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मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।

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बिस्मिल्ला खाँ अपने धर्म के प्रति समर्पित व्यक्ति थे । मुहर्रम के दिनों में वे शहनाई नहीं बजाते थे। जब मुहर्रम आता था, जिसमें शिया मुसलमान हजरत इमामहुसैन और उनके वंशजों के प्रति पूरा 10 दिन का शोक मनाते थे। उस समय वे शहनाई नहीं बजाते थे। न ही किसी संगीत के कार्यक्रम में शरीक होते थे। मुहर्रम के आठवें दिन उनके लिए विशेष महत्त्वपूर्ण था। उस दिन खा साहब खड़े होकर शहनाई बजाते थे व दालमंडी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए नोहा बजाते जाते थे। यो मुहर्रम का दिन खाँ साहब के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण है।



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