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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

अपूर्ण प्रतियोगिता क्या है ? इसके अन्तर्गत मूल्य-निर्धारण कैसे होता है ?याअपूर्ण प्रतियोगिता क्या है? इसकी दशाओं का वर्णन कीजिए तथा इसके अन्तर्गत कीमत-निर्धारण को समझाइए।

Answer»

अपूर्ण प्रतियोगिता में कीमत या मूल्य-निर्धारण
अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत प्रत्येक उत्पादक अथवा विक्रेता का अपना अलग एवं स्वतन्त्र क्षेत्र होता है और वह अपने क्षेत्र में कुछ सीमा तक मनमानी कीमत वसूल कर सकता है। अपूर्ण प्रतियोगिता में प्रत्येक विक्रेता का उद्देश्य एकाधिकारी की भाँति ही अधिकतम लाभ प्राप्त करना होता है; अत: वस्तु की कीमत का निर्धारण ठीक उसी प्रकार होता है जिस प्रकार एकाधिकार की अवस्था में। | अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कीमत का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जिस पर उत्पादन-इकाई की सीमान्त लागत तथा सीमान्त आय दोनों ही बराबर होती हैं। अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए प्रत्येक उत्पादक उत्पादन को तब तक बढ़ाता रहता है जब तक कि उसकी सीमान्त आय सीमान्त लागत से अधिक रहती है, जब ये दोनों बराबर हो जाती हैं तो उसके बाद वह उत्पादन नहीं बढ़ाता। अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत विक्रेता कीमत का निर्धारण करते समय माँग और पूर्ति की शक्तियों का समुचित ध्यान रखता है; अत: अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में कीमत का निर्धारण माँग और पूर्ति दोनों की पारस्परिक क्रियाओं द्वारा होता है।
अपूर्ण प्रतियोगिता में उत्पादक का पूर्ति पर तो पूर्ण नियन्त्रण होता है, किन्तु माँग पर कोई प्रत्यक्ष नियन्त्रण नहीं होता; अतः अपूर्ण प्रतियोगिता में विक्रेता माँग की मूल्य सापेक्षता को ध्यान में रखकर कीमत का निर्धारण करता है। यदि वस्तु की मॉग मूल्ये सापेक्ष है तो विक्रेता उसकी कम कीमत निश्चित करेगा, क्योंकि मूल्य सापेक्ष वस्तुओं की कीमत में थोड़ी-सी भी कमी हो जाने पर उनकी माँग बहुत अधिक बढ़ जाती है; अत: कीमत कम निर्धारित होने के कारण यद्यपि प्रति इकाई लाभ तो कम हो जाता है, परन्तु माँग के बढ़ जाने के कारण कुल लाभ की मात्रा अधिक हो जाती है। इसके विपरीत, यदि वस्तु की माँग निरपेक्ष है तो कीमत में बहुत कमी होने पर भी उसकी माँग में विशेष वृद्धि नहीं होती और कीमत में वृद्धि होने पर माँग में कोई विशेष कमी नहीं होती।
अतः ऐसी वस्तुओं की कीमतें ऊँची ही निश्चित की जाती हैं, क्योंकि कीमतें चाहे कुछ भी हों, लोग उन्हें अवश्य खरीदेंगे। पूर्ति पक्ष के सम्बन्ध में यह विचार करना पड़ता है कि वस्तु के उत्पादन में प्रतिफल का कौन-सा नियम लागू हो रहा है ? यदि वस्तु का उत्पादन वृद्धिमान प्रतिफल नियम के अन्तर्गत हो रहा है तब वस्तु की कम कीमत निश्चित की जाएगी, इसके विपरीत, यदि उत्पादन ह्रासमान प्रतिफल नियम के अन्तर्गत हो रहा है तब वह वस्तु की कीमत जितनी अधिक वसूल कर सकता है, करेगा। आनुपातिक प्रतिफल नियम के अन्तर्गत उत्पादित वस्तु की कीमत उसकी माँग के अनुसार निर्धारित की जाएगी अर्थात् माँग के बढ़ने पर कीमत अधिक तथा माँग के घटने पर कम होगी। । संक्षेप में हम कह सकते हैं कि विक्रेता अपनी वस्तु की कीमत को निश्चित करते समय प्रत्येक कीमत पर अपने कुल लाभ का अनुमान लगाता है और वही कीमत निश्चित करता है जिस पर कि उसे अधिकतम कुल निवल लाभ अथवा आय प्राप्त होती हैं।

2.

