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श्वः कार्यमय कुर्वीत पूर्वाणे चापराणिकम्।नहि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम् 11211​

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EXPLANATION:

“जो कार्य कल किया जाना है उसे पुरुष आज ही संपन्न कर ले, और जो अपराह्न में किया जाना हो उसे पूर्वाह्न में पूरा कर ले, क्योंकि मृत्यु किसी के लिए प्रतीक्षा नहीं करती है, भले ही कार्य संपन्न कर लिया गया हो या नहीं ।” अर्थात् मृत्यु कब आ जायेगी इसका पूर्वानुमान कोई नहीं कर सकता है । कार्य संपन्न हो चुका कि नहीं इस बात का इंतजार वह नहीं करने वाली । अतः अविलंब अपने कर्तव्य पूरे कर लेने चाहिये ।

यहां उपदेष्टा का इशारा सत्कर्मों से रहा है । भारतीय मान्यता रही है कि जीवात्मा अमर है और अपने इहलोक के कर्मों के फल अन्य लोकों अथवा अन्य जन्मों में भोगने को विवश है । अतः सत्कर्मों के निष्पादन में विलंब न करने की सलाह नीतिवचन देते हैं । अन्य समाजों में भी स्वर्ग-नरक की अवधारणा तथा कर्मफलों की महत्ता किंचित् भेद के साथ स्वीकारी गयी है । क्या इसे समाज का दुर्भाग्य कहा जाये कि आधुनिक जीवन में कर्मों की गुणवत्ता के अर्थ शनैः-शनैः बेमानी होते जा रहे हैं ?

उपर्युक्त नीतिवचन ने कबीर के एक दोहे की ओर मेरा ध्यान खींचा, जिसे मैंने अपनी प्राथमिक स्तर की हिन्दी पाठ्यपुस्तकों में कभी पढ़ा था । दोहा सुविख्यात है और मेरे अनुमान से अधिकांश हिन्दीभाषियों को ज्ञात होगा



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