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प्रायद्वीपीय पठार का वर्णन कीजिए।

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प्रायद्वीपीय पठार पुराने क्रिस्टलीय, आग्नेय तथा रूपांतरित शैलों से बना है। यह गोंडवाना भूमि के टूटने एवं अफवाह के कारण बना था इसीलिए यह प्राचीनतम भू-भाग का हिस्सा है। इस पठारी भाग में चौड़ी तथा छिछली घाटियाँ एवं गोलाकार पहाड़ियाँ हैं। इस पठार के दो मुख्य भाग हैं-‘मध्य उच्च भूमि तथा ‘दक्कन का पठार।

1. मध्य उच्चभूमि – नर्मदा नदी के उत्तर में प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग जो कि मालवा के पठार के अधिकतर भागों पर फैला है उसे मध्य उच्चभूमि के नाम से जाना जाता है। विंध्य श्रृंखला दक्षिण में मध्य उच्चभूमि तथा उत्तर-पश्चिम में अरावली से घिरी है।

2. दक्कन का पठार – यह एक तिकोना भूखंड है जो नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित है। उत्तर में इसके चौड़े आधार पर सतपुड़ा की श्रृंखला है जबकि महादेव, कैमूर की पहाड़ियाँ एवं मैकाल श्रृंखला इसके पूर्वी विस्तार हैं। दक्कन के पठार के पूर्वी एवं पश्चिमी सिरे पर क्रमशः पूर्वी तथा पश्चिमी घाट स्थित हैं। पठारी क्षेत्र बहुत पुरानी स्थलाकृति है जिसका क्षेत्र बहुत विशाल है।

इस पठार की एक प्रमुख विशेषता काली मिट्टी है जिसे दक्कन टैप कहा जाता है। इसका उद्गम ज्वालामुखीय है और इसलिए चट्टानें आग्नेय हैं। पूरा दक्कन का पठार विषुवतीय क्षेत्र में स्थित है। इसमें वर्षा मध्यमे होती है। दक्कन टैप काली लावा मिट्टी से बना है जो कपास की खेती के लिए बहुत लाभदायक है। प्रायद्वीपीय पठार के पश्चिमी एवं उत्तर पश्चिमी छोर पर अरावली पहाड़ियाँ स्थित हैं। ये गुजरात से दिल्ली तक दक्षिण-पश्चिम-उत्तरपूर्व दिशा में फैली हुई हैं।



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