अधिकतम बिक्री करने के लिए उत्पादक को क्या करना पड़ता है ?

Answer»

उत्पादक को वस्तुओं की अधिकतम बिक्री करने के लिए विज्ञापन व प्रचार आदि पर व्यय करना पड़ता है।

3.

आय किसे कहते हैं ?

Answer»

इकाई ने उत्पन्न की इकाईयों को विक्रय करके जो मुद्रा प्राप्त करते है उसे आय कहते हैं ।

4.

समय का दीर्घकाल अर्थात् क्या ?

Answer»

समय का दीर्घकाल अर्थात् समय (काल) कि जिस समय दरम्यान इकाई के सभी साधन अस्थिर होते है । अर्थात कि साधनों में परिवर्तन कर सकते हैं । प्लान्ट, यंत्रसामग्री, कारखाना के मकान आदि का प्रमाण में वृद्धि या कमी करके इकाई के उत्पादन को बढ़ाघटा सकते हैं । इकाई के दीर्घकालीन नये और आधुनिक यंत्रसामिग्री द्वारा उत्पादन इकाई का कद बढ़ा सकते हैं ।

5.

उत्पादन खर्च किसे कहते हैं ?

Answer»

चीजवस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करने के लिए मुद्राकीय स्वरूप में जो खर्च किया जाता है उसे उत्पादन खर्च कहते हैं ।

6.

औसत स्थिर खर्च किसे कहते हैं ?

Answer»

निश्चित उत्पादन के स्तर पर कुल स्थिर खर्च को कुल उत्पादित इकाईयों से भाग देने पर जो खर्च मिलता है उसे औसत स्थिर खर्च कहते हैं।

7.

औसत खर्च किसे कहते हैं ?

Answer»

कुल खर्च को उत्पादन की कुल इकाईयों से भाग देने पर जो खर्च प्राप्त होता है, तो उसे औसत खर्च कहते हैं ।

8.

औसत अस्थिर खर्च किसे कहते हैं ?

Answer»

निश्चित उत्पादन के स्तर पर कुल अस्थिर खर्च को कुल उत्पादित इकाईयों से भाग देने पर जो खर्च मिलता है उसे औसत अस्थिर खर्च कहते हैं।

9.

कुल खर्च किसे कहते हैं ?

Answer»

कुल स्थिर खर्च और कुल अस्थिर खर्च के योग को कुल खर्च कहते हैं ।

10.

पूर्ण एवं अपूर्ण प्रतियोगिता में अन्तर (भेद) कीजिए। इनमें से कौन व्यावहारिक है ? यापूर्ण एवं अपूर्ण प्रतियोगी बाजार की विशेषताओं की तुलना कीजिए।

Answer»

पूर्ण प्रतियोगिता तथा अपूर्ण प्रतियोगिता में अन्तर (भेद)

क०स०पूर्ण प्रतियोगिताअपूर्ण प्रतियोगिता
1.पूर्ण प्रतियोगिता में क्रेताओं व विक्रेताओं की संख्या अधिक होती है।अपूर्ण प्रतियोगिता में क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या पूर्ण प्रतियोगिता की अपेक्षा कम होती हैं। इसमें एकाधिकारी प्रतियोगिता, ‘अल्पाधिकार’ तथा ‘द्वयाधिकारी की स्थितियाँ सम्मिलित होती हैं।
2.पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म के द्वारा उत्पादित तथा बेची जाने वाली वस्तुओं में एकरूपता होती है।अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत वस्तु-विभेद पाया जाता है। प्रत्येक फर्म बाजार में अपनी वस्तु की अलग पहचान बनाने का प्रयास करती है।
3.पूर्ण प्रतियोगिता में फर्मों का स्वतन्त्र प्रवेश व बहिर्गमन होता है।अपूर्ण प्रतियोगिता में भी फमों का स्वतन्त्र प्रवेश व बहिर्गमन होता है।
4.पूर्ण प्रतियोगिताओं में क्रेताओं और विक्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान होता है तथा उनमे परम्पर सम्पर्क होता है।अपूर्ण प्रतियोगिता में क्रेताओं और विक्रेताओं की बाजार का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं होता है।
5.पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में वस्तु की कीमत का निर्धारण उद्योग द्वारा माँग और पूर्ति की शक्तियों के सन्तुलन से होता है। इस कीमत को उद्योग में कार्य कर रही फमें दिया हुआ मान लेती हैं।अपूर्ण प्रतियोगिता में विक्रेता कीमत निर्धारित करते समय माँग व पूर्ति की शक्तियों का ध्यान रखता है, परन्तु प्रत्येक फर्म या विक्रेता का अपना अलग स्वतन्त्र क्षेत्र होता है।
6.पूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय तथा सीमान्त आय बराबर होती हैं। औसत आय तथा सीमान्त आय वक्र एक सीधी पड़ी रेखा होती है।अपूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय सीमान्त आय से अधिक होती है। औसत आय वक्र तथा सीमान्त आय वक्र बाएँ से दाएँ नीचे को गिरता हुआ होता है।
7.पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म अल्पकाल में लाभ, सामान्य लाभ व हानि अर्जित करती है तथा दीर्घकाल में फर्म को मात्र सामान्य लाभ ही प्राप्त होता है।अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म अल्पकाल में लाभ, सामान्य लाभ व हानि की स्थिति में हो सकती है। तथा दीर्घकाल में फर्म को केवल सामान्य लाभ ही अर्जित हो पाता है।
8.पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म विज्ञापन व प्रचार आदि में प्रायः बिक्री लागते वहन नहीं करती है।अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म वस्तु की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापन व प्रचार व्यय करती है।
9.पूर्ण प्रतियोगिता एक काल्पनिक दशा है। वास्तविक जीवन में यह नहीं पायी जाती है। अतः पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति केवल सैद्धान्तिक है।अपूर्ण प्रतियोगिता व्यावहारिक जीवन में पायी जाती है। अतः यह सैद्धान्तिक न होकर व्यावहारिक है।
11.

