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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

एक अध्ययन से प्या चलन कि के रंग की आँखों वाले बच्चों के जनक ( माता-पिता ) की आँखें भी हलके रंग की होती हैं। इसके आधार पर क्या हम कह सकते हैं कि आँखों के हलके रंग का लक्षण प्रभावी है अथवा अप्रभावी? अपने उत्तर की व्याख्या कीजिए। 

Answer»

इस आधर पर यह खा जा सकता है | कि आँखों के हल्के रंग का लक्षण प्रभावी है | क्योंकि माता – पिता की आँखें भी हल्के रंग की है अत: हम प्रभावी लक्षण हल्के रंग को कहेंगें हांलाकि गहरे रंग का लक्षण अप्रभावी है |

2.

विकासीय दृष्टिकोण से हमारी किस से अध्कि समानता है ?(a)  चीन के विद्यार्थी(b)  चिम्पैंजी(c)  मकड़ी(d)  जीवाणु

Answer»

(a)  चीन के विद्यार्थी 

3.

जैव-विकास तथा वर्गीकरण का अध्ययन क्षेत्रा किस प्रकार परस्पर संबंध्ति है।

Answer»

मानव के पूर्वज एक ही थे | धीरे – धीरे जीवों का विकास हुआ तथा इसी विकास के कारण जीव सरलता से जटिलता की ओर अग्रसर हुए तथा विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत हुए | इस प्रकार जैव विकास ही वर्गीकरण की सीढ़ी है |

4.

किन प्रमाणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि जीवन की उत्पत्ति अजैविक पदार्थों से हुई है?

Answer»

सन् 1929 में ब्रिटिश वैज्ञानिक जे .बी.एस. हाल्डेन ने बताया कि शायद कुछ जटिल कार्बनिक अणुओं का संश्लेष्ण हुआ जो जीवो के लिए आवश्यक थे | प्राथमिक जीव अन्य रासायनिक संश्लेष्ण द्वारा उत्पन्न हुए होगें | इसके आमेनिया , मीथेन , तथा हाइड्रोजन सल्फाइड के अणु परन्तु ऑक्सीजन के नंही थे | 100० C से कम ताप पर गैसों के मिश्रण में चिंगारियां उत्पन्न करने पर एक सप्ताह बाद 15 प्रतिशत कार्बन सरल कार्बनिक यौगिकों में बदल गए | इनमें एमीनो अम्ल भी संश्लेषित हुए जो प्रोटीन के अणुओं को बनाते हैं | इस प्रकार अजैविक पदार्थो से जीवों की उत्पति हुई |

5.

विकास के आधार पर क्या आप बता सकते हैं कि जीवाणु, मकड़ी, मछली तथा चिम्पैंजी में किसका शारीरिक अभिकल्प उत्तम है? अपने उत्तर की व्याख्या कीजिए।

Answer»

मानव एवं चिम्पैंजी दोनों के ही पूर्वज एक सामान थे | चिम्पैंजी मानव के ही सामान अपने क्रियाकलाप सम्पन्न कर सकता है | परन्तु अत्यधिक जटिलता के कारण विकास कि दृष्टि से शरीरिक अभिकल्प में त्रुटियाँ भी है पर फिर भी जीवाणु , मकड़ी व मछली से उत्तम है |

6.

एक वृक्ष की हत्या कवि परिचय :

Answer»

कुँवर नारायण जी का जन्म 19 सितंबर 1927 ई. में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में हुआ। आपने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1951 ई. में अंग्रेजी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। आपके साहित्य पर श्री नरेन्द्रदेव और आचार्य कृपलानी जी का प्रभाव दिखाई देता है।

आपका पहला काव्य संकलन ‘चक्रव्यूह’ 1956 ई. में प्रकाशित हुआ जो कि हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर माना जाता है।

प्रसिद्ध रचनाएँ : काव्य : ‘परिवेश’, ‘अपने सामने’, ‘कोई दूसरा नहीं’, ‘आत्मजयी’, ‘वाजश्रवा के बहाने’, ‘तीसरा सप्तक’, ‘हम तुम’, ‘इन दिनों’ आदि। आपका कहानी संकलन ‘आकारों के आस पास’ 1971 ई. में प्रकाशित हुआ।

आपको ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘कबीर सम्मान’ के साथ ही 2005 ई. में समग्र साहित्य के लिए ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। आपकी साहित्यिक सेवा के लिए भारत सरकार ने 2009 ई. में पद्मभूषण की उपाधि से विभूषित किया।

7.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :अबकी घर लौटा तो देखा वह नहीं था-वही बूढ़ा चौकीदार वृक्षजो हमेशा मिलता था घर के दरवाजे पर तैनात।

Answer»

प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठय पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘एक वृक्ष की हत्या’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है, जिसके रचयिता कुँवर नारायण हैं।

संदर्भ : प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने उस वृक्ष को हमेशा दोस्त के रूप में माना था जिसके कट जाने पर उसकी यादें कवि को बार-बार सताती है। वह हमेशा दरवाजे पर बूढ़े चौकीदार की तरह तैनात रहता था।

भाव स्पष्टीकरण : कवि कई दिनों बाद घर लौटा तो देखा कि उसके घर के निकट जो पेड़ हुआ करता था वह कट गया है। वह पेड़ जिसके इर्द-गिर्द उसका बचपन बीता, कहीं नहीं था। वह पेड़ बूढ़ा हो गया था पर ठाठ उसकी हमेशा रहती थी। वह एक बूढ़े चौकीदार सा नियुक्त उसके घर की रखवाली करता था।

8.

एक वृक्ष की हत्या कविता का सारांश अँग्रेजी में लिखें।

Answer»

In this poem, the poet Kunwar Narayan describes his feelings towards a tree. The poet treated the tree as a friend. In this poem, one can find a description of human feelings.

