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विश्व में सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना सोदाहरण कीजिए।यासूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना करते हुए जापान में इस उद्योग के प्रमुख केन्द्रों का वर्णन कीजिए। यासूती वस्त्र उद्योग के लिए उपयुक्त स्थानीयकरण के भौगोलिक कारकों की समीक्षा करते हुए इस उद्योग का विश्व में वितरण समझाइए।याजापान के सूती वस्त्र उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –(क) उपर्युक्त भौगोलिक परिस्थितियाँ,(ख) प्रमुख उत्पादन क्षेत्र।याग्रेट ब्रिटेन में वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों का उल्लेख कीजिए तथा इसके प्रमुख उत्पादन केन्द्रों का वर्णन कीजिए। यासूती वस्त्र उद्योग के स्थानीकरण के कारकों की विवेचना कीजिए एवं विश्व में इस उद्योग के प्रमुख केन्द्रों का उल्लेख कीजिए।यासंयुक्त राज्य अमेरिका में सूती वस्त्रोद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए (अ) स्थानीयकरण के कारक(ब) उद्योग के प्रमुख क्षेत्र(स) निर्माण। |
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Answer» सूती वस्त्र उद्योग Cotton Textile Industry वस्त्र मानव की तीन प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है। वस्त्रों का उपयोग तन ढकने के लिए प्राचीन काल से होता आया है। यह तन ढकने की आवश्यकता से लेकर अब तन सजाने की वस्तु बन गया है। गर्म जलवायु के देशों में सूती वस्त्रों का प्रचलन सर्वाधिक है। वर्तमान समय में सूती वस्त्र निर्माण का कार्य एक सुविकसित उद्योग का रूप ग्रहण कर चुका है। सूती वस्त्रों का निर्माण हाथ व मशीनों दोनों से होता है। अब इस उद्योग में स्वचालित तथा सुधरी हुई मशीनों का उपयोग होने लगा है। सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारक – सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण को निम्नलिखित कारकों ने प्रभावित किया है। (1) जलवायु – सूती वस्त्र उद्योग उन्हीं देशों में स्थापित किया जाता है, जहाँ धागा बनाने के लिए नमें जलवायु मिलती है, क्योंकि शुष्क जलवायु में धागा बार-बार टूटता रहता है। अब तो कृत्रिम आर्द्रता उत्पन्न कर कहीं भी बाजार के निकट सूती कपड़े के कारखाने खोले जा सकते हैं। (2) कच्चा माल – सूती कपड़ा बनाने के लिए कपास की आवश्यकता होती है। कपास को गाँठ में बाँधकर कम खर्चे और आसानी के साथ दूर क्षेत्रों को भेजा जा सकता है; अत: आज के सूती कपड़े बनाने वाले प्रमुख देश जापान, इंग्लैण्ड, जर्मनी इसके उदाहरण हैं। (3) पर्याप्त मात्रा में मीठे जल की आवश्यकता – यह सूती कपड़े के लिए बहुत महत्त्व रखती है। सूत की धुलाई, रँगाई और अन्य कई प्रकार के कार्यों के लिए शुद्ध जल की आवश्यकता होती है। इसी कारण नदियों या झीलों के किनारे सूती व्यवसाय के केन्द्र स्थापित किये गये हैं। इंग्लैण्ड में ब्लैकबर्न, बर्नले, लीड्स और लिवरपूल तक नहर के किनारे-किनारे सूती कपड़े के कारखाने पाये जाते हैं। संयुक्त राज्य में भी न्यू-इंग्लैण्ड राज्य में नदियों के किनारे-किनारे सूती वस्त्र के अधिक कारखाने स्थापित किये गये हैं। (4) श्रम – सूती वस्त्र उद्योग कुशल कारीगरों की उपलब्धता पर भी निर्भर करता है। लंकाशायरे और मैनचेस्टर में इस उद्योग के केन्द्रित होने का प्रधान कारण यही है कि वहाँ पहले ऊनी कपड़ा बनाने वाले कुशल कारीगर पाये जाते थे। इसी प्रकार जापान में भी सूती वस्त्र उद्योग को रेशमी कपड़ा बुनने वालों से काफी सहायता मिली है। भारत के मुम्बई और अहमदाबाद केन्द्रों में अधिकांश जुलाहों के कारण उद्योगों का विकास हुआ है। (5) शक्ति के साधन – जहाँ पर्याप्त मात्रा में सस्ती एवं निरन्तर विद्युत शक्ति प्राप्त हो जाती है, वहीं इसका तेजी से विकास होता है। इटली, जापान, कोरिया व चीन में भी विद्युत ऊर्जा की निरन्तर (6) यातायात के साधन एवं बाजार – तैयार माल को खपत के केन्द्रों तक पहुँचाने के लिए सस्ते और उत्तमपरिवहन के साधनों की आवश्यकता पड़ती है। उपनिवेश काल में निर्मित वस्त्र ब्रिटेन से हजारों मील दूर अफ्रीका में भारत भेजे जाते थे। आज तो जिन देशों के पास अपना कच्चा माल एवं स्वयं को विश्व में सूती वस्त्र उद्योग का वितरण सूती धागा उत्पादन की दृष्टि से विश्व के अग्रणी देश क्रमशः चीन (35%), संयुक्त राज्य अमेरिकी (13%), भारत (12%), पाकिस्तान (10%), तुर्की (3%), ब्राजील (3%), इटली (2%), दक्षिण कोरिया (1.5%) आदि हैं। (अ) संयुक्त राज्य अमेरिका का सूती वस्त्र उद्योग मिलों द्वारा निर्मित सूती वस्त्रों के उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका का तीसरा तथा सूती धागा उत्पादन में दूसरा स्थान है। यहाँ सूत कातने एवं वस्त्र बुनने का व्यवसाय पूर्वी भागों में अप्लेशियन पर्वतीय क्षेत्र के पूर्वी राज्यों में होता है, जहाँ इस उद्योग के लिए सभी भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं। सर्वप्रथम सूती वस्त्र उद्योग का विकास न्यू-इंग्लैण्ड राज्यों में हुआ था, परन्तु बाद में दक्षिणी राज्यों (अप्लेशियन पर्वतीय) में इसका सर्वाधिक विकास हुआ है। अतः उत्तरी-पूर्वी संयुक्त राज्य से इसके दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्रों की ओर इस उद्योग का खिसकाव हुआ है। Localisation Factors of Cotton Textile Industry in U.S.A. ⦁ अनुकूलतम नम जलवायु। उद्योग के प्रमुख क्षेत्र Main Areas of Industry संयुक्त राज्य में वस्त्र उद्योग संयुक्त रूप से विकसित हुआ है, अर्थात् कताई, बुनाई एवं छपाई आदि कार्य एक साथ ही किये जाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में सूती वस्त्र उत्पादन के निम्नलिखित क्षेत्र प्रमुख हैं – (1) न्यू-इंग्लैण्ड क्षेत्र – न्यू-इंग्लैण्ड में सूती वस्त्र निर्माणक केन्द्र रोड्स द्वीप, कनेक्टीकट, मैसाचुसेट्स एवं हैम्पशायर में हैं। प्रथम सूती मिल की स्थापना सन् 1790 में रोड्स द्वीप के पॉर्टकट नामक स्थान पर की गयी थी। इसके बाद अन्य नगरों में सूती मिलें स्थापित की गयीं, जिनमें फाल-रिवर, न्यूब्रेडफोर्ड, लॉवेल, प्रॉविडेन्स, लारेंस एवं मानचेस्टर महत्त्वपूर्ण केन्द्र हैं। अन्य केन्द्रों में बोस्टन, वॉरसेस्टर, विवरले, पिचबर्ग, होलीओक, नार्थ-एडेम्स, बूनसॉ केट, ट्राउनटन आदि प्रमुख हैं। (3) दक्षिणी अप्लेशियन क्षेत्र – यह संयुक्त राज्य का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक प्रदेश है। उत्तरी एवं दक्षिणी केरोलिना, जॉर्जिया एवं टेनेसी आदि राज्य इसके अन्तर्गत सम्मिलित हैं। यहाँ सूती वस्त्र उद्योग का अधिक विकास सन् 1880 के बाद हुआ है। निर्यात – ब्राजील संयुक्त राज्य अमेरिका में बने सूती वस्त्रों का सबसे बड़ा ग्राहक है। इसके अतिरिक्त मैक्सिको, ग्वाटेमाला, निकारागुआ, जमैका, हवाना, क्यूबा, वेनेजुएला, कोलम्बियां, इक्वेडोर, अर्जेण्टाइना, चिली, बोलिविया, यूरोप आदि देशों को भी सूती वस्त्रों का निर्यात किया जाता है। (ब) जापान का सूती वस्त्र उद्योग सूती वस्त्र उत्पादन में जापान का स्थान विश्व में तो नगण्य है, परन्तु एशिया महाद्वीप में चीन, भारत एवं कोरिया के बाद चौथा स्थान है। जापान विदेशों से कपास का आयात कर, उसका वस्त्र तैयार कर अन्य देशों को निर्यात कर देता है। जापान में सूती वस्त्रों की पहली मिल 1868 ई० में