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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

भारत की रक्षा तैयारी पर एक लेख लिखिए।यादेश की आन्तरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए सरकार को क्या उपाय करने चाहिए? उनमें से किन्हीं दो का उल्लेख कीजिए।

Answer»

भारत अपनी विस्तृत सीमा की सुरक्षा के लिए सजग एवं सावधान है। स्वाधीनता के बाद से ही भारत ने इस दिशा में सराहनीय कार्य किये हैं। प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय बजट में रक्षा के लिए पर्याप्त धनराशि की व्यवस्था की जाती रही है। वर्तमान सरकार ने बजट में रक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त धनराशि की व्यवस्था की है।

रक्षा बजट

भारत ने अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए निम्न तैयारियाँ की हैं

1. स्वाधीनता के बाद भारत ने रक्षा उत्पादों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण प्रयास किये हैं। भारत के इस प्रयास के फलस्वरूप आज 39 आर्डिनेन्स फैक्ट्रियाँ विविध रक्षा सामग्रियाँ का उत्पादन कर रही हैं।

2. युद्ध-काल में खाद्यान्न आदि की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सरकार ने खाद्यान्न उत्पादन एवं भण्डारण की समुचित व्यवस्था की है।

3. सरकार ने केन्द्रीय वार्षिक बजट में प्रतिवर्ष रक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था की है।

4. रक्षा उत्पादनों में गुणवत्ता और तेजी लाने के लिए सरकार ने 7 मई, 1980 को रक्षा अनुसन्धान और विकास नामक एक नये विभाग की स्थापना की है।

5. भारत सरकार ने सेना को आधुनिकतम तकनीक एवं अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित करने का प्रयास किया है। उल्लेखनीय है कि भारत 1998 में दूसरा परमाणु विस्फोट करके संसार के परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है।

6. भारत ने अपने सैनिकों को युद्ध-कला में और दक्ष बनाने, नये सैनिकों की भर्ती करने एवं उनके प्रशिक्षण के लिए देश में कई प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना की है।

7. अपने प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम के अन्तर्गत भारत त्रिशूल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश, नाग आदि प्रक्षेपास्त्रों के निर्माण में सफल रहा है।

2.

पंचशील समझौता कब हुआ?(क) 1950 ई० में(ख) 1960 ई० में(ग) 1945 ई० में(घ) 1954 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (घ) 1954 ई० में

3.

अन्त्योदय कार्यक्रम क्रियान्वित करने में अग्रणी राज्य है –(क) उत्तर प्रदेश(ख) राजस्थान(ग) हिमाचल प्रदेश(घ) बिहार

Answer»

सही विकल्प है (ख) राजस्थान

4.

‘असम राइफल्स’ पर टिप्पणी लिखिए।

Answer»

पूर्वोत्तर राज्यों में ‘असम राइफल्स’ सबसे पुराना पुलिस बल है। ‘असम राइफल्स’ का गठन सन् 1835 ई० में ‘कछार लेवी’ के नाम से किया गया था। इस पर पूर्वोत्तर क्षेत्र की आन्तरिक सुरक्षा और भारत-म्यांमार सीमा की सुरक्षा को दोहरा उत्तरदायित्व है। पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने में असम राइफल्स की भूमिका सराहनीय रही है। इस बल को प्यार से पूर्वोत्तर का प्रहरी’ और ‘पर्वतीय लोगों का मित्र’ कहा जाता है।

5.

भू-दान आन्दोलन कब प्रारम्भ किया गया?(क) 1951 ई० में(ख) 1952 ई० में(ग) 1953 ई० में(घ) 1954 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (क) 1951 ई० में

6.

संसद से क्या आशय है? संसद के दोनों सदनों का कार्यकाल बताइए।

Answer»

सभी लोकतंत्रीय राज्यों में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की एक संस्था होती है, जो कानूनों का निर्माण करती है।

भारत, इंग्लैण्ड तथा फ्रांस आदि राज्यों में इसे संसद नाम दिया गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में इस संस्था को कांग्रेस नाम दिया गया है। लोकसभा के सदस्यों का साधारण कार्यकाल 5 वर्ष है, परंतु राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह उसे इसके पाँच वर्ष पूरे होने से पहले भी भंग कर सकता है। राज्यसभा एक स्थायी सदन है, उसके सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। इसके 1/3 सदस्य प्रत्येक दो वर्ष के बाद रिटायर हो जाते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्य चुन लिए जाते हैं।

7.

प्रधानमंत्री की शक्तियाँ एवं कार्यों का विवरण दीजिए।

Answer»

प्रधानमंत्री की मुख्य शक्तियाँ एवं कार्यों का विवरण इस प्रकार है-

⦁    मंत्रिपरिषद का निर्माण करना – प्रधानमंत्री का मुख्य कार्य मंत्रिपरिषद् का निर्माण करना है, प्रधानमंत्री मंत्रियों की सूची तैयार करता है और राष्ट्रपति के सामने प्रस्तुत करता है। राष्ट्रपति इस सूची के अनुसार ही मंत्रियों को नियुक्त करता है। प्रधानमंत्री ही विभिन्न मंत्रियों के बीच विभागों का बँटवारा करता है।

⦁    मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता – प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल की बैठकें बुलाता है तथा उनकी अध्यक्षता करता है। इन बैठकों का कार्यक्रम भी प्रधानमंत्री द्वारा तैयार किया जाता है।

⦁    मंत्रियों को हटाना – यदि कोई मंत्री प्रधानमंत्री की नीति से असहमत होता है, तो प्रधानमंत्री उसे त्याग-पत्र देने के लिए कह सकता है। यदि वह ऐसा नहीं करता, तो प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से कहकर उसे पद से हटवा सकता

⦁    संसद का नेता – प्रधानमंत्री के परामर्श के अनुसार ही राष्ट्रपति द्वारा संसद का अधिवेशन बुलाया जाता है तथा स्थगित किया जाता है। संसद में सरकार की ओर से सभी महत्त्वपूर्ण घोषणाएँ प्रधानमंत्री द्वारा ही की जाती हैं।

⦁    नीति आयोग का अध्यक्ष (पूर्व में योजना आयोग) – प्रधानमंत्री नीति आयोग (पूर्व में योजना आयोग), जो देश के आर्थिक विकास के लिए नीतियों का निर्माण करता है, का अध्यक्ष होता है।