The poet says that when he returned home the last time, the large ‘watchkeeper’ tree, which could always be found outside the main door of his house, was no longer to be seen. The exterior of the tree was made of old skin (bark), it was a rough and hardy tree and its exterior was covered with rough wrinkles and dust and dirt. Its dry branches were like rifles, and it had a turban of leaves and flowers. Its feet had rough and wrinkled shoes (roots) but it had a very strong base. Where did this tree go?

In the sun, in the rain and in summer and winter, the tree would always be alert in its khaki uniform, and would always ask from afar who was trespassing. The poet would reply that it was a friend (the poet himself) and would then rest a while under the tree’s shade. In reality, the poet always feared that some mortal enemy would visit them. He was always aware of the fact that they would have to prepare themselves to face these enemies.

The house has to be saved from thieves, the town from rioters, and the country from its enemies. The rivers have to be saved from becoming rivulets, the air has to be saved from smoke, food has to be saved from poison and the jungles have to be saved from becoming deserts, and humanity has to be saved from turning into a jungle.

9.

एक वृक्ष की हत्या कविता का भावार्थ :

Answer»

प्रस्तुत कविता में कुँवर नारायण ने वृक्षों के प्रति अपनी संवेदना जताई है। कवि वृक्ष को दोस्त के रूप में देखते हैं। मानवीय भावनाओं को यहाँ देखा जा सकता है।

1) अबकी घर लौटा तो देखा वह नहीं था….
वही बूढ़ा चौकीदार वृक्ष
जो हमेशा मिलता था घर के दरवाजे पर तैनात।
पुराने चमड़े का बना उसका शरीर
वही सख्त जान
झुर्रियोंदार खुरदुरा तना मैलाकुचैला,
राइफिल-सी एक सूखी डाल,
एक पगड़ी फूल पत्तीदार,

पाँवों में फटापुराना जूता
चरमराता लेकिन अक्खड़ बल बूता।

कवि कहता हैं कि अब की बार जब वह घर लौटा, तो वह बूढ़ा चौकीदार वृक्ष, जो हमेशा घर के दरवाजे पर मिलता था वह नहीं था। पुराने चमड़े का बना हुआ उसका शरीर, वही कठोर जान, झुर्रियों वाला खुरदरा तना मैला-कुचैला, राइफिल की तरह उसकी सूखी डाल, एक फूल-पत्तीदार वाली पगड़ी, पाँवों में फटा-पुराना जूता चरमराता, परन्तु अक्खड़ बल-बूते वाला। कहाँ गया वह वृक्ष?

2) धूप में, बारिश में,
गर्मी में, सर्दी में,
हमेशा चौकन्ना
अपनी ख़ाकी वर्दी में।
दूर से ही ललकारता, ‘कौन?’
मैं जवाब देता, ‘दोस्त!’
और पल भर को बैठ जाता
उसकी ठंडी छाँव में।
दरअसल शुरू से ही था हमारे अंदेशों में
कहीं एक जानी दुश्मन

धूप में, वर्षा में, सर्दी-गर्मी में हमेशा चौकन्ना रहकर अपनी खाकी वर्दी में दूर से ही ललकारता था – ‘कौन?’ कवि जवाब देता – ‘दोस्त!’ और कुछ क्षण उसकी छाया में बैठ जाता। वास्तव में कवि को संदेह था कि कोई जानी दुश्मन आ गया होगा! इन दुश्मनों से बचाना है।

3) कि घर को बचाना है लुटेरों से
शहर को बचाना है नादिरों से
देश को बचाना है, देश के दुश्मनों से।
बचाना है-
नदियों को नाला हो जाने से
हवा को धुंआ हो जाने से
खाने को जहर हो जाने सेः
बचाना है- जंगल को, मरुथल हो जाने से,
बचाना है- मनुष्य को, जंगल हो जाने से।

घर को लुटेरों से, शहर को नादिरों से, देश को दुश्मनों से बचाना है। नदियों को नालों से, हवा को धुंए से, खाने को जहर से, जंगल को मरुस्थल से और मनुष्य को जंगल हो जाने से बचाना है।

10.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :बचाना है-नदियों को नाला हो जाने सेहवा को धुंआ हो जाने सेखाने को जहर हो जाने सेबचाना है – जंगल को, मरुथल हो जाने सेबचाना है – मनुष्य को जंगल हो जाने से।

Answer»

प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘एक वृक्ष की हत्या’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है, जिसके रचयिता कुँवर नारायण हैं।

संदर्भ : अपने घर के दरवाजे पर तैनात वृक्ष के कट जाने पर कवि उसकी यादों में खो जाते हैं, और साथ ही साथ पर्यावरण के विनाश के प्रति मनुष्य को सचेत भी करते हैं।

भाव स्पष्टीकरण : कवि वृक्ष के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं। यदि वृक्ष के महत्व को हम नहीं समझेंगे और वृक्षों को इसी तरह काटते रहेंगे तो आगे आने वाले दिनों में बहुत संकट झेलने पड़ेंगे। इसकी शुरूआत हो चुकी है। भू ताप लगातार बढ़ रहा है, मौसम में बदलाव आ रहा हैं, और जल संकट लगातार बढ़ रहा है। साफ ऑक्सीजन नहीं मिलने के कारण सैकड़ों बीमारियाँ फैल रही हैं। अगर हम अब भी पर्यावरण के संरक्षण के लिए सजग नहीं होते हैं तो यह संकट और अधिक विनाशकारी होता जाऐगा। इसलिए हमें नदियों को अगर नाले में बदलने से बचाना है तो हमें अच्छी बारिश के लिए वृक्षों को बचाना है। अगर वृक्ष नहीं होंगे तो ऑक्सीजन की जगह सिर्फ धुंआ ही बचेगा। हमें खाने पीने की चीजों को प्रदूषित होने से बचाना है। उपजाऊ जमीन को रेगिस्तान में तबदील होने से बचाने के लिए जंगलों को बचाना है। और सिर्फ नदी, हवा, जंगल ही नहीं बल्कि मनुष्यता को भी बचाना है।