औसत आय किसे कहते हैं ?

Answer»

इकाई की कुल आय को इकाई की विक्रय की गयी इकाईयों से भाग देने से प्राप्त आय को औसत आय कहते हैं ।

12.

अपूर्ण प्रतियोगिता है(क) काल्पनिक(ख) व्यावहारिक(ग) काल्पनिक-व्यावहारिक(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है  (ख) व्यावहारिक।

13.

अपूर्ण प्रतियोगिता में औसत और सीमान्त आगम के वक्र गिरते हुए होते हैं(क) नीचे की ओर(ख) ऊपर की ओर(ग) बीच में(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है  (क) नीचे की ओर।

14.

समय का अल्पकाल अर्थात् क्या ?

Answer»

समय का अल्पकाल अर्थात् ऐसा समय कि जिस समय दरम्यान इकाई के कद में परिवर्तन नहीं कर सकते हैं । परंतु उसकी स्थापित उत्पादन शक्ति का उपयोग करके उत्पादन बढ़ा सकते हैं । इस समय में इकाई के साधन स्थिर होते हैं । जैसे प्लान्ट, यंत्रसामिग्री, कारखाना के मकान आदि ।

15.

कुल आय किसे कहते हैं ?

Answer»

इकाई द्वारा उसे सभी इकाईयों को विक्रय करके जो आय प्राप्त की हो तो उसे कुल आय कहते हैं ।

16.

वास्तविक खर्च की संकल्पना समझाइए ।

Answer»

उत्पादन – प्रक्रिया दरम्यान, उत्पादन साधनों के मालिकों (श्रमिकों, पूँजीपति, जमीन के मालिक, नियोजक) को जो थकान, आलस, दुःख, त्याग, असंतोष आदि का अनुभव करना पड़ता है उसे वास्तविक खर्च कहते हैं । यह आत्मलक्षी और मनोवैज्ञानिक होने से मापना कठिन है ।

17.

कुल खर्च और कुल आय का अर्थ दीजिए ।

Answer»

कुल खर्च : कुल उत्पादन और कुल खर्च के बीच कार्यकारण का सम्बन्ध होता है । कुल उत्पादन अधिक हो तो कुल खर्च भी अधिक होता है । ‘इकाई के कुल स्थिर खर्च और कुल अस्थिर खर्च के कुल योग को कुल खर्च कहते हैं ।’

कल आय : पेढ़ी उत्पादन की इकाई का विक्रय करके जो मुद्रा प्राप्त करती है उसे आय कहते हैं । इकाई को कुल आय इकाई को उसके विक्रय में से आय प्राप्त होती है । कुल आय को विक्रय आय के नाम से भी जानते है ।

18.

अपूर्ण प्रतियोगिता में विक्रेताओं की संख्या होती है(क) शून्य(ख) कम(ग) अधिक(घ) ये सभी

Answer»

सही विकल्प है  (ख) कम।

19.

