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मानवाधिकार आयोग के विषय में आप क्या जानते हैं? इसके क्या कार्य हैं?

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किसी भी संविधान द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों की वास्तविक पहचान तब होती है जब उन्हें लागू किया जाता है। समाज के गरीब, अशिक्षित और कमजोर वर्ग के लोगों को अपने अधिकारों का प्रयोग करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पी०यू०सी०एल०) या पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पी०यू०डी०आर०) जैसी संस्थाएँ अधिकारों के हनन पर दृष्टि रखती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2000 में सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में उच्चतम न्यायालय का एक पूर्व न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय का एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश तथा मानवाधिकारों के सम्बन्ध में ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले दो और सदस्य होते हैं।

मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतें मिलने पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग स्वयं अपनी पहल पर या किसी पीड़ित व्यक्ति की याचिका पर जाँच कर सकता है। जेलों में बन्दियों की स्थिति का अध्ययन करने जा सकता है, मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध कर सकता है या शोध को प्रोत्साहित कर सकता है। आयोग को प्रतिवर्ष हजारों शिकायतें प्राप्त होती हैं। इनमें से अधिकतर हिरासत में मृत्यु, हिरासत के दौरान बलात्कार, लोगों के गायब होने, पुलिस की ज्यादतियों, कार्यवाही न किए जाने, महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार आदि से सम्बन्धित होती हैं। मानवाधिकार आयोग का सर्वाधिक प्रभावी हस्तक्षेप पंजाब में युवकों के गायब होने तथा गुजरात-दंगों के मामले में जाँच के रूप में रहा। आयोग को स्वयं मुकदमा सुनने का अधिकार नहीं है। यह सरकार या न्यायालय को अपनी जाँच के आधार पर मुकदमे चलाने की सिफारिश कर सकता है।



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