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निबन्ध:पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं

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प्रस्तावना–स्वाधीनता में महान् सुख है और पराधीनता में किंचित्-मात्र भी सुख नहीं। पराधीनता दु:खों की खान है। स्वाभिमानी व्यक्ति एक दिन भी परतन्त्र रहना पसन्द नहीं करता। उसका स्वाभिमान परतन्त्रता के बन्धन को तोड़ देना चाहता है। पराधीन व्यक्ति को चाहे कितना ही सुख, भोग और ऐश्वर्य प्राप्त हो, वह उसके लिए विष तुल्य ही है। पराधीन व्यक्ति की बुद्धि कुण्ठित हो जाती है, उसकी योग्यता का विकास अवरुद्ध हो जाता है, स्वतन्त्र चिन्तन का प्रवाह रुक जाता है और उसको पग-पग पर अपमानित व प्रताड़ित होना पड़ता है।

स्वतन्त्रता का सुख-मुक्त गगन में उन्मुक्त उड़ान भरने में जो आनन्द है, वह पिंजरे में कहाँ ? कल-कल नाद करने वाली नदियाँ भी पर्वतों की छाती को चीरकर आगे बढ़ जाती हैं। सिंह और चीते जैसे हिंसक पशु भी कठघरा तोड़कर बाहर निकलने को बेचैन रहते हैं।  हिरन, खरगोश आदि वन्य जीव तो मुक्त विचरण कर प्रसन्न रहते हैं। जब पशु-पक्षी-फूल-पत्ती आदि को भी स्वतन्त्रता से इतना उन्मुक्त प्यार है तो विवेकशील व्यक्ति परतन्त्र रहना कैसे पसन्द करेगा ? एक अंग्रेज लेखक का यह कथन कितना सत्य है– ‘It is better to be in hell than to be a slave in heaven.’ अर्थात् स्वर्ग में दास बनकर रहने से नरक में रहना कहीं अधिक अच्छा है। महर्षि व्यास ने भी प्रकारान्तर से यही बात कही है-‘पारतन्त्र्यं महोदुःखं स्वातन्त्र्यं परमं सुखम्।

परतन्त्रता का दुःख-परतन्त्रता वास्तव में मानव के लिए कलंक है। उसे जीवन के हर क्षेत्र में पराश्रित रहना पड़ता है। उसकी प्रतिभा, कला-कौशल और योग्यता दूसरों के लिए होती है। उसका लाभ वह स्वयं नहीं ले पाता। वह पराधीनता के बन्धन में जकड़ा हुआ होने से आत्महीनता और तुच्छता का अनुभव करता है। वह अपने जीवन को उपेक्षित और पीड़ित समझता है और ऐसे जीवन को स्वप्न में भी नहीं चाहता।

पराधीनता अभिशाप है। पराधीनता मानव, समाज अथवा राष्ट्र के लिए कभी हितकर नहीं हो सकती। पराधीनता से उन्नति और विकास के सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। पराधीन राष्ट्र सभी सुख-साधनों से हीन होकर दूसरे शासकों की कठपुतली बन जाते हैं।

पराधीनता के विविध रूप-पराधीनता चाहे व्यक्ति की हो या राष्ट्र की दोनों ही गर्हित हैं। जिस प्रकार व्यक्तिगत पराधीनता से व्यक्ति का विकास रुक जाता है, उसी प्रकार राष्ट्र की पराधीनता से राष्ट्र पंगु बन जाता है। पराधीनता के अनेकानेक रूप होते हैं, जिनमें मुख्य निम्नलिखित हैं–

(क) राजनीतिक-राजनीतिक पराधीनता सबसे भयावह हैं। इसके अन्तर्गत एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र का गुलाम बनकर रहना पड़ता है। राजनीतिक पराधीनता शासित देश के गौरव व सम्मान को खत्म कर उसे उपहास व घृणा का पात्र बना देती है।

(ख) आर्थिक–आज किसी देश को पराधीन रख पाना बहुत कठिन है। इसलिए शक्तिशाली राष्ट्रों; विशेषकर अमेरिका ने एक नया तरीका अपनाया है। वह राष्ट्रों को आर्थिक सहायता यो ऋण देकर उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है। यह पराधीनता भविष्य में बहुत कष्टकर होती है।

(ग) सांस्कृतिक—इसका तात्पर्य यह है कि किसी देश पर अपनी भाषा और साहित्य थोपकर  मानसिक दृष्टि से उसे अपना गुलाम बना लिया जाए। अंग्रेजों ने भारत में अंग्रेजी का प्रचलन कर तथा पाश्चात्य संस्कृति के प्रचार के माध्यम से देश को मानसिक गुलामी प्रदान की है।

(घ) सामाजिक-सामाजिक पराधीनता से आशय है–विभिन्न वर्गों में असमानता का होना। अंग्रेजों ने इसके लिए विभिन्न वर्गों में भेदभाव को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने जातीयता, प्रान्तीयता व छुआछूत को भड़काकर देश में सर्वत्र अशान्ति और द्वेष-भावना को जाग्रत किया।

स्वाधीनता की महत्ता–स्वाधीनता का कोई सानी नहीं। स्वाधीनता की शीतल छाया में संस्कृति, सभ्यता और समृद्धि बढ़ती है। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसकी अनुभूति करते हुए ईश्वर से कामना की है-“जहाँ मन में कोई डर न हो और मस्तक गर्व से ऊँचा हो, जहाँ ज्ञान के प्रवाह पर कोई प्रतिबन्ध न हो और स्पष्ट विचारों की निर्मल सरिता निरर्थक रूढ़िग्रस्तता के मरुस्थल में लुप्त न हो जाए, हे परमपिता! ऐसी स्वाधीनता के स्वर्ग में मेरा देश जाग्रत हो।”

स्वाधीनता के लिए संघर्ष-स्वतन्त्रता मनुष्य को जन्मसिद्ध अधिकार है। इस अधिकार को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक समाज और प्रत्येक राष्ट्र को सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए। आज हम भारतवासी राजनीतिक दृष्टिकोण से स्वाधीन हैं, परन्तु हम आज भी मानसिक रूप से विदेशियों (अंग्रेजों) के गुलाम हैं। हमें शीघ्र ही इस मानसिक गुलामी से भी मुक्त होना चाहिए।

उपसंहार-आज हमारा सौभाग्य है कि हम मुक्त भूमि पर मुक्त गगन के नीचे मुक्ति-गीत गा रहे हैं। हमारा देश चिर स्वतन्त्र बना रहे, इसके लिए हमें आपसी द्वेषभाव व वर्ग-विद्वेष को भूलकर राष्ट्रीय चेतना जाग्रत कर देश के गौरव और अक्षुण्णता को कायम रखने के लिए संकल्प लेना चाहिए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक सम्पूर्ण देश एक है; अत: एकत्व की भावना को दृढ़ और मूर्त रूप देकर हमें गौरवशाली राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए।



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