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सहकारी मंडलियों की मर्यादाएँ समझाइए ।

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सहकारी मंडली कुछ निश्चित क्षेत्रों में और कुछ खास देशों में सफल हुई है । भारत में उसका विकास का प्रमाण मंद रहा है,

उसका कारण उसकी निम्न मर्यादाएँ हैं :

(1) मर्यादित पूँजी : सहकारी समिति आर्थिक रूप से निर्बल व्यक्तियों का मंडल है । इससे अधिक पूँजी नहीं एकत्रित की जा सकती । इसके उपरांत उसके सदस्य के पास चाहे कितने भी शेयर हों उसे एक ही मत देने का अधिकार होने से सदस्य अधिक शेयर खरीदने के लिये प्रेरित नहीं होते । तीसरा, कोई एक व्यक्ति अधिक से अधिक अमुक ही शेयर खरीद सके इस मर्यादा के कारण भी पूँजी मर्यादित प्रमाण में ही मिलती है । इससे जहाँ काफी बड़े प्रमाण में पूँजी की आवश्यकता हो वहाँ सहकारी मंडली नहीं चल सकती ।

(2) बिनकार्यक्षम संचालन : सहकारी समिति में ज्यादातर मानद् कार्यकर होते हैं । जिन्हें या तो बिल्कुल भी वेतन नहीं दिया जाता या तो खूब कम मानद् वेतन दिया जाता है, जिससे अप्रामाणिकता का भय रहता है । तथा मानद् कार्यकर कुशल संचालक हो यह अनिवार्य नहीं है । इसके उपरांत, सदस्यों में पूर्ण रूप से धंधाकीय समझ न होने से वह जिस व्यक्ति का संचालक के रूप में चुनाव करते हैं, वह संचालक के रूप में अकार्यक्षम हो सकते हैं या अप्रमाणिक भी हो सकते हैं ।

(3) सरकारी हस्तक्षेप : सहकारी प्रवृत्ति की भारत में शुरुआत ही सरकार के द्वारा हुई और आज भी सरकार सहकारी मंडलियों को अनेक रूप से मदद करती है । इस तरह सहकारी मंडलियाँ आर्थिक रूप से सरकार पर अवलंबित है । अगर सरकार आर्थिक मदद न करे तो उसका विकास रुक जाता है । इस तरह, यह प्रवृत्ति संपूर्ण रूप से सरकार पर आधारित हो गई है । इसके अलावा सरकार अगर मदद करती है तो सहकारी मंडली पर अंकुश भी रखती है । इसके लिये सहकारी समिति के कानून में अनेक प्रकार की सत्ता रजिस्ट्रार को दी गई है । इस तरह, सरकारी हस्तक्षेप के कारण सहकारी मंडली सही अर्थ में सहकारी भावना का विकास नहीं कर सकती ।

(4) वित्तीय उत्तेजनों का अभाव : सहकारी समिति में संचालकों को लाभ रूपी प्रेरक बल न होने से उत्साह और इच्छा शक्ति (लगन) से काम करने की वृत्ति कम होती है । मानद् वेतन से काम करनेवाले संचालक स्वाभाविक रूप से उत्साह से काम नहीं कर सकते । इसके अलावा अधिक डिविडेन्ड की भी यहाँ कोई संभावना नहीं है, कारण कि अधिक से अधिक कितना डिविडेन्ड दिया जा सके उस पर कानून द्वारा नियंत्रण है । इस तरह महत्तम लाभ का जो प्रेरक बल व्यक्तिगत मालिकी, साझेदारी या कंपनी में है वह सहकारी मंडली में देखने को नहीं मिलता ।

(5) सिद्धांतों की समझ का अभाव : सहकार के सिद्धांतों का ज्ञान ज्यादातर सदस्यों को नहीं होता है । ज्यादातर सदस्यों में पक्षपात, संघर्ष, अप्रामाणिकता वगैरह देखने को मिलते हैं, इससे मंडली का विकास रुक जाता है ।

(6) शिथिल व्यवस्थातंत्र : सहकारी ग्राहक भंडार में ग्राहक निश्चित होते हैं । अर्थात् वह बाजार प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं करते । व्यवस्थापकों के कार्य में शिथिलता आ जाती है । व्यवस्थातंत्र खूब शिथिल हो जाता है ।

(7) मर्यादित क्षेत्र : आर्थिक प्रवृत्तियों के प्रत्येक क्षेत्र में सहकार मिल नहीं सकता । ऐसा करने के लिये सभी तरह के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करना पड़ता है तथा आय और संपत्ति की असमानता घटानी पड़ती है । इस तरह सभी क्षेत्रों में सहकारी मंडली चल नहीं सकती।



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