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ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों के विकास एवं महत्त्व पर विस्तार से लिखें।

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ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भू-हाीय ऊर्जा, जैव पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा आदि सम्मिलित हैं।

विकास- ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोतों के प्रयोग को बढ़ाने पर हाल के वर्षों में अत्यधिक बल दिया जा रहा है। इस ऊर्जा का वनारोपण, पर्यावरण सुधार, ऊर्जा संरक्षण, रोजगार वृद्धि, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सुधार, सामाजिक कल्याण, खेतों में सिंचाई, जैविक खाद उत्पादन आदि क्षेत्रों में विशेष योगदान है। मार्च, 1981 में केन्द्र सरकार ने एक उच्च अधिकार प्राप्त आयोग की स्थापना की थी ताकि अतिरिक्त ऊर्जा स्रोतों का पता लगाया जा सके। 1982 में गैर-परम्परागत ऊर्जा साधनों का विभाग, ऊर्जा मन्त्रालय में स्थापित किया गया। अब गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों के लिए अलग से एक मन्त्रालय स्थापित कर दिया गया है। राज्य सरकारों ने भी अपने यहां गैर-परम्परागत ऊर्जा साधनों के लिए अलग से एजेन्सी स्थापित की हुई है। स्थानीय लोगों की भागीदारी से स्थानीय स्तर पर खाना पकाने की गैस, लघु सिंचाई योजना, पीने का पानी तथा सड़कों पर रोशनी की व्यवस्था के कार्यों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

पवन ऊर्जा से ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था में सहायता मिली है। कई स्थानों पर पवन केन्द्र कार्य कर रहे हैं। यहां से उत्पन्न बिजली को ग्रिड प्रणाली में शामिल कर लिया गया है।
भू-तापीय ऊर्जा-भारत में भू-तापीय ऊर्जा का अभी तक पूरी तरह विकास नहीं किया जा सका। हिमाचल में मणिकरण स्थित गर्म जल स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन के प्रयास किए जा रहे हैं। – महत्त्व-ऊर्जा साधनों के रूप में इनका उपयोग बहुत ही पुराना है

  1. नौ-परिवहन में पवन तथा प्रवाहित जल का भी उपयोग होता था।
  2. आटा पीसने के लिए पनचक्कियों का प्रचलन था। पानी खींचने के लिए पवन चक्कियों का उपयोग होता था। आज के युग में भी इनकी कुछ विशेषताओं तथा परम्परागत साधनों की कुछ कमियों के कारण इनका महत्त्व दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। इन साधनों की यह विशेषता है कि ये सभी साधन या तो नवीकरण योग्य हैं या अक्षय हैं। ये साधन कम खर्चीले भी हैं।


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