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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

भारत में जनजातियाँ मुख्यतः किन भागों में पाई जाती हैं? इनकी समस्याओं के समाधान के लिए सरकार की ओर से क्या उपाय किए जा रहे हैं ? 

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जनजातीय जनसंख्या निवास
आज जनजातियाँ भारत की समस्त जनसंख्या का लगभग 8 प्रतिशत हैं। भारतीय संविधान में 560 जनजातियों का उल्लेख है, जो विभिन्न राज्यों के ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों में रहती हैं।

भारतीय संघ के कुछ राज्यों में जनजाति जनसंख्या अधिक है और कुछ राज्यों में कम। झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में जनजातीय जनसंख्या सर्वाधिक है। इसके बाद ओडिशा, बिहार, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, पं० बंगाल, आन्ध्र प्रदेश तथा असम राज्य आते हैं। उत्तराखण्ड, केरल एवं तमिलनाडु में जनजाति जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है।

प्रतिशत की दृष्टि से मणिपुर, मेघालय, नागालैण्डे, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम ऐसे राज्य हैं, जिनकी समस्त जनसंख्या में जनजाति जनसंख्या अनुपात 20 प्रतिशत से अधिक है।

सरकार की ओर से किए जा रहे उपाय
आन्ध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान के कुछ क्षेत्र अनुच्छेद 244 और संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अन्तर्गत ‘अनुसूचित क्षेत्र (Scheduled Areas) घोषित किये गये हैं। इन राज्यों के राज्यपाल अनुसूचित क्षेत्रों की रिपोर्ट प्रतिवर्ष राष्ट्रपति को देते हैं। असम, मेघालय और मिजोरम का प्रशासन संविधान की छठी अनुसूची के उपबन्धों के आधार पर किया जाता है। इसे अनुसूची के अनुसार उन्हें स्वायत्तशासी’ (Autonomous) जिलों में बाँटा गया है। इस प्रकार के 8 जिले हैं-असम के उत्तरी कछार, पहाड़ी जिले तथा मिकिर पहाड़ी जिले, मेघालय के संयुक्त खासी जयन्तिया, जोवाई और गारो पहाड़ी जिले तथा मिजोरम के चकमा, लाखेर और पावी जिले। प्रत्येक स्वायत्तशासी जिले में एक जिला परिषद् होती है जिसमें अधिकतम 30 सदस्य होते हैं। इनमें चार मनोनीत हो सकते हैं और शेष का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाता है। इस परिषद् को कुछ प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक अधिकार प्रदान किये गये हैं।

जनजातियों के कल्याण हेतु दो राज्यों की स्थापना – वर्ष 2000 ई० में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों का विभाजन कर क्रमश: छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड और झारखण्ड की स्थापना की गई है। इनमें से छत्तीसगढ़ और झारखण्ड राज्य की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य इन क्षेत्रों में रहने वाली जनजातियों का विकास ही रहा है।
पृथक जनजाति राष्ट्रीय आयोग की स्थापना – अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के विकास हेतु 65वें संवैधानिक संशोधन (1990) के द्वारा अनुसूचित जाति एवं जनजाति राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की गयी थी, लेकिन कुछ ही वर्ष बाद यह अनुभव किया गया कि भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से जनजातियाँ अनुसूचित जातियों से भिन्न हैं तथा उनकी समस्याएँ भी भिन्न हैं। अतः 85वें संवैधानिक संशोधन (2003) ई० के आधार पर वर्ष 1990 में स्थापित आयोग के स्थान पर पृथक् ‘जनजाति राष्ट्रीय आयोग’ स्थापित किया गया है। इस प्रकार के आयोग की स्थापना सही दिशा में एक कदम है।

2.

सरकार द्वारा आदिवासियों की समस्याओं के समाधान के लिए उठाए गए कदमों की व्याख्या कीजिए।

Answer»

आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों की समस्याओं का समाधान
आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों) की समस्याओं के समाधान हेतु सरकार ने अनेक कदम उठाए हैं। इन्हें संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ इनकी समस्याओं के समाधान हेतु निम्नलिखित उपाय भी किए गए हैं –

