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‘मन पर किसी का बस नहीं; वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।” टुन्नू के इस कथन में उसका दुलारी के प्रति किशोर जनित प्रेम व्यक्त हुआ है, परंतु उसके विवेक ने उसके प्रेम को किस दिशा की ओर मोड़ा? |
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Answer» “मन पर किसी को बस नहीं, वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।”—यह टुन्नू के किशोर मन की अभिव्यक्ति है। टुन्नू जहाँ सोलह-सत्रह वर्षीय किशोर था वही दुलारी यौवन के अस्ताचल पर खड़ी थी। इस तरह तो टुन्नू का शारीरिक सौंदर्य के प्रति कोई आकर्षण नहीं था। उसके मन में दुलारी के शरीर के प्रति लोभ नहीं बल्कि पवित्र तथा सम्मानीय स्नेह था। होली के अवसर पर दुलारी को सूती खादी साड़ी देने पर दुलारी ने जब उसकी उपेक्षा की तो उसने कहा कि मैं प्रतिदान में तुमसे कुछ माँगता तो नहीं हूँ। दुलारी की उपेक्षा के प्रतिक्रिया स्वरूप टुन्नू के विवेक ने दुलारी के प्रति बढ़ते हुए प्रेम को देश-प्रेम की ओर मोड़ दिया। वह आज़ादी के दीवानों के साथ कार्य करने लगा। विदेशी वस्त्रों की होली जलाने वाली टोली में सम्मिलित हो गया। इस देश-प्रेम की भावना के कारण अली सगीर के गालियाँ देने पर प्रतिवाद करने की हिम्मत कर बैठता है और उसके ठोकर मारने पर मृत्यु को प्राप्त होता है। इस तरह उसका बलिदान अंग्रेज़ खुफिया पुलिस के रिपोर्टर का विरोध करने पर हुआ और उसका देश-प्रेम सफल हुआ। |
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