कुल आय का सूत्र लिखो ।

Answer»

कुल आय = विक्रय की गई इकाई × वस्तु की कीमत
TR = Q × P

20.

‘दीर्घकालीन समय के बाद सभी खर्च अस्थिर बन जाते हैं ।’ समझाइए ।

Answer»

कुल खर्च में अस्थिर खर्च और स्थिर खर्च दोनों का समावेश होता है । स्थिर खर्च में स्थायी सम्पति जैसे प्लान्ट, पूँजी का व्याज, लाइसन्स फीस, सम्पत्ति व्यवसायवेरा, कारखाना – मकान का किराया, स्थायी स्टाफ का वेतन, वीमा प्रीमियम आदि का समावेश होता है । परन्तु यह खर्च अल्पकालीन समय तक ही स्थिर रहता है । अर्थात् एक सीमा तक स्थिर रहता है उसके बाद खर्च में वृद्धि होती है । अस्थिर खर्च अस्थिर साधनों पर खर्च होता है । उत्पादन के स्तर में परिवर्तन हो तो इस खर्च में भी परिवर्तन होता है । अस्थिर खर्च में कच्चे माल की कीमत, ईंधन का खर्च, बिजली का बिल, वाहनव्यवहार का खर्च आदि का समावेश होता है । जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ता है वैसे-वैसे अस्थिर खर्च भी बढ़ता है । इस प्रकार दीर्घकालीन समय के बाद स्थिर और अस्थिर खर्च दीर्घकालीन समय के बाद अस्थिर बनते हैं ।

21.

वैकल्पिक खर्च किसे कहते हैं ?

Answer»

पसंद किये गये विकल्प के लिए अन्य श्रेष्ठ और उपयोगी विकल्पों का त्याग करना पड़ता है । वह वैकल्पिक खर्च है । एक वस्तु का उत्पादन करने पर दूसरी वस्तु का उत्पादन संभव नहीं है, इसलिए जिसका उत्पादन नहीं होता है उतना मूल्य की रकम खोनी पड़ती है वह वैकल्पिक खर्च है ।

22.

अपूर्ण प्रतियोगिता से आप क्या समझते हैं ? अपूर्ण प्रतियोगिता की विशेषताओं की विवेचना कीजिए।याअपूर्ण प्रतियोगी बाजार को परिभाषित कीजिए। याअपूर्ण प्रतियोगिता की मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

Answer»

अपूर्ण प्रतियोगिता का अर्थ
वास्तविक जीवन में न तो पूर्ण प्रतियोगिता की दशाएँ पायी जाती हैं और न एकाधिकार की। प्रायः इन दोनों के बीच की अवस्थाएँ मिलती हैं, जिसे अपूर्ण प्रतियोगिता कहते हैं। अपूर्ण प्रतियोगिता से अभिप्राय पूर्ण प्रतियोगिता तथा एकाधिकार के बीच की किसी अवस्था से होता है। अपूर्ण प्रतियोगिता का स्वरूप अंशतः प्रतियोगिता तथा अंशतः एकाधिकारी होता है।
फेयर चाइल्ड के शब्दों में, “यदि बाजार उचित प्रकार से संगठित नहीं होता, यदि क्रेता और विक्रेता एक-दूसरे के सम्पर्क में आने में कठिनाई का अनुभव करते हैं और वे दूसरे के द्वारा क्रय की गयी वस्तुओं और उनके द्वारा दिये गये मूल्यों की तुलना करने में असमर्थ रहते हैं तो ऐसी स्थिति को अपूर्ण प्रतियोगिता कहते हैं।
जे० के० मेहता के शब्दों में, “यह बात भली-भाँति स्पष्ट हो गयी है कि विनिमय की प्रत्येक स्थिति वह स्थिति है जिसको आंशिक एकाधिकार की स्थिति कहते हैं और यदि आंशिक एकाधिकार को दूसरी ओर से देखा जाए तो यह अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति है। प्रत्येक स्थिति में प्रतियोगिता तत्त्व तथा एकाधिकार तत्त्व दोनों का मिश्रण है।”