⦁    लोकसभा तथा राज्य विधानमण्डलों में इनके लिए स्थानों के आरक्षण की व्यवस्था की गई है।
⦁    शासकीय सेवाओं में आरक्षण की सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
⦁    जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन हेतु कल्याण व सलाहकार अभिकरणों की स्थापना की गई है।
⦁    संवैधानिक संरक्षणों के क्रियान्वयन की जाँच हेतु संसदीय समिति का गठन किया गया है।
⦁    सभी राज्यों में कल्याण विभागों की स्थापना की गई है, जो कि जनजातीय कल्याण कार्यों की देख-रेख करते हैं।
⦁    अनुसूचित जनजातियों के बीच कार्य कर रहे गैर-सरकारी स्वैच्छिक संगठनों को अनुदान प्रदान किया जाता है।
⦁    अनुसूचित जनजातियों को शिक्षण व प्रशिक्षण हेतु विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। सरकार ने शिक्षा का विकास करने के उद्देश्य से आदिवासियों को निःशुल्क शिक्षा, छात्रवृत्ति तथा छात्रावास की सुविधाएँ प्रदान की हैं।
⦁    पंचवर्षीय योजनाओं में अनुसूचित जनजातियों के विकास हेतु विशेष प्रावधान किए गए हैं।
⦁    कुछ राज्यों में भारतीय जनजातीय विपणन विकास संघ की स्थापना भी की गई है जिससे उनका आर्थिक शोषण कम किया जा सके।
⦁    अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं और बच्चों के हित सुरक्षित करने के लिए। केन्द्रीय कल्याण राज्यमंत्री की अध्यक्षता में सलाहकार बोर्ड की स्थापना की गई है।
⦁    संविधान की पाँचवीं अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्र वाले तथा राष्ट्रपति के निर्देश पर अनुसूचित आदिम जातियों वाले राज्यों में आदिम जाति के लिए सलाहकार परिषदों की स्थापना की व्यवस्था है। आन्ध्र प्रदेश, ओडिशा, गुजरात, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा राजस्थान में ऐसी परिषदों की स्थापना की जा चुकी है। ये परिषदें आदिवासियों के कल्याण सम्बन्धी विषयों पर राज्यपालों को परामर्श देती हैं।
⦁    वन से प्राप्त उत्पादों के विपणन के सम्बन्ध में सहकारी समितियों की स्थापना की गई है। मध्य प्रदेश में नई तेंदू पत्ता नीति के चलते ठेकेदारों के आदमी आदिवासियों का शोषण नहीं कर पाएँगे क्योंकि तेंदू पत्ता एकत्र कराने का कार्य सहकारिता के अन्तर्गत आ गया है।
⦁    राष्ट्रीय आदिवासी नीति 2006-21 जुलाई, 2006 को केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय आदिवासी नीति का मसौदा जारी किया गया जिसके अन्तर्गत आदिवासियों से सम्बन्धित 23 मुद्दे प्रमुख हैं-आदिवासियों की जमीन छीनने, उनके विस्थापन व पुनर्वास, शिक्षा, सफाई, राज्यों के पेशा कानून को केन्द्रीय कानून के समान बनाना, लैंगिक भेदभाव को दूर करना, उनकी संस्कृति की सुरक्षा करने आदि पर बल तथा जंगल की जमीन पर आदिवासियों के अधिकार को भी शामिल किया गया है।
⦁    विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में आदिवासियों के विकास तथा कल्याण से सम्बन्धित अनेक कार्यक्रमों तथा योजनाओं को स्थान दिया गया है। आदिवासी उपयोजना कार्यक्रम का लक्ष्य है-गरीबी को दूर करना। बीस सूत्री कार्यक्रमों में सर्वोच्च स्थान ‘गरीबी के विरुद्ध संघर्ष को दिया गया था। छठी योजनाकाल में पूरे देश में 27,59,379 आदिवासियों को गरीबी की। रेखा से ऊपर उठाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
⦁    केन्द्र तथा राज्य सरकारों के द्वारा अनुसूचित जनजातियों के लिए बनाए गए संवैधानिक तथा कानूनी सुरक्षा उपायों को लागू किया जा रहा है तथा इसके प्रभावशाली क्रियान्वयन पर भी अधिक जोर दिया जा रहा है।
⦁    गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की दृष्टि से सरकार द्वारा समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारण्टी कार्यक्रम आदि को आदिवासी क्षेत्रों में लागू किया गया है।
आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों) की समस्याओं के उपर्युक्त उपाय कारगर सिद्ध हुए हैं, परन्तु इस दिशा में अभी बहुत कार्य किया जाना शेष है। इन्हें देश की मुख्य धारा में जोड़ने हेतु इनका सामाजिक-आर्थिक उत्थान किया जाना आवश्यक है। सरकार और जनसामान्य के मिश्रित प्रयासों से ही हमें आदिवासियों को उनकी समस्याओं से मुक्ति दिला सकते हैं और उनके अच्छे जीवनयापन के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर सकते हैं।

3.

सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विफलता के मुख्य कारण बताइए।

Answer»

सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विफलता का मुख्य कारण अखिल भारतीय स्तर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खाद्यान्नों की औसत उपभोग मात्रा 1 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिमाह है। बिहार, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति उपभोग को आँकड़ा 300 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिमाह से भी कम हैं।

4.

सार्वजनिक वितरण प्रणाली को किन आधारों पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है?

Answer»

सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अनेक आधारों पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है। अनाजों से साढ़स भरे अन्न भंडारों के बावजूद भुखमरी की घटनाएँ हो रही है। भारतीय खाद्य निगम के भंडार अनाज से भी हैं। कहीं अनाज सड़ रहा है तो कुछ स्थानों पर चूहे अनाज खा रहे हैं।

5.

सहायिकी (सब्सिडी) क्या है?

Answer»

सहायिकी (सब्सिडी) वह भुगतान है जो सरकार द्वारा किसी उत्पादक को बाजार कीमत की अनुपूर्ति के लिए किया जाता है। सहायिकी से घरेलू उत्पादकों के लिए ऊँची आय कायम रखते हुए, उपभोक्ता कीमतों को कम किया जा सकता है।

6.

राशन की दुकानों के संचालन में क्या समस्याएँ हैं?

Answer»

राशन की दुकानों के संचालन में आने वाली प्रमुख समस्यायें इस प्रकार हैं

⦁    राशन की दुकान खोलने के लिए पर्याप्त मात्रा में उच्च कोटि की सीमित वस्तुओं का सरकार द्वारा उपलब्ध न किया जाना।

⦁     सभी सदस्यों का राशन न लेना।।

⦁    घटिया वस्तुओं का न खरीदा जाना।

⦁     कुछ दुकानदारों द्वारा छल-कपट, धोखा-धड़ी, चोर बाजारी और काला बाजारी करना।

⦁     पर्याप्त मात्रा में राशन की दुकान का उपलब्ध न होना।

⦁     राशन की दुकानों का देहातों में दूर स्थित होना।

7.

टिप्पणी लिखें(क) न्यूनतम समर्थित कीमत(ख) बफर स्टॉक(ग) निर्गम कीमत(घ) उचित दर की दुकान

Answer»

(क) न्यूनतम समर्थित कीमत-भारतीय खाद्य निगम अधिशेष उत्पादन वाले राज्यों में किसानों से गेहूँ और चावल खरीदता है। किसानों को उनकी फसल के लिए पहले से घोषित कीमतें दी जाती हैं। इस मूल्य को न्यूनतम समर्थित मूल्य कहा जाता है। सरकार फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से बुआई के मौसम से पहले न्यूनतम समर्थित मूल्य की घोषणा करती है। खरीदे हुए अनाज खाद्य भंडारों में रखे जाते हैं।

(ख) बफर स्टॉक-अतिरिक्त भंडार गेहूँ एवं चावल जैसे अनाजों का स्टॉक है जो सरकार द्वारा भारतीय खाद्य निगम से प्राप्त किया जाता है। इसका वितरण घाटे के क्षेत्रों एवं आवश्यक लोगों को किया जाता है।

(ग) निर्गमित कीमत-निर्गमित मूल्य पर सरकार द्वारा घाटे के क्षेत्रों में अनाज का वितरण किया जाता है, निर्गमित मूल्य कहलाती है। यह कीमत बाजार मूल्य की तुलना में कम होती है

(घ) उचित दर वाली दुकानें भारतीय खाद्य निगम द्वारा अधिप्राप्त अनाज को सरकार विनियमित राशन दुकानों के माध्यम से समाज के गरीब वर्गों में वितरित करती हैं।
राशन कि दुकानों में, जिन्हें उचित दर वाली दुकानें कहा जाता है, पर चीनी, खाद्यान्न और खाना पकाने के लिए मिट्टी के तेल का भंडार होता है। ये लोगों को सामान बाजार कीमत से कम कीमत पर देती है। अब अधिकांश क्षेत्रों, गाँवों, कस्बों और शहरों में राशन की दुकानें हैं।

8.

