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यदि आप माली की जगह पर होते, तो हुकूमत के फैसले का इंतजार करते या नहीं; अगर हाँ, तो क्यों ? और नहीं, तो क्यों?

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यदि मैं माली की जगह होता तो में हुकूमत के फैसले का इंतजार नहीं करता। मैं सबसे पहले अपने सहकर्मियों की मदद से उस दबे हुए व्यक्ति को सही सलामत और सावधानीपूर्वक बाहर निकालकर उसका योग्य उपचार करवाता क्योंकि एक व्यक्ति के प्राणों से अधिक महत्त्वपूर्ण सरकारी कार्रवाई नहीं है। संकट के समय में मौके पर उपस्थित सरकारी कर्मचारी स्वयं ही निर्णय ले सकता है।

यदि मैं माली की जगह होता तो मेरी सहानुभूति दबे हुए व्यक्ति के साथ होती। क्योंकि इंसान की जिंदगी से बढ़कर और कुछ नहीं है। अपनी नजर के सामने तड़पते हुए आदमी को बचाना ही मनुष्य की प्रथम आवश्यकता, अनिवार्यता, दायित्व और धर्म होता है। यही कारण है कि आज-कल सरकार ने भी दुर्घटना में घायल या तड़पते हुए आदमी को बचानेवाले या अस्पताल पहुँचानेवाले आदमी को कानूनी दावपेच से मुक्त करने की पहल की है।



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