विशेष : पर्यावरण के प्रति कवि की संवेदना व्यक्त हुई है।
भाषा शैली – साहित्यिक हिन्दी खड़ी बोली।

11.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :पुराने चमड़े का बना उसका शरीरवही सख्त जानझुर्रियोंदार खुरदुरा तना मैलाकुचैला,राइफिल-सी एक सूखी डाल,एक पगड़ी फूल पत्तीदार,पाँवों में फटापुराना जूताचरमराता लेकिन अक्खड़ बल बूता।

Answer»

प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘एक वृक्ष की हत्या’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है, जिसके रचयिता कुँवर नारायण हैं।

भाव स्पष्टीकरण : कवि अब की बार जब घर लौटे तो देखा घर के दरवाजे पर तैनात पुराना वृक्ष नहीं था। उसे स्मरण करते हुए कवि कहते हैं कि बूढ़ा वृक्ष जो चौकीदार जैसा लगता था, हमेशा मेरे दरवाजे पर तैनात रहता था। उसका शरीर बूढ़ा हो चला था लेकिन सख्त जान, कई मौसमों से वह गुजर चुका था। झुर्रियोंदार, खुरदुरा और मैला कुचैला लगता था। उसकी एक सूखी डाल राइफिल सी लगती थी। वृक्ष के ऊपर फैली फूल-पत्तियाँ उसकी पगड़ी जैसी दिख रही थी। उसके पाँव में फटे पुराने चरमराते हुए जूते थे। वह वृक्ष अक्खड़ता के बल बूते मजबूत खड़ा था – छाया देते हुए; स्वच्छ हवा देते हुए लेकिन ऐसा वृक्ष कट गया था। इस तरह कवि ने उस वृक्ष का विस्तार से वर्णन किया है।

12.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :दरअसल शुरू से ही था हमारे अंदेशों मेंकहीं एक जानी दुश्मनकि घर को बचाना है लुटेरों सेशहर को बचाना है नादिरों सेदेश को बचाना है, देश के दुश्मनों से।

Answer»

प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘एक वृक्ष की हत्या’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है, जिसके रचयिता कुँवर नारायण हैं।

संदर्भ : इस कविता में कवि ने वृक्षों के प्रति अपनी संवेदना जताई है।

भाव स्पष्टीकरण : बचपन से ही अपने घर पर तैनात चौकीदार वृक्ष न दिखने पर कवि उदास हो जाते हैं और उसकी याद में खो जाते है। कवि और उस वृक्ष का एक रिश्ता बना हुआ था। दोस्ती हो गयी थी। धूप में, गर्मी में, बारिश में, सर्दी में हमेशा चौकन्ना, छायादार पेड़ के कट जाने पर कवि का क्षोभ बढ़ जाता है। वृक्षों के महत्व को समझाते हुए कवि कहते हैं- ऐसे जानी दुश्मनों से, नादिरों से, लुटेरों से, पर को, शहर को, देश को बचाना है। कवि ने स्वार्थी मनुष्य को धिक्कारा है।

13.

पर्यावरण के संरक्षण के संबंध में कवि कुँवर नारायण के विचार लिखिए।

Answer»

वृक्षों के महत्व का वर्णन करते हुए पर्यावरण के संरक्षण के संबंध में कुँवर नारायण जी कहते हैं कि वृक्ष हर मौसम में मानव का हमदर्द बन कर उसकी भलाई करता है। हम जानते हैं कि मनुष्य को जीने के लिए जो हवा और पानी की आवश्यकता है, वे वृक्षों के कारण ही प्राप्य है। पर्यावरण में प्राणवायु वृक्षों के द्वारा ही बढ़ती है जिससे मानव आराम से साँस ले सके। वृक्ष गर्मियों में छत्र छाया बन कर हमारी थकावट दूर करते हैं। वृक्षों से ही बारिश होती है। वृक्षों को काटना नहीं चाहिए। वृक्षों के बिना हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। इसके बिना मनुष्य का जीना दूभर हो जाएगा इसलिए पर्यावरण का संरक्षण बहुत ही आवश्यक है।

14.

मनुष्य को क्या हो जाने से बचाना है?

Answer»

मनुष्य को जंगल हो जाने से बचाना है।

15.

वृक्ष की महत्ता पर प्रकाश डालिए।

Answer»

‘एक वृक्ष की हत्या’ कविता में कुँवर नारायण जी वृक्षों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए वृक्षों के महत्व को समझाते हैं। वृक्ष धूप में, बारिश में, गर्मी में, सर्दी में हमेशा चौकन्ना रह कर चौकीदार के समान मानव की रक्षा करता है। वृक्ष मानव का दोस्त है। थके-माँदे मानव को वृक्ष शान्ति एवं ठंडक पहुँचाता है। वृक्षों की संख्या घट गयी तो बारिश नहीं होगी। जंगल मरुभूमि बन कर निर्जन हो जाएगा। इसलिए पेड़ों की रक्षा कर मानव को बचाना है।

16.

शहर को किससे बचाना है?

Answer»

शहर को नादिरों से बचाना है।

17.

शुरू से ही क्या अंदेशा था?

Answer»

शुरू से ही अंदेशा था कि कहीं एक जानी दुश्मन है।

18.

वृक्ष न दिखने पर कवि उसकी यादों में कैसे खो गये?