न्यूनतम समर्थित कीमत में वृद्धि से किसानों तथा फसलों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

Answer»

न्यूनतम समर्थित कीमत में वृद्धि से विशेषतया खाद्यान्नों के अधिशेष वाले राज्यों के किसानों को अपनी भूमि पर मोटे अनाजों की खेती समाप्त कर धान और गेहूं उपजाने के लिए प्रेरित किया जाता है जबकि मोटे अनाज गरीबों का प्रमुख भोजन है। धान की खेती के लिए सघन सिंचाई से पर्यावरण और जल स्तर में गिरावट आई है।

9.

राशनिंग क्या है? इसका उपयोग क्यों किया जाता है?

Answer»

राशनिंग उस मात्रा पर प्रतिबंध को दर्शाती है जो उपभोक्ताओं द्वारा क्रय एवं उपभोग की जा सकती है। राशनिंग उन गरीब उपभोक्ताओं के लिए वस्तुओं की उपलब्धि को सुनिश्चित करती है जो कि स्वतन्त्र बाजार में वस्तुएँ प्राप्त नहीं कर पाते। सीमित वस्तुएँ जैसे—मिट्टी का तेल, सीमेंट, वनस्पति घी आदि वस्तुएँ भी राशन कार्ड द्वारा बेची जाती हैं।

10.

सरकार बफर स्टॉक क्यों बनाती है?

Answer»

सरकार बफर स्टॉक को कुछ निश्चित कृषि फसलों जैसे–गेहूँ, गन्ना आदि के लिए नियमित करता है। बफर स्टॉक भारतीय खाद्य निगम (एफ.सी.आई.) के माध्यम से सरकार द्वारा अधिप्राप्त अनाज, गेहूँ और चावल को भण्डार है। भारतीय खाद्य निगम अधिशेष उत्पादन वाले राज्यों में किसानों से गेहूँ और चावल खरीदता है। किसानों को उनकी फसल के लिए पहले से घोषित कीमतें दी जाती हैं। इस मूल्य को न्यूनतम समर्थित मूल्य कहा जाता है। इन फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से बुआई के मौसम से पहले सरकार न्यूनतम समर्थित मूल्य की घोषणा करती है। खरीदे हुए अनाज खाद्य भंडारों में रखे जाते हैं। ऐसा कमी वाले क्षेत्रों में और समाज के गरीब वर्गों में बाजार कीमत से कम कीमत पर अनाज के वितरण के लिए किया जाता है। इस कीमत को निर्गम कीमत भी कहते हैं।

11.

राशन कार्ड के प्रकार बताइए।

Answer»

राशन कार्ड के निम्नलिखित तीन प्रकार होते हैं

⦁     गरीबों में सबसे गरीब के लिए (अंत्योदय) कार्ड।
⦁     गरीबी रेखा से नीचे बी. पी. एल. कार्ड उनके लिए हैं जो गरीबी रेखा से नीचे हैं।
⦁    गरीबी रेखा से ऊपर ए. पी. एल. कार्ड सभी अन्य लोगों के लिए।

12.

राशन कार्ड रखने वाले परिवार को लगभग कितना सामान प्रतिमाह मिलता है?

Answer»

राशन कार्ड रखने वाले कोई भी परिवार प्रतिमाह इनकी एक अनुबंधित मात्रा (जैसे 35 किलोग्राम अनाज, 5 लीटर मिट्टी का तेल, 5 किलोग्राम चीनी आदि) निकटवर्ती राशन की दुकान से खरीद सकता है।

13.

खाद्य और सम्बन्धित वस्तुओं को उपलब्ध कराने में समितियों की भूमिका पर एक टिप्पणी लिखें।

Answer»

देश के दक्षिणी और पश्चिमी भागों में सहकारी समितियाँ भी खाद्य सुरक्षा में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सहकारी समितियाँ निर्धन लोगों को खाद्यान्न की बिक्री के लिए कम कीमत वाली दुकानें खोलती हैं। उदाहरणार्थ, तमिलनाडु में जितनी राशन की दुकानें हैं, उनमें से करीब 94 प्रतिशत सहकारी समितियों के माध्यम से चलाई जा रही हैं। दिल्ली में मदर डेयरी उपभोक्ताओं को दिल्ली सरकार द्वारा निर्धारित नियंत्रित दरों पर अन्य वस्तुएँ जैसे-दूध और सब्जियाँ उपलब्ध कराने में तेजी से प्रगति कर रही है। गुजरात में दूध तथा दुग्ध उत्पादों में अमूल एक और सफल सरकारी समिति का उदाहरण है। देश के विभिन्न भागों में कार्यरत सरकारी समितियों के और अनेक उदाहरण हैं, जिन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों के लिए खाद्य और सम्बन्धित वस्तुएँ उपलब्ध कराई हैं।

14.

सहकारी समितियाँ किस प्रकार खाद्य सुरक्षा में सहायक होती हैं?