⦁    राष्ट्र का नेता – प्रधानमंत्री राष्ट्र का भी नेता है। जब देश पर किसी भी प्रकार का कोई संकट आता है, तो समस्त देश प्रधानमंत्री की ओर देखता है। प्रधानमंत्री से  ही यह आशा की जाती है कि वह देश को उस संकट से मुक्ति दिलाएगा। इस प्रकार प्रधानमंत्री ही देश का वास्तविक शासक होता है।

⦁    राष्ट्रपति तथा मंत्रिमंडल के बीच कड़ी – प्रधानमंत्री राष्ट्रपति तथा मंत्रिमंडल के बीच कड़ी का काम करता है। वह राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए निर्णयों के बारे में सूचित करता है तथा राष्ट्रपति की बात को मंत्रिमंडल के पास पहुँचाता है। मंत्री प्रधानमंत्री की पूर्व स्वीकृति से ही राष्ट्रपति से मिल सकते हैं।

⦁    नीति निर्धारण करना – देश की आंतरिक तथा बाहरी (विदेश) नीति के निर्धारण में प्रधानमंत्री बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

⦁    नियुक्तियाँ – राष्ट्रपति सभी उच्च सरकारी पदों पर नियुक्तियाँ प्रधानमंत्री के परामर्श के अनुसार ही करता है।

⦁    राष्ट्रपति का मुख्य सलाहकार – प्रधानमंत्री राष्ट्रपति का मुख्य सलाहकार होता है। राष्ट्रपति अपने सभी कार्य प्रधानमंत्री के परामर्श के अनुसार ही करता है।

8.

असम राइफल्स का गठन हुआ(क) 1835 ई० में(ख) 1935 ई० में(ग) 1951 ई० में(घ) 1953 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (क) 1835 ई० में

9.

उस मंत्रालय की पहचान करें जिसने निम्नलिखित समाचार जारी किया होगा –(क) देश से जूट का निर्यात बढ़ाने के लिए एक नई नीति बनाई जा रही है।1. रक्षा मंत्रालय(ख) ग्रामीण इलाकों में टेलीफोन सेवाएँ सुलभ कराई जाएँगी।2. कृषि, खाद्यान्न और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय(ग) सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बिकने वाले चावल और गेहूँ की कीमतें कम की जाएँगी।3. स्वास्थ्य मंत्रालय(घ) पल्स पोलियो अभियान शुरू किया जाएगा।4. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय(ङ) ऊँची पहाड़ियों पर तैनात सैनिकों के भत्ते बढ़ाए जाएँगे।(ङ) ऊँची पहाड़ियों पर तैनात सैनिकों के भत्ते बढ़ाए जाएँगे।

Answer»
(क) देश से जूट का निर्यात बढ़ाने के लिए एक नई नीति बनाई जा रही है।4. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय
(ख) ग्रामीण इलाकों में टेलीफोन सेवाएँ सुलभ कराई जाएँगी।5. संचार और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्रालय
(ग) सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बिकने वाले चावल और गेहूँ की कीमतें कम की जाएँगी।2. कृषि, खाद्यान्न और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय
(घ) पल्स पोलियो अभियान शुरू किया जाएगा।3. स्वास्थ्य मंत्रालय
(ङ) ऊँची पहाड़ियों पर तैनात सैनिकों के भत्ते बढ़ाए जाएँगे।1. रक्षा मंत्रालय

10.

विधायिका से क्या आशय है?

Answer»

विधायिका जनप्रतिनिधियों की वह सभी है जिसके पास देश का कानून बनाने की शक्ति होती है। कानून बनाने के अतिरिक्त विधायिका को करों में वृद्धि करने, बजट बनाने और दूसरे वित्त विधेयकों को बनाने का विशेष अधिकार होता है।

11.

लोकसभा वित्तीय मामलों में किन शक्तियों का प्रयोग करती है?

Answer»

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में वित्तीय मामलों में लोकसभा की शक्ति सर्वोच्च है। लोकसभा द्वारा एक बार सरकारी बजट अथवा धन संबंधी कोई कानून पास कर देने के बाद राज्यसभा इसे अस्वीकार नहीं कर सकती। राज्यसभा इसमें केवल 14 दिनों की देरी कर सकती है अथवा इसमें संशोधन का सुझाव दे सकती है। यह लोकसभा का अधिकार है कि वह उन सुझावों को माने या न माने।

12.

निम्नलिखित राजनैतिक संस्थाओं में से कौन-सी संस्था देश के मौजूदा कानून में संशोधन कर सकती है?(क) सर्वोच्च न्यायालय(ख) राष्ट्रपति(ग) प्रधानमंत्री(घ) संसद

Answer»

सही विकल्प है (घ) संसद

13.

होमगार्ड का गठन हुआ(क) 1946 ई० में(ख) 1948 ई० में(ग) 1949 ई० में(घ) 1950 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (क) 1946 ई० में

14.

देश की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में से उस राजनैतिक संस्था का नाम बताइए ने निम्नलिखित मामलों में अधिकारों का इस्तेमाल करती है-(क) सड़क, सिंचाई, जैसे बुनियादी ढाँचों के विकास और नागरिकों की विभिन्न कल्याणकारी गतिविधियों पर किता पैसा खर्च किया जाएगा।(ख) स्टॉक एक्सचेंज को नियमित करने संबंधी कानून बनाने की कमेटी के सुझाव पर विचार-विमर्श करती है।(ग) दो राज्य सरकारों के बीच कानूनी विवाद पर निर्णय लेती है।(घ) भूकंप पीड़ितों की राहत के प्रयासों के बारे में सूचना माँगती है।

Answer»

(क) लोकसभा (वित्त मंत्रालय)
(ख) संसद
(ग) सर्वोच्च न्यायालय
(घ) कार्यपालिका

15.

‘सार्क’ का प्रथम शिखर सम्मेलन सम्पन्न हुआ था(क) बंगलुरु में(ख) काठमाण्डू में(ग) इस्लामाबाद में(घ) ढाका में

Answer»

सही विकल्प है (घ) ढाका में

16.

न्यायपालिका भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा किस तरह करती है?

Answer»

भारतीय संविधान द्वारा भारत के नागरिकों को प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का उत्तरदायित्व भारत के सर्वोच्च न्यायालय को दिया गया है। यदि सरकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों को छीनती है या कोई नागरिक किसी दूसरे नागरिक को उसके मौलिक अधिकारों का प्रयोग स्वतंत्रतापूर्वक नहीं करने देता, तो वह नागरिक अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय की शरण ले सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ‘संवैधानिक उपचारों के अधिकार के अंतर्गत संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है। इन संवैधानिक उपचारों में बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा तथा उत्प्रेषण लेख आदि का प्रयोग नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए किया जाता है।

17.