Answer»

कवि कुँवर नारायण जी अबकी बार घर लौटे तो देखा कि वह बूढ़ा चौकीदार वृक्ष घर के दरवाजे पर नहीं है। वे बहुत उदास हो जाते हैं, उसकी यादों में खो जाते हैं। उसका शरीर पुराने चमड़े का बना था। वह बहुत ही मजबूत था। झुर्रियोंदार खुरदरा उसका तन मैला कुचैला था। उसकी एक सूखी डाली राइफिल सी थीं। फूल-पत्तीदार पगड़ी धारण किया वह वृक्ष बहुत ही सालों से स्थिर मजबूत ढंग से खड़ा था। धूप में, बारिश में, गर्मी में, सर्दी में अर्थात् सभी मौसमों में हमेशा चौकन्ना होकर घर की रखवाली करता था। कवि और उसके बीच एक प्रकार से दोस्ती हो गयी थी। उसकी ठंडी छाया में कुछ पल बैठकर ही कवि घर के अंदर प्रवेश करते थे।

19.

पल भर में कवि कहाँ बैठ जाते हैं?

Answer»

पल भर में कवि पेड़ की ठंडी छाँव में बैठ जाते हैं।

20.

खाने को क्या हो जाने से बचाना है?

Answer»

खाने को जहर हो जाने से बचाना है।

21.

नदियों को क्या हो जाने से बचाना हैं?

Answer»

नदियों को ‘नाला’ हो जाने से बचाना है।

22.

घर को किससे बचाना है?

Answer»

घर को लुटेरों से बचाना है।

23.

वृक्ष की वर्दी खाकी रंग की है।

Answer»

दूर से वृक्ष हमेशा चौकन्ना होकर ललकारता है।

24.

अभी भी किसमें अक्खड़पन दिखाई देता है?

Answer»

बूढ़े चौकीदार वृक्ष में अभी भी अक्खड़पन दिखाई देता है।

25.

वृक्ष की वर्दी किस रंग की है?

Answer»

वृक्ष की वर्दी खाकी रंग की है।

26.

जंगल को क्या हो जाने से बचाना है?

Answer»

जंगल को मरुथल (रेगिस्तान) होने से बचाना है।

27.

प्रथम सन्तानीय पीढ़ी की सन्तान का दोनों जनक में से किसी एक के साथ किया गया प्रसंकरण है(क) जाँच प्रसंकरण (टेस्ट क्रॉस) (ख) संकरे पूर्वज प्रसंकरण (बैक क्रॉस) (ग) अन्योन्यता प्रसंकरण (रेसीप्रोकल क्रॉस) (घ) एक गुण प्रसंकरण (मोनोहाइब्रिड क्रॉस)

Answer»

(ख) संकर पूर्वज प्रसंकरण (बैक क्रॉस)

28.

‘आनुवंशिकी का जनक किसे कहा जाता है?(क) ह्यूगो डी ब्रीज (ख) कार्ल कोरेन्स (ग) ग्रेगर जे० मेंडल (घ) एरिक वॉन सरमेक

Answer»

(ग) ग्रेगर जे० मेंडल

29.

दो विषमयुग्मजी जनकों का क्रॉस है और १ किया गया। मान लीजिए दो स्थल (loci) सहलग्न हैं तो द्विसंकर क्रॉस में F1 पीढ़ी के फीनोटाइप के लक्षणों का वितरण क्या होगा?

Answer»

एक ही गुणसूत्र पर उपस्थित जीन्स के एकसाथ वंशागत होने को जीन सहलग्नता (gene linkage) या सहलग्न जीन (linked genes) कहते हैं। सहलग्न जीन्स द्वारा नियन्त्रित होने वाले लक्षणों को सहलग्न लक्षण (linked characters) कहते हैं। जीन सहलग्नता (gene linkage) के अध्ययन के लिए मॉर्गनने ड्रोसोफिला (Drosophila) पर अनेक प्रयोग किए। ये मेण्डेल द्वारा किए गए द्विसंकर संकरण के समान थे। मॉर्गन ने पीले शरीर और श्वेत नेत्रों वाली मादा मक्खियों का संकरण भूरे शरीर और लाल नेत्रों वाली मक्खियों के साथ किया। इनसे प्राप्त प्रथम पुत्रीय संतति (F1 पीढ़ी) के सदस्यों में परस्पर क्रॉस कराने पर उन्होंने पाया कि ये दो जोड़ी जीन एक-दूसरे से स्वतन्त्र रूप से पृथक् नहीं हुए और F2 पीढ़ी का अनुपात मेण्डेल के नियमानुसार प्राप्त अनुपात 9:3:3:1 से काफी भिन्न प्राप्त होता है (यह अनुपात दो जीन्स के स्वतन्त्र कार्य करने पर अपेक्षित था)। यह सहलग्नता के कारण होता है।

30.

कोई द्विगुणित जीन 6 स्थलों के लिए विषमयुग्मजी (heterozygous) है, कितने प्रकार के युग्मकों का उत्पादन सम्भव है?

Answer»

जब कोई द्विगुणित जीन 6 स्थलों के लिए विषमयुग्मजी है अर्थात् किसी त्रिसंकर (tri-hybrid) में तुलनात्मक लक्षणों के तीन जोड़े जीन (कारक) होते हैं। प्रत्येक जोड़े लक्षण का विसंयोजन दूसरे जोड़े से स्वतन्त्र होता है तो द्विगुणित जीन 6 स्थलों के लिए विषमयुग्मजी होगा। जैसे लम्बे, पीले तथा गोल बीज वाले शुद्ध जनकों का संकरण, नाटे, हरे और झुरींदार बीज वाले पौधों से कराने पर F1 पीढ़ी में प्राप्त संकर लम्बे, गोल और पीले बीज वाले पौधों की विषमयुग्मजी जीन संरचना Tt Rr Yy होती है। इससे आठ प्रकार के युग्मक TRY, TRy, TrY, Try, tRY, tRy, trY, try बनते हैं। अर्थात् F1 पीढ़ी के सदस्यों के जीन युग्मक निर्माण के समय स्वतन्त्र होकर नए-नए संयोग बनाते हैं।

31.

