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Answer» प्रेरणा (प्रेरक) का महत्व(Importance of Motivation) प्रेरणा एक विशेष आन्तरिक अवस्था है जो प्राणी में किसी क्रिया या व्यवहार को आरम्भ करने की प्रवृत्ति जाग्रत करती है। यह प्राणी में व्यवहार की दिशा तथा मात्रा भी निश्चित करती है। वस्तुतः मनुष्य एवं पशु, सभी का व्यवहार प्रेरणाओं से युक्त तथा संचालित होता है। इस भाँति, मनुष्य के जीवन में उसके व्यवहार और अनुभवों के सन्दर्भ में प्रेरणाओं का उल्लेखनीय स्थान तथा महत्त्व है। मानव-व्यवहार तथा अनुभवों में प्रेरकों की भूमिका(Role of Motives in the Human Behaviour and Experiences) आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार व्यक्ति के व्यवहार और उसके जीवन के अनुभवों में प्रेरणा (प्रेरक) की विशिष्ट एवं निर्विवाद भूमिका है। इसका प्रतिपादन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है (1) व्यवहार-प्रदर्शन एवं प्रेरक – मनुष्य के प्रत्येक व्यवहार के पीछे प्रेरणा का प्रत्यय निहित रहता है। कोई मनुष्य एक विशेष व्यवहार क्यों प्रदर्शित करता है-यह विषय प्रारम्भ से ही जिज्ञासा, चिन्तन तथा विवाद का रहा है उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपना क्या जीवन लक्ष्य निर्धारित करता है। वह अन्य व्यक्ति या वस्तुओं में रुचि क्यों लेता है, वह किन वस्तुओं का संग्रह करना पसन्द करता है और क्यों, वह उपलब्धि के लिए क्यों प्रयासशील रहता है, उसकी आकांक्षा का स्तर क्या है, उसकी विशिष्ट आदतें क्या हैं और ये किस भाँति निर्मित हुईं?–ये सभी प्रश्न ‘मनोवैज्ञानिकों के लिए महत्त्वपूर्ण रहे हैं, जिनका अध्ययन प्रेरणा के अन्तर्गत किया जाता है। (2) उपकल्पनात्मक-प्रक्रिया – प्रेरणा एक उपकल्पनात्मक प्रक्रिया (Hypothetical Process) है, जिसका सीधा सम्बन्ध व्यवहारे के निर्धारण से होता है। प्रेरक व्यवहार का मूल स्रोत है। और मानव के व्यवहार की नियन्त्रण अनेक प्रकार के प्रेरक करते हैं। जैविक (या जन्मजात) प्रेरक प्राणी में जन्म से ही पाये जाते हैं। ये जीवन के आधार हैं और इनके अभाव में प्राणी जीवित नहीं रह सकता। इन प्रेरकों में भूख, प्यास, नींद, मल-मूत्र त्याग, क्रोध, प्रेम तथा काम आदि प्रमुख हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में रहने से उसमें अर्जित प्रेरक पैदा होते हैं। व्यक्ति का जीवन-लक्ष्य, आकांक्षा का स्तर, रुचि, आदत तथा मनोवृत्तियाँ आदि व्यक्तिगत प्रेरणाएँ हैं जो व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से सीखी जाती हैं। सामुदायिकता, प्रशंसा व निन्दा तथा आत्मगौरव जैसी सामाजिक प्रेरणाएँ व्यक्ति में सामाजिक प्रभाव के कारण निर्धारित होती हैं। इस भाति, प्रेरणा एक उपकल्पनात्मक-प्रक्रिया है और जैविक एवं अर्जित प्रेरक ही व्यक्ति को क्रियाशील बनाकर विशिष्ट व्यवहार करने की प्ररेणा प्रदान करते हैं और इसी कारण मानव के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। (3) लक्ष्य निर्देशित व्यवहार – प्रत्येक प्रकार की प्रेरणा से सम्बन्धित व्यवहार का कोई-न-कोई लक्ष्य या उद्देश्य अवश्य होता है। इसे लक्ष्य या उद्देश्य को पूरा करने के लिए व्यक्ति हर सम्भव प्रयास करता है और उसका प्रयास तब तक जारी रहता है जब तक कि वह लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेता। प्यासी व्यक्ति, पानी की प्राप्ति का लक्ष्य लेकर तब तक भटकता रहता है जब तक वह पानी पीकर प्यास नहीं बुझा लेता। लक्ष्य निर्देशित