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गाँव किसे कहते हैं? भारतीय गाँव की ऐतिहासिक रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।यागाँव को परिभाषित कीजिए तथा गाँवों के प्रमुख प्रकार बताइए।याभारत के संदर्भ में गाँवों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है? समझाइए।

Answer»

गाँव, ग्रामीण समाजशास्त्र की प्रयोगशाला है, जो कि समाजशास्त्र की प्रमुख शाखा है। ग्रामीण समाजशास्त्र की विषय-वस्तु और क्षेत्र; ग्रामीण जीवन और समुदाय से संबंधित हैं। इस दृष्टि से भारतीय गाँव का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है। प्रायः सभी भारतीय गाँवों में किसी-न-किसी मात्रा में समानता पायी जाती है। भारत में आदिकाल से गाँव पाए जाते रहे हैं और इन गाँवों में अपने युग की छाप को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भारत में अनेक विदेशी शासक आए और उन्होंने भारत पर शासन किया। इन विदेशी शासकों का भारतीय ग्रामीण समुदाय पर प्रभाव अवश्य पड़ा, किंतु उनमें कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ। भारत में गाँव विविधता में एकता के द्योतक माने जाते हैं। इस दृष्टि से गाँवों का अध्ययन आवश्यक है।

गाँव का अर्थ तथा परिभाषाएँ।
गाँव वैसे तो एक अत्यंत सरल शब्द लगता है परंतु इसकी कोई निश्चित परिभाषा देना कठिन है। इसे परिवारों का वह समूह कहा जा सकता है जो एक निश्चित क्षेत्र में स्थापित होता है तथा जिसका एक विशिष्ट नाम होता है। गाँव की एक निश्चिम सीमा होती है तथा गाँववासी इस सीमा के प्रति सचेत होते हैं। उन्हें यह पूरी तरह से पता होता है कि उनके गाँव की सीमा ही उसे दूसरे गाँवों से पृथक् करती है। इस सीमा में उस गाँव के व्यक्ति निवास करते हैं, कृषि तथा इससे संबंधित व्यवसाय करते हैं तथा अन्य कार्यों का संपादन करते हैं। भारतीय गाँवों के घरों की दीवारें अधिकांशतः मिट्टी की होती हैं। उनकी छत खपरैल की होती हैं। आवागमन के लिए कच्ची गलियाँ होती हैं। भारतीय गाँव अपेक्षाकृत एक परिपूर्ण इकाई होते थे, यद्यपि अब इनमें भी परिवर्तन की प्रक्रिया गतिशील है। इनमें जजमानी प्रथा का प्रचलन पाया जाता है। धर्म और परंपराओं का ग्रामीण जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है।
विभिन्न विद्वानों ने गाँव की जो परिभाषाएँ की हैं, उनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं –

1. आर० के० पाटिल (R.K. Patil) के अनुसार – “ग्रामीण क्षेत्र में सामान्य ग्राम स्थान पर समीपस्थ गृहों में निवास करने वाले परिवारों के समूह को सामान्यतः ग्राम की अभिव्यक्ति के • रूप में समझा जा सकता है।”
2. ए० आर० देसाई (A.R. Desai) के अनुसार – “गाँव ग्राम्य समाज की इकाई है। यह रंगशाला के समान है, जहाँ ग्राम जीवन को प्रकट करता है और कार्य करता है।”
3. सिम्स (Sims) के अनुसार – “गाँव वह नाम है, जो कि प्राचीन कृषकों की स्थापना को । साधारणतयाः दर्शाता है।”

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि गाँव मानव निवास का वह नाम है, जिसका एक विशिष्ट क्षेत्र होता है और जहाँ सामुदायिक जीवन के सभी तत्त्व पाए जाते हैं। यहाँ निवास करने वाले सदस्य पारस्परिक आत्म-निर्भरता के द्वारा सामाजिक संबंधों का विकास करते हैं।