भारत-भूटान मैत्री सन्धि कब हुई?(क) 1977 ई० में(ख) 1949 ई० में(ग) 1950 ई० में(घ) 1955 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (ख) 1949 ई० में

18.

दक्षेस का पन्द्रहवाँ शिखर सम्मेलन कहाँ हुआ ?

Answer»

दक्षेस का पन्द्रहवाँ शिखर सम्मेलन अप्रैल, 2008 ई० में कोलम्बो (श्रीलंका) में हुआ था।

19.

पंचशील के सिद्धान्तों को स्पष्ट कीजिए।

Answer»

29 अप्रैल, 1954 को भारत के प्रधानमन्त्री नेहरू और चीन के प्रमुख चाऊ एन लाई ने तिब्बत के सम्बन्ध में एक समझौता किया जिसे पंचशील के सिद्धान्त के रूप में जाना जाता है। ये सिद्धान्त हैं-

⦁    सभी देश एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता का सम्मान करें।
⦁    अनाक्रमण
⦁    एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
⦁    परस्पर समानता तथा लाभ के आधार पर कार्य करना।
⦁    शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व।

20.

भारत-पाकिस्तान के बीच दूसरा युद्ध हुआ था(क) 1965 ई० में(ख) 1970 ई० में(ग) 1971 ई० में(घ) 1972 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (ग) 1971 ई० में

21.

भारत-पाक के बीच शिमला समझौता हुआ(क) 1972 ई० में(ख) 1971 ई० में(ग) 1973 ई० में(घ) 1970 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (ख) 1971 ई० में

22.

भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकन्द समझौता कब हुआ ?

Answer»

भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकन्द समझौता सन् 1966 ई० में हुआ।

23.

पण्डित नेहरू के अनुसार गुटनिरपेक्षता का क्या अर्थ है?

Answer»

पण्डित नेहरू के अनुसार गुटनिरपेक्षता नकारात्मक तटस्थता, अप्रगतिशील अथवा उपदेशात्मक नीति नहीं है। इसका अर्थ सकारात्मक है अर्थात् जो उचित और न्यायसंगत है उसकी सहायता एवं समर्थन करना तथा जो अनुचित एवं अन्यायपूर्ण है उसकी आलोचना एवं निन्दा करना।

24.

न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं शक्तियों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

Answer»

देश में विद्यमान विभिन्न स्तरों के समस्त न्यायालयों को सामूहिक रूप से न्यायपालिका कहते हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता से आशय यह है कि यह विधायिका एवं कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त है। इसीलिए न्यायपालिका को सभी लोकतांत्रिक देशों में विशेष महत्त्व दिया गया है। भारतीय न्यायपालिका पूरे देश के लिए सर्वोच्च न्यायालय, राज्यों में उच्च न्यायालयों, जिला न्यायालयों तथा स्थानीय न्यायालयों से मिलकर बनी है। भारतीय न्यायपालिका पूरे विश्व में सबसे अधिक शक्तिशाली है।

भारत की न्यायपालिका एकीकृत है। इसका अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायालय पूरे देश में न्यायिक प्रशासन को नियंत्रित करता है। वह इनमें से किसी भी विवाद की सुनवाई कर सकता है।

⦁    देश के नागरिकों के बीच;
⦁    नागरिकों एवं सरकार के बीच;
⦁    दो या इससे अधिक राज्य सरकारों के बीच;
⦁    केन्द्र और राज्य सरकार के बीच।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ है कि यह विधायिका अथवा कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त है। न्यायाधीश सरकार के निर्देशों या सत्ताधारी दलों की इच्छा के अनुसार काम नहीं करते। यही कारण है कि सभी आधुनिक लोकतंत्रों में अदालतें, विधायिका और कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त होती हैं। सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को देश के संविधान की व्याख्या करने का अधिकार है। अगर उसे लगता है कि विधायिका का कोई कानून अथवा कार्यपालिका की कोई कार्रवाई संविधान के विरुद्ध है तो यह उसे केन्द्र अथवा राज्य स्तर पर अमान्य घोषित कर सकती है। इस प्रकार जब इसके सामने किसी कानून या कार्यपालिका की कार्रवाई को चुनौती मिलती है तो वह उसकी संवैधानिक वैधता तय करती है।

इसे न्यायिक समीक्षा के नाम से जाना जाता है। न्यायिक समीक्षा सर्वोच्च न्यायालय की वह शक्ति है जिसके द्वारा वह विधायिका द्वारा पारित कानून अथवा कार्यपालिका द्वारा की गई कार्रवाई को यह जानने के लिए प्रयोग कर सकती है कि उक्त कानून या कार्रवाई संविधान द्वारा निषिद्ध है अथवा नहीं। यदि न्यायालय यह पाता है कि कोई कानून अथवा आदेश संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है तो यह ऐसे कानून या आदेश को अमान्य घोषित कर सकता है।

25.

दक्षेस का पूरा नाम लिखिए।

Answer»

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC : South Asian Association for Regional Co-operation)।

26.

शिमला समझौता क्या है?

Answer»

भारत-पाक युद्ध सन् 1971 के बाद जुलाई 1972 में शिमला में भारत की तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमन्त्री जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच एक समझौता हुआ जिस्से ‘शिमला समझौता’ कहा जाता है।

27.

भारत-पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता कब हुआ ?

Answer»

भारत-पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता सन् 1971 ई० में हुआ।

28.

ग्रुप चार (G-4) का संगठन क्यों किया गया?

Answer»

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता के लिए अपनी सशक्त दावेदारी प्रस्तुत करने के उद्देश्य से चार देशों—भारत, ब्राजील, जर्मनी व जापान ने ग्रुप चार (G-4) नामक संगठन बनाया। इन चारों देशों ने इस संगठन के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र संघ में सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता के लिए एक-दूसरे का पूर्ण सहयोग करने का निर्णय लिया है।

29.

गुटनिरपेक्ष नीति से भारत को मिलने वाले दो लाभ बताइए।

Answer»

⦁    गुटनिरपेक्ष नीति अपनाकर ही भारत शीतयुद्ध काल में दोनों गुटों से सैन्य व आर्थिक सहायता प्राप्त करने में सफल रहा।
⦁    इस नीति के कारण ही भारत को कश्मीर समस्या पर रूस का हमेशा समर्थन मिला।

30.

