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साना साना हाथ जोड़ी के आधार पर प्राकृतिक सौंदर्य को ध्यान में रखते हुए कैलेंडर तैयार करें।

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“साना साना हाथ जोड़ि” एक यात्रा वृतांत है जिसकी लेखिका मधु कांकरिया हैं। इस यात्रा वृतांत में लेखिका ने अपनी सिक्किम की यात्रा , वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य व हिमालय के विराट व भव्य रूप का बहुत खूबसूरती से वर्णन किया है।

दरअसल लेखिका उच्च हिमालयी पहाड़ी क्षेत्रों, सफेद बर्फ की चादर ओढ़े पर्वतों व प्राकृतिक दृश्यों को पहली बार बहुत करीब से देख रही थी और उन्हें देखकर वह बहुत रोमांचित महसूस कर रही थी ।

असल में इन पहाड़ों की यही खूबसूरती है। ये पहाड़ एक ओर जहाँ पर्यटकों को अपनी मनमोहक प्राकृतिक सुंदरता से अपनी ओर खींचते हैं वहीँ दूसरी ओर कल-कल बहती नदियाँ , ऊँचे-ऊँचे  पहाड़ों से गिरते जलप्रपात, बर्फ से ढके पर्वत , टेढ़े-मेढ़े संकरे रास्ते पर्यटकों का मन मोह लेते हैं ।

परन्तु यहाँ रहने वाले स्थानीय लोगों के लिए कई बार यही पहाड़ मुसीबत का सबब बन जाते हैं। उन्हें हर दिन इन टेढ़े-मेढ़े संकरे रास्तों से होकर अपने घरों, खेत -खलिहानों व छोटे-छोटे बच्चों को स्कूलों तक पहुंचना होता है ।जंगलों से जानवरों के लिए चारा व जलावन के लिए लकड़ी लाना, खेती-बाड़ी के अनगिनत काम आदि इनकी रोज की दिनचर्या में शामिल होते हैं ।

इन पहाड़ों में रहने वाले लोगों की जिंदगी काफी कठिनाइयों से भरी होती है वो हर रोज नई चुनौतियों का सामना करते हैं ।

कहानी की शुरुआत लेखिका के गैंगटॉक शहर(सिक्किम में ) में पहुंचने के बाद शुरू होती है। जब लेखिका टिमटिमाते हजारों तारों से भरे आसमान को देख कर एक अजीब सा सम्मोहन महसूस करती हैं और उन जादू भरे क्षणों में खो जाती हैं। लेखिका गैंगटॉक शहर को “मेहनतकश बादशाहों का शहर” कह कर सम्मानित करती हैं क्योंकि यहाँ  के लोग बहुत अधिक मेहनत कर अपना जीवन यापन करते हैं।

तारों भरी खूबसूरत रात देखने के बाद अगली सुबह वह एक नेपाली युवती द्वारा सिखाई गई प्रार्थना “साना साना हाथ जोड़ि , गर्दहु प्रार्थना। हाम्रो जीवन तिम्रो कौसेली” यानि “छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रही हूँ कि मेरा सारा जीवन अच्छाइयों को समर्पित हो” करने लगती है।

प्रार्थना करने के बाद वह यूमथांग की ओर चलने से पहले हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंघा को देखने अपनी बालकनी में पहुँचती हैं। बादल होने के कारण उन्हें कंचनजंघा की चोटी तो नहीं दिखाई देती है लेकिन सामने बगीचे में खिले ढेरों फूलों को देखकर काफी खुश हो जाती हैं।

उसके बाद लेखिका गैंगटॉक शहर से 149 किलोमीटर दूर यूमथांग यानि घाटियों को देखने अपने गाइड जितेन नार्गे व सहेली मणि के साथ चल पड़ती हैं। पाइन और धूपी के खूबसूरत नुकीले पेड़ों को देखते हुए वो धीरे-धीरे पहाड़ी रास्तों से आगे बढ़ने लगती हैं।

आगे चलते-चलते लेखिका को बौद्ध धर्मावलंबियों द्वारा लगाई गई सफेद पताकाएं दिखाई देती है। मंत्र लिखी ये पताकाएं किसी ध्वज की तरह फहरा रहीं थीं  जो शांति और अहिंसा का प्रतीक थीं ।