गाँव की ऐतिहासिक रूपरेखा
गाँव की उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में मतैक्य का अभाव पाया जाता है। कुछ विचारकों का मत है कि गाँव की उत्पत्ति का प्रमुख आधार सभ्यता का विकास है। सभ्यता के विकास ने मनुष्य के ज्ञान को विकसित किया जिसके फलस्वरूप विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मनुष्य ने विभिन्न प्रयत्न प्रारंभ किए और विभिन्न अनुभवों एवं प्रयत्नों के उपरांत संतोष प्राप्त किया। यह प्रक्रिया कालांतर में निरंतर रही है और वर्तमान समय में गाँव संरचना से कस्बों, नगरों और शहरों की संरचना विकसित हुई है। अनेक उविकासवादियों का यह मत है कि कृषि के उदय के बाद गाँव का संगठन दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार गाँव के विकास के बारे में एक मत नहीं है। इसका कारण यह है कि गाँव के विकास के कारक इतने समीपवर्ती और अस्पष्ट हैं कि इनसे कोई स्थायी कल्पना निर्धारित नहीं की जा सकती। गाँव निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया में रहता हैं। ये परिवर्तन प्रौद्योगिक-आर्थिक, सामाजिक-आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक आदि शक्तियों के कारण प्रभावित होते रहे हैं।
इस समस्या के निवारण हेतु भी विभिन्न विचारकों ने अपने मत प्रकट किए हैं। ए० आर० देसाई (A.R. Desai) ने कहा है-“पर्यावरणीय एवं क्षेत्रीय प्रयत्न ग्राम्य प्रारूपों एवं ग्राम्य सामाजिक संरचना में विभेद करने में सहायता करेंगे। ये प्रयत्न प्रादेशीय, जिले संबंधी एवं क्षेत्रीय इकाइयों के वैज्ञानिक वर्गीकरण में भी सहायक होंगे। ये विशिष्ट सांस्कृतिक क्षेत्रों के निर्माण के आधारभूत तत्त्वों की स्थापना में भी सहायक होंगे और अंत में ये संपूर्ण रूप में भारतीय समाज के व्यवस्थित वर्णन को विकसित करने में सहायक होंगे। इस प्रकार विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न प्रयास गाँव के विकास को निर्धारित करने के लिए किए। और इसी कारण गाँव के विकास के संबंध में विभिन्न विचार पारित हुए। देसाई ने लिखा है-“गाँव का उदय इतिहास में कृषि अर्थव्यवस्था के उदय के साथ संबंद्ध है। गाँव का उदय यह निर्देशित करता है कि मानव सामूहिक घुमक्कड़ जीवन से गुजरकर स्थायी जीवन में आया है। यह मूलरूप से उत्पादन के यंत्रों के सुधार के परिणामस्वरूप हुआ, जिसने कृषि का विकास किया और इस भाँति एक निश्चित सीमित क्षेत्र में स्थायी जीवन को संभव और आवश्यक बनाया। जो व्यक्ति स्थायी कृषि को ही ग्रामोदय का आधार मानते हैं उनको विश्वास है कि गाँवों का उदय सभ्यता के उदय के साथ-साथ स्थायी कृषि के परिणामस्वरूप हुआ है।

