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Answer» भाषा-विकास को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Influencing the Language Development) बालकों के भाषा-विकास को प्रभावित करने वाले कारक इस प्रकार हैं| 1. स्वास्थ्य स्वास्थ्य का प्रभाव भाषा- विकास पर भी पड़ता है। जीवन के पहले दो वर्षों में गम्भीर या लम्बी बीमारी होने से बालक का भाषा-विकास ठीक से नहीं हो पाता। रोगी बालक को अन्य बालकों का सम्पर्क नहीं मिलता। बिना बोले ही उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है। उसे बोलने की कोई प्रेरणा नहीं मिलती, जिससे उसका भाषा-विकास पिछड़ जाता है। जिन बालकों में श्रवण दोष पाया जाता है उनका भाषा-विकास अवरोधित हो जाता है। दोषयुक्त तालु, कण्ठ, दाँत तथा जबड़ों के कारण भी बालक शुद्ध भाषा की योग्यता प्राप्त नहीं कर पाता। 2. बुद्धि परीक्षणों के द्वारा यह देखा गया है कि बालक की बुद्धि व उसकी भाषा- योग्यता में गहरा सम्बन्ध है। तीव्रबुद्धि बालक सामान्य बालक की अपेक्षा कम-से-कम चार माह पूर्व बोलना प्रारम्भ कर देता है और मन्दबुद्धि बालक सामान्य बुद्धि वाले बालक से बोलने में तीन वर्ष पिछड़ जाता है। परन्तु सभी मन्दबुद्धि बालकों के सम्बन्ध में यह बात नहीं कही जा सकती। ऐसा भी देखा गया है कि जो बालक अपनी प्रारम्भिक कक्षाओं में भाषा में पिछड़े रहते हैं, ऊँची कक्षाओं में काफी आगे बढ़ जाते हैं। 3. सामाजिक-आर्थिक स्थिति बालक के भाषा- विकास पर परिवार की सामाजिक व आर्थिक स्थिति का प्रभाव भी पड़ता है। शिक्षित परिवार के बालकों का भाषा-विकास अशिक्षित परिवार के बालकों की तुलना में अधिक द्रुतगति से होता है। उच्च सामाजिक स्तर के परिवारों के बालकों का शब्द-भण्डार निर्धन परिवारों के बालकों की अपेक्षा अधिक होता है। मेकार्थी के अनुसार, “उच्च व्यवसाय वाले परिवारों के बालकों पारिवारिक सम्बन्ध की वाक्य-रचना निम्नकोटि के व्यवसाय वाले परिवारों के बालकों की वाक्य-रचना की अपेक्षा कहीं अधिक सुन्दर होती है। इन सबका कारण यही है कि शिक्षित और उच्च सामाजिक व आर्थिक स्तर के परिवारों के बालकों को सीखने और समझने के अधिक अवसर उपलब्ध होते हैं।” 4. पारिवारिक सम्बन्ध- बालक के माता-पिता के साथ क्या सम्बन्ध हैं, माता-पिता बालक के साथ कितना समय व्यतीत करते हैं, माता-पिता बालक से अत्यधिक प्रेम करते हैं या उसे हर समय झिड़कते हैं, इन सब बातों का प्रभाव बालक के भाषा-विकास पर पड़ता है। जिन परिवारों में बालकों की संख्या अधिक होती है, वहाँ माता-पिता बालकों की ओर उचित ध्यान नहीं दे पाते, जिसके परिणामस्वरूप बालकों का भाषा-विकास पिछड़ जाता है। अकेले बालक का विकास जुड़वाँ बालक की तुलना में अधिक अच्छा होता है। क्योंकि जुड़वाँ बालकों को अनुकरण के अवसर नहीं मिलते। सामान्य परिवार में पले बालक का भाषा-विकास अनाथालय में पले बालक की अपेक्षा अच्छा होता है। 5. लिंग-भेद- जीवन के प्रथम वर्ष में शिशु के भाषा-विकास में किसी प्रकार का लिंग-भेद नहीं पाया जाता लेकिन दूसरे वर्ष के आरम्भ से ही यह अन्तर स्पष्ट होने लगता है। लड़कियाँ लड़कों की अपेक्षा शीघ्र बोलना शुरू करती हैं। शब्द-भण्डार, वाक्यों की लम्बाई और उनकी शुद्धता, भाषा की समझ और उच्चारण आदि में लड़कियाँ लड़कों से आगे होती हैं और यह श्रेष्ठता लड़कियों में काफी बड़ी अवस्था तक बनी रहती है लेकिन अन्त में पूर्ण विकास की स्थिति में बहुधा लड़के लड़कियों से आगे हो जाते हैं।} 6. दो भाषाएँ- जहाँ बालक को एक साथ दो भाषाएँ सिखाई जाती हैं वहाँ बालक का भाषा-विकास अवरुद्ध हो जाता है। क्योंकि बालक का ध्यान दोनों ओर रहता है, उसके मस्तिष्क में सन्देह पैदा हो जाता है, उसे एक ही बात के लिए दो-दो शब्द याद करने पड़ते हैं। इससे बालक का शब्द-भण्डार नहीं बढ़ पाता। वह सही उच्चारण नहीं कर पाता। उसमें तनाव पैदा हो जाता है। उसके मस्तिष्क पर व्यर्थ का बोझा लदा रहता है, जिससे उसे समायोजन करने में कठिनाई पैदा होती है। दो भाषाएँ सीखने से केवल भाषा-विकास पर ही नहीं उसके चिन्तन पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। वह यह निश्चय नहीं कर पाता कि किस समय कौन-सा शब्द बोलना उचित है। अतः शैशवावस्था में बालक को केवल उसकी मातृभाषा ही सिखाई जानी चाहिए।
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