स्थापित की गयी थी। प्रथम विश्वयुद्ध तक इस उद्योग की प्रगति बहुत ही मन्द रही। परन्तु प्रथम युद्ध-काल में जापान के इस उद्योग ने तीव्र गति से उन्नति की तथा जापान में बने वस्त्र चीन, भारत एवं अफ्रीकी देशों में पहुँच गये थे। इस प्रकार प्रगति करते-करते 1933 ई० तक जापान विश्व का प्रथम सूती वस्त्र निर्यातक देश बन गया था, परन्तु द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के वस्त्र उद्योग को भारी हानि उठानी पड़ी, क्योंकि इस महायुद्ध में जापान की लगभग 80% सूत कातने वाली मिलें परमाणु बम के प्रहार से नष्ट-भ्रष्ट हो गयी थी। सन् 1946 तक जापान के इस उद्योग की दशा बड़ी ही शोचनीय थी। जापान ने अपने इस उद्योग का पुनर्निर्माण किया तथा आठ वर्षों के अन्तराल में ही अपनी मिलों को आधुनिक मशीनों से सुसज्जित कर लिया था। इस प्रकार 1954 ई० में जापान पुनः विश्व का सबसे बड़ा सूती वस्त्र निर्यातक देश बन गया था तथा आज तक उस स्थिति को बनाये हुए है। वर्तमान समय में उसे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में चीन, संयुक्त राज्य, ब्रिटेन एवं भारतीय वस्त्रों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। जापान में सूती वस्त्र उद्योग के विकास के कारक ⦁ बड़ी संख्या में सस्ते श्रमिकों की प्राप्ति-जिनमें स्त्रियाँ एवं बच्चे श्रमिकों की संख्या अधिक होती है। जापानी श्रमिक दो पारियों में काम करते हैं। जापान की अधिकांश जनसंख्या तटीय भागों में ही निवास करती है। ⦁ कपास के रूप में कच्चा माल चीन, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, मिस्र, सूडान एवं मैक्सिको आदि देशों से आयात किया जाता है। ⦁ जापान का अधिकांश धरातल ऊबड़-खाबड़ एवं पर्वतीय है, जिससे नदियाँ प्राकृतिक जल-प्रपातों का निर्माण करती हैं तथा बड़े पैमाने पर जल-विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जाता है। सूती वस्त्र मिलों में जल-विद्युत शक्ति का ही उपयोग किया जाता है। ⦁ तटीय भागों में प्राकृतिक पत्तनों का विकास जिससे कपास को आयात करने एवं तैयार वस्त्रों को विदेशों में निर्यात करने की सुविधा रहती है। ⦁ जापान के वस्त्र उद्योग में देश में ही बनी आधुनिक मशीनें तथा प्रबन्ध में उच्च क्षमता रखी जाती है। मशीनों के घिसते ही तुरन्त नयी मशीनें बदल दी जाती हैं। ⦁ यहाँ स्वचालित करघों का उपयोग किया जाता है तथा छोटे रेशे की कपास को कातने की उपयुक्त मशीनों का आविष्कार कर लिया गया है, जिससे उत्पादन प्रति श्रमिक पाँच गुना हो गया है। ⦁ जापान की शीतोष्ण जलवायु आर्द्रता-प्रधान है, जिसमें निर्मित सूती धागा नहीं टूटता।⦁ सूती वस्त्र उद्योग का जापानी अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान होने के कारण इस उद्योग को सरकारी प्रोत्साहन मिलता है। ⦁ वस्त्र उद्योग के लिए स्थानीय बाजार एवं निर्यात व्यापार के लिए अफ्रीकी एवं एशियाई देशों बल्कि यहाँ तक कि यूरोपीय, दक्षिणी अमेरिकी एवं ऑस्ट्रेलियाई देशों के बाजार उपलब्ध हैं। ⦁ किन्की प्रदेश – इस प्रदेश में सबसे अधिक सूती वस्त्रों का उत्पादन किया जाता है। यहाँ जापान का एक-तिहाई सूती वस्त्र तैयार किया जाता है। ओसाका एवं कोबे इस प्रदेश के प्रमुख केन्द्र हैं। ओसाका जापान का मानचेस्टर कहलाता है। अन्य केन्द्रों में किशीवादा प्रमुख है। ⦁ क्वाण्टो प्रदेश – जापान में स्थित क्वाण्टो का मैदान प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक प्रदेश है। इस प्रदेश में टोकियो एवं याकोहामा महत्त्वपूर्ण सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। ⦁ नगोया प्रदेश – इस प्रदेश में नगोया नगर के समीपवर्ती भागों में