स्थायी कृषि के कारण गाँव सामूहिक स्थापना का प्रथम रूप है। और ग्रामीण कृषि इस व्यवस्था की उत्पत्ति में प्रथम कारक है। कृषि में उत्पादन बढ़ने के अतिरिक्त खाद्य सामग्री के बच जाने से व्यक्ति अन्य उद्योगों की ओर बढ़े और कस्बों व नगरों की स्थापना हुई। कुछ विद्वान कृषि के अतिरिक्त गाँवों का उदय मानवीय जीवन के उदय के साथ भी निर्धारित करते हैं। पंरतु उविकासवादी कृषि के कारक पर ही अधिक बल देते हैं। वास्तव में जब मानव की सामूहिक व घुमक्कड़ प्रवृत्ति को यांत्रिक व स्थायी खेती का साधन प्राप्त हुआ तो उसी समय से निवास व्यवस्था ने भी स्थायी रूप धारण किया। इसी के फलस्वरूप गाँवों का निर्माण व विकास प्रारंभ हुआ। दूसरे शब्दों में हम इस प्रकार कह सकते हैं कि शिकारी व घुमक्कड़ अर्थात् खाद्य संकलन की अवस्था को हो (लकड़ी को नुकीला कर कृषि हेतु प्रयोग करना) के आविष्कार ने स्थायी रूप में परिवर्तित किया है। इस परिवर्तन के उपरांत पशुपालन का महत्त्व बढ़ गया तथा गाँव का संगठन विकसित हुआ। इसीलिए ग्रामीण समाजशास्त्री सिम्स (Sims) ने भी लिखा है-“गाँव प्राचीन कृषकों की स्थापना को प्रदर्शित करने के लिए सामान्यत: प्रयोग किया जाने वाला नाम है।” भूगोलशास्त्रियों का यह मत है कि कृषि ने मानवीय जीवन में सुरक्षा तथा स्थायित्व प्रदान किया है। कृषि के उपरांत ही सभ्यता का विकास एवं गाँव संरचना में वृद्धि हुई है।

गाँव के विकास के बारे में जे० बी० रोज (J.B. Rose) का कहना है–“प्रथम अवस्था अग्रगामी काल की अवस्था थी जो प्रारंभिक स्थापनाओं के काल से पूर्व लगभग 1800 ई० 1835 ई० तक तथा बाद में मध्य-पश्चिम के विभिन्न भागों में प्रसारित हुई। दूसरी अवस्था, जो भूमि जोतने का काल कहलाती है, ने अग्रगामी काल का उत्तराधिकार लिया और साधारणतः 1890 ई० तक रही। यह काल ग्रामीण समाज का विशिष्ट काल कहलाता है, क्योंकि इसी समय निवास स्थानों की सुव्यवस्था, स्कूल व धर्म-स्थानों का आयोजन हुआ था। तीसरी अवस्था विनाश अथवा विध्वंस काल कहलाती है जो 1890 ई० में मध्य-पश्चिम से प्रारंभ हुई और 1920 ई० तक समस्त देशों में फैल गई। यह काल भूमि वरदान और विशेषीकरण के काल के नाम से परिभाषित किया जाता है। इस प्रकार जे०बी० रोज के विचारानुसार कृषि के पूर्व ही समाज स्थापना की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी थी और कृषि का कार्य बाद में अर्थात् दूसरी अवस्था में प्रारंभ हुआ था। विल्सन (Wilson), जिन्होंने कृषि के उदय के साथ ही गाँवों का उदय निर्धारित किया, के मत का विरोध करते हुए सिम्स (Sims) ने लिखा है।”

“ग्रामीण समुदाय की उत्पत्ति हमें पीछे सभ्यता के प्रांरभ की ओर, स्वयं स्थायी स्थापनों की ओर ले जाती है।” सभ्यता के उदय व स्थायित्व ने सामूहिक जीवन को कृषि के लिए बाध्य किया और तदुपरांत ही उपज का संकलन प्रारंभ हुआ। मानव अपनी क्षुधा तृप्ति हेतु ही इधर-उधर घूमता था। क्षुधा तृप्ति ही उसका तथा उसके जीवन का सर्वप्रथम लक्ष्य था। स्थायी जीवन के साथ ही उसे इस दिशा की ओर प्रयास करना अनिवार्य था। कृषि एक गाँव का एक सम्मिलित रूप इसीलिए ही आज हमें दृष्टिगोचर होता है। इसी दृष्टि से प्राचीन गाँव कृषि व कृषक के नाम से ही संबंधित किए जाते हैं।

गाँवों के प्रमुख प्रकार
गाँवों के प्रमुख प्रकारों के बारें में भी विद्वानों में मतैक्य का अभाव पाया जाता है। भारत के संदर्भ में विद्वानों ने गाँवों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया है –