शिमला समझौता कब हुआ? इसके प्रमुख प्रावधान लिखिए।

Answer»

शिमला समझौता-28 जून, 1972 को श्रीमती इन्दिरा गांधी एवं जुल्फिकार अली भुट्टो के द्वारा शिमला में दोनों देशों के मध्य जो समझौता हुआ उसे शिमला समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के निम्नलिखित प्रमुख प्रावधान थे-

⦁    दोनों देश सभी विवादों एवं समस्याओं के शान्तिपूर्ण समाधान के लिए सीधी वार्ता करेंगे।
⦁    दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध दुष्प्रचार नहीं करेंगे।
⦁    दोनों देश सम्बन्धों को सामान्य बनाने के लिए
⦁    संचार सम्बन्ध फिर से स्थापित करेंगे।
⦁    आवागमन की सुविधाओं का विस्तार करेंगे।
⦁    व्यापार एवं आर्थिक सहयोग स्थापित करेंगे।
⦁    विज्ञान एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में आदान-प्रदान करेंगे।
⦁    स्थायी शान्ति स्थापित करने हेतु हर सम्भव प्रयास किए जाएंगे।
⦁    भविष्य में दोनों सरकारों के अध्यक्ष मिलते रहेंगे।

31.

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना के लिए कौन-कौन उत्तरदायी थे?

Answer»

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना (जन्मदाता) के रूप में भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। सर्वप्रथम नेहरू जी ने इस नीति को भारत के लिए उपयुक्त समझा। इसके बाद सन् 1935 के बाण्डंग सम्मेलन के दौरान नासिर (मिस्र) एवं टीटो (यूगोस्लाविया) के साथ मिलकर इसे विश्व आन्दोलन बनाने पर सहमति प्रकट की।

32.

भारत के प्रधानमंत्री की तीन शक्तियों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

प्रधानमंत्री की तीन प्रमुख शक्तियाँ इस प्रकार हैं-

⦁    प्रधानमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद् का निर्माण करता है। मंत्रिपरिषद् के सभी सदस्य प्रधानमंत्री की सिफारिश के अनुसार ही राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति किए जाते हैं।

⦁    प्रधानमंत्री मंत्रियों के बीच विभागों का विभाजन करता है।

⦁    प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल की बैठकें बुलाता है तथा उनकी अध्यक्षता करता है।

33.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-51 में विदेश नीति के दिए गए संवैधानिक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। अथवा भारतीय विदेश नीति के संवैधानिक सिद्धान्तों को सूचीबद्ध कीजिए।

Answer»

⦁    अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा में अभिवृद्धि।
⦁    राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण एवं सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाए रखना।
⦁    अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने का प्रयास करना।
⦁    संगठित लोगों के परस्पर व्यवहारों में अन्तर्राष्ट्रीय विधि और सन्धियों के प्रति आदर की भावना रखना।

34.

भारतीय विदेश नीति में साधनों की पवित्रता से क्या अर्थ है?

Answer»

भारत की विदेश नीति में साधनों की पवित्रता से तात्पर्य है-अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान करने में शान्तिपूर्ण तरीकों का समर्थन तथा हिंसात्मक एवं अनैतिक साधनों का विरोध करना। भारतीय विदेश नीति का यह तत्त्व अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को परस्पर घृणा तथा सन्देह की भावना से दूर रखना चाहता है।

35.

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्रमुख उपलब्धियाँ बताइए।

Answer»

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्रमुख उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं-

1. गुटनिरपेक्षता की नीति को मान्यता प्रारम्भ में जब गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का आरम्भ हुआ तो विश्व के विकसित व अविकसित राष्ट्रों ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया तथा इसे राजनीति के विरुद्ध एक संकल्पना का नाम दिया। अत: गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के प्रवर्तकों ने यह सोचा कि इसके विषय में राष्ट्रों को कैसे समझाया जाए एवं विश्व के राष्ट्रों से इसे कैसे मान्यता दिलवाई जाए? विश्व के दोनों राष्ट्र अमेरिका एवं सोवियत संघ कहते हैं कि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन एक छलावे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। अतः विश्व के राष्ट्रों को किसी एक गुट में अवश्य शामिल हो जाना चाहिए, परन्तु गुटनिरपेक्ष आन्दोलन अपनी नीतियों पर दृढ़ रहा।
2. शीतयुद्ध के भय को दूर करना-शीतयुद्ध के कारण अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में तनाव का वातावरण था लेकिन गुटनिरपेक्षता की नीति ने इस तनाव को शिथिलता की दशा में लाने के लिए अनेक प्रयास किए तथा इसमें सफलता प्राप्त की।
3. विश्व के संघर्षों को दूर करना–गुटनिरपेक्षता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने विश्व में होने वाले कुछ भयंकर संघर्षों को टाल दिया था। धीरे-धीरे उनके समाधान भी ढूँढ लिए गए। गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों में आण्विक शस्त्र के खतरों को दूर करके अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में शान्ति व सुरक्षा को बनाने में योगदान दिया। विश्व के छोटे-छोटे विकासशील तथा विकसित राष्ट्रों को दो भागों में विभक्त होने से रोका।
गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने सर्वोच्च शक्तियों को हमेशा यही प्रेरणा दी कि “संघर्ष अपने लक्ष्य से सर्वनाश लेकर चलता है” इसलिए इससे बचकर चलने में ही विश्व का कल्याण है। इसके स्थान पर यदि सर्वोच्च शक्तियाँ विकासशील राष्ट्रों के कल्याण के लिए कुछ कार्य करती हैं तो इससे अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को भी बल मिलेगा। उदाहरणार्थ-गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने कोरिया युद्ध, बर्लिन का संकट, इण्डो-चीन संघर्ष, चीनी तटवर्ती द्वीप समूह का विवाद (1955) एवं स्वेज नहर युद्ध (1956) जैसे संकटों के सम्बन्ध में निष्पक्ष तथा त्वरित समाधान के सुझाव देकर विश्व को भयंकर आग की लपटों में जाने से बचा लिया।
4. निःशस्त्रीकरण एवं शस्त्र नियन्त्रण की दिशा में भूमिका-गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के देशों ने निःशस्त्रीकरण तथा शस्त्र नियन्त्रण के लिए विश्व में अवसर तैयार किया है। यद्यपि इस क्षेत्र में गुटनिरपेक्ष देशों को तुरन्त सफलता नहीं मिली, तथापि विश्व के राष्ट्रों को यह भरोसा होने लगा कि हथियारों को बढ़ावा देने से विश्वशान्ति संकट में पड़ सकती है। यह गुटनिरपेक्षता का ही परिणाम है कि सन् 1954 में आण्विक अस्त्र के परीक्षण पर प्रतिबन्ध लग गया तथा सन् 1963 में आंशिक परीक्षण पर प्रतिबन्ध स्वीकार किए गए।
5. संयुक्त राष्ट्र संघ का सम्मान-गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने विश्व संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ का भी हमेशा सम्मान किया, साथ ही संगठन के वास्तविक रूप को रूपान्तरित करने में सहयोग किया। पहली बात तो यह है कि गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों की संख्या इतनी है कि शीतयुद्ध के वातावरण को तटस्थता की नीति के रूप में बदलाव करने में राष्ट्रों के संगठन की बात सुनी गयी। इससे छोटे राष्ट्रों पर संयुक्त राष्ट्र संघ का नियन्त्रण सरलतापूर्वक लागू हो सका था। गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के महत्त्व को बढ़ावा देने में भी सहायता दी।
6. आर्थिक सहयोग का वातावरण बनाना-गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने विकासशील राष्ट्रों के बीच अपनी विश्वसनीयता का ठोस प्रमाण दिया जिस कारण विकासशील राष्ट्रों को समय-समय पर आर्थिक सहायता प्राप्त हो सकी। कोलम्बो शिखर सम्मेलन में जो आर्थिक घोषणा-पत्र तैयार किया गया जिसमें गटनिरपेक्ष राष्ट्रों के बीच ज्यादा-से-ज्यादा आर्थिक सहयोग की स्थिति निर्मित हो सके। इस प्रकार से गुटनिरपेक्षता का आन्दोलन आर्थिक सहयोग का एक संयुक्त मोर्चा है।