मेंडल के एक गुण प्रसंकरण में कौन-सी पीढ़ी हमेशा विषमयुग्मजी होती है? (क) प्रथम सन्तानीय पीढ़ी (ख) द्वितीय सन्तानीय पीढ़ी (ग) तृतीय सन्तानीय पीढ़ी (घ) जनक पीढ़ी

Answer»

(क) प्रथम सन्तानीय पीढ़ी

32.

डाउन सिण्ड्रोम किसे कहते हैं? इसके कारण एवं लक्षण बताइए। या ‘मंगोलियन जड़ता क्या है? इसके दो प्रमुख लक्षण लिखिए।या डाउन्स सिण्ड्रोम के बारे में समझाइए। 

Answer»

डाउन सिण्ड्रोम 

यह रोग गुणसूत्रों में संख्या की अनियमितता के कारण होने वाले परिवर्तनों से होता है। मनुष्य में कभी-कभी गुणसूत्रों (chromosomes) की संख्या 46 के स्थान पर 47 हो जाती है। यह अतिरिक्त गुणसूत्र 21वें समजात जोड़े में तीसरा बढ़ जाने के कारण होता है। इसे डाउन संलक्षण (Down’s syndrome) भी कहते हैं। यह अतिरिक्त गुणसूत्र बच्चे की बुद्धि के सामान्य विकास को रोक देता है। संख्या में अधिक गुणसूत्र का कारण प्रायः अण्ड कोशिका (egg cell) के निर्माण में होने वाली गड़बड़ी के कारण हो सकता है।

47 गुणसूत्रों वाली ऐसी सन्तान का मस्तिष्क अविकसित होता है; सिर गोल, होंठ नीचे की ओर को लटका रहता है, माथा अनावश्यक रूप से चौड़ा होता है; त्वचा खुरदरी होती है; आँखें तिरछी तथा पलकें वलित (folded) होती हैं और मुँह हर समय खुला रहता है। ये मन्द बुद्धि होते हैं। इनके जननांग तो सामान्य होते हैं किन्तु पुरुष नपुंसक होते हैं। इस आनुवंशिक रोग को मंगोलिक बेवकूफी या मंगोलियन जड़ता (Mangolian idiocy) भी कहते हैं।

33.

संकर-पूर्वज संकरण (back cross) तथा परीक्षण संकरण (test cross) में अन्तर बताइए।

Answer»

जब किसी संकर को किसी भी जनक से संकरण कराया जाता है तो इसे संकर-पूर्वज संकरण कहते हैं जबकि प्रथम पीढ़ी (F1) जीव एवं समयुग्मकी अप्रभावी लक्षण वाले जीव के मध्य कराये गये संकरण को परीक्षण संकरण कहते हैं।

34.

वंशागति या आनुवंशिकता तथा आनुवंशिकी में अन्तर स्पष्ट कीजिए। 

Answer»

आनुवंशिक लक्षणों के जनकों से सन्तति में पहुँचने को आनुवंशिकता कहते हैं। विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत आनुवंशिक लक्षणों एवं उनकी वंशागति का अध्ययन किया जाता है, आनुवंशिकी कहलाता है।

35.

मेंडल ने अपने प्रयोग के लिए कितने लक्षणों का चुनाव किया? किन्हीं चार लक्षणों के नाम लिखिए।

Answer»

मंडल ने अपने प्रयोग के लिए सात जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का चुनाव किया। उदाहरणार्थ – 

1. पुष्पों का रंग-बैंगनी तथा सफेद 

2. बीज का रंग-हरा तथा पीला। 

3. पौधे की लम्बाई-लम्बा तथा बौना। 

4. बीज का आकार–गोल एवं झुर्रादार बीज।

36.

वृक्ष का जूता कैसा है?

Answer»

वृक्ष का जूता फटा-पुराना है।

37.

कायर मत बन कविता का भावार्थ :

Answer»

1) कुछ भी बन बस कायर मत बन।
ठोकर मार पटक मत माथा,
तेरी राह रोकते पाहन।
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

कवि मनुष्य को सम्बोधित कर रहा है कि हे मानव! तुम सब कुछ बनो, किन्तु डरपोक मत बनो। मार्ग में यदि पत्थर भी तुम्हारे मार्ग को रोकते हैं, तो ठोकर मार उन्हें वहाँ से हटा दो; किन्तु उनके समक्ष झुको नहीं। माथा पटकना पाप है। अर्थात् जीवन में आने वाली कठिनाइयों से निराश होना व्यर्थ है।

2) ले-देकर जीना क्या जीना?
कब तक गम के आँसू पीना?
मानवता ने सींचा तुझको
बहा युगों तक खून-पसीना।
कुछ न करेगा? किया करेगा….
रे मनुष्य-बस कातर क्रंदन?
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

कवि कह रहा है कि हे मानव! कलह कर जीना अच्छा नहीं है। इस तरह तुम दुःख के आँसू कब तक बहाते रहोगे? मनुष्यता ने तो बहुत समय तक अपना खून और पसीना बहाकर तुम्हें बढ़ाया है या तो तू कुछ नहीं करेगा? या फिर बस कायर की 

2) ले-देकर जीना क्या जीना?
कब तक गम के आँसू पीना?
मानवता ने सींचा तुझको
बहा युगों तक खून-पसीना।
कुछ न करेगा? किया करेगा….
रे मनुष्य-बस कातर क्रंदन?
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

कवि कह रहा है कि हे मानव! कलह कर जीना अच्छा नहीं है। इस तरह तुम दुःख के आँसू कब तक बहाते रहोगे? मनुष्यता ने तो बहुत समय तक अपना खून और पसीना बहाकर तुम्हें बढ़ाया है या तो तू कुछ नहीं करेगा? या फिर बस कायर की 

2) ले-देकर जीना क्या जीना?
कब तक गम के आँसू पीना?
मानवता ने सींचा तुझको
बहा युगों तक खून-पसीना।
कुछ न करेगा? किया करेगा….
रे मनुष्य-बस कातर क्रंदन?
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