1. कोल्ब (Kolb) ने ग्रामीण जीवन में उपलब्ध सुविधाओं को ग्रामीण वर्गीकरण का आधार माना। है। इसी दृष्टि से उन्होंने गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है –
⦁    सहज सुविधा वाले गाँव
⦁     सीमित सुविधा वाले गाँव,
⦁    अपर्याप्त सुविधा वाले गाँव,
⦁    पूर्ण/आंशिक सुविधा वाले गाँव तथा
⦁    पूर्ण नगरीय सुविधायुक्त गाँव।

2. एस० सी० दुबे (S. C. Dube) के अनुसार भारतीय गाँवों या ग्रामीण समुदाय के वर्गीकरण के निम्नलिखित आधारों पर विभाजित किया है –
⦁    आकार, जनसंख्या और भू-भाग के आधार पर,
⦁    प्रजातीय संगठन और जाति संरचना,
⦁    भूस्वामित्व के प्रतिमान,
⦁    अधिकार संरचना और शक्ति का सोपान क्रम,
⦁    सामुदायिक अलगाव की मात्रा तथा
⦁    स्थानीय परंपराएँ।

3. सोरोकिन (Sorokin) के अनुसार जिमरमैन और गाल्पिन ने भू-स्वामित्व को ग्रामीण वर्गीकरण का आधार माना है, जो निम्नलिखित हैं –
⦁    संयुक्त भू-स्वामित्व वाले गाँव,
⦁    पट्टीदारी व्यवस्था वाले गाँव,
⦁    व्यक्तिगत भू-स्वामित्व वाले गाँव,
⦁    वह गाँव जहाँ पट्टीदार रहते हैं,
⦁    जहाँ जमींदारों के कारिंदे रहते हैं तथा
⦁    जहाँ नौकरीपेशा लोग तथा श्रमिक निवास करते हैं।

4. ऐतिहासिक विकास-क्रम की दृष्टि से – ऐतिहासिक विकास-क्रम की दृष्टि से गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    कृषकों का सामूहिक स्वामित्व ग्राम,
⦁    कृषकों के सामूहिक किराएदारी ग्राम,
⦁    कृषकों का व्यक्तिगत स्वामित्व ग्राम,
⦁    कृषकों के व्यक्तिगत किराएदारी ग्राम,
⦁    व्यक्तिगत कृषक मजदूरों के ग्राम तथा
⦁    राज्य व धर्म, कृषक मजदूरों के ग्राम।

5. संरचना के आधार पर – कर्वे (Karve) का विचार है कि संरचना ग्रामीण जीवन का मुख्य आधार है। अतः इन्होंने गाँव की संरचना को ध्यान में रखकर गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है
⦁    बिखरे हुए गाँव तथा
⦁    समूह गाँव।

6. भूमि-व्यवस्था के आधार पर – बेडन पावेल (Baden Powell) ने भूमि व्यवस्था के आधार पर गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है –
⦁    रैयतवारी गाँव तथा
⦁    सामूहिक गाँव।

7. भारतीय गाँवों का सामान्य वर्गीकरण – जनसंख्या और क्षेत्रफल दोनों ही दृष्टियों से भारत एक विशाल देश है। इस विशालता के कारण भारतीय गाँवों का वर्गीकरण एक समस्या है। भारतीय गाँवों का वर्गीकरण निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है –

(i) जनसंख्या के आधार पर – जनसंख्या की दृष्टि से भारतीय गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    बड़े गाँव,
⦁    मध्यम गाँव तथा
⦁    छोटे गाँव।
बड़े गाँवों की श्रेणी में 5,000 से अधिक जनसंख्या वाले गाँवों को सम्मिलित किया जा सकता है। छोटे गाँवों के अंतर्गत 500 से कम आबादी वाले गाँवों को सम्मिलित किया जाता है। जो गाँव 500 से अधिक तथा 5,000 से कम की आबादी के हैं, उनहें मध्यम श्रेणी के गाँवों में सम्मिलित किया जा सकता है।