अपूर्ण प्रतियोगिता की विशेषताएँ
⦁     अपूर्ण प्रतियोगिता में क्रेताओं, विक्रेताओं एवं फर्मों की संख्या पूर्ण प्रतियोगिता की अपेक्षा कम होती है।
⦁     अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत प्रतियोगिता तो होती है, किन्तु वह इतनी अपूर्ण तथा दुर्बल होती है कि माँग और पूर्ति की शक्तियों को कार्य करने का पूर्ण अवसर नहीं मिलता।
⦁    क्रेताओं और विक्रेताओं को बाजार की स्थिति का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है। परिणामस्वरूप बाजार में कीमतें भिन्न-भिन्न होती हैं।
⦁    प्रत्येक विक्रेता को कुछ सीमा तक अपनी वस्तु की मनचाही कीमत वसूल करने की स्वतन्त्रता रहती है।
⦁    अपूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु-विभेद होता है। प्रत्येक फर्म अपनी वस्तु की बाजार माँग में अलग पहचान बनाने का प्रयत्न करती है।
⦁     अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्मों को बाजार में प्रवेश करने व छोड़ने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। अर्थात् बाजार में फर्मों का स्वतन्त्र प्रवेश व बहिर्गमन होता है।
⦁    फर्म के माँग वक्र या औसत आगम वक्र (AR) का ढाल ऋणात्मक होता है और फर्म का सीमान्त आगम वक्र (MR) इसके औसत आगम वक्र से नीचा होता है।
⦁     दीर्घकाल में वस्तु का मूल्य सीमान्त आगम (MR) तथा ओसत आगम (AR) के बराबर होता है।
⦁    अपूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु की बिक्री बढ़ाने हेतु विज्ञापन में प्रचार आदि का आश्रय लिया जाता है।
⦁     व्यावहारिक जीवन में बाजार में अपूर्ण प्रतियोगिता की ही स्थिति पायी जाती है।
⦁    अपूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु का बाजार संगठित नहीं होता।

23.

अपूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल में वस्तु का मूल्य किस स्थिति में निर्धारित होता है ?

Answer»

अपूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल में वस्तु का मूल्य सीमान्त आय व सीमान्त लागत की सन्तुलन की स्थिति में निर्धारित होता है। यहाँ फर्म केवल सामान्य लाभ अर्थात् शून्य लाभ की स्थिति में होती है।

24.

अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण किस प्रकार होता है ?

Answer»

अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत कीमत-निर्धारण में माँग एवं पूर्ति की शक्तियों का समुचित ध्यान रखा जाता है। इस प्रकार कीमत-निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जहाँ पर सीमान्त लागत तथा सीमान्त आय दोनों ही बराबर हों।

25.

उत्पादन का प्रमाण शून्य हो तब भी यह खर्च सकारात्मक होता है ।(A) मुद्राकीय खर्च(B) औसत खर्च(C) अस्थिर खर्च(D) स्थिर खर्च

Answer»

सही विकल्प है (D) स्थिर खर्च

26.

अस्थिर खर्च को मुख्य खर्च कहनेवाला अर्थशास्त्री –(A) प्रो. पिगु(B) प्रो. मार्शल(C) स्मिथ(D) कौटिल्य

Answer»

सही विकल्प है (B) प्रो. मार्शल

27.

सीमांत आय का सूत्र लिखो ।

Answer»

MRn = Rn – R(n – 1)
MR = सीमांत आय,
n = विक्रय इकाई की संख्या
Rn = n इकाई के विक्रय से होनेवाली आय
R(n – 1)= (n – 1) इकाई के विक्रय से होनेवाली आय

28.

औसत खर्च की रेखा का आकार कैसा होता है ?(A) होकी स्टिक(B) U(C) V(D) आयत

Answer»

सही विकल्प है (A) होकी स्टिक

29.

किस खर्च को माप नहीं सकते हैं ?(A) वास्तविक खर्च(B) मुद्राकीय खर्च(C) वैकल्पिक खर्च(D) दीर्घकालीन खर्च

Answer»

सही विकल्प है (A) वास्तविक खर्च

30.

किस बाजार में औसत आय और सीमांत आय समान होते हैं ?(A) पूर्ण स्पर्धा(B) एकाधिकारशाही(C) एकाधिकारशाही युक्त स्पर्धा(D) अल्पहस्तक एकाधिकार

Answer»

सही विकल्प है (A) पूर्ण स्पर्धा

31.

सीमांत आय की अपेक्षा सीमांत खर्च कम हो तब इकाई (पेढ़ी) का क्या मिलता है ?

Answer»

सीमांत आय की अपेक्षा सीमांत खर्च कम हो तो इकाई को लाभ मिलता है ।

32.

सीमांत आय किसे कहते हैं ?