Answer»

सहकारी समितियाँ भारत में खाद्य सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सहकारी समितियों ने गरीब लोगों को कम मूल्य पर वस्तुएँ बेचने के लिए दुकानों का निर्माण किया है। उदाहरण के लिए तमिलनाडु में चलाई जाने वाली सभी उचित कीमत की दुकानों में से 94 प्रतिशत दुकानें सहायक समितियों द्वारा चलाई जाती हैं। दिल्ली में, मदर डेयरी ने दिल्ली सरकार द्वारा निश्चित नियंत्रित कीमत पर उपभोक्ताओं के लिए दूध एवं सब्जियों के संचय का प्रयास किया है। अमूल भी सहकारी समितियों की सफलता की एक कहानी है। यह देश में श्वेत क्रान्ति लाया था। यहाँ सहकारी समितियों के कई और अन्य उदाहरण है जो खाद्य सुरक्षा को भारत के विभिन्न भागों के विभिन्न वर्गों में सुनिश्चित करता है। इसी प्रकार महाराष्ट्र में Academy of Development Science ने गैर-सरकारी संगठनों द्वारा अनाज बैंक बनाने की सुविधा उपलब्ध की। ADS प्रशिक्षण की व्यवस्था करता है। यह भोजन सुरक्षा के उद्देश्य से संगठित गैर-सरकारी संगठनों के लिये भवन की व्यवस्था करता है। महराष्ट्र के विभिन्न भागों में अनाज बैंकों का धीरे-धीरे विकास हो रहा है।

15.

कौन लोग खाद्य असुरक्षा से अधिक ग्रस्त हो सकते हैं?

Answer»

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के अन्य क्षेत्र जो या तो भूमि के आधार पर गरीब हैं या जिनके पास बहुत कम भूमि है, क्रमशः खाद्य असुरक्षा के शिकार हैं। प्राकृतिक प्रकोपों से प्रभावित लोग जो शहरों में पलायन करते हैं, वह भी खाद्य असुरक्षा के शिकार होते हैं। गर्भवती महिलाएँ एवं नर्सिंग माँ भी कुपोषण एवं खाद्य असुरक्षा स्तर का शिकार होती है। उक्त के अलावा भूमिहीन अर्थात् थोड़ी या नाम मात्र की भूमि पर निर्भर लोगों को खाद्य असुरक्षा से ग्रस्त लोगों की श्रेणी में हम शामिल कर सकते हैं जिनका विवरण इस प्रकार हैं

⦁     शहरी कामकाजी मजदूर ।

⦁    अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के कुछ वर्गों के लोग

⦁     प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोग

⦁     गर्भवती तथा दूध पिला रही महिलाएँ तथा पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चे

⦁     पारम्परिक दस्तकार

⦁    पारम्परिक सेवाएँ प्रदान करने वाले लोग

⦁     अपना छोटा-मोटा काम करने वाले कामगार

⦁     भिखारी

16.

गरीबों को खाद्य सुरक्षा देने के लिए सरकार ने क्या किया? सरकार की ओर से शुरू की गई किन्हीं दो योजनाओं की चर्चा कीजिए।

Answer»

भारत सरकार ने लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर खाद्य सुरक्षा प्रणाली अपनायी है। इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्त्योदय अन्न योजना के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है।

(क) सार्वजनिक वितरण प्रणाली–केन्द्र सरकार, भारतीय खाद्य निगम के द्वारा किसानों से अधिप्राप्त अनाज को विनियमित कर राशन की दुकानों के माध्यम से समाज के गरीब वर्गों में वितरित करती है। इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहते हैं। वर्तमान में देश के ज्यादातर क्षेत्रों, गाँवों, कस्बों और शहरों में राशन की दुकानें हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली खाद्य सुरक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा उठाया गया महत्त्वपूर्ण कदम है। राशन की दुकानों को उचित मूल्य की दुकानें कहते हैं। यहाँ चीनी, खाद्यान्न और खाना पकाने के लिए मिट्टी के तेल का भण्डारण और वितरण किया जाता है।

संशोधित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (आर.पी.डी.एस.) को 1992 में देश के 1700 ब्लॉकों में संशोधित सार्वजनिक वितरण प्रणाली शुरू की गई। इसका लक्ष्य दूर-दराज और पिछड़े क्षेत्रों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली से लाभ पहुँचाना था। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टी.पी.डी.एस.) को जून 1997 से सभी क्षेत्रों में गरीबों को लक्षित करने के सिद्धान्त को अपनाने के लिए प्रारम्भ की गई। यह पहला मौका था जब निर्धनों और गैर-निर्धनों के लिए विभेदक कीमत नीति अपनाई गई।

(ख) अन्त्योदय अन्न योजना (ए.ए.वाई.) और अन्नपूर्णा योजना (ए.ए.एस.)-ये योजनाएँ क्रमशः ‘गरीबों में भी सर्वाधिक गरीब’ और ‘दीन वरिष्ठ नागरिक समूहों पर लक्षित हैं। इस योजना का क्रियान्वयन पी.डी.एस. के पहले से ही मौजूद नेटवर्क के साथ जोड़ा गया।

17.

भारत में राशन व्यवस्था की शुरुआत कब हुई?

Answer»

भारत में राशन व्यवस्था की शुरुआत बंगाल के अकाल की पृष्ठभूमि में 1940 ई. के दशक में हुई। इस अकाल में 30 लाख से अधिक लोग मारे गए थे। हरित क्रान्ति से पहले खाद्य संकट से उबरने के लिए 1960 ई. के दशक के दौरान राशन प्रणाली पुनः जीवित की गयी।

18.

उचित दर वाली दुकानों से क्या तात्पर्य है?

Answer»

राशन की दुकानों में जिन्हें उचित दर वाली दुकानें कहा जाता है, जहाँ चीनी, खाद्यान्न और खाना पकाने के लिए मिट्टी के तेल का भंडार होता है, ये सामान लोगों को बाजार कीमत से कम कीमत पर वितरण किया जाता है।

19.

जब कोई आपदा आती है तो खाद्य पूर्ति पर क्या प्रभाव होता है?

Answer»

किसी प्राकृतिक आपदा जैसे—सूखा, बाढ़ आदि के कारण खाद्यान्न की कुल उपज में गिरावट दर्ज की जाती है जिससे क्षेत्र विशेष में खाद्यान्न की कमी हो जाती है जिसकी वजह से खाद्यान्नों की कीमतें बढ़ जाती हैं। समाज के निर्धन वर्ग के लोग ऊँची कीमतों पर खाद्यान्न नहीं खरीद पाते हैं। यदि यह आपदा अधिक लंबे समय तक बनी रहती है तो भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। जो अकाल की स्थिति बन सकती है।

20.