36.

राष्ट्रपति किस परिस्थिति में संकटकालीन स्थिति की घोषणा कर सकता है?

Answer»

राष्ट्रपति निम्न तीन स्थितियों में संकटकाल की घोषणा कर सकता है-

⦁    युद्ध, विदेशी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह होने की स्थिति में।

⦁    किसी राज्य में संवैधानिक मशीनरी के विफल होने की स्थिति में।

⦁    देश की वित्तीय स्थिति खराब होने की स्थिति में।

37.

भारत की विदेशी नीति की एक विशेषता के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के शान्तिपूर्ण समाधान’ पर एक टिप्पणी लिखिए।

Answer»

आधुनिक समय में प्रत्येक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्रों के साथ सम्पर्क स्थापित करने के लिए विदेश नीति निर्धारित करनी पड़ती है। सामान्य शब्दों में, विदेश नीति से अभिप्राय उस नीति से है जो एक देश द्वारा अन्य देशों के प्रति अपनाई जाती है। भारत ने भी स्वतन्त्र विदेश नीति अपनाई। इसकी अनेक विशेषताएँ हैं और उनमें से एक विशेषता है—अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का शान्तिपूर्ण समाधान। इस कार्य के सफलतापूर्वक संचालन हेतु भारत ने विश्व को पंचशील के सिद्धान्त दिए तथा हमेशा ही संयुक्त राष्ट्र संघ का समर्थन किया। समय-समय पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किए गए शान्ति प्रयासों में भारत ने हर प्रकार की सहायता प्रदान की, जैसे-स्वेज नहर की समस्या, हिन्द-चीन का प्रश्न, वियतनाम की समस्या, कांगो की समस्या, साइप्रस की समस्या, भारत-पाकिस्तान युद्ध, ईरान-इराक युद्ध आदि अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के शान्तिपूर्ण समाधान के लिए भारत ने भरसक प्रयास किए तथा अपने अधिकांश प्रयत्नों में सफलता प्राप्त की।

38.

भारतीय संविधान में दिए गए विदेश नीति सम्बन्धी राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए।

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भारत के संविधान में राजनीति के निर्देशक सिद्धान्तों में केवल राज्य की आन्तरिक नीति से सम्बन्धित ही निर्देश नहीं दिए गए हैं बल्कि भारत को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए, के बारे में भी निर्देश दिए गए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-51 में ‘अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा के बढ़ावे’ के लिए राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धान्तों के माध्यम से कहा गया है कि राज्य-

⦁    अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का,
⦁    राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाए रखने का,
⦁    संगठित लोगों से एक-दूसरे से व्यवहार में अन्तर्राष्ट्रीय विधि और सन्धि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और
⦁    अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को पारस्परिक बातचीत द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा।

39.

शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का अर्थ क्या है?

Answer»

शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का अर्थ है-जिस व्यक्ति या देश के साथ मतभेद हों, उसके साथ भी शान्तिपूर्वक रहना।

40.

भारत की विदेशी नीति के प्रमुख सिद्धान्त एवं विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Answer»

एक राष्ट्र के रूप में भारत का उदय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में हुआ था। ऐसे में भारत ने अपनी विदेश नीति में अन्य सभी देशों की सम्प्रभुता का सम्मान करने तथा शान्ति कायम करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य सामने रखा। अत: उसने अपनी विदेश नीति को राष्ट्रीय हितों के सिद्धान्त पर आधारित किया है। भारत की विदेश नीति के मूलभूत सिद्धान्तों (विशेषताओं) का विवेचन निम्न प्रकार है-

