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पारितन्त्र में ऊर्जा और खनिज पदार्थों के प्रवाह पर प्रकाश डालिए।

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सम्पूर्ण पारितन्त्र ऊर्जा के लिए सूर्यातप पर निर्भर करता है; अतः सभी प्रकार के पोषकों में ऊर्जा का प्रवाह सतत रूप में प्रतिपल होता रहता है। उत्पादकों को अपना भोजन बनाने के लिए सौर-विकिरण से ऊर्जा प्राप्त होती है। ऊर्जा का स्थानान्तरण उत्पांदकों से शाकाहारियों में और शाकाहारियों से मांसाहारियों में होता रहता है। इस प्रकार उत्पादकों शाकाहारियों तथा मांसाहारियों के निर्जीव या विघटित अवशेष, अपघटकों को ऊर्जा प्रदान करते हैं। अत: सूर्य से प्राप्त ऊर्जा का प्रवाह एक ही दिशा में होता रहता है तथा यह प्रवाहं तब तक जारी रहता है जब तक कि ऊर्जा विलीन नहीं हो जाती है। जीव-जन्तु भोजन से प्राप्त ऊर्जा का कुछ भाग तो पचा लेते हैं तथा शेष भाग श्वसन द्वारा ऊष्मा के रूप में बाहर निकल जाता है। मृदा से खनिज पदार्थों का पेड़-पौधों में प्रवाह उनकी वृद्धि एवं विकास में सहायक होता है। उपभोक्ता अपनी वृद्धि एवं विकास के लिए इन पोषकों का भरपूर उपयाग करते हैं। जब पेड़-पौधे और जीव-जन्तु । नष्ट अर्थात् काल-कवलित हो जाते हैं, तब जीवाणु और कवक जैसे अपघटक उन्हें अपना भोजन बना लेते हैं तथा उन्हें विघटित कर अजैव पोषकों में परिणत कर दते हैं। ये अजैव पोषक मृदा में विलीन होते रहते हैं तथा पेड़-पौधे पुन: उनका उपभोग करते हैं। इस प्रकार पारितन्त्र में खनिज पदार्थों की यह चक्रीय प्रक्रिया अबाध गति से चलती रहती है।



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