लेखिका ने जब इन पताकाओं के बारे में पूछा तो गाइड जितेन ने बताया कि जब भी किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु होती है तो उसकी आत्मा की शांति के लिए शहर से दूर किसी पवित्र स्थान पर 108 पताकाएं फहरा दी जाती है। नार्गे ने यह भी बताया कि किसी शुभ अवसर या नए कार्य की शुरुआत करने पर सफेद की जगह रंगीन पताकाएं फहरा दी जाती हैं।

यहाँ से थोड़ी दूरी पर स्थित “कवी लोंग स्टॉक ” जगह के बारे में नार्गे ने बताया कि यहां “गाइड” फिल्म की शूटिंग हुई थी। इन्हीं रास्तों से आगे जाते हुए लेखिका ने एक कुटिया के अंदर “प्रेयर व्हील यानि धर्म चक्र” को धूमते हुए देख कर उत्सुकता बस उसके बारे में जानने की कोशिश की।

तब नार्गे ने बताया कि प्रेयर व्हील एक धर्म चक्र है। इसको घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं”। यह सुनकर लेखिका को लगा कि “पहाड़ हो या मैदान या कोई भी जगह हो , इस देश की आत्मा एक जैसी ही है”।

जैसे-जैसे लेखिका अपनी यात्रा में पहाड़ की ऊंचाई की तरफ बढ़ने लगी। बाजार, लोग, बस्तियाँ सब पीछे छूटने लगे। अब लेखिका को नीचे घाटियों में पेड़ पौधों के बीच बने छोटे-छोटे घर , ताश के पत्तों से बने घरों की भांति प्रतीत हो रहे थे। और न जाने कितने ही तीर्थयात्रियों , कवियों , दर्शकों साधु संतों के आराध्य हिमालय का विराट व वैभवशाली रूप धीरे-धीरे लेखिका के सामने आने लगा था। अब लेखिका को हिमालय पल-पल बदलता हुआ नजर आ रहा था।

लेखिका अब खूबसूरत प्राकृतिक नजारों , आसमान छूते पर्वत शिखरों , ऊंचाई से दूध की धार की तरह झर-झर गिरते जलप्रपातों, नीचे पूरे वेग से बहती चांदी की तरह चमकती तीस्ता नदी को देखकर अंदर-ही-अंदर रोमांचित महसूस कर रही थी।

तभी उनकी जीप “सेवेन सिस्टर्स वॉटरफॉल” पर रूक गई। यहाँ पहुंचकर लेखिका को ऐसा लग रहा था जैसे उनके अंदर की सारी बुराइयाँ  व दुष्ट वासनाएँ इस झरने के निर्मल धारा में बह गई हों। यह दृश्य लेखिका के मन व आत्मा को शांति देने वाला था।

धीरे-धीरे लेखिका का सफर आगे बढ़ता गया और प्राकृतिक दृश्य पल पल में कुछ यूँ  बदल रहे थे जैसे कोई जादू की छड़ी घुमा कर इन दृश्यों को बदल रहा हो। पर्वत , झरने , घाटियों , वादियों के दुर्लभ नजारे सभी कुछ बेहद खूबसूरत था तभी लेखिका की नजर “थिंक ग्रीन” बोर्ड पर पड़ गई। सब कुछ कल्पनाओं से भी ज्यादा सुंदर था।

तभी लेखिका को जमीनी हकीकत का एक दृश्य अंदर से झकझोर गया। जब लेखिका ने कुछ पहाड़ी औरतों को कुदाल और हथौड़ी से पत्थर तोड़ते हुए देखा। कुछ महिलाओं की पीठ में बड़ी सी टोकरिया (डोको) थी जिनमें उनके बच्चे बंधे थे। मातृत्व साधना और श्रम साधना का यह रूप देख कर उनको बड़ा आघात लगा

पूछने पर उनको पता चला कि ये महिलाएं पहाड़ी रास्तों को चौड़ा बनाने का काम कर रहीं हैं और यह बड़ा ही खतरनाक काम होता है क्योंकि रास्तों को चौड़ा बनाने के लिए डायनामाइट का प्रयोग किया जाता है और कई बार इसमें मजदूरों की मौत भी हो जाती हैं। यह देखकर वह मन मन सोचने लगी “कितना कम लेकर ये लोग , समाज को कितना अधिक वापस कर देते हैं”।