1. गुटनिरपेक्षता की नीति–द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व दो गुटों में बँट गया था। इसमें से एक पश्चिमी देशों का गुट था तथा दूसरा साम्यवादी देशों का। दोनों महाशक्तियों ने भारत को अपने पीछे लगाने के अनेक प्रयास किए, लेकिन भारत ने दोनों ही प्रकार के सैन्य गुटों से अलग रहने का निश्चय किया और तय किया कि वह किसी भी सैन्य गठबन्धन का सदस्य नहीं बनेगा। वह स्वतन्त्र विदेश नीति अपनाएगा और प्रत्येक राष्ट्रीय महत्त्व के प्रश्न पर स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष रूप से विचार करेगा। पं० नेहरू के शब्दों में, “गुटनिरपेक्षता शान्ति का मार्ग तथा लड़ाई के बचाव का मार्ग है। इसका उद्देश्य सैन्य गुटबन्दियों से दूर रहना है।”
2. उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद का विरोध-साम्राज्यवादी देश दूसरे देशों की स्वतन्त्रता का अपहरण करके उनका शोषण करते रहते हैं। संघर्ष तथा युद्धों का सबसे बड़ा कारण साम्राज्यवाद है। भारत स्वयं साम्राज्यवादी शोषण का शिकार रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के अधिकांश राष्ट्र स्वतन्त्र हो गए पर साम्राज्यवाद का अभी पूर्ण विनाश नहीं हो पाया। भारत ने एशियाई तथा अफ्रीकी देशों की स्वतन्त्रता का स्थागत किया है।
3. अन्य देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध–भारत की विदेश नीति की अन्य विशेषता यह है कि भारत विश्व के अन्य देशों से अच्छे सम्बन्ध बनाने हेतु हमेशा तैयार रहता है। भारत ने न केवल मित्रतापूर्ण सम्बन्ध एशिया के देशों से ही बनाए हैं बल्कि उसने विश्व के अन्य देशों से भी सम्बन्ध बनाए हैं। भारत के नेताओं ने कई बार घोषणा भी की है कि भारत सभी देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है।
4. पंचशील तथा शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व-पंचशील का अर्थ है-पाँच सिद्धान्त। ये सिद्धान्त हमारी विदेश नीति के मूल आधार हैं। इन पाँच सिद्धान्तों के लिए ‘पंचशील’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 29 अप्रैल, 1954 में किया गया था। ये ऐसे सिद्धान्त हैं कि यदि इन पर विश्व के सभी देश चलें तो विश्व में शान्ति स्थापित हो सकती है। ये पाँच सिद्धान्त अग्रलिखित हैं-
⦁    एक-दूसरे की अखण्डता और प्रभुसत्ता को बनाए रखना।
⦁    एक-दूसरे पर आक्रमण न करना।
⦁    एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
⦁    शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को मानना।
⦁    आपस में समानता और मित्रता की भावना को बनाए रखना।
5. राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा-भारत शुरू से ही एक शान्तिप्रिय देश रहा है इसीलिए उसने अपनी विदेश नीति को राष्ट्रीय हितों के सिद्धान्त पर आधारित किया है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी भारत ने अपने उद्देश्य मैत्रीपूर्ण रखे हैं। इन उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए भारत ने संसार के समस्त देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए हैं। इसी कारण आज भारत आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में शीघ्रता से उन्नति कर रहा है। इसके साथ-साथ वर्तमान समय में भारत के सम्बन्ध विश्व की महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका तथा रूस और अन्य लगभग समस्त देशों के साथ मैत्रीपूर्ण तथा अच्छे हैं।

41.

‘शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व’ से आप क्या समझते हैं?

Answer»

भारतीय विदेश नीति का सार ‘शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व’ है। शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का अर्थ है-बिना किसी मनमुटाव के मैत्रीपूर्ण ढंग से एक देश का दूसरे देश के साथ रहना। यदि भिन्न राष्ट्र एक-दूसरे के साथ पड़ोसियों की तरह नहीं रहेंगे तो विश्व में शान्ति की स्थापना नहीं हो सकती। शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व विदेश नीति का एकमात्र सिद्धान्त ही नहीं है बल्कि यह राज्यों के बीच व्यवहार का एक तरीका भी है।
भारत एशिया की महाशक्ति बनने की इच्छा नहीं रखता है तथा पंचशील और गुटनिरपेक्षता की नीति से समर्थित शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में आस्था रखता है। पंचशील के सिद्धान्त हमारी विदेश नीति के मूलाधार हैं। पंचशील के ये सिद्धान्त ऐसे हैं कि यदि इन पर विश्व के सभी देश अमल करें तो शान्ति स्थापित हो सकती है। पंचशील के इन सिद्धान्तों में से एक प्रमुख सिद्धान्त है-“शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को मानना।” शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धान्तों यानि पंचशील की घोषणा भारत के प्रधानमन्त्री नेहरू और चीन के प्रमुख चाऊ एन लाई ने संयुक्त रूप से 29 अप्रैल, 1954 में की।

42.

बड़ा घनचक्कर है! क्या यहाँ सारा मामला परमाणु बम बनाने का नहीं है? हम ऐसा सीधे-सीधे क्यों नहीं कहते?

Answer»

भारत ने सन् 1974 में परमाणु परीक्षण किया तो इसे उसने शान्तिपूर्ण परीक्षण करार दिया। भारत ने मई 1998 में परमाणु परीक्षण किए तथा यह जताया कि उसके पास सैन्य उद्देश्यों के लिए अणु शक्ति को प्रयोग में लाने की क्षमता है। इस दृष्टि से यह मामला यद्यपि परमाणु बम बनाने का ही था तथापि भारत की परमाणु नीति में सैद्धान्तिक तौर पर यह बात स्वीकार की गई है कि भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा लेकिन इन हथियारों का प्रयोग ‘पहले नहीं करेगा।

43.

भारत की विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता का महत्त्व बताइए। भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति क्यों अपनाई है?

Answer»

भारत की विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता का महत्त्व गुटनिरपेक्षता का अर्थ है कि भारत अन्तर्राष्ट्रीय विषयों के सम्बन्ध में अपनी स्वतन्त्र निर्णय लेने की नीति का पालन करता है। भारत ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद अपनी विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्त को अत्यधिक महत्त्व दिया। भारत प्रत्येक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या का समर्थन या विरोध उसमें निहित गुण और दोषों के आधार पर करता है। भारत ने यह नीति अपने देश के राजनीतिक, आर्थिक और भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए अपनाई है। भारत की विभिन्न सरकारों ने अपनी विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता की नीति ही अपनाई है।

भारत द्वारा गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण-

⦁    किसी भी गुट के साथ मिलने तथा उसका पिछलग्गू बनने से राष्ट्र की स्वतन्त्रता कुछ अंश तक अवश्य प्रभावित होती है।
⦁    भारत ने अपने को गुट संघर्ष में शामिल करने की अपेक्षा देश की आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक प्रगति की ओर ध्यान देने में अधिक लाभ समझा क्योंकि हमारे सामने अपनी प्रगति अधिक महत्त्वपूर्ण है।
⦁    भारत स्वयं एक महान देश है तथा इसे अपने क्षेत्र में अपनी स्थिति को महत्त्वपूर्ण बनाने हेतु किसी बाहरी शक्ति की आवश्यकता नहीं थी।

44.