कवि कह रहा है कि हे मानव! कलह कर जीना अच्छा नहीं है। इस तरह तुम दुःख के आँसू कब तक बहाते रहोगे? मनुष्यता ने तो बहुत समय तक अपना खून और पसीना बहाकर तुम्हें बढ़ाया है या तो तू कुछ नहीं करेगा? या फिर बस कायर की तरह बैठा-बैठा अपनी कमजोरी पर रोता रहेगा। तुम कुछ भी बनो किन्तु कायर मत बनो।

3) युद्धं देहि कहे जब पामर
दे न दुहाई पीठ फेर कर;
या तो जीत प्रीति के बल पर
या तेरा पद चूमे तस्कर।
प्रतिहिंसा भी दुर्बलता है,
पर कायरता अधिक अपावन
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

हे मानव! जब तुम्हें कोई युद्ध के लिए ललकारे तो पीठ फेरकर सहायता मत माँग। हे मानव! प्रेम के आधार पर प्राप्त विजय को तुम्हारा रास्ता चूमना चाहिए। क्या तुम यह नहीं जानते हो कि . बदला लेना भी अच्छा कार्य नहीं है। कायरता तो इससे भी अधिक गिरी हुई वस्तु है। इसलिए तुम सब कुछ बनो, किन्तु कायर मत बनो।

4) तेरी रक्षा का न मोल है,
पर तेरा मानव अमोल है,
यह मिटता है, वह बनता है,
यही सत्य की सही तोल है,
अर्पण कर सर्वस्व मनुज को,
कर न दुष्ट को आत्मसमर्पण,
कुछ भी बन बस कायर मत बन।

हे मनुष्य! तेरी रक्षा हो, इसका कोई मूल्य नहीं है। पर यह बात कटु सत्य है कि मानवता एक बहुमूल्य वस्तु है। जब मनुष्य अपने को मिटा देता है, तभी मानवता की रक्षा होती है। सत्य का यही मापदंड है। तुम मनुष्य के लिए अपना सब कुछ त्याग दो, किन्तु दुष्ट के सामने कभी मत झुको। तुम सब कुछ बनो, किन्तु कायर मत बनो।

38.

हो गई है पीर पर्वत-सी कविता (गज़ल) का भावार्थ :

Answer»

1) हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

कवि दुष्यंत कुमार के अनुसार समाज में कई प्रकार की विसंगतियाँ देखने को मिलती हैं। मनुष्य-मनुष्य से ईर्ष्या, घृणा करते रहने से पीड़ाएँ पर्वत के समान फैल गई हैं। इसे पिघलना चाहिए। हिमालय से गंगा को निकलना चाहिए।

2) आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

आज यह दीवार ऐसे हिल रही है, मानो खिड़कियों व दरवाजों के लगे हुए परदे हिल रहे हैं। वास्तव में होना यह है कि सम्पूर्ण बुनियाद ही हिल जाये, ताकि फिर से कुछ नया निर्माण किया जा सके। ऐसी शर्त रख रहे हैं कि परिवर्तन की चाह है।

3) हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर तथा गाँव में हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

4) सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

समाज को यदि बदलना है, तो केवल आवाज देने या घोषणा करने से कुछ होगा नहीं। कवि का अटूट विश्वास है कि सिर्फ हंगामा करना उनका उद्देश्य नहीं है, बल्कि पूरी कोशिश रहेगी कि सूरत ही बदल दी जाये। तात्पर्य यह है कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। उसके लिए जन-जागृति अति आवश्यक है।

5) मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

कवि अन्त में जागृत करते हुए कहते हैं कि मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में ही सही, आग होनी चाहिए, लेकिन वह आग सदा जलती रहनी चाहिए।

39.

हो गई है पीर पर्वत-सी कवि परिचय :

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कवि, गीतकार, उपन्यासकार, नाटककार एवं आलोचक दुष्यन्त कुमार का जन्म 1931 ई. में बिजनौर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के उपरांत आपने कुछ वर्ष आकाशवाणी भोपाल में काम किया। आप बाद में मध्यप्रदेश भाषा-विभाग, भोपाल से जुड़े जहाँ आप सह-संचालक के रूप में कार्य करते रहे।

आपको ‘नई कविता’ का कवि माना जाता है। आपने अपने लेखन के अन्तिम दौर में ‘गजल’ को अपनाया। इस विधा में आपने नए आयाम स्थापित किये जिसमें आपको बहुत प्रसिद्धि मिली। आपकी मृत्यु 1975 ई. में हुई।

आपकी रचनाएँ : काव्य : ‘सूर्य का स्वागत’, ‘आवाजों के घेरे’, ‘जलते हुए वन का वसन्त’, ‘एक कंठ विषपायी’ (काव्य-नाटक) ‘साए में धूप’ (गजल-संग्रह)।

उपन्यास : ‘छोटे-छोटे सवाल’, ‘दुहरी जिन्दगी’, ‘आँगन में एक वृक्ष’|
नाटक : ‘और मसीहा मर गया’। एकांकी : ‘मन के कोण’।

40.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

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प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘हो गई है पीर पर्वत-सी’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है जिसके रचयिता दुष्यन्त कुमार हैं।

संदर्भ : प्रस्तुत कविता में कवि भारतीय जनता की पीड़ा को पर्वत जैसी विशाल बताते हुए उसे क्रान्तिकारी बदलाव के लिए आह्वान कर रहे हैं।

