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श्री श्यामनारायण पाण्डेय की पुस्तक में दी गई कविता वीर रस से परिपूर्ण है। वीर रस की परिभाषा देते हुए पाठ से दो उदाहरण दीजिए।

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(क) वीर रस की परिभाषा–शत्रु की उन्नति, दीनों पर अत्याचार या धर्म की दुर्गति को मिटाने जैसे किसी विकट या दुष्कर कार्य को करने का जो उत्साह मन में उमड़ता है, वही वीर रस का स्थायी भाव है, जिसकी पुष्टि होने पर वीर रस की सिद्धि होती है।

(ख) वीर रस के अव्यय-स्थायी भाव–उत्साह।

आलम्बन (विभाव)-अत्याचारी शत्रु।

उद्दीपन (विभाव)--शत्रु का अहंकार रणवाद्य, यश की इच्छा आदि।

अनुभाव–गर्वपूर्ण उक्ति, प्रहार करना, रोमांच आदि।

संचार भाव-आवेग, उग्रता, गर्व, औत्सुक्य, चपलता आदि।

उदाहरण-

वह हाथी दले पर टूट पड़ा,
मानो उस पर पवि छूट पड़ा।
कट गई वेग से भू, ऐसा ।
शोणित का नाला फूट पड़ा।



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