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उरुक में 3000 ई० पू० के लगभग प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में युगान्तकारी परिवर्तन किस प्रकार शहरी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यन्त उपयुक्त सिद्ध हुआ?

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पुरातत्त्वीय सर्वेक्षणों से ज्ञात होता है कि 3000 ई० पू० के आसपास जब उरुक नगर का 250 हेक्टेयर भूमि में विस्तार हुआ तो इसके लिए दर्जनों छोटे-छोटे गाँव उजड़ गए। बड़ी संख्या में जनसंख्या का विस्थापन हुआ। उसका यह विस्तार शताब्दियों तक विकसित रहे मोहनजोदड़ो नगर से दो-गुना था। यह भी उल्लेखनीय है कि उरुक नगर की रक्षा के लिए उसके चारों ओर एक सुदृढ़ दीवार बना दी गई थी। उरुक नगर 4200 ई० पू० से 400 ईसवी तक निरन्तर अपने अस्तित्व में बना रहा। इस अवधि में वह 400 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तृत हो गया। स्थानीय लोगों और युद्धबन्दियों को अनिवार्य रूप से मंदिर का अथवा प्रत्यक्ष रूप से शासक का काम करना पड़ता था। जिन्हें काम पर लगाया जाता था उन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता था। शासक के आदेश से लोग पत्थर खोदने, धातु खनिज लाने, मिट्टी से ईंट तैयार करने और मंदिर में लगाने, और सुदूर देशों में जाकर मंदिर के लिए उपयुक्त सामान लाने के कामों में जुटे रहते थे। इस कारण 3000 ई० पू० के आसपास उरुक में खूब तकनीकी प्रगति भी हुई। अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औजारों का प्रयोग किया जाता था। वास्तुविदों ने ईंटों के स्तम्भों का निर्माण करना सीख लिया था। सैकड़ों लोगों को चिकनी मिट्टी के शंकु (कोन) बनाने और पकाने के काम में लगाया जाता था जिससे वे दीवारें विभिन्न रंगों से सुशोभित हो जाती हैं। मूर्तिकला के क्षेत्र में भी उच्चकोटि की सफलता प्राप्त की गई, इस कला के सुंदर नमूने पत्थरों पर तैयार किए जाते थे। इसी समय औद्योगिकी के क्षेत्र में एक युगान्तरकारी परिवर्तन आया जो शहरी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत उपयुक्त सिद्ध हुआ। वह था– कुम्हार के चाक का निर्माण। आगे चलकर इस चाक से कुम्हार की कार्यशाला में एक साथ बड़े पैमाने पर दर्जनों एक जैसे बर्तन एक साथ बनाए जाने लगे।



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