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उपभोऊन्तावाद की संस्कृति र पाठ केलेके लेखककौन199.​

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केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम में जब से आया हूँ, एक ही चीज़ आम तौर पर हर जगह दिख जाती है. केले!

ये पढ़ कर हैरान मत होइएगा कि इस शहर में हर गली या नुक्कड़ या फिर बड़े बाज़ार या किसी शापिंग मॉल में आने का गेट ही क्यों न हो, हर तरफ़ एक ही चीज़ लटकी मिल जाती है, केले!

यहाँ आने से पहले मैंने भी केरल की तस्वीरों में दो ही चीज़ें देखी थीं. केरल के ख़ूबसूरत बीच और हरे-भरे जंगलों के बीच केले के पेड़.

लेकिन कभी सोचा भी नहीं था कि इस फल की बिक्री यहाँ पर ठीक उसी तरह दुकानों में होती है जैसे उत्तर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश या बिहार में पान या चाय की दुकान होती हैं.

पूरे माजरे को समझने के लिए मैं पैदल ही अपने होटल से निकल पड़ा.

क़रीब 200 मीटर चलने के बाद ही एक पारचून की दुकान दिखी जिसमें शैम्पू, चाय के पाउच और सौंफ के पैकटों के बीच एक बड़ी सी केले के पेड़ की डाल लहरा रही थी और उसमें क़रीब 50 से भी ज़्यादा लाल रंग के केले थे.

लाल रंग के केले पहले यदा-कदा ही दिखे थे और वो भी छोटे आकार के लेकिन यहाँ तो क़रीब सात-आठ इंच लंबे लाल केले हर दुकान की शोभा बढ़ा रहे होते हैं.

ऐसी ही एक दुकान के मालिक पुष्करण कहते हैं, "केरल में केले को शुभ मानते हैं. इसके फल को भी और पत्तों को भी. केरल का वातावरण केले की फसल के लिए बहुत अनुकूल भी है. सबसे अच्छी बात ये की केला यहाँ पूरे भारत में सबसे सस्ता मिलता है."

अपनी जिज्ञासा को थोडा बहुत दबाते हुए मैंने जब पुश्करण से एक केले का दाम पूछा तो हैरानी भी हुई और लालच भी बढ़ा. छह केलों की क़ीमत थी मात्र 6 रूपए!

सुबह केरल शहर का मुआयना करने निकला तो जिधर नज़र घूमी केले ही दिखे.

महत्वपूर्ण हिस्सा

फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि शहर के भीतर की दुकानों में लाल के साथ साथ हरे और पके हुए केले भी बिक रहे थे.

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