थोड़ा सा और ऊंचाई पर चलने के बाद लेखिका ने देखा कि सात-आठ साल के बच्चे अपने स्कूल से घर लौटते हुए उनसे लिफ्ट मांग रहे थे। लेखिका के स्कूल बस के बारे में पूछने पर नार्गे ने हंसते हुए बताया कि पहाड़ी इलाकों में जीवन बहुत कठोर होता है। ये बच्चे रोज 3 से 4 किलोमीटर टेढ़े- मेढ़े पहाड़ी रास्तों से पैदल चलकर अपने स्कूल पहुंचते हैं। शाम को घर आकर अपनी मांओं के साथ मवेशियों को चराने जंगल जाते हैं। जंगल से भारी भारी लकड़ी के गगट्ठर सिर पर लाद कर घर लाते हैं।

जीप जब धीरे धीरे पहाड़ी रास्तों से बढ़ने लगी तभी सूरज ढलने लगा। लेखिका ने देखा कि कुछ पहाड़ी औरतों गायों को चरा कर वापस अपने घर लौट रही थी। लेखिका की जीप चाय के बागानों से गुजरने लगी। सिक्क्मी परिधान पहने कुछ युवतियां बागानों से चाय की पत्तियां तोड रही थी। चटक हरियाली के बीच सुर्ख लाल रंग , डूबते सूरज की स्वर्णिम और सात्विक आभा में इंद्रधनुषी छटा बिखेर रहा था।

यूमथांग पहुंचने से पहले लेखिका को एक रात लायुंग में बितानी थी।लायुंग गगनचुंबी पहाड़ों के तले एक छोटी सी शांत बस्ती थी। दौड़ भाग भरी जिंदगी से दूर शांत और एकांत जगह। लेखिका अपनी थकान उतारने के लिए तीस्ता नदी के किनारे एक पत्थर के ऊपर जा कर बैठ गई।

रात होने पर गाइड नार्गे के साथ अन्य लोगों ने नाचना – गाना शुरू कर दिया। लेखिका की सहेली मणि ने भी बहुत सुंदर नृत्य किया। लायुंग में लोगों की आजीविका का मुख्य साधन पहाड़ी आलू , धान की खेती और शराब ही है।

लेखिका यहां बर्फ देखना चाहती थी लेकिन उन्हें वहां कहीं भी बर्फ नहीं दिखाई दी। तभी एक स्थानीय युवक ने लेखिका को बताया कि प्रदूषण के कारण अब यहां बर्फबारी बहुत कम होती है। लेखिका को अगर बर्फ देखनी है तो उन्हें “कटाओ यानी भारत का स्विट्जरलैंड” जाना पड़ेगा।

कटाओ पर्यटक स्थल के रूप में अभी उतना विकसित नहीं हुआ था। इसीलिए यहां का प्राकृतिक सौंदर्य अभी भी पूरी तरह से बरकरार था। लायुंग से कटाओ का सफर लगभग 2 घंटे का था। लेकिन वहां पहुंचने का रास्ता बहुत ही खतरनाक था। कटाओ में बर्फ से ढके पहाड़ चांदी की तरह चमक रहे थे। लेखिका इसे देखकर बहुत ही आनंदित महसूस कर रही थी।

कटाओ में लोग बर्फ के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। लेकिन वह तो इस नजारे को अपनी आंखों में भर लेना चाहती थी। उन्हें ऐसा लग रहा था कि जैसे कि ऋषि-मुनियों को वेदों की रचना करने की प्रेरणा यही से मिली हो और उन्हें यह भी महसूस हुआ कि यदि इस असीम सौंदर्य को कोई अपराधी भी देख ले तो , वह भी आध्यात्मिक या ऋषि हो जाए।

लेखिका की सहेली मणि के मन में भी दर्शनिकता के भाव पनपने लगे और वह कहने लगी कि प्रकृति की जल संचय व्यवस्था कितनी शानदार हैं। वह अपने अनोखे ढंग से ही जल संचय करती हैं।यह हिमशिखर जल स्तंभ हैं पूरे एशिया के। प्रकृति जाडों में पहाड़ की ऊंची-ऊंची चोटियों में बर्फ जमा देती हैं और गर्मी आते ही बर्फ पिघल कर पानी के रूप में नदियों से बहकर हम तक पहुंचती हैं और हमारी प्यास बुझाती हैं।