भाव स्पष्टीकरण : कवि कहते हैं कि देश की राजनीतिक व्यवस्था में चरम सीमा तक पहुँच चुके भ्रष्टाचार, अवसरवाद एवं कुशासन से तंग आ चुकी जनता को बदलाव के लिए तैयार हो जाना चाहिए। कवि जनता से बदलाव के लिए आह्वान करते हैं। वे कहते हैं- अगर व्यवस्था के प्रति आपके मन में आग है, गुस्सा है तो उसे प्रकट कीजिए। परिवर्तन के लिए दूसरों का इंतजार नहीं करना चाहिए। अगर इतने पर भी कोई चुप बैठा है या उसे तकलीफ नहीं हो रही है तो ऐसे में आपको भी चुप नहीं रह जाना चाहिए। आप आगे बढ़िए। लोग धीरे-धीरे आपके पीछे आएंगे। देश की वर्तमान व्यवस्था को मूल से बदले बिना परिवर्तन नहीं होगा। इसलिए आमूल-चूल परिवर्तन के लिए कोशिश कीजिए।

विशेष : भाषा खड़ी बोली। गज़ल में आपात काल पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति की आहटें महसूस की जा सकती है।

41.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

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प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘हो गई है पीर पर्वत-सी’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है जिसके रचयिता दुष्यन्त कुमार हैं।

भाव स्पष्टीकरण : प्रगतिवादी विचारधारा को व्यक्त करते हुए कवि दुष्यन्त कुमार देश की जनता को प्रगति-पथ पर ले जाने व सुखी जीवन की परिकल्पना करते हैं। वे देखते हैं कि समाज में दुःख, दारिद्र्य, शोषण सब कुछ अभी भी है। आज के मानव वर्ग की पीड़ा हिमालय पर्वत के समान बन गई है। वे आशा करते हैं कि इस पीड़ा रूपी पर्वत से गंगा निकलनी चाहिए। अर्थात् ये परिवर्तन की आग चाहें किसी के भी मन से उठे, उसे उठना चाहिए। इसके माध्यम से कवि देशवासियों को जागरण का संदेश देते हैं।

42.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :युद्धं देहि कहे जब पामरदे न दुहाई पीठ फेर कर;या तो जीत प्रीति के बल परया तेरा पद चूमे तस्कर।

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प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘कायर मत बन’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है, जिसके रचयिता नरेन्द्र शर्मा हैं।

संदर्भ : प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने मनुष्य को कायर न बनने का संदेश देते हुए कहा है कि मनुष्य को मनुष्यता का ध्यान भी रखना अवश्यक है।

स्पष्टीकरण : कवि कह रहे हैं- हे मनुष्य! तुम कुछ भी बनो बस कायर मत बनो। अगर कोई दुष्ट या क्रूर व्यक्ति तुमसे टक्कर लेने खड़ा हो जाए, तो उसकी ताकत से डरकर तू पीछे मत हटना। पीठ दिखाकर भाग न जाना। संसार में कई ऐसे महापुरुष जन्मे हैं, जिन्होंने प्यार और सेवाभाव से दुष्टों के दिल को भी जीत लिया या पिघलाया है। क्योंकि हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा से देना नहीं। प्रतिहिंसा भी दुर्बलता ही है, लेकिन कायरता तो उससे भी अधिक अपवित्र है। इसलिए हे मानव! तुम कुछ भी बनो लेकिन कायर मत बनो।

43.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :तेरी रक्षा का न मोल है,पर तेरा मानव अमोल है,यह मिटता है, वह बनता है,यही सत्य की सही तोल है

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प्रसंग : इस कवितांश को हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘कायर मत बन’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता नरेन्द्र शर्मा जी हैं।

संदर्भ : प्रस्तुत कविता में कवि मनुष्य को कायर न बनने का संदेश दे रहे हैं।

व्याख्या : कवि कह रहे हैं कि हे मनुष्य! तेरी रक्षा हो, इसका कोई मूल्य नहीं है। पर यह भी कटु सत्य है कि मानवता भी एक बहुमूल्य वस्तु है। यदि मनुष्य मानवता की रक्षा के लिए अपने को मिटा देता है, तभी मनुष्यता की, मानव जाति की रक्षा हो पाती है। सत्य का यही मानदंड है। अर्थात् जीवन अमूल्य है। इस पर कोई प्रश्न नहीं है लेकिन व्यक्ति जीवन से ज्यादा बहुमूल्य मानव जीवन है। मनुष्यता, मानव जीवन चलता रहता है। अगर मानव जीवन ही नष्ट हो गया तो मनुष्य भी कहाँ बचेगा। इसलिए मनुष्य को बलिदान के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।

विशेष : खड़ी बोली का प्रयोग। प्रेरणादायक कविता।

44.

हो गई है पीर पर्वत-सी कविता का सारांश अँग्रेजी में लिखें।

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This poem has been taken from a collection of ghazals, written by Dushyant Kumar. These ghazals give the message of patriotism to the people of India.

The poet feels that in today’s society, we can witness many discrepancies and disturbances. Fear, loathing and jealousy between people have created a mountain of troubles out of nothing The poet feels that this mountain must melt. This mountain, which is like the Himalayas, must give birth to a river.

Today, the walls of our houses are shaking. They are shaking in such a way that it is as if even the curtains of the windows and the doors are shivering. In reality, it just so happen that the entire structure must be shaken out so that some new construction can be begun. The poet places such a condition that it proves the want and desire for a revolution.
In every city and every village, on every street and in every lane, hands are waving such that even corpses should get up and begin to walk.

For society to experience a change, only speeches and warnings are going to be insufficient. The poet is supremely confident that only creating noise and ruckus is not his intention, rather his complete effort will be towards totally changing the face of society. The implied meaning is that those who keep trying will never fail.

The poet believes that for a change to happen in society, there must be awareness among the public.

In conclusion, the poet tries to make the reader aware that if not in his heart, then so be it in another’s heart – there must be a burning desire for change. Irrespective of whose heart the fire burns in, it must, however, continue to burn with the same ferocity. This is the only way that change can happen in society.

