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महादेवी वर्मा की काव्य-यात्रा में सुभद्राकुमारी चौहान का क्या योगदान था ?

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महादेवी वर्मा को छात्रावास में सुभद्राजी का साथ मिला। उनके कमरे में जो चार छात्राएँ थीं, उनमें से सुभद्राजी एक हैं। महादेवी उस समय तुकबंदी कर लेती थी। महादेवी ने अपनी माँ से प्रेरणा पाकर ब्रजभाषा में काव्य लिखना प्रारंभ कर दिया था। किन्तु सुभद्राजी खड़ी बोली में कविता लिखती थी। महादेवी ने उनका अनुकरण कर उनके जैसी कविता लिखने लगी। उस समय सुभद्राजी प्रतिष्ठित कवयित्री थीं।

महादेवी वर्मा उनसे छिपा-छिपाकर कविता लिखती थी। एक बार सुभद्राजी ने महादेवी वर्मा को पूछा कि ‘महादेवी, तुम कविता लिखती हो ? तो महादेवी ने डर के मारे ‘नहीं’ कह दिया। फिर सुभद्राजी ने उनके डेस्क के किताबों की तलाशी ली। उनमें से बहुत-सी कविताएँ निकली। सुभद्राजी ने एक हाथ से कागज़ पकड़ा, एक हाथ से महादेवी को और पूरे हॉस्टल में दिखा आई कि ये कविता लिखती हैं।

इसके बाद दोनों की मित्रता हो गई। जब लड़कियाँ खेलती तो सुभद्रा व महादेवी डाल पर बैठकर कविता का सर्जन करती। दोनों कवि-सम्मेलन में काव्य-पाठ करने लगी। महादेवी वर्मा को काव्य-पाठ के लिए प्रथम पुरस्कार मिलता था। उन्होंने कम से कम सौ पदक मिले होंगे। यो सुभद्राकुमारी के सानिध्य में आकर महादेवी वर्मा की कविताओं का परिमार्जन होता रहा, वे उनकी गणना श्रेष्ठ कवत्रियों में होने लगी। महादेवी वर्मा आगे चलकर छायावाद का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ मानी गई। इस प्रकार महादेवी वर्मा की काव्य-यात्रा में सुभद्राकुमारी का महत्त्वपूर्ण योगदान था।



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