Answer»

वस्तु की अतिरिक्त एक इकाई के विक्रय के परिणामस्वरूप इकाई की कुल विक्रय आय में जो वृद्धि होती है तो उसे सीमांत आय कहते हैं।

33.

पूर्ति कब सक्रिय रहती है ?

Answer»

यदि माँग निश्चित रहती है किन्तु पूर्ति की दशाएँ बदलती रहती हैं, तब पूर्ति सक्रिय होती है।

34.

अपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म की औसत आय रेखा होती है (क) गिरती हुई रेखा(ख) उठती हुई रेखा(ग) क्षैतिज रेखो।(घ) ऊर्ध्व रेखा।

Answer»

सही विकल्प है  (क) गिरती हुई रेखा।

35.

माँग तथा पूर्ति का मूल्य सिद्धान्त का प्रतिपादन किस अर्थशास्त्री ने किया ?

Answer»

प्रो० मार्शल ने।

36.

मूल्य-निर्धारण में माँग कब निष्क्रिय रहती है ?

Answer»

यदि माँग निश्चित रहती है, किन्तु पूर्ति की दशाएँ बदलती रहती हैं, तो माँग निष्क्रिय रहती है।

37.

सुरक्षित कीमत किसे कहते हैं ?

Answer»

सुरक्षित कीमत वह न्यूनतम कीमत होती है, जिस पर कोई उत्पादक अपनी वस्तु की माँग स्वयं करने लगते हैं और उसे बेचने से मना करते हैं।

38.

“वस्तु की कीमत उसकी उपयोगिता से निर्धारित होती है। यह मत किन अर्थशास्त्रियों का है?

Answer»

वालरा और जेवेन्स का।

39.

बाजार की किस दशा में वस्तु की कीमत उत्पादन लागत के बराबर होती है ?

Answer»

पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में दीर्घकाल में वस्तु की कीमत उत्पादन लागत के बराबर होती है।

40.

क्रेता या उपभोक्ता वस्तु-विशेष की माँग क्यों करते हैं ?

Answer»

विभिन्न वस्तुओं में पृथक्-पृथक् आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने का गुण या क्षमता होती है। इस कारण किसी वस्तु-विशेष की माँग उसमें निहित तुष्टिगुण के कारण होती है।

41.

अर्थशास्त्र में वस्तुएँ कितने प्रकार की मानी गयी हैं ?

Answer»

अर्थशास्त्र में वस्तुएँ दो प्रकार की मानी गयी हैं

⦁    शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुएँ तथा
⦁     टिकाऊ या दीर्घकाल तक बनी रहने वाली वस्तुएँ।

42.

सुरक्षित कीमत किस प्रकार के बाजार में पायी जाती है ?

Answer»

सुरक्षित कीमत अल्पकालीन बाजार में होती है।

43.

“वस्तु की कीमत उसकी उत्पादन लागत से निर्धारित होती है। यह मत किन अर्थशासियों का है ?

Answer»

एडम स्मिथ और रिका।

44.

क्या पूर्ण प्रतियोगिता वास्तविक जगत् में सम्भव है ?

Answer»

नहीं, पूर्ण प्रतियोगिता वास्तविक जगत् में सम्भव नहीं है।

45.

कोई फर्म सन्तुलन की स्थिति में कब होती है ?

Answer»

कोई फर्म केवल सन्तुलन की स्थिति में ही अधिकतम लाभ प्राप्त करती है। अत: किसी फर्म को सन्तुलन की स्थिति में तब ही कहा जाता है जब उसमें विस्तार अथवा संकुचन करने की कोई प्रवृत्ति न हो।

46.

‘पूर्ण प्रतियोगिता एक कल्पनामात्र है, व्यावहारिक नहीं।’ विवेचना कीजिए।

Answer»