थोड़ा आगे चलने पर लेखिका को कुछ फौजी छावनियों दिखी। तभी उन्हें ध्यान आया कि यह बॉर्डर एरिया है। यहां चीन की सीमा भारत से लगती है। जब लेखिका ने एक फौजी से पूछा कि “आप इस कड़कड़ाती ठंड में यहां कैसे रहते हैं। तब फौजी ने बड़े हंसते हुए जवाब दिया कि “आप चैन से इसीलिए सोते हैं क्योंकि हम यहां पहरा देते हैं”।

लेखिका सोचने को मजबूर हो गई कि जब इस कड़कड़ाती ठंड में हम थोड़ी देर भी यहाँ ठहर नहीं पा रहे हैं तो ये फौजी कैसे अपनी ड्यूटी निभाते होंगे। यह सोचकर लेखिका का सिर सम्मान से झुक गया।

उन्होंने फौजी से “फेरी भेटुला यानि फिर मिलेंगे” कहकरकर विदा ली। इसके बाद यूमथांग की ओर लौट पड़ी। यूमथांग की घाटियों में उस समय ढेरों प्रियता और रोड़ोंडेड्रो के बहुत ही खूबसूरत फूल खिले थे। लेकिन यूमथांग वापस आकर उन लोगों को सब कुछ फिका फिका लग रहा था क्योंकि यूमथांग कटाओ जैसा सुंदर नहीं था।

चलते चलते लेखिका ने चिप्स बेचती एक सिक्क्मी युवती से पूछा “क्या तुम सिक्किमी हो ” ।युवती ने जवाब दिया “नहीं , मैं इंडियन हूं”। यह सुनकर लेखिका को बहुत अच्छा लगा। सिक्किम के लोग भारत में मिलकर काफी खुश हैं।

दरअसल सिक्किम पहले भारत का हिस्सा नहीं था। सिक्किम पहले स्वतंत्र रजवाड़ा था।लेकिन अब सिक्किम भारत में कुछ इस तरह से घुलमिल गया है ऐसा लगता ही नहीं कि , सिक्किम पहले भारत का हिस्सा नहीं था। तब वहां पर पर्यटन उद्योग इतना फला फुला नहीं था। सिक्किम के लोग भारत का हिस्सा बनकर काफी खुश हैं।

जीप आगे को बढ़ती जा रही थी कि तभी एक पहाड़ी कुत्ते ने रास्ता काट लिया। मणि ने बताया कि ये पहाड़ी कुत्ते सिर्फ चांदनी रात में ही भोंकते हैं। यह सुनकर लेखिका हैरान थी। थोड़ा आगे चलने पर नार्गे ने लेखिका को गुरु नानक के फुटप्रिंट वाला पत्थर भी दिखाया।

नार्गे ने बताया कि ऐसा माना जाता है कि इस जगह पर गुरु नानकजी की थाली से थोड़े से चावल छिटक कर गिर गए थे। और जहां-जहां वो चावल छिटक कर गिरे। वहां-वहां अब चावल की खेती होती है।

यहां से करीब 3 किलोमीटर आगे चलने के बाद वो खेदुम पहुंचे। यह लगभग 1 किलोमीटर का क्षेत्र था। नार्गे ने बताया कि इस स्थान पर देवी-देवताओं का निवास है। यहां कोई गंदगी नहीं फैलाता है। जो भी गंदगी फैलाता है वह मर जाता है। उसने यह भी बताया कि हम पहाड़ , नदी , झरने इन सब की पूजा करते हैं। हम इन्हें गंदा नहीं कर सकते।

लेखिका के यह कहने पर कि “तभी गैंगटॉक शहर इतना सुंदर है”। नार्गे ने लेखिका को कहा “मैडम गैंगटॉक नहीं गंतोक कहिए। जिसका अर्थ होता है पहाड़”।

उसने आगे बताया कि सिक्किम के भारत में मिलने के कई वर्षों बाद भारतीय आर्मी के एक कप्तान शेखर दत्ता ने इसे पर्यटन स्थल ( टूरिस्ट स्पॉट) बनाने का निर्णय लिया। इसके बाद से ही सिक्किम में पहाड़ों को काटकर रास्ते बनाए जा रहे हैं। नए नए पर्यटन स्थलों की खोज जारी है।लेखिका ने मन ही मन सोचा कि इंसान की इसी असमाप्त खोज का नाम ही तो सौंदर्य है…..।



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