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Answer» न्यायिक समीक्षा का अर्थ न्यायिक समीक्षा का अर्थ है-एक कानून या आदेश की समीक्षा और वैधता निर्धारित करने के लिए न्यायपालिका की शक्ति को प्रदर्शित करना। विधायी कार्यों की न्यायिक समीक्षा का अर्थ वह शक्ति है जो विधायिका द्वारा पारित कानून को संविधान में निहित प्रावधानों और विशेषकर संविधान के भाग-3 के अनुसार सुनिश्चित करती है। निर्णयों की न्यायिक समीक्षा के मामले में, उदाहरण के लिए जब एक कानून को इस आधार पर चुनौती दी गयी कि इसे बिना किसी प्राधिकरण या अधिकार से विधायिका द्वारा पारित किया गया है, विधायिका द्वारा पारित किया गया कानून वैध है। या नहीं, इसके बारे में फैसला लेने का अधिकार अदालत के पास सुरक्षित होता है। इसके अलावा हमारे देश में किसी भी विधायिका के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि वे अदालतों द्वारा दिए गए निर्णय की अवज्ञा या उपेक्षा कर सकें। अदालतों के पास न्यायिक समीक्षा की व्यापक शक्तियाँ हैं। इन शक्तियों का बड़ी सावधानी और नियन्त्रण के साथ प्रयोग किया जाता है। इन शक्तियों की निम्न सीमाएँ हैं- ⦁ इसके पास केवल निर्णय तक पहुँचने में प्रक्रिया का सही ढंग से पालन किया गया है या नहीं देखने की ही अनुमति होती है, लेकिन स्वयं निर्णय लेने की अनुमति नहीं होती है। ⦁ इसे केवल हमारे सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय जैसी अदालतों को सौंपा जाता है। ⦁ जब तक बिल्कुल जरूरी न हो तब तक नीतिगत मामलों और राजनीतिक सवालों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। ⦁ एक बार कानून के पारित होने पर यह स्थिति बदलने के साथ असंवैधानिक हो सकता है। यह शायद कानून प्रणाली में खालीपन पैदा कर सकती है। इसलिए यह कहा जा सकता है। कि अदालत द्वारा दिए गए निर्देश तभी बाध्यकारी होंगे जब तक कानून अधिनियमित नहीं हो जाते हैं अर्थात् यह प्राकृतिक रूप से अस्थायी है। ⦁ यह कानून की व्याख्या और उसे अमान्य कर सकता है, लेकिन खुद कानून नहीं बना सकता है।
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