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‘राम-राम यह भी कोई लड़ाई है।” लहनासिंह के शब्दों में उसकी प्रतिक्रिया लिखिए।

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चार दिन से दिन-रात खेन्देके में बैठे हड्डियाँ अकड़ गईं। यहाँ लुधियाना से अधिक जाड़ा है। ऊपर से वर्षा और जमीन दिखाई नहीं देती। पिंडलियों तक कीचड़ में धंसे हैं। घण्टे दो घण्टे में धमाका होता है जिससे खन्दक हिल जाती है, धरती उछल जाती है। गोलों से कैसे बचें ? हर समय जलजला आता रहता है। खन्दक से बाहर साफा या कुहनी निकली कि गोली पड़ी। न मालूम जर्मन मिट्टी में लेटे हैं या पत्तों में छिपे हैं। सामने आकर नहीं लड़ते। यदि संगीन चढ़ाकर मार्च करने का हुक्म मिल जाय तो सात-सात जर्मनों को एक साथ मार दें। यह तो कायरों की लड़ाई है। सामने आकर लड़े तो लड़ाई का आनन्द है। यह कैसी लड़ाई है।



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