पूर्ण प्रतियोगिता के लिए जिन आवश्यक तत्त्वों या दशाओं का वर्णन किया गया है वे किसी भी दशा में व्यावहारिक नहीं हैं। यह आवश्यक नहीं है कि एक ही प्रकार की वस्तुओं में समानता हो अर्थात् वस्तुएँ एकसमान नहीं होती हैं। वस्तुओं का क्रय-विक्रय सामान्यत: प्रतिबन्धित होता है। उत्पत्ति के साधन पूर्ण गतिशील नहीं होते। क्रेता-विक्रेता को बाजार की दशाओं का पूर्ण ज्ञान नहीं होने के कारण बाजार में प्रचलित वस्तु के मूल्य में भिन्नता होती है। विज्ञापन, माल की पैकिंग, उधार बिक्री, घर तक माल पहुँचाने की सुविधा तथा छूट आदि सुविधाओं के कारण वस्तु-विभेद एवं मूल्य-विभेद की स्थिति सदा बनी रहती है। उपर्युक्त अनेक कारणों से हम देखते हैं कि पूर्ण प्रतियोगिता वाला बाजार अपूर्ण प्रतियोगिता का बाजार बनकर रह गया है, पूर्ण प्रतियोगिता तो मात्र एक कल्पना बनकर रह गयी है।
पूर्ण प्रतियोगिता की आवश्यक दशाओं में अनेक कमियाँ होने के बावजूद भी अर्थशास्त्र में पूर्ण प्रतियोगिता के अध्ययन का महत्त्व है, क्योंकि पूर्ण प्रतियोगिता द्वारा ही आर्थिक समस्याओं का अध्ययन सुविधापूर्वक सम्पन्न हो सकता है।

47.

संक्षिप्त व्याख्या करें-पूर्ण प्रतिस्पर्धा में लाभ तथा हानि की स्थितियाँ।

Answer»

पूर्ण प्रतिस्पर्धा में लाभ तथा हानि की स्थितियाँ–पूर्ण प्रतिस्पर्धा के अन्तर्गत अल्पकाल या दीर्घकाल में कोई भी फर्म मात्र सामान्य लाभ या शून्य लाभ ही प्राप्त करती है।
जब फर्म की औसत आय सीमान्त लागत के बराबर होती है, तो इस स्थिति में फर्म शून्य लाभ या सामान्य लाभ प्राप्त करती है। पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म की हानि की स्थिति तब होगी जब कि फर्म की औसत लागत औसत आय से अधिक हो; परन्तु हानि की स्थिति में फर्म उद्योग छोड़कर चली जाती है, परिणामस्वरूप पूर्ति कम हो जाएगी और कीमत (औसत आय) बढ़कर औसत लागत के बराबर हो जाएगी और फर्म पुनः सामान्य लाभ प्राप्त करेगा।

48.

पूर्ण प्रतियोगिता की मुख्य विशेषताएँ (लक्षण) बताइए।यापूर्ण प्रतियोगिता का क्या अर्थ है ? पूर्ण प्रतियोगी बाजार की विशेषताएँ बताइए। यापूर्ण प्रतियोगिता की विशेषताओं को समझाइए। यापूर्ण प्रतियोगिता को परिभाषित कीजिए। इसकी किन्हीं चार विशेषताओं की विवेचना कीजिए।

Answer»

पूर्ण प्रतियोगिता का अर्थ तथा परिभाषाएँ
पूर्ण प्रतियोगिता, बाजार की वह दशा होती है जिसमें क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या अधिक होती है। इसमें कोई भी एक क्रेता अथवा विक्रेता व्यक्तिगत रूप से वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। समस्त बाजार में वस्तु का एक ही मूल्य होता है। पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में फर्म ‘कीमत ग्रहण करने वाली’ (Price taker) होती है, कीमत-निर्धारण करने वाली’ (Price maker) नहीं।
बोल्डिंग के अनुसार, “पूर्ण प्रतियोगिता व्यापार की वह स्थिति है जिसमें प्रचुर संख्या में क्रेता और विक्रेता बिल्कुल एक ही प्रकार की वस्तु के क्रय-विक्रय में लगे होते हैं तथा जो एक-दूसरे के अत्यधिक निकट सम्पर्क में आकर आपस में स्वतन्त्रतापूर्वक वस्तु का क्रय करते हैं।
श्रीमती जॉन रॉबिन्सन के शब्दों में, “जब प्रत्येक विक्रेता द्वारा उत्पादित वस्तु की माँग पूर्ण रूप से लोचदार होती है तो विक्रेता की दृष्टि से प्रतियोगिता पूर्ण होती है। इसके लिए दो अवस्थाओं का होना अनिवार्य है। पहली-विक्रेताओं की संख्या अधिक होनी चाहिए, किसी एक विक्रेता का उत्पादन वस्तु के कुल उत्पादन का एक बहुत ही थोड़ा भाग होता है। दूसरी – सभी ग्राहक प्रतियोगी विक्रेताओं के बीच चयन करने की दृष्टि से समान होते हैं, जिससे बाजार पूर्ण हो जाता है।

पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की आवश्यक विशेषताएँ या लक्षण
पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
⦁     पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार में क्रेताओं तथा विक्रेताओं की संख्या अधिक होनी चाहिए, ताकि कोई एक क्रेता या विक्रेता वस्तु के मूल्य को प्रभावित न कर सके।
⦁     क्रेताओं तथा विक्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए, अर्थात् उनको बाजार में उस वस्तु के मूल्य तथा एक-दूसरे के विषय में पूर्ण जानकारी होनी चाहिए ताकि कोई विक्रेता बाजार मूल्य से अधिक मूल्य न ले सके और न ही कोई क्रेता अधिक मूल्य दे।
⦁     फर्मों द्वारा उत्पादित तथा बेची जाने वाली वस्तुएँ एकसमान गुण वाली होने के साथ ही अभिन्न भी होनी चाहिए, ताकि क्रेता बिना किसी प्रकार की शंका के उन्हें खरीद सके। साथ ही जब वस्तुएँ अभिन्न होंगी तब समस्त बाजार में उनकी कीमत भी एक रहेगी।
⦁    पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार में किसी समय-विशेष पर वस्तु की समस्त इकाइयों का मूल्य एक-समान होना चाहिए।
⦁    पूर्ण प्रतियोगिता बाजार में फर्मों का भाग लेना अथवा न लेना सरल व स्वतन्त्र होना चाहिए। उन पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए ताकि अधिक लाभ कमाने की इच्छा से ये एक व्यवसाय से दूसरे व्यवसाय में अथवा एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से भाग ले सकें।
⦁    पूर्ण प्रतियोगिता बाजार में क्रय-विक्रय की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए ताकि कोई भी क्रेता किसी भी स्थान से वस्तु खरीद सके तथा कोई भी विक्रेता किसी भी स्थान पर अपनी वस्तु बेच सके।
⦁     पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार में वस्तुओं के मूल्य पर किसी भी प्रकार का नियन्त्रण नहीं होना चाहिए, क्योंकि मूल्य-नियन्त्रण के अभाव में ही माँग एवं सम्भरण (पूर्ति) शक्तियाँ प्रभावपूर्ण ढंग से । अपना कार्य करती हैं।
वास्तविक जीवन में पूर्ण प्रतियोगिता की दशाएँ नहीं पायी जाती हैं और यह विचार बिल्कुल काल्पनिक है। वास्तविक जीवन में पूर्ण प्रतियोगिता के न पाये जाने के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं
⦁    सभी वस्तुओं की बिक्री में क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या अधिक नहीं होती है। कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हो सकती हैं जिनके उत्पादक थोड़ी संख्या में हों, और इसलिए, वे वस्तु की कीमत को प्रभावित कर सकते हैं। इसी प्रकार कुछ क्रेता भी बाजार में अत्यधिक प्रभावशाली हो सकते हैं।
⦁    अधिकतर बाजार में वस्तुओं में एकरूपता नहीं पायी जाती तथा वे एक जैसी नहीं होती हैं। इसके अतिरिक्त आज बाजारों में विज्ञापन, प्रचार, पैकिंग की भिन्नता आदि के द्वारा उपभोक्ताओं के मस्तिष्क में वस्तु-विभेद उत्पन्न कर दिया जाता है और वे एक वस्तु को दूसरी की अपेक्षा प्राथमिकता देने लगते हैं।
⦁    क्रेताओं और विक्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है। प्रायः उन्हें यह मालूम नहीं होता है कि अन्य क्रेताओं और विक्रेताओं के द्वारा किस कीमत पर सौदे किये जा रहे हैं।
⦁    उत्पत्ति के साधनों में पूर्ण गतिशीलता नहीं पायी जाती है। श्रम, पूँजी तथा अन्य साधनों के आने-जाने में अनेक बाधाएँ आ सकती हैं, जिसके कारण उत्पत्ति के साधनों की गतिशीलता कम हो जाती है।
⦁    उद्योगों में फर्मों का प्रवेश स्वतन्त्र नहीं होता है और इस सम्बन्ध में बहुत-सी बाधाएँ उत्पन्न की जा सकती हैं।

49.

पूर्ण प्रतियोगिता बाजार के दो लक्षण (विशेषताएँ) लिखिए।

Answer»

(1) क्रेताओं और विक्रेताओं की अधिक संख्या तथा
(2) बाजार को पूर्ण ज्ञान होना।

50.

पूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु के मूल्य का निर्धारण किसके द्वारा होता है ?

Answer»

पूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु का मूल्य माँग और पूर्ति के द्वारा निर्धारित होता है।