भारत की विदेश नीति के प्रमुख लक्ष्यों अथवा उद्देश्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

Answer»

भारतीय विदेश नीति का प्रमुख लक्ष्य अथवा उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की पूर्ति व विकास करना है। भारतीय विदेश नीति के प्रमुख लक्ष्य निम्नलिखित हैं-

⦁    अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा का समर्थन करना एवं पारस्परिक मतभेदों के शान्तिपूर्ण समाधान का प्रयास करना।
⦁    शस्त्रों की होड़-विशेष तौर से आण्विक शस्त्रों की होड़ का विरोध करना व व्यापारिक निःशस्त्रीकरण का समर्थन करना।
⦁    राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देना जिससे राष्ट्र की स्वतन्त्रता व अखण्डता पर मँडराने वाले हर प्रकार के खतरे को रोका जा सके।
⦁    विश्वव्यापी तनाव दूर करके पारस्परिक समझौते को बढ़ावा देना तथा संघर्ष नीति व सैन्य गुटबाजी का विरोध करना।
⦁    साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, नस्लवाद, पृथकतावाद एवं सैन्यवाद का विरोध करना।
⦁    शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा पंचशील के आदर्शों को बढ़ावा देना।
⦁    विश्व के समस्त राष्ट्रों विशेष रूप से पड़ोसी राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना।

45.

अगर आपको भारत की विदेश नीति के बारे में फैसला लेने को कहा जाए तो आप इसकी किन बातों को बदलना चाहेंगे? ठीक इसी तरह यह भी बताएँ कि भारत की विदेश नीति के किन दो पहलुओं को आप बरकरार रखना चाहेंगे? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।

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भारतीय विदेश नीति में निम्नलिखित दो बदलाव लाना चाहूँगा-
⦁    मैं वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति में बदलाव लाना चाहूँगा क्योंकि वर्तमान वैश्वीकरण और उदारीकरण के युग में किसी भी गुट से अलग रहना देश-हित में नहीं है।
⦁    मैं, भारत की विदेश नीति में चीन एवं पाकिस्तान के साथ जिस प्रकार की नीति अपनाई जा रही है उसमें बदलाव लाना चाहूँगा, क्योंकि इसके वांछित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं।

इसके अतिरिक्त मैं भारतीय विदेश नीति के निम्नलिखित दो पहलुओं को बरकरार रखना चाहूँगा-
⦁    सी०टी०बी०टी० के बारे में वर्तमान दृष्टिकोण को और परमाणु नीति की वर्तमान नीति को जारी रखंगा।
⦁    मैं संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता जारी रखते हुए विश्व बैंक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में सहयोग जारी रगा।

46.

भारत व चीन के मध्य अच्छे सम्बन्ध बनाने हेतु दो सुझाव दीजिए।

Answer»

⦁    दोनों पक्ष सीमा विवादों के निपटारे के लिए वार्ताएँ जारी रखें तथा सीमा क्षेत्र में शान्ति बनाए रखें।
⦁    दोनों देशों को द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि करने का प्रयास करना चाहिए।

47.

विलय नीति का सम्बन्ध है-(क) नाना साहब से(ख) डलहौजी से(ग) टीपू सुल्तान से(घ) हैदर अली से

Answer»

सही विकल्प है ख) डलहौजी से

48.

भारत की विदेश नीति का निर्माण शान्ति और सहयोग के सिद्धान्तों को आधार मानकर हुआ। लेकिन 1962-1971 की अवधि यानी महज दस सालों में भारत को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि यह भारत की विदेश नीति की असफलता है अथवा आप इसे अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम मानेंगे? अपने मन्तव्य के पक्ष में तर्क दीजिए।

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भारत की विदेश नीति के निर्माण में पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अहम भूमिका निभाई। वे प्रधानमन्त्री के साथ-साथ विदेशमन्त्री भी थे। प्रधानमन्त्री और विदेशमन्त्री के रूप में सन् 1947 से 1964 तक उन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना तथा उसके क्रियान्वयन पर गहरा प्रभाव डाला। उनके अनुसार विदेश नीति के तीन बड़े उद्देश्य थे-

⦁    कठिन संघर्ष से प्राप्त सम्प्रभुता को बनाए रखना,
⦁    क्षेत्रीय अखण्डता को बनाए रखना।
⦁    तेजी के साथ विकास (आर्थिक) करना। नेहरू जी उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर हासिल करना चाहते थे।
स्वतन्त्र भारत की विदेश नीति में शान्तिपूर्ण विश्व का सपना था और इसके लिए भारत ने गुटनिरपेक्षता का पालन किया। भारत ने इसके लिए शीतयुद्ध में उपजे तनाव को कम करने की कोशिश की तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के शान्ति-अभियानों में अपनी सेना भेजी। भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर स्वतन्त्र रवैया अपनाया।

दुर्भाग्यवश सन् 1962 से 1972 की अवधि में भारत को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा। सन् 1962 में चीन के साथ युद्ध हुआ। सन् 1965 में भारत को पाकिस्तान के साथ युद्ध करना पड़ा तथा तीसरा युद्ध सन् 1971 में भारत-पाक के मध्य ही हुआ। वास्तव में भारत की विदेश नीति का निर्माण शान्ति और सहयोग के सिद्धान्तों को आधार मानकर हुआ लेकिन सन् 1962 से 1973 की अवधि में जिन तीन युद्धों का सामना भारत को करना पड़ा उन्हें विदेश नीति की असफलता का परिणाम नहीं कहा जा सकता। बल्कि इसे अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम माना जा सकता है।

