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तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए कविता का भावार्थ लिखें।

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1) तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए।
मेरे वर्ण-वर्ण विशृंखल,
चरण-चरण भरमाये,
गूंज-गूंजकर मिटनेवाले
मैंने गीत बनाये।
कूक हो गयी हूक गगन की
कोकिल के कंठों पर,
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए।

कवि ‘बच्चन’ जी कहते हैं कि – पाठकों! तुम मेरा गीत गा दो, वह अमर हो जायेगा। मैंने अपने ये गीत वर्ण, चरण आदि को सजाकर बनाये हैं। मेरे ये गीत गूंज-गूंजकर मिटनेवाले गीत हैं। कोयल को मीठी तान मानो गगन तक पहुंच गई है। तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए।

शब्दार्थ :

  • विश्रृंखल – बन्धनहीन, स्वतंत्र, मुक्त;
  • कूक – लंबी गहरी आवाज़, कोकिला की आवाज;
  • हूक – दर्द की आवाज, पीड़ा।

2) जब-जब जग ने कर फैलाये
मैंने कोष लुटाया,
रंक हुआ मैं निज निधि खोकर,
जगती ने क्या पाया?
भेंट न जिसमें कुछ खोऊँ
पर तुम सब कुछ पाओ,
तुम ले लो, मेरा दान अमर हो जाए,
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए।

जब भी जग ने हाथ फैलाए मैंने यह कोष लुटाया। अपना सब कुछ देकर मैं रंक बन गया। जगती ने क्या पाया? मेरे पास भेंट हेतु कुछ नहीं, फिर भी तुम पा लो। मेरा दिया हुआ दान भी अमर हो जाए। तुम गा दो, मेरा गीत अमर हो जाए।

शब्दार्थ :

  • कर – हाथ;
  • कोष – निधि, खजाना;
  • रंक – गरीब।

3) सुन्दर और असुन्दर जग में
मैंने क्या न सराहा,
इतनी ममतामय दुनिया में
मैं केवल अनचाहा!
देखू अब किसकी रुकती है
आ मुझपर अभिलाषा,
तुम रख लो मेरा मान अमर हो जाए,
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए।

सुन्दर और असुन्दर जग में मैंने क्या न सराहा, अनचाहे ममता दी, देखू अब किसकी इच्छा मेरे लिए रुकती है! तुम मेरा मान रख लो। तुम गा दो, मेरा गीत अमर हो जाए।

शब्दार्थ :

  • सराहा – प्रशंसा करना;
  • अनचाहा – जिसे कोई नहीं चाहता

4) दुःख से जीवन बीता फिर भी
शेष अभी कुछ रहता,
जीवन की अंतिम घड़ियों में
भी तुम से यह कहता,
सुख की एक साँस पर होता
है अमरत्व निछावर,
तुम छू दो मेरा प्राण अमर हो जाए!
तुम गा दो, मेस गान अमर हो जाए!

दुःख से जीवन बीता, फिर भी जीवन की अंतिम घड़ियों तक तुमसे कहता हूँ – सुख की एक साँस पर अमरत्व न्योछावर है, तुम छू दो मेरा प्राण, अमर हो जाए! तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए।



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