भारत में खाद्य सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है?

Answer»

(क) प्रत्येक व्यक्ति के लिए खाद्य उपलब्ध रहे।

(ख) लोगों के पास अपनी भोजन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त और पौष्टिक भोजन खरीदने के लिए धन उपलब्ध हो।

(ग) प्रत्येक व्यक्ति की पहुँच में खाद्य रहे।

21.

अकाल से आप क्या समझते है?

Answer»

अकाल फसलों के उत्पादन कम होने से लोगों में भुखमरी उत्पन्न हो जाती है जिससे बड़े पैमाने पर मौतें होती हैं। जो लोग भुखमरी तथा विवश होकर होकर दूषित जल या सड़े भोजन के प्रयोग से फैलने वाली महामारियों तथा भुखमरी से उत्पन्न कमजोरी से रोगी के प्रति शरीर की प्रतिरोधी क्षमता में कमी उत्पन्न होती है।

22.

भारत में लोगों का एक वर्ग अब भी खाद्य से वंचित है? व्याख्या कीजिए।

Answer»

यह सत्य है कि भारत में लोगों का एक वर्ग अब भी खाद्य से वंचित है। आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर देश बन चुका है। ऐसे में देश का कोई नागरिक खाद्य से वंचित नहीं होना चाहिए। वास्तविक अभ्यास एवं वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं है। लोगों को एक वर्ग अब भी खाद्य से वंचित है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उनके पास खाद्य खरीदने के लिए आवश्यक राशि नहीं है। यह लोग दीर्घकालिक गरीब हैं जो कोई क्रय शक्ति नहीं रखते। इस वर्ग में भूमिहीन एवं बेरोज़गार लोग शामिल हैं।

खाद्य से वंचित सर्वाधिक प्रभावित वर्गों में है-ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन परिवार जो थोड़ी बहुत अथवा नगण्य भूमि पर निर्भर हैं, कम वेतन पाने वाले लोग, शहरों में मौसमी रोजगार पाने वाले लोग। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के कुछ वर्गों (इनमें से निचली जातियाँ) को या तो भूमि का आधार कमजोर होता है। वे लोग भी खाद्य की दृष्टि से सर्वाधिक असुरक्षित होते हैं, जो प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हैं और जिन्हें काम की तलाश में दूसरी जगह जाना पड़ता है। खाद्य असुरक्षा से ग्रस्त आबादी का बड़ा भाग गर्भवती तथा दूध पिला रही महिलाओं तथा पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों का है।

23.

क्या आप मानते हैं कि हरित क्रान्ति ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना दिया है? कैसे?

Answer»

भारत में सरकार ने स्वतन्त्रता के पश्चात् खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर बनने का यथासम्भव प्रयास किया है। भारत में कृषि क्षेत्र में एक नयी रणनीति अपनायी गयी, जैसे-हरित क्रान्ति के कारण गेहूँ उत्पादन में वृद्धि हुई। गेहूँ की सफलता के बाद चावल के क्षेत्र में इस सफलता की पुनरावृत्ति हुई। पंजाब और हरियाणा में सर्वाधिक वृद्धि दर दर्ज की गयी, जहाँ अनाजों का उत्पादन 1964-65 के 72.3 लाख टन की तुलना में बढ़कर 1995-96 में 3.03 करोड़ टन पर पहुँच गया, जो अब तक का सर्वाधिक ऊँचा रिकार्ड था। दूसरी तरफ, तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश में चावल के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। अतः हरित क्रान्ति ने भारत को काफी हद तक खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना दिया है।

24.

भुखमरी से आप क्या समझते हैं? भारत में भुखमरी के कितने प्रकार हैं?

Answer»

भुखमरी खाद्य की दृष्टि से असुरक्षा को इंगित करने वाला एक दूसरा पहलू है। भुखमरी गरीबी की एक अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, यह गरीबी लाती है। इस तरह खाद्य की दृष्टि से सुरक्षित होने से वर्तमान में भुखमरी समाप्त हो जाती है और भविष्य में भुखमरी का खतरा कम हो जाता है।

भुखमरी के प्रकार

(क) दीर्घकालिक भुखमरी–यह मात्रा या गुणवत्ता के आधार पर अपर्याप्त आहार ग्रहण करने के कारण होती है। गरीब लोग अपनी अत्यन्त निम्न आय और जीवित रहने के लिए खाद्य पदार्थ खरीदने में अक्षमता के कारण दीर्घकालिक भुखमरी से ग्रस्त होते हैं।

(ख) मौसमी भुखमरी-यह फसल उपजाने और काटने के चक्र से सम्बन्धित हैं। यह ग्रामीण क्षेत्रों की कृषि क्रियाओं की मौसमी प्रकृति के कारण ना नारी क्षेत्रों में अनियमित श्रम के कारण होती है। जैसे-बरसात के मौसम में अनियत निर्माण श्रमिक को कम काम रहता है।

25.

खाद्यान्न के गोदामों में आवश्यकता से अधिक अनाज का होना फिर भी लोगों के पास खाने के लिए भोजन नहीं है। इस विडम्बना से आप क्या समझते हैं?

Answer»

अतिरिक्त भंडार (Buffer Stock) की पर्याप्तता के बावजूद हमारे देश की 26% जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे रह रही है। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिदिन उनके पास भोजन खरीदने के साधन भी नहीं हैं। हालांकि यह प्रतिशत 19992000 में कम हुआ जो 1993-94 में 36% था; इन गरीबों की सम्पूर्ण संख्या 26 करोड़ है। यह प्रदर्शित करता है कि यहाँ पर कुछ लोगों के पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं है, जबकि सरकार के गोदामों में खाद्यान्न रखने की जगह नहीं है। उपरोक्त परिस्थितियों में हमारे कृषि वैज्ञानिकों को उत्पादन में वृद्धि के लिए कई अन्य उपाय खोजने पड़ेंगे जिससे हमारी जनसंख्या के कई लाख लोगों को भोजन प्रदान किया जा सके।

26.