स्थित छोटे-छोटे नगरीय केन्द्रों में सूती वस्त्र की मिलें स्थापित की गयी हैं। मिनोओबारी की खाड़ी के तटीय भागों में भी सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र विकसित हुए हैं। अन्य प्रमुख केन्द्रों में योकोच्ची, हामामात्सू तथ तयोर्हशी आदि महत्त्वपूर्ण हैं। इस प्रकार जापान ग्राहकों की रुचि का ख्याल कर उनकी माँग के अनुसार सस्ते कपड़े के उत्पादन का प्रयास करता है, जिससे उसे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारत, हांगकांग, चीन, ब्रिटेन, अमेरिका आदि देशों से प्रतिस्पर्धा लेने में सुगमता रह सके। (स) रूस का सूती वस्त्र उद्योग मिलों द्वारा सूती वस्त्र उत्पादन में रूस का विश्व में चौथा स्थान है। यहाँ सूती वस्त्र उद्योग के लिए निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं – ⦁ यहाँ कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में कजाकिस्तान तथा जॉर्जिया से प्राप्त होता है, जो पूर्ववर्ती सोवियत संघ के राज्य थे। रूस में सूती वस्त्र उत्पादक क्षेत्र ⦁ मास्को-इवानोवो प्रदेश – इस प्रदेश में सूती वस्त्र उद्योग का विकास 18वीं शताब्दी के अन्त में किया गया था। कपास ट्रांस-काकेशिया एवं मध्य एशिया से प्राप्त होती है। सोवियत क्रान्ति (1917) के बाद से यह प्रदेश कच्चे माल (कपास) के उत्पादन में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो गया है। इवानोवो को रूस का मानचेस्टर कहा जाता है। इसके चारों ओर सूती वस्त्र उत्पादक मिलों के नगरीय केन्द्रों का एक घेरा-सा विकसित हो गया है। यारोस्लाव, कोस्त्रोमोव, किनेशमा, शुया, कैमरोव, ओरेखोवो-जुयेवो, मास्को, नोगिन्स्क, पॉवलोवस्की-पोसाद, येगोरयेवस्क, सेरपुखोवु, ग्लुखोवो प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। ⦁ लेनिनग्राड प्रदेश – इस प्रदेश में लेनिनग्राड, नार्वा, तल्लिन तथा बाल्टिक राज्यों में रीगा एवं कौनास प्रमुख वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। ⦁ कालिनिन प्रदेश – मास्को के पश्चिम में इस प्रदेश में कालिनिन, विशनीय, वोलोस्चेक एवं यार्तसेवो प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। ⦁ यूक्रेन प्रदेश – इस प्रदेश में सूत कातने एवं वस्त्र बुनने की मशीनों का निर्माण खेरसन में होता है। खारकोव एवं कीव प्रमुख वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। ⦁ वोल्गा बेसिन – वोल्गा नदी की घाटी में चेवोकसरी, कणीशिन एवं ताम्बोव प्रमुख सूती वस्त्रोत्पादक केन्द्र हैं। ⦁ यूराल प्रदेश – यूराल प्रदेश के पूर्व में स्थित चिल्याबिन्स्क प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र ⦁ ट्रांस-काकेशिया प्रदेश – गोर्की इस प्रदेश का सबसे बड़ा वस्त्रोत्पादक केन्द्र है। बाकू, किरिवबाद, कुताइसी, तिब्लिसी, लेनिनांकन प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। ⦁ मध्य एशिया – यहाँ पर ताशकन्द, फरगना, बुखारा, लेनिनवाद, फुन्जे, अशखाबाद एवं दुशाम्बे प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। ⦁ साइबेरिया – ओमस्क, नोवासिबिस्र्क, बरनोल, ब्रियस्क, कैमरोवकान्स्क, लेनिनस्ककुजनेत्स्क, अल्मा-अत्ता एवं कुस्तनाय प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। (द) ग्रेट ब्रिटेन का सूती वस्त्र उद्योग ग्रेट ब्रिटेन में औद्योगिक क्रान्ति का सूत्रपात सूती वस्त्र उद्योग से ही हुआ है। 