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राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्तों के क्रियान्वयन के विषय में आप क्या जानते हैं। इन्हें वादयोग्य क्यों नहीं बनाया गया?

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भारतीय लोकतन्त्र की सफलता नीति-निदेशक तत्त्वों के लागू करने में निहित है। भारत सरकार ने पिछले 57 वर्षों में निदेशक तत्त्वों को प्रभावी बनाने के लिए अनेक कानून व योजनाएँ लागू की हैं। आर्थिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं को अपनाया गया ताकि निदेशक तत्त्वों में निहित उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके। गरीबी और आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए 20-सूत्री कार्यक्रम लागू किया गया। ग्रामीण अंचलों में शिक्षा व स्वास्थ्य का प्रसार किया गया है। विश्व शान्ति व अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा दिया गया है। इन समस्त नीतियों का उद्देश्य निदेशक तत्त्वों द्वारा घोषित लक्ष्य लोक-कल्याणकारी राज्य की प्राप्ति है। 

लेकिन इन नीतियों से किस सीमा तक नीति-निदेशक तत्त्व प्राप्त हो पाए हैं? यह तथ्य केवल एक ही ओर संकेत करता है कि अभी यथार्थ में नीति-निदेशक तत्त्वों को प्राप्त नहीं किया जा सका है। आर्थिक क्षेत्र में पंचवर्षीय योजनाओं को अपनाने के बावजूद भी भौतिक साधनों पर केन्द्रीकरण कम नहीं हुआ। है। अमीर अधिक अमीर हुआ है तथा गरीब और अधिक गरीब निःशुल्क शिक्षा, समान आचार संहिता के निदेशक तत्त्व मृग मरीचिका बन चुके हैं। मुफ्त कानूनी सहायता के निदेशक तत्त्व के बावजूद न्याय-प्रणाली बहुत महँगी है। कुटीर उद्योग-धन्धों को बड़े औद्योगिक कारखानों ने वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर निगल लिया है। मद्यनिषेध को राजस्व-प्राप्ति हेतु बलि का बकरा बना दिया गया है।

राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्तों को न्याययोग्य या वादयोग्य क्यों नहीं पाया गया – प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जब राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त भारतीय नागरिकों के जीवन के विकास तथा लोकतन्त्र की सफलता के लिए इतने महत्त्वपूर्ण हैं तो इन्हें भी मौलिक अधिकारों की तरह वादयोग्य क्यों नहीं बनाया गया? ऐसा होने पर कोई भी सरकार इन्हें अनदेखा नहीं कर सकती थी। परन्तु ऐसा करना सम्भव नहीं था क्योंकि इन्हें लागू करने में धन की बड़ी आवश्यकता थी और देश जब स्वतन्त्र हुआ तो आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी। इसलिए यह बात सरकार पर ही छोड़ दी गई कि जैसे-जैसे सरकार के पास धन तथा दूसरे साधन उपलब्ध होते जाएँ, वह इन्हें थोड़ा-थोड़ा करके लागू करती जाए। मौलिक अधिकारों की तरह इन निदेशक सिद्धान्तों को पूर्ण रूप से उस समय लागू करना व्यावहारिक कदम नहीं था।



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