राष्ट्रीय काम के बदले अनाज कार्यक्रम को लागू करने के उद्देश्य बताइए।

Answer»

14 नवम्बर, 2004 ई. को यह कार्यक्रम पूरक श्रम रोजगार के सृजन को तीव्र करने के उद्देश्य से देश के 150 पिछड़े जिलों में शुरू किया गया। यह कार्यक्रम उन समस्त ग्रामीण गरीबों के लिए है, जिन्हें वेतन रोजगार की आवश्यकता है।

और जो अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक हैं। इसे शत-प्रतिशत केन्द्र द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम के रूप में लागू किया गया और राज्यों को निःशुल्क अनाज मुहैया कराया जाता रहा है। जिला स्तर पर कलेक्टर शीर्ष अधिकारी है और उन पर इस कार्यक्रम की योजना बनाने, कार्यान्वयन, समन्वयन और पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी है। वर्ष 2004-05 में इस कार्यक्रम के लिए 20 लाख टन अनाज के अतिरिक्त 2,020 करोड़ रुपये नियत किए गए हैं।

27.

चीन की नई आर्थिक नीति की कोई चार असफलताएँ बताइए।

Answer»

चीन की आर्थिक नीति की चार असफलताएँ निम्नलिखित हैं-

⦁    चीन में हुए आर्थिक सुधारों का लाभ सभी वर्गों को समान रूप से प्राप्त नहीं हुआ है।
⦁    चीन में बेरोजगारी बढ़ी है।
⦁    चीन में अर्थव्यवस्था में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है तथा पर्यावरण खराब हुआ है।
⦁    चीन द्वारा अपनाई गई अर्थव्यवस्था से ग्रामों व शहरों, तटीय व मुख्य भूमि पर रहने वाले लोगों में आर्थिक असमानता बढ़ी है।

28.

यूरोपीय संघ को क्या चीजें एक प्रभावी क्षेत्रीय संगठन बनाती हैं?

Answer»

यूरोपीय संघ को निम्नलिखित तत्त्व एक प्रभावी क्षेत्रीय संगठन सिद्ध करते हैं-

1. समान राजनीतिक रूप-यूरोपीय संघ आर्थिक सहयोग वाली व्यवस्था से बदलकर अधिक-सेअधिक राजनीतिक रूप लेता गया है। यूरोपीय संघ का अपना एक झण्डा, गान, स्थापना दिवस तथा अपनी मुद्रा यूरो है। इससे साझी विदेश नीति और सुरक्षा नीति में सहायता मिली है।
2. सहयोग की नीति-यूरोपीय संघ ने सहयोग की नीति को अपनाया है। यूरोपीय संगठन के माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों ने एक-दूसरे की मदद की, इससे भी इस संघ का प्रभाव बढ़ा। इस महाद्वीप के इतिहास ने सभी यूरोपीय देशों को सिखा दिया कि क्षेत्रीय शान्ति और सहयोग ही अन्ततः उन्हें समृद्धि और विकास दे सकता है। संघर्ष और युद्ध, विनाश और पतन का मूल कारण होते हैं।
3. आर्थिक प्रभाव या शक्ति-यूरोपीय संघ का आर्थिक प्रभाव बहुत अधिक है। सन् 2005 में वह विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। इसकी मुद्रा यूरो अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व के लिए खतरा बन सकती है। विश्व व्यापार में इसकी भागीदारी अमेरिका से तीन गुनी अधिक है और इसी के चलते वह अमेरिका और चीन से व्यापारिक विवादों में बराबरी से बात करता है। इसकी आर्थिक शक्ति का प्रभाव इसके निकटतम देशों पर ही नहीं बल्कि एशिया और अफ्रीका के दूर-दराज के देशों पर भी है।
4. राजनीति और कूटनीति का प्रभाव-इस संघ का राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव भी कम नहीं है। इसके दो सदस्य देश ब्रिटेन और फ्रांस सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य हैं। संघ के कई अन्य सदस्य देश सुरक्षा परिषद् के अस्थायी सदस्यों में शामिल हैं।
5. विश्व के अन्य देशों की नीतियों को प्रभावित करना-यूरोपीय संघ में विकास एवं एकीकरण के कारण विश्व के अन्य देशों को प्रभावित करने की क्षमता भी है। वह अमेरिका को प्रभावित कर सकता है और विश्व की आर्थिक, सामाजिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है।
6.सैन्य शक्ति-यूरोपीय संघ के पास विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। इसका कुल बजट अमेरिका के बाद सबसे अधिक है। यूरोपीय संघ के दो देशों ब्रिटेन एवं फ्रांस के पास परमाणु हथियार हैं। विज्ञान और संचार प्रौद्योगिकी के मामले में इस संघ का विश्व में दूसरा स्थान है।

29.

मास्ट्रिस्ट सन्धि पर हस्ताक्षर कब हुए थे-(a) 7 फरवरी, 1993(b) 7 फरवरी, 1992(c) 8 जून, 1992(d) 7 जुलाई, 1992.

Answer»

सही विकल्प है (b) 7 फरवरी, 1992.

30.

यूरोपीय संघ एक अधिराष्ट्रीय संगठन के रूप में कैसे उभरा? इनकी सीमाएँ क्या हैं?

Answer»

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात् अनेक यूरोपीय नेता यूरोप के प्रश्नों को लेकर दुविधा में पड़े हुए थे। क्या यूरोप को अपनी पुरानी शत्रुता को पुन: प्रारम्भ कर देना चाहिए अथवा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सकारात्मक योगदान करने वाले सिद्धान्तों तथा संस्थाओं के आधार पर उसे अपने सम्बन्धों को नए आयाम देने, चाहिए। द्वितीय विश्वयुद्ध ने उन अनेक मान्यताओं तथा व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर दिया जिनके आधार पर यूरोप के देशों के परस्पर आपसी सम्बन्ध विकसित हुए थे। सन् 1945 तक यूरोपीय राष्ट्रों ने अपनी अर्थव्यवस्था की बर्बादी को अति निकट से देखा था। उन्होंने उन मान्यताओं और व्यवस्थाओं को भी टूटते हुए देखा था जिन पर यूरोप खड़ा हुआ था।

द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् यूरोपीय देशों द्वारा समस्याओं का समाधान द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने निम्नांकित ऐतिहासिक कदम उठाकर अपनी समस्याएं सुलझाई थी-

