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कविता का सरल अर्थ : (1) पीपल होती तुम …… ठंडी होती है दोपह(2) ढिबरी थीं दीदी ……. हम बड़े होते गए।(3) नदी होती तो …. किनारों पर चमकते।(4) चट्टान थीं दीदी …… उड़ते तुम्हारे भीतर।(5) वहाँ झूले पड़े ……. गुम हो गई थीं।(6) दीदी, अब …….. पतंग और खिलौने।(7) अब तो ढिबरी ….. समझता होगा।(8) हमारा क्या है ……. तुम्हारी तरह।

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(1) पीपल होती तुम …… ठंडी होती है दोपहर।

कवि कहते हैं कि दीदी! यदि तुम घर के पिछवाड़े का छायादार पीपल का वृक्ष होतीं, तो हम तुम्हारी खूब हरी-हरी घनी टहनियों के बीच हारिल पक्षी बनकर अपना घर बसाते।

दीदी, हारिल भी हमारी तरह ही होते हैं, जिनका कोई घर नहीं होता अर्थात वे घोंसला बनाकर किसी एक स्थान पर स्थायी रूप से कभी नहीं रहते। वे कहीं दूर पहाड़ों से उड़कर आते हैं और दूर जंगलों में उड़ जाते हैं। दीदी, पीपल की छांह दोपहर में तुम्हारी तरह ही ठंडी होती है।

(2) ढिबरी थीं दीदी ……. हम बड़े होते गए।

दीदी, तुम तो उस ढिबरी की तरह थौं, जो हमारे जीवन के अभावों रूपी तेल में अपनी कपास की बाती डुबोकर जलती रही थीं। इसके प्रकाश में हमने पहले पहल सीखा था अक्षर लिखना और सुना था आपसे अनुभवों से भरे किस्से आपके मुंह से। आप अपना प्रकाश फैलाती रहीं और आपके ज्ञान के प्रकाश से घर की दीवारें और छप्पर के तिनके आलोकित हो गए। अर्थात् आपका ज्ञान सर्वत्र व्याप्त हो गया और आपके ज्ञान की रोशनी में हम बड़े होते रहे।

(3) नदी होती तो …. किनारों पर चमकते।

दीदी, यदि आप नदी होती, तो हम मछलियाँ बनकर किसी चमकदार लहर में उत्साह से छुपते। कभी-कभी सीपी बनकर अपने अंदर बूंदें लेते और मोती बन जाने पर हम किनारों पर चमकते।

(4) चट्टान थीं दीदी …… उड़ते तुम्हारे भीतर।

दीदी, तुम दृढ़ चट्टान की भाँति हुआ करती थीं। अनुशासन के कठोर नियमों में तनिक भी कहीं किसी नरमी का आभास नहीं होता था। हम लोग ही थे, जो कभी पतंग उड़ाकर हलचल, पैदा कर देते थे।

दीदी, आप चट्टान की भाँति थीं और आपके भीतर किसी के लिए कोई स्थान था, तो वह छोटे-छोटे परिदों के लिए था, जो आपके अंदर उड़ते और फड़फड़ाते थे।

(5) वहाँ झूले पड़े ……. गुम हो गई थीं।

दीदी, (आपके कड़े अनुशासन के बीच) वहाँ हमारे लिए झूले डाले गए थे। हमारे खेलने के लिए गद्रे रखे गए थे। इतना ही नहीं मालदह आम हमारे लिए पकाया जाता था। पर हमारी गेंदें वहाँ गुम हो गई थीं। गेंद खेलने की अनुमति हमें नहीं थी।

(6) दीदी, अब …….. पतंग और खिलौने।

दौदी, अब तो आप अपने दूसरे घर की नीव की ईट हो चुकी हैं। दीदी, आपकी इस नई दुनिया में कहीं हमारी खोई हुई गेंदें और खोए हुए खिलौने होंगे।

(7) अब तो ढिबरी ….. समझता होगा।

दीदी, अब तो आप अपने नए ऑगन की ढिबरी बनकर वहाँ ज्ञान का प्रकाश फैला रही हैं। अब आपके घर का कोई और बचपन पहले-पहल अक्षर पहचानता होगा, आपके मुंह से आपके अनुभवों के चक किस्से सुनता होगा और वह इस तरह दुनिया के बारे में जानतासमझता होगा।

(8) हमारा क्या है ……. तुम्हारी तरह।

दीदी, हमारी चिंता मत करो। हमारा क्या है? हम तो हारिल की तरह हैं। वर्ष दो वर्ष में कभी आएंगे और मेहमान की तरह दो-चार दिन ठहरकर फिर निकल जाएंगे कहीं और! दीदी, हमने अपना कोई स्थायी ठिकाना बनाया ही नहीं। कहीं स्थायी रूप से निवास नहीं किया आज तक। दीदी, आपकी तरह हमारा जीवन भी बहुत कठिन है।



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