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मैं गरुड़, कृष्ण ! मैं पक्षिराज, सिर पर न चाहिए मुझे ताज,दुर्योधन पर है. विपद धोर, सकता न किसी विध उसे छोड,रणखेत पाटना है. मुझको,अहि.पाश काटना है. मुझको।

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कर्ण श्रीकृष्ण से कहता है कि इस समय मेरी स्थिति गरुड़ पक्षी के समान है। मुझे राजमुकुट नहीं पहनना है। इस समय दुर्योधन भारी संकट में है। युद्धरूपी नागपाश ने उसे जकड़ रखा है। मुझे दुर्योधन के इस नागपाश को काटना है-दुर्योधन को बुद्ध में विजय दिलाना है। मुझे गरुड़ की तरह अपना दायित्व निभाना है।



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