1. अमेरिकी सहयोग तथा यूरोपीय आर्थिक संगठन की स्थापना-सन् 1945 के बाद यूरोप के देशों में परस्पर मेल-मिलाप से शीतयुद्ध में भी सहायता मिली। अमेरिका ने यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के लिए पर्याप्त सहायता प्रदान की थी। इसे ‘मार्शल योजना’ के नाम से जाना जाता है। अमेरिका ने ‘नाटो’ के अन्तर्गत एक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को जन्म दिया। मार्शल योजना में ही सन् 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना की गयी जिसके माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों को आर्थिक सहायता दी गयी। यह एक ऐसा मंच बन गया जिसके माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों ने व्यापार तथा आर्थिक मामलों में एक-दूसरे की सहायता प्रारम्भ की।
2. यूरोपीय परिषद् तथा आर्थिक समुदाय का गठन–सन् 1949 में गठित यूरोपीय परिषद् राजनीतिक सहयोग के मामले में एक मील का पत्थर सिद्ध हुई। यूरोप के पूँजीवादी देशों में अर्थव्यवस्था के परस्पर एकीकरण की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ी और इसके फलस्वरूप सन् 1957 में यूरोपीय इकोनोमिक कम्युनिटी का गठन हुआ।
3. यूरोपीय पार्लियामेण्ट का गठन-यूरोपीय संसद के गठन के बाद परस्पर जुड़ाव की इस प्रक्रिया ने राजनीतिक स्वरूप हासिल कर लिया। सोवियत खेमे के पतन के बाद इस प्रक्रिया में तेजी आई और सन् 1992 में दूसरी परिणति यूरोपीय संघ की स्थापना के रूप में हुई। यूरोपीय संघ के रूप में समान विदेश तथा सुरक्षा नीति, आन्तरिक मामलों एवं न्याय से जुड़े मुद्दों पर सहयोग और एकसमान मुद्रा के चलन हेतु रास्ता तैयार हो गया।
4. यूरोपीय संघ का गठन-एक लम्बी समयावधि में निर्मित यूरोपीय संघ आर्थिक सहयोग वाली व्यवस्था से परिवर्तित होकर अधिकाधिक राजनीतिक स्वरूप धारण करता चला गया। अब यूरोपीय संघ स्वयं काफी सीमा तक एक विशाल राष्ट्र-राज्य की तरह ही कार्य करने लगा। हालाँकि यूरोपीय संघ का एक अलग संविधान निर्मित किए जाने की असफल कोशिश की जा चुकी है परन्तु इसका अपना झण्डा, गान, स्थापना दिवस और अपनी मुद्रा है। अन्य देशों के सम्बन्धों के मामले में इसने काफी सीमा तक संयुक्त विदेश तथा सुरक्षा नीति भी बना ली है। – नए सदस्यों को सम्मिलित करते हुए यूरोपीय संघ ने सहयोग के दायरे में रहते हुए विस्तार का प्रयास किया। मुख्यतया नए सदस्य पूर्व सोवियत गुट से थे।

यूरोपीय संघ की सीमाएँ एक अधिराष्ट्रीय संगठन के रूप में यूरोपीय संघ आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप करने में सक्षम है, परन्तु अनेक मामलों में इसके सदस्य देशों की अपनी विदेश तथा रक्षा नीति है जो विभिन्न मुद्दों पर परस्पर एक-दूसरे के विरुद्ध भी होती है। उदाहरणार्थ, इराक पर अमेरिकी हमले में ब्रिटिश प्रधानमन्त्री तो उसके साथ थे, लेकिन जर्मन तथा फ्रांस इस आक्रमण के विरुद्ध थे। इसी तरह यूरोप के कुछ भागों में यूरो को लागू किए जाने के कार्यक्रम को लेकर भी काफी मतभेद रहे थे। पूर्व ब्रिटिश प्रधानमन्त्री मार्गरेट थैचर ने ग्रेट ब्रिटेन को यूरोपीय बाजार से अलग रखा। डेनमार्क तथा स्वीडन ने मास्ट्रिस्ट सन्धि तथा संयुक्त यूरोपीय मुद्रा यूरो को मानने का प्रतिरोध किया। उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विदेशी तथा रक्षा मामलों में कार्य करने की यूरोपीय संघ की क्षमता सीमित है।

31.

यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन क्या है?

Answer»

यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना सन् 1948 में अमेरिकी विदेश मन्त्री मार्शल के द्वारा प्रस्तुत योजना के आधार पर की गई थी।
इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य पश्चिमी यूरोप के देशों की आर्थिक मदद करना था। इस संगठन ने एक ऐसा मंच प्रस्तुत किया जिसके माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों ने व्यापार और आर्थिक मामलों में एक-दूसरे की सहायता की।

32.

मास्ट्रिस्ट सन्धि किस संगठन का आधार है-(a) गैट(b) विश्व व्यापार संगठन(c) नाफ्टा(d) यूरोपीय संघ।

Answer»

सही विकल्प है (d) यूरोपीय संघ।

33.

यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना कब की गई-(a) 1949 में(b) 1950 में(c) 1948 में(d) 1951 में।

Answer»

सही विकल्प है (c) 1948 में।

34.

Why are smooth muscles called Involuntary muscles?

Answer»

Smooth muscles are called involuntary muscles because their functioning cannot be controlled by our will

35.

What are the three types of muscle tissue? Write two characteristic points about the structure of each of them.

Answer»

(i) Striated muscles

  • Cells are cylindrical and unbranched
  • They show alternate dark and light bands called striations

 (ii) Smooth muscles

  • cells are spindle-shaped
  • Striations are absent

(iii) Cardiac muscles

  • Cells are cylindrical and branched 
  • Striations are faint 
36.

Explain the Muscle Tissue and types.

Answer»

Muscle Tissue :

Consists of long, cylindrical, contractile cells called fibres; bring about movement and locomotion. 

(i) Skeletal Muscle

• Consists of long cylindrical, multinucleated fibres. 

• Closely attached to skeletal bones. 

• Striated and voluntary. 

