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Shram safalata ki seedee vishay per nibandh likiye short essay ​

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ANSWER:

निरंतर परिश्रम ही जीवन की सफलता की कहानी है । सफलता के लिए समय भी चाहिए । समय में निरंतर परिश्रम आवश्यक है । निरंतर परिश्रम का क्रम टूट जाता है तो हो सकता है कि सफलता ना मिले । इसलिए निरंतर परिश्रम आवश्यक है । तभी सफलता प्राप्त होती है । अब आये विचारों को भी देखते हैं :-

निसंदेह निरंतर परिश्रम ही सफलता की वास्तविक कुंजी है। भाग्य के भरोसे केवल वही बैठते हैं जो परिश्रम से भागते हैं, काम नहीं करना चाहते, थोड़ा करके अधिक पाने की इच्छा रखते हैं। निरंतर कर्म और परिश्रम व्यक्ति को उसके इच्छित कार्य में सफलता ही नहीं दिलाते,सफलता के उच्च शिखर पर भी पहुँचाते है। खरगोश और कछुए की कहानी और “ करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान।।”भी इसी ओर इंगित करते हैं।

क्या निरंतर परिश्रम ही सफलता की कुंजी है ?

बिल्कुल इसमें कोई दो राय नहीं है ! वर्तमान युग तो गरिमा का युग है ! एक अपंग भी भीख न मांगकर परिश्रम करके सम्मान से जीने की चाह रखता है ! परिश्रम से एक अपाहिज में भी अदम्य आत्म विश्वास जाग उठता है !

जो व्यक्ति आलसी और कामचोर हैं वे हीभाग्य का रास्ता देखते हैं!अथवा जिनके बाप दादों की संपत्ति होती है वही श्रम कम करते हैं ! हालाकि सभी यह नहीं करते फिर भी ! हां ! यदि परिश्रम करने से भी सफलता नहीं मिलती तो हमें निराश नहीं होना चाहिए !सफलता के लिए दृष्टीकोण सकारात्मक होना चाहिए ! कोई भी कार्य करते हैं तो विश्वास ,दृढसंकल्पता का होना एवं लक्ष्य तक पहूंचने का जूनून होना चाहिए ! !परिश्रम के साथ समय का भी ध्यान देना चाहिए ! सफलता जरुर मिलेगी !श्रम के पसीने से सींचा हुआ फल अवश्य मीठा ही होगा!बाकी श्री कृष्ण भगवान ने कहा है कर्म करते जाओ फल की इच्छ न ऱखें !

बिल्कुल सही है क्योंकि बिना परिश्रम व्यक्ति अपंग के समान है ।ईश्वर की ये अद्भुत रचना है कि इंसान बिना हिले डुले रह ही नहीं सकता ।उसकी मानसिकता भी सदा से ही चीजों को हासिल करने की रही है ।आराम दायक जिंदगी बिताने के लिए भी उसे तरह-तरह के साधन जुटाने पड़ते हैं और उसके लिए परिश्रम करना पड़ता है ।हर व्यक्ति के मस्तिष्क में लोभ-मोह की ऐसी भावना भरी है कि वो दूसरे की अधिकता को सहन नहीं कर पाता और स्वतः दुगना परिश्रम कर प्रतिस्पर्धा में उतर आता है और जब सफलता मिलने लगती है तो दिन दूनी रात चौगुनी मेहनत करता है ।बिना परिश्रम कोई सफलता प्राप्त नहीं कर सकता ।यह सौ प्रतिशत सही है ।

बिना परिश्रम भाग्य के भरोसे बैठे रहने से काम नहीं होता ,

निंरन्तर घिसते रहने से पत्थर में भी छेंद हो जाता है , तो असम्भव कार्य भी मेहनतकश इंसान संम्भव कर लेता है । मेहनती इंसान के लिये कोई भी कार्य करना सम्भव है ।

बस हमें सुझ बुझ व संतुलन रख कार्य करना है , गधा मजूरी नही । विवेक के साथ संतुलन बनाकर लक्ष्य पर निशाना साध काम करें तो हर मुश्किल काम भी बड़ी आसानी से हो जाता है ।

ठीक है, क्योंकि इसके द्वारा ही हम अपने जीवन में उपलब्धियों के साथ-साथ जीवन की आवश्यकताएं पूरी करते हैं। धनोपार्जन करके जीवन में सुख- सुविधा रूपी सफलता का आनंद लेते हैं, लेकिन निरंतर परिश्रम करने की चाहत व काम करने का लगातार बढ़ता दबाव मानसिक रुग्णता पैदा करके व्यक्ति की कार्यक्षमता और कार्यकुशलता पर यदा-कदा प्रश्न चिन्ह लगा देता है। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि परिश्रम से मानसिक पठार बनने लगते हैं।

अतः हमें निरंतर परिश्रम यानी काम के बढ़ते घंटे व मशीन होते जीवन की त्रासदी को तदनुकूल पर्यावरण एवं स्वास्थ्य के साथ समझना आवश्यक होगा ।

निरंतर परिश्रम ही सफलता की कुंजी है और मुझे इसमें पूर्ण विश्वास है ।बहुत लोगों का विश्वास है कि अगर भाग्य में लिखा होगा तभी सफलता मिलेगी ।लेकिन निरंतर परिश्रम ही है जिसके समक्ष सफलता शीश झुकाती है ।निरंतर प्रयास हमें सदा मंजिल की तरफ ही ले जाता है ।

सफ़लता प्राप्ति हेतु बहुत से बिंदु हैं । जिनमें से प्रमुख हैं -

लक्ष्य निर्धारण

समय प्रबंधन

एकाग्रता

परिश्रम

निरंतरता

अब प्रश्न ये उठता है कि इन सबमें प्रमुख कौन है । तो निश्चित रूप से ये कहा जा सकता है कि जिसने भी सार्थक दिशा में पूर्णमनोयोग से सतत परिश्रम किया वो अवश्य ही विजयी हुआ ।

परिश्रम अर्थात कर्म के महत्व को भगवान श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को गीता के उपदेश द्‌वारा समझाया है



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