45.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :यह मिटता है, वह बनता है,यही सत्य की सही तोल है,अर्पण कर सर्वस्व मनुज को,कर न दुष्ट को आत्मसमर्पण,कुछ भी बन बस कायर मत बन।

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प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के आधुनिक कविता ‘कायर मत बन’ से लिया गया है जिसके रचयिता नरेन्द्र शर्मा हैं।

संदर्भ : प्रस्तुत कविता में कवि ने मनुष्य को कायर न बनने का संदेश दिया है। कवि मानवता को अत्यधिक महत्त्व देते हुए दुष्टों के सामने हार नहीं मानने के लिए कहते हैं।

स्पष्टीकरण : कवि कहते हैं कि जब दुश्मन युद्ध के लिए ललकारे तब उसका वीरता से सामना करना चाहिए। कायरता सबसे बड़ी अपवित्र चीज है। इसलिए धैर्य और वीरता के साथ दुष्टों को पराजित करना चाहिए। तुम मानवता की रक्षा के लिए अपने को मिटा दो। तुम्हारा जीवन कीमती है लेकिन मानवता की रक्षा ज्यादा जरूरी है। मानवता अनमोल है। यही सत्य है। इसलिए दुष्ट के सामने आत्म समर्पण नहीं करके अपना तन-मन-धन मनुष्यता के लिए अर्पित कर दो। स्वयं को मानवता की रक्षा के लिए बलिदान भी होना पड़े तब बलिदान भी देना चाहिए। यही सत्य है। अगर दुष्टों का राज हो गया तो संपूर्ण मानवता खतरे में पड़ जाएगी।

विशेष : भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली के साथ-साथ ओजपूर्ण है।

46.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

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प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘हो गई है पीर पर्वत-सी’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है जिसके रचयिता दुष्यन्त कुमार हैं।

संदर्भ : यह गजल देशवासियों को जागरण का संदेश देती है।

भाव स्पष्टीकरण : इस संसार में दुःखी लोगों की पीड़ा पर्वत सी बन गई है। मनुष्य-मनुष्य के बीच दीवारें बन गई हैं, दूरी बढ़ती जा रही है। कवि ने ऐसी प्रगति परक विचार धारा इस कविता में भर दी है कि हर प्रान्त के, हर गली, हर नगर, हर गाँव में हाथ लहराते हुए झूमते हुए धैर्य से चलना चाहिए। दुःख सुख में परिवर्तित होना चाहिए। सचमुच देश में प्रगति तभी संभव है जब देश के सभी प्रान्त, सभी वर्ग के लोग एक जुट होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें।

47.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए :सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

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प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य गौरव’ के ‘हो गई है पीर पर्वत-सी’ नामक आधुनिक कविता से लिया गया है जिसके रचयिता दुष्यन्त कुमार हैं।

संदर्भ : इसमें देशवासियों को जागरण का संदेश मिलता है।

भाव स्पष्टीकरण : देश की तत्कालीन परिस्थितियों का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि दुःखी लोगों की पीड़ा पर्वत सी बन गई है, उसे पिघलना चाहिए। मनुष्य-मनुष्य के बीच जो दीवार बन गई है, उस दीवार की बुनियाद हिलनी चाहिए। हर शहर, हर गाँव के दलित, पीड़ित व्यक्ति को खुशहाली से जीना चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना कवि का उद्देश्य नहीं है, वे इन समस्याओं का समाधान चाहते हैं। देश की परिस्थितियाँ बदलनी चाहिए। सभी को सामंजस्यपूर्ण सुखी जीवन बिताने की व्यवस्था होनी चाहिए।

48.

कायर मत बन कवि परिचय :

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नरेन्द्र शर्मा का जन्म 1913 ई. में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के जहाँगीरपुर नामक गाँव में हुआ। आपने 1936 ई. में प्रयाग विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण आपको जेल-यात्राएँ भी करनी पड़ीं। 1954 ई. में आपको मुंबई के आकाशवाणी केन्द्र में ‘विविध भारती’ कार्यक्रम का संचालक नियुक्त किया गया।

आपकी रचनाएँ : कविता-संग्रह : ‘प्रभात फेरी’, ‘शूल-फूल’, ‘प्रवासी के गीत’, ‘पलाश वन’, ‘मिट्टी और फूल’, ‘कदली वन’, ‘हंसमाला’, ‘रक्तचंदन’, ‘बहुत रात रोये’ आदि। ‘द्रौपदी’, ‘उत्तरजय’, तथा ‘सुवर्णा’ (खंड काव्य)।

आपकी रचनाओं में श्रृंगारिकता, दार्शनिकता तथा प्रतीकात्मकता दृष्टिगोचर होती है। सामाजिक विषमताओं को भी आपने अत्यंत भावुक ढंग से अपने काव्य में स्थान दिया है। नरेन्द्र शर्मा की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है, जिसमें भाषा की सरसता, मधुरता, प्रवाहमयता तथा सरलता विद्यमान है।

49.

कवि नरेन्द्र शर्मा क्या अर्पण करने के लिए कहते हैं?

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कवि नरेन्द्र शर्मा सर्वस्व अर्पण करने के लिए कहते हैं।

50.

कवि नरेन्द्र शर्मा ने प्रतिहिंसा और कायरता के संबंध में क्या कहा है?

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कवि नरेन्द्र शर्मा ने ‘कायर मत बन’ कविता से हमें यह संदेश दिया है कि कुछ भी बन बस कायर मत बन। तुम कब तक दुःख के आँसू पीते रहोगे? धैर्य से जिन्दगी में बाधाओं पर जीत हासिल करो। प्रतिहिंसा भी दुर्बलता है पर कायरता उससे अधिक अपावन है। हिंसा के प्रति हिंसा करना मनुष्य की दुर्बलता है तो कायरता भी अधिक अपवित्र है। कभी दुष्टों के आगे आत्मसमर्पण मत करना। तुम्हें किसी से भी डरने की आवश्यकता नहीं है। कायरता को छोड़कर, धैर्य और साहस से जिन्दगी में आगे बढ़ना चाहिए।