(ii) Smooth Muscles

• Consists of spindle like, uni nucleated fibres. 

• Do not show striations and are involuntary. 

• Wall of internal organs such as blood vessels, stomach and intestine. 

(iii) Cardiac Muscles

• Short, cylindrical, uni nucleated fibres, branched fibres 

• Occur in the heart wall and are involuntary. 

• Intercalated discs for communication.

37.

Do you think the title of this story is suitable for it? Can you think of any other title (s)?

Answer»

Decidedly the title of this story is most suitable. For the old Connie, no other present could have given such joy as the !; coming home of Jim, her husband. Her presumption might be wrong, but she got the greatest happiness of her life. Since the story revolves around Christmas, the alternate; the title of the story could be ‘War and Peace’ or ‘Christmas Gift’. But neither can be a match to the present tide.

38.

What Is the white flag a symbol of?A. Declaration of warB. Continuation of warC. PeaceD. Warning before firing

Answer»

Answer is C. Peace

39.

The Tommies and the Fritzes met on the Christmas Day.A. the English soilB. the German soilC. no man’s landD. None of these three

Answer»

C. no man’s land

40.

What is Connie’s Christmas present? Why is it ‘the best Christmas present in the world’?

Answer»

Connie thought that Jim had come back home from war. She mistook the author for Jim. She had been waiting for her husband Jim. So the coming home of Jim was the best Christmas present in the world for her.

41.

Where and when was the Rajputana University established?

Answer»

The Rajputana University was established in Jaipur in January, 1947.

42.

Fill in the blanks with the appropriateforms of verbs given in the brackets and complete the texts:We ….1….. all ….1….. (stand) to in our trenches yesterday morning, Christmas morning. It …..2….. (be) crisp and quiet all about, as beautiful a morning as I ….3….. ever …3….. (see), as cold and frosty as a Christmas morning should be.

Answer»

1. were, standing

2. was

3. have seen

43.

When and where was the first Ayurvedic Medicines college set up?

Answer»

The first Ayurvedic Medicines college was set up in 1933 in Udaipur.

44.

What was Hems Wolf’s pursuit before he joined the army?A. He was a singer.B. He was a cello player.C. He was an actor.D. He was a dancer.

Answer»

B. He was a cello player.

45.

The first law college was opened in Rajasthan at – (a) Udaipur (b) Kota (c) Bikaner (d) Alwar

Answer»

(a)  Udaipur

46.

On increasing the length of the tube of the tube of a compound microscope its magnifying power(A) decreases(B) increases(C) becomes zero(D) does not change

Answer»

The correct option is (A) decreases.

Magnifying Power (MP) = v/u x D/ue, 

L = v + |ue|, if L increases, ue increases.

Hence, When length of microscope tube increase, magnifying power gets decreased.

47.

Name three high education centres of rajputana under the indigenous education.

Answer»

Three high school education centres in the indigenous system were:

1. The Hindu Maths 

2. The Jain Upasaras 

3. The Muslim Madrassa

48.

Who opened the Private Public Engineering Institute of Technical Education in Rajputana? (a) Birla Education Trust (b) Rajasthan Vidhyapeeth (c) Vidhya Bhawan Society (d) Vanasthali Vidhyapeeth

Answer»

(a) Birla Education Trust

49.

I waited for his call, but he ............not call.(A) do(B) done(C) doing(D) did

Answer»

I waited for his call, but he did not call.

50.

Write about the beginning and evolution of technical education in Rajputana in the pre-independent India.

Answer»

India lagged behind the technical education in the early 20th century. In 1901 * Lord Curzon emphasised, in the Shimla Education Sammelan, to make technical education an inseparable part of the education, but it could be introduced only after the First World War and it evolved after the Second World War. On the suggestions of the British government, on 3rd Feburary, 1945 some intellectuals from the Rajputana and Madhya Pradesh proposed in a joint session to open a technical college in each state, but the proposal could not get through.

In Rajputana the technical education was introduced in various fields as mentioned below and it evolved gradually:

1. Teachers’ Training: 

The first attempt was made by the missionaries by opening Normal classes in Nasirabad and Beawar to train the teachers. Later on normal classes were started in the states too. The first teachers’ training college was opened in 1941 by the Vidhya Bhawan Education Society. The second teachers’ training college was opened at Ajmer in 1941 with the efforts of Dr. J.C, Chatterjee, the Chairman of the joint Board of Rajputana, Madhya Pradesh and Gwalior, and the third teachers’ training college was opened in 1946 in Bikaner.

2. Agricultural Technology: 

After the formation of the Education Board, in 1936 it was included as a compulsory subject in the syllabus for the secondary and higher secondary schools. In 1938-1939 Agricultural technology was introduced as an optional subject in the agriculture intermediate colleges. The night classes was started in Mewar villages to impart training to the farmers in the new technology of agriculture. In 1944 Secretary of State for India sent the circular to the rulers to introduce the Silon Plan. It was introduced in many states under the Silon Plan. The training was imparted in the schools in gardening, growing vegetables, use of new technology, tools and experiments.

3. Ayurvedic Medical College: 

In 1933 the first Ayurvedic Medical College was affiliated with the Ayurveda Board, Kanpur. It imparted knowledge only in medicines and investigation technique but not in the surgery. Ajrurvedic hospital was opened in Jaipur.

4. Ayurvedic Medical Science: 

As regards Ayurvedic medical treatment, Maharaja Ramsingh of Jaipur, in cooperation with Dr. Broor opened in 1947 Swai Mansingh Medical college. Prior to it four students from each state as per the quota fixed by the British sovereign were sent for medical studies. In 1894 four girls students were sent for the first time for studies in medicines to Agra Medical College. This was the first step of Rajputana in the field of medical studies for women. In the field of nurse training, there were schools in Bikaner and the Ajmer Medical Home School.

5. Law Education: 

In 1946 L.L.B classes were started in the Bhupal Nobles College, Udaipur. After the establishment of the Rajasthan University, the proposal to start separate law classes was moved and on the basis of the same the night classes law college was started in Maharaja College. Besides the Bhupal College, law studies were started in four other colleges, namely Law College, Jaipur, Jaswant College, Jodhpur, Raj Rishi College, Alwar and Dungar College, Bikaner.