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प्राकृत केवल अपढ़ों की नहीं अपितु, सुशिक्षितों की भी भाषा थी’ – द्विवेदीजी ने यह क्यों कहा है ?

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प्राक्त उस समय आम बोलचाल की भाषा थी। बौद्धग्रंथों की रचना प्राकृत में ही हुई थी। विद्वानों ने गाथा सप्तसती, कुमारपाल चरित, सेतुबंध महाकाव्य जैसे ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा में ही की। इसलिए द्विवेदीजी ने कहा ‘प्राकृत केवल अपड़ों की ही नहीं अपितु सुशिक्षितों की भी भाषा थी।’



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