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निबन्ध:आचारः परमो धर्मः |
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Answer» प्रस्तावना-सदाचार मनुष्य का लक्षण है। सदाचार को धारण करना मानवता को प्राप्त करना है। सदाचारी व्यक्ति समाज में पूजित होता है। आचारहीन का कोई भी सम्मान नहीं करता, कोई भी उसका साथ नहीं देता, वेद भी उसका कल्याण नहीं करते।’ आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः’-अर्थात् वेद भी आचारहीन व्यक्ति का उद्धार नहीं कर सकते। सदाचार का अर्थ-सदाचार’ शब्द संस्कृत के ‘सत्’ और ‘आचार’ शब्दों से मिलकर बना है। इसका अर्थ है-सज्जन का आचरण अथवा शुभ आचरण। सत्य, अहिंसा, ईश्वर-विश्वास, मैत्री-भाव, महापुरुषों का अनुसरण करना आदि बातें सदाचार में गिनी जाती हैं। इस सदाचार को धारण करने वाला व्यक्ति सदाचारी कहलाता है। इसके विपरीत आचरण करने वाले व्यक्ति को दुराचारी कहते हैं। सच्चरित्रता-सदाचार का महत्त्वपूर्ण अंग सच्चरित्रता है। सच्चरित्रता सदाचार का सर्वोत्तम साधन है। प्रसिद्ध कहावत है कि “यदि धन नष्ट हो जाए तो मनुष्य का कुछ भी नहीं बिगड़ता, स्वास्थ्य बिगड़ जाने पर कुछ हानि होती है और चरित्रहीन होने पर मनुष्य का सर्वस्व नष्ट हो जाता है। मनुष्य में जो कुछ भी मनुष्यत्व है, उसका प्रतिबिम्ब उसका चरित्र है। आचारहीन मनुष्य तो निरा पशु या राक्षस है। सच्चरित्रता की सबसे आवश्यक बात है-भय की प्रवृत्ति पर नियन्त्रण करना। भय की प्रवृत्ति को वश में करके ही हमारे हृदय में ऊँचे आदर्श और स्वस्थ प्रेरणाएँ पनप सकती हैं। जो भय के वश में हो गया। हो, उसके चरित्र का विकास नहीं होता। उसकी शक्ति, आत्मबल और महत्त्वाकांक्षाएँ दुर्बल हो जाती हैं। इसी भय के कारण वह सत्य बात नहीं कर पाता और कदम-कदम पर कायरों की भाँति दूसरों के सामने घुटने टेकता है। जीवन में अच्छे चारित्रिक संस्कारों का विकास हो सके, इसके लिए आवश्यक है कि बुरे वातावरण से स्वयं को दूर रखा जाए। यदि आपका वातावरण दूषित है तो आपका चरित्र भी गिर जाएगा। इसीलिए अपने चरित्र-निर्माण के लिए सदैव भले या बुद्धिमान् लोगों को संग करना चाहिए, बुरे लोगों का साथ छोड़ देना चाहिए तथा शुभ विचारों को मन में लाना चाहिए। धर्म की प्रधानता–भारत एक आध्यात्मिक देश है। यहाँ की संस्कृति एवं सभ्यता धर्मप्रधान है। धर्म से मनुष्य की लौकिक एवं आध्यात्मिक उन्नति होती है। लोक और परलोक की भलाई धर्म से ही सम्भव है। धर्म आत्मा को उन्नत करता है और उसे पतन की ओर जाने से रोकता है। धर्म के यदि इस रूप को ग्रहण किया जाए तो धर्म को सदाचार का पर्यायवाची भी कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में सदाचार में वे गुण हैं, जो धर्म में हैं। सदाचार के आधार पर ही धर्म की स्थिति सम्भव है। जो आचरण मनुष्य को ऊँचा उठाये, उसे चरित्रवान् बनाये, वह धर्म है, वही सदाचार है। सदाचारी होना ही धर्मात्मा होना है। महाभारत में कहा गया है-‘आचारः धर्मः’ अर्थात् धर्म की उत्पत्ति आचार से ही होती है। शील : सदाचार की शक्ति-शील मानसिक उच्छंखलता के लिए अंकुश है। सदाचार मनुष्य की काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि वृत्तियों से रक्षा करता है। अहिंसा की भावना से मन की क्रूरता समाप्त होती है। और उसमें करुणा, सहानुभूति एवं दया की भावना जाग्रत होती है। क्षमा, सहनशीलता आदि गुणों से मनुष्य का नैतिक उत्थान होता है और मानव से लेकर पशु-पक्षी तक के प्रति उदारता की भावना पैदा होती है। इस प्रकार सदाचार का गुण धारण करने से मनुष्य का चरित्र उज्ज्वल होता है, उसमें कर्तव्यनिष्ठा एवं धर्मनिष्ठा पैदा होती है जो उसे अलौकिक शक्ति की प्राप्ति कराने में सहायक होती है। सदाचार : सम्पूर्ण गुणों का सार-सदाचार मनुष्य के सम्पूर्ण गुणों का सार है, जो उसके जीवन को सार्थकता प्रदान करता है। इसकी तुलना में विश्व की कोई भी मूल्यवान् वस्तु नहीं टिक सकती। व्यक्ति चाहे संसार के वैभव का स्वामी हो या सम्पूर्ण विद्याओं का पण्डित अथवा शस्त्र-संचालन में कुशल योद्धा, यदि वह सदाचार से रहित है तो कदापि पूजनीय नहीं हो सकता। सदाचार का बल संसार की सबसे बड़ी शक्ति है, जो कभी भी पराजित नहीं हो सकती। सदाचार के बल से मनुष्य मानसिक दुर्बलताओं का नाश करता है। जिस प्रकार दिग्दर्शक यन्त्र के बिना जहाज निर्दिष्ट स्थान पर नहीं पहुँच सकता, उसी प्रकार सदाचार के बिना मनुष्य कभी भी अपने जीवन-लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। उपसंहार-वर्तमान युग में पाश्चात्य पद्धति की शिक्षा के प्रभाव से भारत के युवक-युवतियाँ सदाचार को निरर्थक समझने लगे हैं तथा सदाचार-विरोधी जीवन को आदर्श मानने लगे हैं। इसी कारण युवा वर्ग पतन की ओर बढ़ रहा है तथा उसके जीवन में विश्रृंखलता, अनुशासनहीनता, उच्छृखलता बढ़ती जा रही है। लुटते हुए आचरण की रक्षा के लिए युवा वर्ग को सचेत होना चाहिए। उन्हें राम, कृष्ण, हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर, गाँधी एवं नेहरू के चरित्र को आदर्श मानकर सदाचरणप्रिय होना चाहिए। राष्ट्र का वास्तविक अभ्युत्थान तभी हो सकेगा, जब हमारे देशवासी सदाचारी बनेंगे। |
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