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वैभव-विलास की चाह नहीं, अपनी कोई परवाह नहीं,बस यहीं चाहता हूँ केवल, दान की देव सरिता निर्मल,करतल से झरती रहे. सदा,निर्धन को भरती रहे. सदा।

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कर्ण श्रीकृष्ण से कहता है कि हे केशव! आप मुझे राज्य देने का प्रलोभन दे रहे हैं, परंतु मैं वैभव-विलास का जीवन पसंद नहीं करता। मुझे अपनी कोई चिंता नहीं है। मुझे दान देने में रुचि है। इसलिए मैं केवल यही चाहता हूँ कि मैं गरीबों को हमेशा दान देता रहूं और उनके दुःख दूर करता रहूँ।



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