व्यवहार किसी भी प्रकार को हो सकता है; जैसे-किसी पर आक्रमण करना, किसी वस्तु का संग्रह करना या किसी वस्तु पर अधिकार जमाना और अपना जीवन-लक्ष्य निर्धारिते करना आदि। (4) श्रेष्ठ कार्य निष्पादन – प्रेरणाएँ मनुष्य के व्यवहार को असाधारण व्यवस्था प्रदान करती हैं। जिसके परिणामस्वरूप वह स्वयं को अधिक ऊर्जा एवं चेतना से परिपूर्ण पाता है। प्रेरित व्यवहार की अवस्था में उत्पन्न जागृति, आन्तरिक तनाव, तत्परती अथवा शक्ति के कारण ही व्यक्ति सामान्य अवस्था से अधिक कार्य कर पाता है। इतना ही नहीं, उसके कार्य का निष्पादन श्रेष्ठ प्रकार का होता है। (5) महान सफलता या उपलब्धि के लिए प्रयास – प्रेरित व्यवहार के कारण व्यक्ति महान सफलता या उपलब्धि के लिए क्रियाशील हो जाता है। वह व्यवहार के किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए प्रयास कर सकता है; क्योंकि व्यक्ति उन्हीं कार्यों को अधिकाधिक करते हैं जिनमें वे अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन कर पाते हैं, प्रायः देखा जाता है कि सम्बन्धित जीवन-क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि या सफलता पाने तथा अपने जीवन को अधिक उन्नत बनाने के लिए व्यक्ति अभिप्रेरित हो उठता है। इस भाँति, महान सफलता या उपलब्धि की प्रेरणा मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।। (6) सामूहिक जीवन की प्रवृत्ति – व्यक्ति समूह में रहना अधिक पसन्द करता है। समूह में वह निर्भीक रहता है तथा अन्य लोगों के सहयोग से सुखी एवं सुविधापूर्ण जीवन-यापन करता है। समूह में रहते हुए उसे आत्म-अभिव्यक्ति के अवसर मिलते हैं, अनेक आवश्यकताओं तथा इच्छाओं की सन्तुष्टि होती है। मैत्री तथा यौन इच्छाएँ भी समूह में सन्तुष्ट हो पाती हैं। इसके साथ ही व्यक्ति को समाज की परम्पराओं, प्रथाओं तथा आदर्शों के अनुरूप सामाजिक कार्य करने के अवसर प्राप्त होते हैं। किन्तु आधुनिक समय में सामाजिक परिवर्तनों , सामाजिक गतिशीलताओं तथा जटिल अन्त:क्रियाओं के कारण सामूहिक जीवन की प्रवृत्ति में कमी दृष्टिगोचर हो रही है। परिणाम यह है कि विश्व स्तर पर जीवन का आनन्द खोता जा रहा है और मानसिक तनाव बढ़ते जा रहे हैं। सामूहिकता की प्रेरणा व्यक्ति को सुखमय एवं आनन्ददायक जीवन-यापन के लिए उत्साहित करती है। (7) तर्क-निर्णय एवं संकल्प – प्रायः व्यक्ति के जीवन में ऐसी स्थितियाँ आती हैं कि जब वह कोई उचित निर्णय नहीं ले पाता और मानसिक तनाव व संघर्ष के कारण व्याकुलता अनुभव करती है। ऐसी दशा में उपस्थित विकल्पों पर तर्क-वितर्क या विचरण करके तथा अभिप्रेरणाओं के गुण-दोषों पर विचार करके निर्णय की प्रक्रिया शुरु होती है। व्यक्ति कई विकल्पों में से सबसे ज्यादा उचित विकल्प के चुनाव का निर्णय लेता है और प्रेरण को कार्यान्वित करता है। यदि व्यक्ति अपने निर्णय को तत्काल कार्यान्वित नहीं कर पाता तो ऐसी अवस्था में उसे संकल्प की आवश्यकता पड़ती है। उदाहरणार्थ– पढ़ाई करने तथा नौकरी करने के बीच उत्पन्न मानसिक संघर्ष में तर्क-वितर्क के बाद एक युवक पढ़ाई करने का निर्णय लेता है और कष्ट उठाकर भी इस संकल्प को पूरा करता है। इस तरह से तर्क, निर्णय एवं संकल्प की प्रेरणाएँ व्यक्ति को मानसिक संघर्ष से निकालकर उपयुक्त निर्णय को क्रियान्वित करने हेतु संकल्पवान बनाती हैं। निष्कर्षत: प्रेरक मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और उनका व्यवहार एवं अनुभवों में विशिष्ट स्थान है।
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