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महादेवी जी के इस संस्मरण को पढ़ते हुए आपके मानस-पटल पर भी अपने बचपन की कोई स्मृति उभरकर आई होगी, उसे संस्मरण शैली में लिखिए।

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मेरे हिन्दी के अध्यापक ने मुझे पन्द्रह अगस्त के शुभ अवसर पर एक स्पीच तैयार करवाया था। मैंने उस स्पीच को अच्छी तरह से याद कर लिया था। पन्द्रह अगस्त के दिन मुझे दो कार्यक्रम के बाद अपना स्पीच देना था। जैसे ही उद्घोषक कोई घोषणा करता तो मैं भीतर से काँप जाता था। हृदय की गति तेज हो गई थी। मैंने जो स्पीच याद किया था उसे बार-बार मन में दोहरा रहा था।

तभी उद्घोषक ने मेरे नाम की घोषणा की। मैं मंच पर पहुँचा। थोड़ा संकुचाया किन्तु अपनी तेज और मधुर आवाज से मैंने अपने स्पीच की शुरुआत की। धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ता गया और मेरी आवाज का जादू चल गया। स्पीच के खत्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट से सभी ने मेरा स्वागत किया। भारतमाता की जय बोलकर मैं मंच से नीचे उतर गई। इस दिन को मैं कभी नहीं भूल सकता।



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