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निराला जी द्वारा रचित ‘दान’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।

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सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा लिखित ‘दान’ कविता में दु:खी मानवों की उपेक्षा करके वानरों, कौओं आदि को भोजन खिलाने वाले मनुष्यों पर व्यंग्य किया गया है। ‘दान’ कविता का सारांश निम्न प्रकार है

सारांश – एक दिन प्रात:काल कवि घूमते-घूमते नदी के पुल पर जा पहुँचा और सोचने लगा कि यह प्रकृति-जो जैसा करता है, उसे वैसा ही फल देती है। संसार का सौन्दर्य, गीत, भाषा आदि सभी किसी-न-किसी रूप में प्रकृति का दान पाते हैं और सभी यही कहते हैं कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है।

कवि ने देखा कि पुल के ऊपर बहुत से बन्दर बैठे हैं और मार्ग में एक ओर काले रंग का मरा हुआ-सा अत्यन्त दुर्बल भिखारी बैठा हुआ है। जैसे ही कवि ने झुककर नीचे की ओर देखा तो उन्हें वहाँ पर शिवजी के ऊपर चावल, तिल और जल चढ़ाते हुए एक ब्राह्मण दिखलायी दिया तत्पश्चात् वह ब्राह्मण एक झोली लेकर ऊपर आया। बन्दर उसे देखकर वहाँ आ गये। उसने बन्दरों को झोली से निकालकर पुए दे दिये और उसे भिखारी की ओर मुड़कर भी नहीं देखा। यह देखकर कवि को दुःख हुआ। वह व्यंग्य के साथ बोला–हे मानव, तू धन्य है।



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