19 वीं शताब्दी में इसने औद्योगिक क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शन किया, किन्तु आज ब्रिटेन की स्थिति पहले जैसी नहीं रह गयी है। सूती वस्त्र के निर्माण में एक समय यह शिखर पर था, परन्तु वर्तमान में यह देश विश्वका केवल 0.45% (27.5 करोड़ वर्ग मी) मिश्रित सूती वस्त्र तैयार करता है। इसे सूती वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में सदैव संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान एवं भारत से प्रतिस्पर्धा लेनी पड़ती है। इस व्यवसाय ने यहाँ की जनसंख्या को आजीविका तथा देश को सुदृढ़ आर्थिक आधार प्रदान किया, इसलिए “सूती वस्त्र उद्योग को ग्रेट ब्रिटेन की रोटी” कहा जाता था। ग्रेट ब्रिटेन में सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के कारण – यह आश्चर्य की बात है कि ग्रेट ब्रिटेन में कपास पैदा नहीं होती है फिर भी यहाँ सूती वस्त्र उद्योग का पर्याप्त विकास हुआ है। ग्रेट ब्रिटेन में सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं – ⦁ समुद्री आर्द्र जलवायु विश्व स्तर पर सूती वस्त्र उद्योग को आधुनिक मिल प्रणाली पर विकसित करने का श्रेय ब्रिटेन को ही है। सूती वस्त्र उद्योग का सबसे अधिक विकास लंकाशायर क्षेत्र में हुआ है। सूती वस्त्र उद्योग में मानचेस्टर यहाँ का विश्व-प्रसिद्ध सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र है। (1) लंकाशायर क्षेत्र – लंकाशायर क्षेत्र ग्रेट ब्रिटेन की महत्त्वपूर्ण तथा सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक क्षेत्र है। इस क्षेत्र में सूती वस्त्र उद्योग के लिए नम जलवायु, पर्याप्त कोयला, आयातित कपास, पर्याप्त शक्ति के साधन, नदियों का स्वच्छ जल, पर्याप्त नवीन मशीनें, लंकाशायर का पत्तन, समीप में चैशायर से रासायनिक पदार्थों की उपलब्धता, विस्तृत भूमि, कुशल एवं सस्ते श्रमिक तथा पर्याप्त विदेशी माँग जैसी भौगोलिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। मानचेस्टर इस क्षेत्र का विश्व-प्रसिद्ध सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र है। इस क्षेत्र के अन्य सूती वस्त्र बनाने वाले केन्द्र प्रेस्टन, कालने, मेकलेराफील्ड, एकरिंगटन, डार्विन, नेलसन, बोल्टन, रोशडेल, स्टॉकपोर्ट, ब्लेकबर्न, ओल्डहम, बर्नले, बरी, नाटिंघम तथा लीसेस्टर आदि हैं। यहाँ रँग्राई का कार्य बिंगान, विडनेस व सैण्ट-हैलेन्स में किया जाता है। (2) ग्लासगो क्षेत्र – इस क्षेत्र में सूती वस्त्र उद्योग का विकास क्लाइड नदी की घाटी में विकसित हुआ है। यहाँ की नम समुद्री जलवायु, पर्याप्त शक्ति के साधन एवं सुलभ जल-यातायात ने इस उद्योग के विकास में विशेष योगदान दिया है। यहाँ सूत बनाने का कार्य बहुत बड़े पैमाने पर किया जाता है। इस क्षेत्र में सूती वस्त्र बनाने के प्रमुख केन्द्र ग्लासगो, ब्रेडफोर्ड तथा पैसले हैं। पैसले सूती धागा बनाने का भी प्रमुख केन्द्र है, जब कि ग्लासगो मलमल बनाने के लिए विश्व प्रसिद्ध है। (3) भावी सम्भावनाएँ – प्रथम विश्व युद्ध के आरम्भ तक ब्रिटेन को संसार के सूती वस्त्र उत्पादक देशों में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था, परन्तु उसके बाद सूती वस्त्र के उत्पादन में जापान, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, जर्मनी और फ्रांस इससे आगे बढ़ गये। भारत, जापान, चीन आदि देशों से कड़े मुकाबले के कारण अब ब्रिटेन का सूती वस्त्र उत्पादन बहुत घट गया है। इस उद्योग के पुनर्विकास की सम्भावनाएँ भी नहीं हैं, क्योंकि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था अब व्यापारोन्मुख हो गयी है जिसमें वेस्त्र उद्योग जैसे उपभोक्ता उद्योग के लिए कोई स्थान नहीं है। वैसे भी भारत, चीन तथा जापान के सस्ते वस्त्रों के सामने ब्रिटिश उत्पादों का महत्त्व नहीं रह गया है। |
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