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निबन्ध:होली

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प्रस्तावना-हमारे देश में अनेक धर्मों व सम्प्रदायों के  मानने वाले व्यक्ति निवास करते हैं। सभी की अपनी-अपनी परम्पराएँ, मान्यताएँ, रहन-सहन व वेशभूषा हैं। सभी के द्वारा मनाये जाने वाले त्योहार भी। भिन्न-भिन्न हैं। यही कारण है कि हर मास किसी-न-किसी धर्म से सम्बन्धित त्योहार आते ही रहते हैं। कभी हिन्दू दीपावली की खुशियाँ मनाते हैं तो ईसाई प्रभु यीशु के जन्म-दिवस पर चर्च में प्रार्थना करते हैं तो मुसलमान ईद के अवसर पर गले मिलते व नमाज अदा करते दिखाई देते हैं। रंगों में सिमटा, खुशियों का त्योहार होली भी इसी प्रकार देश-भर में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह शुभ पर्व प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा के सुन्दर अवसर की शोभा बढ़ाने आता है।

प्राकृतिक वातावरण-रंगों का त्योहार होली वसन्त ऋतु का सन्देशवाहक है। इस ऋतु में मानव-मात्र के साथ-साथ प्रकृति भी इठला उठती है। चारों ओर प्रकृति के रूप और सौन्दर्य के दृश्य दृष्टिगत होते हैं। पुष्प-वाटिका में पपीहे की तान सुनने से मन-मयूर नृत्य कर उठता है। आम के झुरमुट से कोयल की कूक सुनकर तो हृदय भी झंकृत हो उठता है। ऋतुराज वसन्त का स्वागत अत्यधिक शान से सम्पन्न होता है। चारों ओर हर्ष और उल्लास छा जाता है।

धार्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोण-होलिकोत्सव धार्मिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। एकता, मिलन और हर्षोल्लास के प्रतीक इस त्योहार को मनाने के पीछे अनेक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। प्रमुखतः इस उत्सव का आधार हिरण्यकशिपु नामक अभिमानी राजा और उसके ईश्वर-भक्त पुत्र प्रह्लाद की कथा है। कहते हैं कि हिरण्यकशिपु बड़ा अत्याचारी था, किन्तु उसी का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर का अनन्य भक्त था। जब हिरण्यकशिपु ने यह बात सुनी तो वह बड़ा ही क्रोधित हुआ। उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश करे। होलिका को यह वरदान था कि अग्नि उसको जला नहीं सकती थी,  किन्तु ‘जाको राखे साइयाँ, मारन सकिहैं कोय’ के अनुसार होलिका तो आग में जल गयी और प्रह्लाद को बाल भी बॉका नहीं हुआ। उसी समय से परम्परागत रूप से होली के त्योहार के एक दिन पूर्व होलिका-दहन का आयोजन होता है। होली के शुभ अवसर पर जैन धर्मावलम्बी आठ दिन तक सिद्धचक्र की पूजा करते हैं। यह ‘अष्टाह्निका’ पर्व कहलाता है।

होली का राग-रंग-प्रथम दिन होलिका का दहन होता है। बच्चे घर-घर से लकड़ियाँ एकत्रित करके चौराहों पर होली तैयार करते हैं। सन्ध्या समय महिलाएँ इसकी पूजा करती हैं और रात्रि में यथा मुहूर्त होलिका दहन करते हैं। होलिका दहन के समय लोग जौ की बालों को भूनकर खाते भी हैं। होलिका का दहन इस बात का द्योतक है कि मानव अपने क्रोध, मान, माया और लोभ को भस्म कर अपने दिल को उज्ज्वल व निर्मल बनाये। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय है।

होलिंका के अगले दिन दुल्हैंडी मनायी जाती है। इस दिन मनुष्य अपने आपसी बैर-विरोध को भुलाकर आपस में एक-दूसरे पर रंग डालते हैं, गुलाल लगाते हैं और गले मिलते हैं। चारों तरफ हँसीमजाक का वातावरण फैल जाता है। क्या अमीर और क्या गरीब, सभी होली के रंगों से सराबोर हो उठते हैं। सारा वातावरण ही रंगमय प्रतीत होता है। बच्चे, औरतें व युवक सभी आनन्द व उमंग से भर उठते हैं। ब्रज की होली बड़ी मशहूर है। देश-विदेश के असंख्य लोग इसे देखने आते हैं। नगरों में सायंकाल अनेक स्थानों पर होली मिलन समारोह का आयोजन होता है जिसमें हास्य-कविताएँ, लतीफे व अन्य रंगारंग कार्यक्रम भी होते हैं।

त्योहार के कुछ दोष-होली के इस पवित्र व प्रेमपूर्ण त्योहार को कुछ लोग अश्लील आचरण और गलत हरकतों द्वारा गन्दा बनाते हैं। कुछ लोग एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं और गन्दगी फेंकते हैं। चेहरों पर कीचड़, पक्के रंग  या तारकोल पोतने तथा राहगीरों पर गुब्बारे फेंकते हैं। कुछ लोग भाँग, शराब आदि पीकर हुड़दंग करते हैं। ऐसी अनुचित व अनैतिक हरकतें इस पर्व की पवित्रता को दूषित करती हैं।

उपसंहार-होली प्रेम का त्योहार है, गले मिलने का त्योहार है, बैर और विरोध को मिटाने का त्योहार है। इस दिन शत्रु भी अपनी शत्रुता भुलाकर मित्र बन जाते हैं। यह त्योहार अमीर और गरीब के भेद को कम करके वातावरण में प्रेम की ज्योति को प्रज्वलित करता है। इसे एकता के त्योहार के  रूप में मनाया जाना चाहिए। निस्सन्देह होली का पर्व हमारी सांस्कृतिक धरोहर है और इस परम्परा का पूर्ण निर्वाह करना। हमारा दायित्व है।



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