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टिप्पणी लिखिए–“अर्जित निस्सहायता” या “अधिगमित विवशता’। |
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Answer» अधिगम की प्रक्रिया के अध्ययन के सन्दर्भ में अर्जित निस्सहायता का भी अध्ययन किया जाता है। इसे ‘अधिगमित विवशता’ भी कहा जाता है। इस विषय में सर्वप्रथम सन् 1967 ई० में सैलिगमैन एवं मायर ने व्यवस्थित अध्ययन किया। इस अध्ययन के निष्कर्ष में स्पष्ट किया गया कि जब कोई प्राणी अनियन्त्रित विकर्णात्मक घटनाओं का सामना करता है तो उसमें प्रारम्भिक अनुभव अनेक बार यह भावना उत्पन्न कर देते हैं कि उसके कार्यों या व्यवहार का सम्बन्धित परिस्थितियों या वातावरण पर किसी प्रकार का नियन्त्रण नहीं है। इस स्थिति में प्राणी या व्यक्ति में एक प्रकार की विवशता या बेबसी की भावना विकसित हो जाती है। इस स्थिति को ही मनोवैज्ञानिक भाषा में ‘अर्जित निस्सहायता’ या अधिगमित विवशता कहा जाता है। जिन परिस्थितियों या वातावरण के कारण प्राणी में इस प्रकार की विवशता की भावना विकसित होती है तथा सम्बन्धित परिस्थितियों में प्राणी को यदि कोई विषय सिखाया जाता है तो प्रायः व्यक्ति के अधिगम पर ऋणात्मक प्रभाव ही पड़ता है। सामान्य रूप से ⦁ अर्जित निस्सहायता या अधिगमित विवशता की भावना सम्बन्धित परिस्थिति के प्रति विशिष्ट होती है। ⦁ अनेक बार व्यक्ति अपनी अधिगमित विवशता को स्थायी समझ लेता है। ⦁ प्रायः व्यक्ति अपनी अर्जित निस्सहायता के सम्बन्ध को आन्तरिक तथा कुछ बाहरी कारकों से जोड़ लेता है। |
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