के आधार पर ऋण प्रदान करना तथा नकद साख देना।
⦁    जनता की बहुमूल्य वस्तुओं को सुरक्षित रखना अर्थात् लॉकर्स की सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
⦁     ग्राहकों के लिए रुपया भेजने की सुविधा प्रदान करना।
⦁     ग्रामीण क्षेत्रों में बचतों को प्रोत्साहित करना तथा उनको संग्रह करना।
⦁    शाखाओं का जाल बिछाकर बैंकिंग का प्रचार व प्रसार करना।
⦁    ग्रामीण साख की पूर्ति बढ़ाने के लिए एक शक्तिशाली एजेन्सी का कार्य करना।
⦁     लघु उद्योगों को आर्थिक सहायता एवं परामर्श देने का कार्य करना।
⦁     व्यापार तथा कृषि को वित्तीय एवं साख सम्बन्धी सुविधाएँ प्रदान करना।
⦁    विनिमय बिलों को भुनाना तथा उनका क्रय-विक्रय करना।
⦁     बैंक की पूँजी का सरकारी ऋण-पत्रों, अंशों तथा अन्य प्रतिभूतियों में विनियोजन करना।
⦁     ट्रस्टों, एक्जीक्यूटर आदि के रूप में सम्पत्तियों का प्रबन्ध करना।
⦁    पेन्शन कोषों का संचालन करना।
⦁     किसी सहकारी समिति या कम्पनी को उसकी सम्पत्तियों की प्रतिभूति पर, किसी भी अवधि का ऋण देना अथवा कैश क्रेडिट खोलना।
⦁     स्वर्ण तथा चाँदी का क्रय-विक्रय करना।
⦁    रिजर्व बैंक की स्वीकृति से किसी भी बैंकिंग कम्पनी के अंशों को खरीदना व बेचना अथवा अपने संरक्षण में किसी बैंकिंग कम्पनी को स्थापित करना या उसका संचालन करना।
⦁     केन्द्रीय सरकार की अनुमति से अन्य कोई भी कार्य करना।

स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के वर्जित कार्य
भारतीय स्टेट बैंक के वर्जित कार्य निम्नलिखित हैं
⦁    यह अपने अंशों पर या अचल सम्पत्ति की जमानत पर 6 माह से अधिक की अवधि के लिए ऋण या अग्रिम नहीं दे सकता।।
⦁     यह अपने कार्यालयों व कर्मचारियों के निवास के अतिरिक्त किसी प्रकार की अचल सम्पत्ति नहीं खरीद सकता।।
⦁     यह ऐसे बिलों की पुनः कटौती नहीं कर सकता जिनकी परिपक्वता 6 महीने से अधिक की होती है। कृषि-साख के सम्बन्ध में यह अवधि 15 माह रखी गयी है।
⦁    यह किसी फर्म अथवा किसी व्यक्ति को निश्चित राशि से अधिक राशि बिना जमानत के नहीं दे सकता।
⦁    यह ऐसे बिलों को नहीं भुना सकता जिन पर दो विश्वसनीय हस्ताक्षर नहीं हैं।
⦁    यह विदेशी विनिमय व्यवसाय नहीं कर सकता।
⦁    यह उद्योगों को उनकी सम्पत्ति की जमानत पर मध्यमकालीन ऋण 7 वर्ष की अवधि के लिए ही दे सकता है तथा अपने कर्मचारियों द्वारा बनायी गयी सहकारी भवन निर्माण समितियों को भी 6 माह से अधिक के लिए रुपया उधार दे सकती है।