(ii) क्षेत्रफल के आधार पर – क्षेत्रफल के आधार पर गाँवों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    सीमित गाँव तथा
⦁    विस्तृत गाँव।
विस्तृत गाँव वे हैं, जो विशाल क्षेत्रों में फैले होते हैं। इनका क्षेत्रफल काफी बड़ा होता है। इसके विपरीत सीमित क्षेत्रफल में फैले गाँव ‘सीमित गाँव’ के अंतर्गत रखे जा सकते हैं।

(iii) अर्थव्यवस्था के आधार पर – अर्थव्यवस्था के आधार पर गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    कृषिप्रधान गाँव,
⦁    उद्योगप्रधान गाँव तथा
⦁    मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले गाँव।
कृषिप्रधान गाँव वे हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था खेती पर आधारित है। इन गाँवों में निवास करने वाले व्यक्तियों का प्रमुख व्यवसाय खेती करना है। इसके विपरीत उद्योगप्रधान गाँव वे हैं, जिनमें ग्रामीण आवश्यकताओं की पूर्ति तथा जीवन-यापन के लिए कुटीर उद्योग का संपादन किया जाता है। इन उद्योगों में लकड़ी, लोहा, मिट्टी, चमड़े आदि के उद्योग सम्मिलित हैं। मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले गाँव वे हैं, जहाँ कृषि तथा उद्योग दोनों का ही मिला-जुला स्वरूप पाया जाता है।

(iv) सुविधाओं के आधार पर – ग्रामीण जीवन में उपलब्ध सुविधाओं के आधार पर गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    पूर्ण सुविधायुक्त गाँव,
⦁    आंशिक सुविधायुक्त गाँव तथा
⦁    सुविधाहीन गाँव।
पूर्ण सुविधायुक्त गाँवों की श्रेणी में उन गाँवों को रखा जाता है, जहाँ मानव जीवन की समस्त आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इन सुविधाओं में आवागमन तथा संचार, स्वास्थ्य तथा चिकित्सा, शिक्षा, सुरक्षा, व्यवसाय तथा व्यापार आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। सुविधाहीन गाँव वे हैं, जहाँ उपर्युक्त सुविधाएँ उपलब्ध नहीं है। आंशिक सुविधा युक्त गाँव इन दोनों के मध्य की स्थिति हैं, जहाँ कुछ सुविधाएँ भी हैं और कुछ असुविधाएँ भी।

(v) परिस्थितिशास्त्रीय आधार पर – नगरीय और ग्रामीण परिस्थितियों के आधार पर गाँवों को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    नगरीकृत गाँव,
⦁    अर्द्ध-नगरीकृत गाँव तथा
⦁    ग्रामीण गाँव।
नगरीकृत गाँवे वे हैं, जो विशाल नगरों के पास स्थित हैं। इन गाँवों की अर्थव्यवस्था तथा जीवन पूर्णतया नगरों पर आधारित होता है। इन गाँवों में कोलकाता, मुम्बई दिल्ली आदि के आस-पास स्थित गाँवों को सम्मिलित किया जा सकता है। ग्रामीण गाँव वे हैं, जो नगरीय सभ्यता से दूर स्थित हैं। वहाँ का वातावरण तथा जीवन ग्रामीण तत्त्वों पर आधारित है। अर्द्ध-नगरीय गाँव वे हैं, जो न तो पूर्णतया नगरीकृत हैं और न ही ग्रामीण।

(vi) अन्य वर्गीकरण – उपर्युक्त वर्गीकरण के अतिरिक्त गाँवों को अन्य अनेक भागों में विभाजित किया जा सकता है। ऐसे प्रमुख वर्गीकरण निम्नलिखित हैं
⦁    धार्मिक आधार पर गाँवों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    धर्मप्रधान गाँव तथा
⦁    मिश्रित धर्मप्रधान गाँव।
⦁    शैक्षणिक आधार पर गाँवों को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –
⦁    शिक्षित गाँव
⦁    अर्द्ध-शिक्षित गाँव तथा
⦁    अशिक्षित गाँव
⦁    धार्मिक व राजनीतिक आधार पर गाँवों को सत्ता पक्ष और सत्ता विरोधी इन दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।



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