इसके पक्ष में तर्क इस प्रकार हैं
(1) भारत की विदेश नीति शान्ति और सहयोग के आधार पर टिकी हुई है। शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धान्तों यानी पंचशील की घोषणा भारत के प्रधानमन्त्री नेहरू और चीन के प्रमुख चाऊ एन लाई ने संयुक्त रूप से 29 अप्रैल, 1954 में की। परन्तु चीन ने विश्वासघात किया। चीन ने सन् 1956 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। इससे भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक रूप से जो एक मध्यवर्ती राज्य बना चला आ रहा था, वह खत्म हो गया। तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा ने भारत से राजनीतिक शरण माँगी और सन् 1959 में भारत ने उन्हें ‘शरण दी। चीन ने आरोप लगाया कि भारत सरकार अन्दरूनी तौर पर चीन विरोधी गतिविधियों को हवा दे रही है। चीन ने अक्टूबर 1962 में बड़ी तेजी से तथा व्यापक स्तर पर भारत पर हमला किया।
(2) कश्मीर मामले पर पाकिस्तान के साथ बँटवारे के तुरन्त बाद ही संघर्ष छिड़ गया था। दोनों देशों के बीच सन् 1965 में कहीं ज्यादा गम्भीर किस्म के सैन्य-संघर्ष की शुरुआत हुई। परन्तु उस समय लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारत सरकार की विदेश नीति असफल नहीं हुई। भारतीय प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के जनरल अयूब खान के बीच सन् 1966 में ताशकन्द-समझौता हुआ। सोवियत संघ ने इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इस प्रकार उस महान नेता की आन्तरिक नीति के साथ-साथ भारत की विदेश नीति की धाक भी जमी।
(3) बंगलादेश के मामले पर सन् 1971 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने एक सफल कूटनीतिज्ञ की भूमिका में बंगलादेश का समर्थन किया तथा एक शत्रु देश की कमर स्थायी रूप से तोड़कर यह सिद्ध किया कि युद्ध में सब जायज है तथा “हम पाकिस्तान के बड़े भाई हैं’ ऐसे आदर्शवादी नारों का व्यावहारिक तौर पर कोई स्थान नहीं है।
(4) विदेशी सम्बन्ध राष्ट्र हितों पर टिके होते हैं। राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। ऐसा भी नहीं है कि हमेशा आदर्शों का ही ढिंढोरा पीटा जाए। हम परमाणु शक्ति-सम्पन्न हैं, सुरक्षा परिषद् में स्थायी स्थान प्राप्त करेंगे तथा राष्ट्र की एकता व अखण्डता, भू-भाग, आत्म-सम्मान व यहाँ के लोगों के जान-माल की रक्षा भी करेंगे। वर्तमान परिस्थितियाँ इस प्रकार की हैं कि हमें समानता से हर मंच व हर स्थान पर अपनी बात कहनी होगी तथा यथासम्भव अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति, सुरक्षा, सहयोग व प्रेम को बनाए रखने का प्रयास भी करना होगा।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सन् 1962-1972 के बीच तीन युद्ध भारत की विदेश नीति की असफलता नहीं बल्कि तत्कालीन परिस्थितियों का ही परिणाम थे।

49.

क्या भारत की विदेश नीति से यह झलकता है कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है? 1971 के बंगलादेश युद्ध के सन्दर्भ में इस प्रश्न पर विचार करें।

Answer»

भारत की विदेश नीति से यह बिल्कुल भी नहीं झलकता है कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है। सन् 1971 का बंगलादेश युद्ध इस बात को बिल्कुल साबित नहीं करता। बंगलादेश के निर्माण के लिए स्वयं पाकिस्तान की पूर्वी पाकिस्तान के प्रति उपेक्षापूर्ण नीतियाँ थीं। भारत एक शान्तिप्रिय देश है। वह शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीतियों में विश्वास करता आया है।

भारत द्वारा सन् 1971 में बंगलादेश के मामले में हस्तक्षेप-अवामी लीग के अध्यक्ष शेख मुजीबुर्रहमान थे तथा सन् 1970 के चुनाव में उनके दल को बड़ी सफलता प्राप्त हुई। चुनाव परिणामों के आधार पर संविधान सभा की बैठक बुलाई जानी चाहिए थी, जिसमें मुजीब के दल को बहुमत प्राप्त था। शेख मुजीब को बन्दी बना लिया गया। उसके साथ ही अवामी लीग के और नेताओं को भी बन्दी बना लिया गया। पाकिस्तानी ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्म ढाए तथा बड़ी संख्या में वध किए गए। जनता ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाई तथा पाकिस्तान से अलग होकर स्वतन्त्र राज्य बनाने की घोषणा की तथा आन्दोलन चलाया गया। सेना ने अपना दमन चक्र और तेज कर दिया। इस जुल्म से बचने के लिए लाखों व्यक्ति पूर्वी पाकिस्तान को छोड़कर भारत आ गए। भारत के लिए इन शरणार्थियों को सँभालना कठिन हो गया। भारत ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के प्रति नैतिक सहानुभूति दिखाई तथा उसकी आर्थिक सहायता भी की। पाकिस्तान ने भारत पर आरोप लगाया कि वह उसके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है। पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा पर आक्रमण कर दिया। भारत ने दोनों तरफ पश्चिमी और पूर्वी सीमा के पार पाकिस्तान पर जवाबी हमला किया तथा दस दिन के अन्दर ही पाकिस्तान के 90,000 सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया और बंगलादेश का उद्भव हुआ।

कुछ राजनीतिज्ञों का मत है कि भारत दक्षिण एशिया क्षेत्र में महाशक्ति की भूमिका का निर्वाह करना चाहता है। वैसे इस क्षेत्र में भारत स्वाभाविक रूप से ही एक महाशक्ति है। परन्तु भारत ने क्षेत्रीय महाशक्ति बनने की आकांक्षा कभी नहीं पाली। भारत ने बंगलादेश युद्ध के समय भी पाकिस्तान को धूल चटायी लेकिन उसके बन्दी बनाए गए सैनिकों को ससम्मान रिहा किया। भारत अमेरिका जैसी महाशक्ति बनना नहीं चाहता जिसने छोटे-छोटे देशो को अपने गुट में शामिल करने के प्रयास किए तथा अपने सैन्य संगठन बनाए। यदि भारत महाशक्ति की भूमिका का निर्वाह करना चाहता तो सन् 1965 में पाकिस्तान के विजित क्षेत्रों को वापस न करता तथा सन् 1971 के युद्ध में प्राप्त किए गए क्षेत्रों पर भी अपना दावा बनाए रखता। भारत बलपूर्वक किसी देश पर अपनी बात थोपने की विचारधारा नहीं रखता।

50.

सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के कारण बताइए।

Answer»

भारत-चीन युद्ध के कारण-सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

⦁    तिब्बत की समस्या-सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध की सबसे बड़ी समस्या तिब्बत की समस्या थी। चीन ने सदैव तिब्बत पर अपना दावा किया, जबकि भारत इस समस्या को तिब्बतवासियों की भावनाओं को ध्यान मे रखकर सुलझाना चाहता था।
⦁    मानचित्र से सम्बन्धित समस्या-भारत और चीन के बीच सन् 1962 में हुए युद्ध का एक कारण दोनो देशों के बीच मानचित्र में रेखांकित भू-भाग था। चीन ने सन् 1954 में प्रकाशित अपने मानचित्र में कुछ ऐसे भाग प्रदर्शित किए जो वास्तव में भारतीय भू-भाग में थे, अत: भारत ने इस पर चीन के साथ अपना विरोध दर्ज कराया।
⦁    सीमा-विवाद-भारत-चीन के बीच युद्ध का एक कारण सीमा-विवाद भी था। भारत ने सदैव मैकमोहन रेखा को स्वीकार किया, परन्तु चीन ने नहीं। सीमा-विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि इसने आगे चलकर युद्ध का रूप धारण कर लिया।