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श्री सतगुरु राम सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए क्या-क्या यत्न किए?

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श्री सतगुरु राम सिंह एक महान् देश भक्त थे। उन्होंने बाबा बालक सिंह के पश्चात् पंजाब में नामधारी अथवा कूका लहर का नेतृत्व किया। बाबा राम सिंह ने 1857 ई० में कुछ लोगों को अमृत छका कर नामधारी लहर को संगठित रूप प्रदान किया। भले ही इस लहर का मुख्य उद्देश्य धार्मिक एवं सामाजिक सुधार के लिए कार्य करना था, तो भी इसने अंग्रेजी शासन का विरोध किया और उसके प्रति असहयोग की नीति अपनाई।

बाबा राम सिंह की गतिविधियां-

  1. बाबा राम सिंह जहां भी जाते, उनके साथ घुड़सवारों की टोली अवश्य जाती थी। इससे अंग्रेज़ सरकार यह सोचने लगी कि नामधारी किसी विद्रोह की तैयारी कर रहे हैं।
  2. अंग्रेज़ बाबा राम सिंह के डाक प्रबन्ध को सन्देह की दृष्टि से देखते थे।
  3. बाबा राम सिंह ने प्रचार की सुविधा को सम्मुख रख कर पंजाब को 22 प्रांतों में बांटा हुआ था। प्रत्येक प्रांत का एक सेवादार होता था जिसे सूबेदार कहा जाता था। नामधारियों की यह कार्यवाही भी अंग्रेजों को डरा रही थी।
  4. 1869 में नामधारियों या कूकों ने कश्मीर के शासक के साथ सम्पर्क स्थापित किया। उन्होंने नामधारियों (कूकों) को सैनिक प्रशिक्षण देना भी आरम्भ कर दिया।
  5. नामधारी लोगों ने गौ-रक्षा का कार्य आरम्भ कर दिया था। गौ-रक्षा के लिए वे कसाइयों को मार डालते थे। 1871 ई० में उन्होंने रायकोट (अमृतसर) के कुछ बूचड़खानों पर आक्रमण करके कई कसाइयों को मार डाला।
  6. जनवरी, 1872 में 150 कूकों (नामधारियों) का एक जत्था कसाइयों को दण्ड देने मालेरकोटला पहुंचा। 15 जनवरी, 1872 ई० को कूकों और मालेरकोटला की सेना के बीच घमासान लड़ाई हुई ! दोनों पक्षों के अनेक व्यक्ति मारे गए। अंग्रेजों ने कूकों के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए अपनी विशेष सेना मालेरकोटला भेजी। 68 कूकों ने स्वयं अपनी गिरफ्तारी दी। उनमें से 49 कूकों को 17 जनवरी, 1872 ई० को तोपों से उड़ा दिया गया। सरकारी मुकद्दमों के पश्चात् 16 कूकों को मृत्यु दण्ड दिया गया। बाबा राम सिंह को देश निकाला देकर रंगून भेज दिया गया।
    सच तो यह है कि बाबा राम सिंह के नेतृत्व में नामधारी अपने प्राणों की परवाह न करते हुए अपने उद्देश्य पर डटे रहे।


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